चीन को लेकर विदेश मंत्री और जनरल रावत के बयानों में अंतर क्यों

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जहां एक तरफ़ भारत के चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत ने चीन को लेकर सैन्य विकल्प की बात की थी वहीं, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन के साथ सीमा विवाद के समाधान के लिए कूटनीतिक विकल्प पर ज़ोर दिया है.
रेडिफ़ डॉट कॉम को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने भारत-चीन सीमा विवाद पर बात की. उन्होंने कहा, “पिछले दशक में देपसांग, चुमार, डोकलाम पर पैदा हुए विवाद एक-दूसरे से अलग थे लेकिन उनका समाधान कूटनीतिक प्रयासों से हुआ. मैं वर्तमान स्थिति की गंभीरता या जटिल प्रकृति को कम नहीं बता रहा. हमें अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिये जो भी ज़रूरी है करना होगा.”
उन्होंने कूटनीतिक समाधान में यथास्थिति बनाए रखने पर भी ज़ोर दिया. एस जयशंकर ने कहा कि जब बात समाधान की हो तो ये सभी समझौतों और सहमतियों का सम्मान करते हुए होना चाहिए, ना कि एकतरफ़ा ढंग से यथास्थिति में बदलाव का प्रयास करके. हम सैन्य और राजनयिकों दोनों माध्यमों से चीन से बात कर रहे हैं. ये दोनों एकसाथ चलते हैं.
इससे पहले जनरल बिपिन रावत ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में चीन के मसले पर सैन्य विकल्प होने की बात कही थी. उन्होंने कहा था कि पूर्वी लद्दाख में चीनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा किए गए अतिक्रमण से निपटने के लिए भारत के पास एक सैन्य विकल्प मौजूद है, लेकिन इसका इस्तेमाल तभी किया जाएगा जब दोनों देशों की सेनाओं के बीच बातचीत और राजनयिक विकल्प निष्फल साबित हो जाएगे.
जनरल रावत ने कहा था, "डिफ़ेंस सेवाओं को ज़िम्मेदारी दी जाती है कि वो एलएसी की निगरानी करें और घुसपैठ को रोकने के लिए अभियान चलाएं. किसी भी ऐसी गतिविधि को शांतिपूर्वक हल करने और घुसपैठ को रोकने के लिए सरकार की तरफ़ से संपूर्ण दृष्टिकोण को अपनाया जाता है. लेकिन सीमा पर यथास्थिति बहाल करने में सफलता नहीं मिलती तो फ़ौज सैन्य कार्रवाई के लिए हमेशा तैयार रहती है."
इसके अलावा एस जयशंकर ने मौजूदा स्थिति को सबसे गंभीर बताया. उन्होंने कहा, “ये 1962 के बाद वाक़ई सबसे गंभीर स्थिति है. 45 सालों बाद इस सीमा पर सैनिकों की मौत हुई है. दोनों पक्षों की ओर से वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अभी तैनात सुरक्षा बलों की संख्या भी अभूतपूर्व है.”
भारत और चीन लगभग तीन महीनों से पूर्वी लद्दाख में तनावपूर्ण गतिरोध की स्थिति में हैं जबकि कई दौर की राजनयिक और सैन्य स्तर की बातचीत हो चुकी है.
यह तनाव तब बढ़ गया था जब गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ संघर्ष में भारत के 20 जवानों की मौत हो गई थी. अब भी गतिरोध सुलझाने की कोशिश हो रही है.
ऐसे में कुछ ही दिनों के अंतराल पर सीडीएस और विदेश मंत्री के बयानों में अंतर की क्या वजह है. क्या दोनों के बयानों में विरोधाभास है और तालमेल की कमी है या किसी तरह का रणनीतिक संकेत है.

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दोनों अपनी जगह सही
रक्षा विशेषज्ञ सुशांत सरीन मानते हैं कि ये तालमेल की कमी नहीं है बल्कि दोनों अपनी जगह सही बात कह रहे हैं.
वह कहते हैं, “हमें ये देखना होगा कि ये जो बयान आए हैं वो किस संदर्भ में हैं. अगर किसी फ़ौजी से ये सवाल पूछा जाए कि क्या सैन्य तौर पर आप तैयार हैं, तो कोई भी सेनाध्यक्ष ये नहीं कहेगा कि सेना का कोई विकल्प नहीं है. फिर उन्होंने भी बातचीत और राजनयिक विकल्प निष्फल होने के बाद सैन्य कार्रवाई की बात कही थी.”
“वहीं, एस जयशंकर कह रहे हैं कि कूटनीति ही विकल्प है. सामरिक जानकार ये मानते हैं कि जंग भी कूटनीति का ही हिस्सा होती है. आप पूरी तरह से ये नहीं कह सकते कि हम लड़ाई लड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. आपको कहीं ना कहीं पर उस विकल्प के बारे में सोचना होगा. लेकिन, ये विकल्प इस्तेमाल किया जाएगा या नहीं, ये फ़ैसला फ़ौज नहीं सरकार लेती है.”
सुशांत सरीन कहते हैं कि सरकार की तरफ़ से विदेश मंत्री ने ये साफ़ कर दिया है कि हम हर कूटनीतिक कोशिश करेंगे. इन कोशिशों में आर्थिक प्रतिबंध भी आते हैं और अंतरराष्ट्रीय दबाव भी आता है. सरकार संकेत दे भी चुकी है कि चीन ऐसा ना सोचे कि सीमा पर तनाव के बावजूद भी बाक़ी रिश्ते सामान्य रहेंगे. भारत और चीन के रिश्तों में ये बड़ा बदलाव आया है.
दोनों बयानों में संकेत
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मनोज जोशी का कहना है कि दोनों का बयान अपने आप में एक तरह का संकेत है.
वह बताते हैं, “इस बार का तनाव एक साथ कई जगहों पर हुआ है. चीन भी अपनी बात पर अड़ा हुआ है. ऐसे में हर तरह के विकल्पों पर बात करने का मतलब है कि भारत किसी भी हालत में वर्तमान स्थिति में नहीं बने रहना चाहता. वो संदेश देना चाहता है कि चीन ये ना सोचे कि भारत थक जाएगा या कूटनीतिक विकल्प ही ढूंढता रह जाएगा. वो इसके आगे के लिए भी तैयार है.”
तीन महीने पहले शुरू हुआ ये गतिरोध थोड़े बहुत बदलाव के बाद अब भी जारी है. पिछले महीने ऐसी ख़बरें थीं कि सीमा पर तनातनी कम करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है.

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सैन्य कार्रवाई कितनी संभव
गलवान, गोगरा और हॉटस्प्रिंग्स पर ये काम चल रहा था लेकिन, देपसांग और पैंगोंग सी झील पर बता नहीं हुई थी. वहीं, विदेश मंत्री का भी कहना है कि यो 1962 के बाद से सबसे गंभीर स्थिति है. ऐसे में क्या भारत वाक़ई सैन्य विकल्प अपना सकता है.
विशेषज्ञ सैन्य कार्रवाई को एक विकल्प तो मानते हैं लेकिन उनका कहना है कि हर देश इससे बचना चाहता है. भारत ने भी कभी पहले सैन्य कार्रवाई की शुरुआत नहीं की.
सुशांत सरीन का कहना है कि चीन और भारत के बीच पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं जहां पर एक-दो साल तक गतिरोध बना रहा. लेकिन, कूटनीतिक कोशिशें बरक़रार रहती हैं. आगे चलकर उसमें ऐसा रास्ता निकलता है कि सहमति बन जाती है.
मनोज जोशी भी कहते हैं कि युद्ध से बचा ही जाना चाहिए क्योंकि इसके शुरू होने के बाद इस पर नियंत्रण बहुत मुश्किल होता है. इसके अनगिनत परिणाम होते हैं. 15 जून की घटना ही देख लीजिए. एक मुठभेड़ हुई जिसमें 20 सैनिक मारे गए और कई घायल हो गए. वहीं, जवाबी कार्रवाई में आपसे कोई चूक हो जाए तो उसकी भरपाई मुश्किल हो जाती है.
फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि हर देश गतिरोध के मामले में हर विकल्प खुले रखने की बात कहता है.
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