जनरल बिपिन रावत के पहले चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ़ बनने से सेना में क्या बदला?

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- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या आपको पता है 15 दिसंबर 2015 को क्या हुआ था?
कुछ लोगों को ही ये पता होगा. गूगल सर्च से भी बहुत मदद शायद ही मिले. मैंने कोशिश करके देखी.
लेकिन फिर भी भारत के सैन्य इतिहास में इस दिन के महत्व को कोई नहीं ले सकता.
केरल के कोच्ची से पचास किलोमीटर पश्चिम में अरब महासागर के गर्म पानी में सैन्य शक्ति का शानदार प्रदर्शन था. 60 लड़ाकू विमान, तीस युद्धक पोत और पांच पनडुब्बियां एक साथ थे.
और इन सबके केंद्र में था भारत का विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रमादित्य. ये पहली कंबाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस (सीसीसी) का मेज़बान था. इस सालाना सम्मेलन में भारतीय राजनीतिक नेतृत्व सेना, वायुसेना और नौसेना के शीर्ष कमांडरों के साथ चर्चा करते हैं.
ये दिल्ली के बाहर आयोजित पहली कंबाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस थी. समय आने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबोधित किया.

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'शीर्ष पर ज्वाइंटनेस एक ऐसी ज़रूरत है जो लंबे समय से लंबित है. मिलिटरी के शीर्ष नेतृत्व के पास तीनों सेनाओं का अनुभव होना चाहिए. हमें डिफेंस प्रबंधन के वरिष्ठ पदों में भी सुधार की ज़रूरत है. ये दुखद है कि डिफेंस में सुधार के कई प्रस्तावों को अब तक लागू नहीं किया जा सका है.'
इसी दिन पिछले साल, पीएम मोदी ने जो उन्हें ग़लत लगा उसे ठीक करने की सबसे बड़ी प्रक्रिया शुरू की. और उन्होंने ऐसा चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ़ के पद की घोषणा करके किया.
24 दिसंबर 2019 को केंद्रीय कैबिनेट ने इस प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी. छह दिन बाद तत्कालीन सेना प्रमुख बिपिन रावत के पहला सीडीएस नियुक्त होने की घोषणा कर दी गई.
लेकिन नियुक्ति का उतना महत्व नहीं है जितना पद को सरकार की ओर से दी गईं शक्तियों और उन नियमों का है जिनके तहत पद पर बैठे व्यक्ति को काम करना है.
सीडीएस के पद का गठन करने के लिए जिन नियमों को बनाया गया उसके नोट पर हस्ताक्षर करने वालों में शामिल रहे पूर्न नौसेना अध्यक्ष जनरल सुनील लांबा ने मुझे बताया, ''उस नोट में सीडीएस की भूमिका और ज़िम्मेदारियों का ज़िक्र है. उसके अधिकतर बिंदुओं को स्वीकार कर लिया गया है और ज़िम्मेदारियां सीडीएस को दे दी गई हैं.''

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तो बदल क्या गया है?
सैन्य नेतृत्व से जुड़े लोग, जिनसे मैंने बात की मानते हैं कि अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी.
लेफ़्टिनेंट जनरल सतीश दुआ (रिटायर्ड) जितनी जानकारी कुछ ही लोगों को होगी.
वो चीफ़ ऑफ़ इंटिग्रेटेड डिफ़ेंस स्टाफ़ के पद से रिटायर हुए. सीडीएस बिपिन रावत अभी इसी संस्था का नेतृत्व करते हैं.
दुआ कहते हैं, ''इतनी बड़ी चीज़ के आकलन के लिए छह या आठ महीने का समय कोई समय नहीं है. शुरुआती कामकाज़ में भी समय लगेगा क्योंकि ये मौजूदा सैन्य बलों के पैरों पर पैर रखने जैसा है. नियम बहुत स्पष्ट हैं, समय सीमा तय कर दी गई है और मैं इसे लेकर बहुत सकारात्मक हूं.''
आइए जानते हैं कि सरकार सीडीएस से क्या करवाना चाहती है.
आप इस बारे में सरकार के कई आदेश और विज्ञप्तियां पढ़ सकते हैं. लेकिन संक्षेप में बात ये है- एकल सेवा दृष्टिकोण को समाप्त करना. साझा तौर पर सामान ख़रीदना, स्टाफ का प्रशिक्षण करना, संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए सेना, नौसेना और वायुसेना की मौजूदा कमांड को पुनर्स्थापित करना, भारत में बने उपकरणों का इस्तेमाल करना और ख़रीददारी को प्राथमिकता देना.
रियर एडमिरल सुदर्शन श्रीखंडे (रिटायर्ड) ने मुझे बताया, ''सीडीएस के हाथ में काफ़ी काम है. थिएटर और सक्रिय कमांड पर चर्चा करनी है, उनका प्रारूप, ज़िम्मेदारी का क्षेत्र, ढांचा और घटक तय करने है.'' लेकिन हर कोई संतुष्ट नहीं है.

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चीफ़ ऑफ़ इंटीग्रेटेड डिफ़ेंस स्टाफ़ के पद से रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चैत बताते हैं, ''निश्चित तौर पर कोविड-19 संकट और चीन के साथ टकराव ने हमारे ध्यान ज्वाइंटनेस से हटाकर उन चीज़ों की ओर खींचा है जो ज़्यादा ज़रूरी हैं. लेकिन पद के गठन के आठ महीने बाद, मैं मानता हूं कि विज़न डाक्युमेंट आने ही वाला है. मैं निश्चित तौर पर मानता हूं कि ये हो रहा है, लेकिन मुझे अभी इसके कोई संकेत दिखे नहीं हैं, अब तक तो ये हमारे बीच होना चाहिए था.'
क्या नहीं बदला है?
हर साल भारत में सेना का बजट बढ़ रहा है. साठ प्रतिशत बजट वेतन और पेंशन में ख़र्च हो जाता है. हथियारों और सामान के लिए और पुराने सामान की जगह नए सामान में निवेश के लिए बजट कम हो रहा है.
मनोहर पर्रिकर इंस्टिट्यूट ऑफ़ डिफेंस स्टडीज़ एंड एनेलिसिस में शोधकर्ता डॉ. लक्ष्मण कुमार बहेरा कहते हैं, ''हमें अभी वो सुधार देखने हैं जो सेना के मॉडर्नाइज़ेशन और मानव संसाधन पर हो रहे ख़र्च में बचत के लिए ज़रूरी हैं. हालांकि, मैं मानता हूं कि चीन के साथ सीमा पर टकराव ने हमारा ध्यान हटा दिया है. सेना को अपने बजट का 60 प्रतिशत वेतन और पेंशन पर ख़र्च करना पड़ रहा है. इससे क्षमता प्रभावित हो रही है. इसमें सुधार के लिए क्या क़दम उठाए गए हैं मैं नहीं जानता. यदि अप्लकालिक और मध्यकालिक समाधान की बात की जाए तो मुझे लगता है कि बजट बढ़ाना ही एकमात्र जवाब है. लेकिन हां, दीर्घकालिक तौर पर पेंशन नियमों और कर्मचारियों की सेवा से जुड़े नियमों की समीक्षा की जा सकती है.''
क्या दिशा सही है?
पद संभालने के तीसरे दिन ही सीडीएस बिपिन रावत ने आदेश दिया था कि एयर डिफेंस कमांड के निर्माण के लिए प्रस्ताव 30 जून 2020 तक तैयार हो जाना चाहिए.
पद संभालने के एक महीने से कुछ दिन अधिक बाद 17 फ़रवरी को द हिंदू में उनका एक बयान छपा. ''प्रायद्वीपीय भारत की सुरक्षा एक कमांडर की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए. क्या हम पूर्वी और पश्चिमी नेवल कमांड का एकीकरण करके इसे पेनिनसुलर कमांड कह सकते हैं? हम मार्च 31 तक पेनिनसुलर कमांड की तैयारी के लिए शोध शुरू कर देंगे. जम्मू और कश्मीर अलग थिएटर होना चाहिए जिसमें आईबी (इंटरनेशनल बाउंड्री) पार्ट भी हो. पश्चिमी थिएटर का संतुलन भी एक अलग कमांड हो.''
उन्होंने कहा था, 'चीन से लगी सीमा की निगरानी एक या दो थिएटर कमांड करेंगी.' उनके इस बयान ने सनसनी पैदा कर दी, ख़ासकर भारतीय नौसेना में.
एक अधिकारी ने नाम न लेने की शर्त पर कहा, ''जो नाम उन्होंने चुना उसने इस तथ्य के साथ न्याय नहीं किया कि भारतीय नौसेना सिर्फ़ हिंद महासागर तक सीमित नहीं है बल्कि प्रशांत महासागर में भी हमारे हित हैं. सीडीएस से उम्मीद की जाती है कि वो एक बड़ा नज़रिया रखें और सभी सेवाओं को साथ लेकर चलें.'
कुछ लोगों ने फ़ैसले लिए जाने की गति पर भी सवाल उठाए हैं.
एक अधिकारी ने कहा, ''क्या ये फ़ैसले किसी शोध पर आधारित हैं या फिर किसी की अपनी सोच पर हैं? हम दीर्घकालिक बदलावों की बात कर रहे हैं और यहां सोच-समझकर ही क़दम उठाना ज़रूरी है.'
व्यक्ति आधारित दृष्टिकोण से दूर हटने की ज़रूरत का तर्क देते हुए जनरल चैत कहते हैं, ''पेशेवर बदलावों के लिए संस्थागत निर्णय लेना ज़्यादा ज़रूरी है ना कि किसी एक व्यक्ति का निर्णय लेना. इससे ये सुनिश्चित होगा कि बदलाव पारदर्शिता की भावना से किए जाएं और स्थायी रहें ना कि कुछ ही दिनों के लिए हों. मुझे लगता है कि सीडीएस के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये होगी कि वो एक नेता बन रहें ना कि प्रबंधक बन जाएं. क्योंकि इस पद पर हितों का टकराव हमेशा बना रहेगा.'

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'आप कितना जानते हैं'
अपने सार्वजनिक भाषणों में जनरल रावत का दृष्टिकोण हमेशा ही एक जैसा बना रहा है. वो बार-बार एकतरफ़ा आधुनिकीकरण जिसमें एक सेवा आगे बढ़ जाए और बाक़ी पीछे लटकती रहें से बचने की ज़रूरत पर ज़ोर देते रहे हैं. वो बढ़ते पेंशन खर्च, सिनर्जी, इंटीग्रेशन और ज्वाइंटनेस की बात करते रहे हैं.
और इसमें कोई हैरत की बात नहीं है.
क्योंकी सीडीएस के पद के गठन के समय केंद्रीय कैबिनेट ने कहा था कि इसका मुख्य उद्देश्य, 'तीनों सेवाओं में तीन साल के भीतर ऑपरेशन, लॉजीस्टिक, प्रशिक्षण, सहायक सेवाओं, संचार, मरम्मत और रखरखाव में ज्वाइंटनेस लाना है.'
ज्वाइंटनेस यानी एक साथ मिलकर चलना.
जनरल दुआ कहते हैं, 'मीडिया एयर डिफेंस कमांड की बात करता है, पेनिनसुलर कमांड की बात करता है लेकिन दूसरे मुद्दों पर भी बहुत काम हो रहा है और उस बारे में उतनी बात बात नहीं होती. साइबर, स्पेस, सोशल मीडिया जैसे क्षेत्र भी अहम है और यहां चीज़ें बदल रही हैं. लॉजिस्टिक्स (रसद) एक अन्य क्षेत्र है जहां काम हो रहा है. ये क्षेत्र बहुत फेशनेबल नहीं हैं लेकिन ये भी अहम हैं.'
जनता को कितनी जानकारी मिले इसे नियंत्रण करने की ज़रूरत का संकेत देते हुए सीडीएस के दफ़्तर के कामकाज की जानकारी रखने वाले एक अधिकारी ने मुझे बताया, 'इस कार्यालय में हम वो हर ज़रूरी काम कर रहे हैं जो किया जाना चाहिए. हर काम के प्रचार की ज़रूरत नहीं है. सवाल ये है कि आप जानते कितना हैं?'
विशेषज्ञों का मानना है कि सीडीएस की नियुक्ति एक बड़ा क़दम है लेकिन उससे भी बड़ा क़दम है डिपार्टमेंट ऑफ़ मिलिट्री अफ़ेयर्स (डीएमए) का गठन.
एडमिरल श्रीखंडे कहते हैं, 'ये ऐसा काम था जिसकी बहुत लोगों ने उम्मीद नहीं की थी. अब तक दृष्टिकोण ये रहा था कि सैन्य सेवाएं प्रस्ताव देती थीं और नागरिक अफ़सरशाही उसे मंज़ूर करती थी, क्रियान्वित करती थी, नकार देती थी या फिर राजनीतिक निर्णय लेने वालों के पास भेज देती थी. डीएमए का मतलब ये है कि अब सैन्य सेवाएं स्वयं प्रस्तावों को ध्यानपूर्वक देखेंगी और आंतरिक प्रश्न पूछेंगी.'
आज, डीएमए में 160 सिविलियन कर्मचारी हैं और सैकड़ों सैन्य कर्मचारी हैं.
जनरल रावत डीएमए के प्रमुख हैं जबकि संयुक्त सचिव स्तर के सिविलियन कर्मचारी भी हैं.
15 अगस्त 2019 को चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ़ के पद का गठन करके प्रधानमंत्री ने देश को चौंका दिया था.
39 सेकंड में प्रधानमंत्री ने न सिर्फ़ इस पद के गठन की घोषणा कर दी थी बल्कि इसे लेकर अपना विज़न भी स्पष्ट कर दिया था.
उनके भाषण के अंत के, तत्कालीन वायुसेना प्रमुख के चेहरे पर मुस्कान थी, नौसेना प्रमुख ने हां में हां मिलाते हुए सिर हिलाया था और तब सेना प्रमुख रहे जनरल रावत बस चुपचाप बैठे रहे थे.
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