भारत-चीन सीमा विवाद: सेना के पीछे हटने को लेकर दोनों देशों के बयान क्यों हैं अलग?

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    • Author, शुभम किशोर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत-चीन सीमा पर तनाव कम करने की जारी कोशिशों के बीच भारत ने गुरुवार को कहा कि लद्दाख में एलएसी पर सेना के पीछे हटने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है, “सेनाओं के पीछे हटने के उद्देश्य पर दोनों देशों ने थोड़ी प्रगति की है, लेकिन इसे अभी तक पूरा नहीं किया जा सका है.”

बयान में कहा गया है कि दोनों देशों के सीनियर कमांडरों के बीच मुलाकात होगी और इस मुद्दे पर आने वाले समय में दोनों देश साथ मिलकर काम करेंगे.

विदेश मंत्रालय ने कहा, “हम पहले भी कह चुके हैं कि सीमावर्ती इलाकों में शांति और स्थिरता दोनों देशों के बीच रिश्तों की बुनियाद है. इसलिए हम चीन से उम्मीद करते हैं कि वह सेना के पीछे हटने, तनाव कम करने और शांति और स्थिरता कायम करने के दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच पहले से हो चुकी सहमति के अनुसार काम करे”

इससे पहले चीन ने कहा था कि ज़्यादातर इलाकों से सेना पीछे हट चुकी है. चीन के राजदूत सन वेंगडॉन्ग ने कहा कि पैंगोंग झील के उत्तरी इलाके में चीन की सेना “पारंपरिक सीमा रेखा” के पीछे है. उनके मुताबिक “चीन ने कभी भी अपने इलाके से बाहर की ज़मीन पर दावा नहीं जताया है”

सन वेंगडॉन्ग ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज़ स्टडी के वेबिनार में कहा “चीन उम्मीद करता है कि भारत की सैन्य टुकड़ियां दोनों देशों के बीच हुए समझौतों और प्रोटोकॉल का पालन करेंगी और गै़रक़ानूनी रूप से एलएसी पार कर चीन की तरफ़ नहीं आएंगी.”

उनके मुताबिक “दोनों देशों की साझा कोशिश से ज़्यादातर इलाकों में सेनाएं पीछे हट गई हैं, और ज़मीनी स्तर पर तनाव कम हो रहा है.”

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भारत चीन सीमा पर मौजूदा हालात क्या हैं?

दोनों देशों के बयानों से स्थिति का अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल है. एक ओर चीन कह रहा है कि सेनाएं ज़्यादातर इलाकों में पीछे हटी है, वहीं भारत का कहना है कि उद्देश्य को लेकर ‘थोड़ी प्रगति’ हुई है.

इसे समझने के लिए बीबीसी ने चीन मामलों के जानकार जेएनयू के प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह से बात की. प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह ने बताया, “ये हैरान करने वाली बात नहीं है कि दोनों ओर से अलग-अलग बयान आ रहे हैं क्योंकि दोनों देशों की एलएसी को लेकर समझ अलग-अलग है”

सीमा पर सेनाएं लगातार पेट्रोलिंग करती रहती हैं, सीमा पूरी तरह से निर्धारित नहीं है इसलिए कौन सी सेना विवाद शुरू होने से पहले किस जगह पर थी, ये भी कहना मुश्किल है.

स्वर्ण सिंह के मुताबिक, “इससे ये साफ़ है कि भारत जिसे एलएसी मानता है, चीन उसके पीछे नहीं गया है, लेकिन चीन की अपनी व्याख्या के अनुसार वह अपने हिस्से में हैं.”

सिंह ये भी मानते हैं कि यह चीन की ‘दो कदम आगे बढ़कर एक कदम’ पीछे हटने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है.

पूर्व राजनयिक पी स्टॉबटन के मुताबिक, “ज़मीन पर अभी क्या स्थिति है ये सरकार पता लगा रही होगी, किन-किन जगहों पर सेना पीछे हटी है इसकी जानकारी इकट्ठा की जा रही होगी. मुझे यकीन है इसे लेकर कई सर्वे सरकार की ओर से किए जा रहे होंगे. इस मामले में जो सरकार जानकारी दे रही है, उसे ही हमें मानना है.”

स्टॉबटन के मुताबिक ये मुमकिन है सरकार के मुताबिक जहां तक सेना को पीछे हटना चाहिए था, वो वहां तक नहीं हटी है, इसलिए ऐसे बयान आ रहे हैं.

इसके अलावा ये समझना जरूरी है कि डीएस्केलेशन एक लंबी प्रक्रिया हो सकती है.

स्टॉबटन कहते हैं अगर दोनों सेनाएं एक दूसरे के सामने नहीं खड़ी हैं, तो ये एक अच्छा संकेत है. उनके मुताबिक, “सबसे ज़्यादा ज़रूरी था कि सीमा पर से तनाव कम किया जाए, पिछले महीने की तुलना में वो तनाव अगर कम हुआ है, तो इसका मतलब है कि स्थिति बेहतर है.”

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सीमा पर शांति की कोशिशें

पिछले महीने ही दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच शांति को लेकर कोशिशें शुरू हुई थीं.

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने टेलीफ़ोन पर बातचीत के थी जिसके बाद दोनों देशों की तरफ़ से बयान जारी किए गए थे.

भारत की तरफ़ से कहा गया था कि बातचीत के बाद भारत-चीन के प्रतिनिधि इस बात पर सहमत हुए कि जल्द से जल्द वास्तविक नियत्रंण रेखा पर सैनिकों के डिस-एंगेजमेंट की प्रक्रिया शुरू होगी.

इसके बाद चीन ने भारत की तरह चार मुख्य बिंदुओं पर सहमति की बात अपने बयान में कही थी. उन्होंने बयान में आगे कहा कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और सैन्य स्तर की बातचीत का सिलसिला चलता रहेगा.

हालाँकि चीन सरकार के बयान में ना तो डिस-एंगेजमेंट शब्द का इस्तेमाल किया था, ना ही डि-एस्कलेशन की प्रक्रिया का ज़िक्र किया गया था.

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कैसे सुलझेगा विवाद?

स्वर्ण सिंह मानते हैं कि दोनों देशों के बीच विदेश मंत्रालय के स्तर पर सैद्धांतिक तौर पर तालमेल बिठाने और समझ विकसित करने की जरूरत है. उनके मुताबिक, “दोनों देशों का ये कहना कि वो सीमा पर शांति चाहते हैं, ये एक अच्छा संकेत है.इसके अलावा सेना के अधिकारियों के स्तर पर भी लगातार बातचीत हो रही है.”

जानकारों का कहना है कि चीन के बयान से यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि सीमा को लेकर स्थिति तनाव पूर्ण हो रही है, दोनों देशों के बीच शांति की कोशिशें हो रही हैं,लेकिन सबकुछ इतनी जल्दी सामान्य हो जाएगा यह सोचना सही नहीं है. सीमा विवाद को कूटनीति के स्तर पर सुलझाने की कोशिशों में काफ़ी समय लग सकता है.

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