चीन की बांग्लादेश को तीस्ता मामले में मदद से कितना चिंतित भारत

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- Author, अपूर्व कृष्ण
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले साल जुलाई की बात है. पश्चिम बंगाल की विधानसभा में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की विधायक रहीमा मंडल ने सदन का ध्यान एक ऐसी बात पर दिलाया जो बंगाल के लिए बहुत ही भावुक कर देनेवाला मुद्दा है.
उन्होंने कहा कि लोगों को 'इलिश' मछली नहीं मिल रही.
इलिश या हिल्सा मछली को बंगाल में बड़े शौक से खाया जाता है. इलिश का स्थान सभी मछलियों में ख़ास है और ये महंगी भी होती है.
पश्चिम बंगाल के लिए इलिश की कमी इतनी बड़ी बात थी कि सवाल का जवाब देने के लिए स्वयं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को खड़ा होना पड़ा. वो बोलीं, "हाँ हमें पता है कि बांग्लादेश ने कुछ समय से इलिश की सप्लाई बंद कर दी है, मैं समझ सकती हूँ कि वो दुखी हैं क्योंकि हम उनको तीस्ता का पानी नहीं दे रहे."
और तीस्ता नदी के पानी का बँटवारा उनके लिए क्या है, इस पर अपना मंतव्य ममता बहुत पहले से प्रकट करती रही हैं. 2017 में कूचबिहार की एक जनसभा में उन्होंने कहा था, "आमि बांग्लादेश के भालोबाशि, किंतु बांग्ला तो आगे... यानी मैं बांग्लादेश से प्यार करती हूँ, पर पश्चिम बंगाल तो उनसे पहले है."
दरअसल, तीस्ता नदी के पानी के बँटवारे का मुद्दा एक ऐसा मुद्दा है जो कहने के लिए तो दो देशों - भारत और बांग्लादेश - के बीच का मुद्दा है, मगर असलियत में ये ममता बनर्जी और दिल्ली में मौजूद केंद्र सरकार का मुद्दा ज़्यादा है, जिसकी वजह से ये किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पा रहा.

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फिर पिछले दिनों मामले में एक नया मोड़ आ गया जब दो देशों के मामले में एक तीसरे देश का नाम जुड़ गया. वो है - चीन.
चीन ने बांग्लादेश को एक अरब डॉलर का कर्ज़ देने की बात की है जो तीस्ता नदी के पानी की बेहतर व्यवस्था और सिंचाई परियोजनाओं पर ख़र्च किया जाएगा.
यानी अगर आसान शब्दों में कहें तो दो पुराने दोस्तों के बीच किसी चीज़ को लेकर एक राय नहीं बन पाई, तो तीसरा कूद पड़ा और जिस दोस्त को ज़रूरत थी उससे कहा, कि चिंता ना करो, मैं तुम्हारी मदद करता हूँ. कुछ यही स्थिति पुराने दोस्तों भारत और बांग्लादेश के मामले की है, जिसमें चीन मदद करने के लिए आगे चला आया है.

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तीस्ता नदी
तीस्ता 414 किलोमीटर लंबी नदी है जो हिमालय में 7,096 मीटर ऊपर स्थित पाहुनरी ग्लेशियर से निकलती है.
पहले ये भारत के सिक्किम राज्य में पहुँचती है, वहाँ से पश्चिम बंगाल जाती है और फिर वहां से होते हुए बांग्लादेश चली जाती है.
बांग्लादेश में ये ब्रह्मपुत्र नदी से मिल जाती है, ब्रह्मपुत्र आगे जाकर पद्मा नदी से मिलती है. गंगा नदी को बांग्लादेश में पद्मा कहते हैं.
पद्मा आगे जाकर मेघना नदी से मिलती है, और मेघना नदी बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है.
- ये भी पढ़िएः गंगा कैसे बहती रही भारत से बांग्लादेश तक
विवाद क्या है?
बांग्लादेश चाहता है कि नदी का पानी चूँकि भारत से होते हुए उनके देश में आ रहा है, इसलिए भारत हिसाब से पानी ख़र्च करे, ताकि उनके यहाँ पहुँचने तक नदी में पानी बना रहे.
भारत, या असल में पश्चिम बंगाल कहता है कि पानी इतना नहीं है कि वो उस हिसाब से बाँट सके जितना कि बांग्लादेश चाहता है. पश्चिम बंगाल का कहना है कि उत्तर बंगाल के छह ज़िले तीस्ता नदी पर निर्भर हैं.
इसे लेकर सबसे पहले 1983 में आधे मन से एक समझौते की कोशिश हुई जिसमें पानी के आधे-आधे बँटवारे का प्रस्ताव किया गया, मगर उस पर बात बनी नहीं, उसका पालन नहीं हो सका.

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इसके बाद बांग्लादेश में 2008 में जब शेख़ हसीना वाजिद की पार्टी अवामी लीग सत्ता में लौटी और 2011 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ढाका गए. बातचीत फिर से आगे बढ़ी.
लेकिन, मामला तब अटक गया जब 2011 में पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य की ओर से एक प्रस्ताव केंद्र को भेजा.
केंद्र ने उसकी उपेक्षा कर अपना अलग प्रस्ताव तैयार किया, ममता बनर्जी ने इसी बात को अपने अहं का मुद्दा बना लिया है.
कोलकाता में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार निर्माल्य मुखर्जी बताते हैं कि ममता बनर्जी ने केंद्र को 42.5 प्रतिशत पानी भारत को, और 37.5 प्रतिशत पानी बांग्लादेश को दिए जाने का प्रस्ताव किया था, शेष 20 प्रतिशत पानी के बँटवारे पर उन्होंने कुछ नहीं कहा, मगर हो सकता है ये 20 प्रतिशत पानी सिक्किम के लिए हो.
मनमोहन सिंह के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और 2015 में वो ढाका दौरे पर गए तो एक बार फिर तीस्ता समझौते की सुगबुगाहट बढ़ी. मोदी सरकार ने एक नया प्रस्ताव रखा, मगर बात फिर ममता बनर्जी के अहं वाले मुद्दे पर आकर अटक गई.
निर्माल्य मुखर्जी कहते हैं, "जब भी ममता बनर्जी से इस बारे में कोई भी बात करेगा तो वो पहले ये पूछेंगी कि उनके 2011 के प्रस्ताव का क्या हुआ? "

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बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीणा सीकरी भी मानती हैं कि ये मुद्दा ममता बनर्जी की आपत्तियों की वजह से नतीजे पर नहीं पहुँच रहा, मगर ऐसा नहीं है कि दोनों देशों में इसे लेकर तनाव है.
वीणा सीकरी ने कहा, "तीस्ता को लेकर एक ड्राफ़्ट तो है ही, जिस पर ममता बनर्जी को आपत्तियाँ हैं, मगर जब तक ये समझौता नहीं होता, तब तक ये पानी बांग्लादेश तो जा ही रहा है, उसे कोई यहाँ रोक तो नहीं रहा. फिर बातचीत चल ही रही है कि कैसे मिलकर पानी की बेहतर व्यवस्था की जाए, ताकि गर्मियों में पानी कम होने का उपाय निकाला जा सके, जैसे कि ऐसी परिस्थिति में किस तरह की फ़सलें लगाई जाएँ, आदि."
निर्माल्य मुखर्जी कहते हैं, "तीस्ता ऐसा मामला है जिसमें ममता को दरकिनार कर कोई हल नहीं निकल सकता. कुछ समझौता हुआ भी तो वो अस्थायी समझौता होगा. अब वो अगले साल चुनाव हार जाएँ, तो शायद परिस्थितियाँ बदल जाएँ, लेकिन तब भी पश्चिम बंगाल को तो साथ लेना ही होगा."
चीन का मामला
एक सवाल ये उठ रहा है कि तीस्ता नदी मामले में चीन की बांग्लादेश को मदद को किस नज़रिए से देखा जाना चाहिए?
जानकारों का मानना है कि चीन का ये क़दम भारत को परेशान करने की एक कोशिश है.

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दिल्ली के जेएनयू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंध के अध्यापक प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं कि चीन ने पिछले साल बांग्लादेश को विभिन्न परियोजनाओं के लिए 6.4 अरब डॉलर देने की बात कही थी, और इस साल उसने कहा कि वो उसकी पहली किस्त में एक अरब डॉलर दे भी देगा जो तीस्ता परियोजना पर ख़र्च होगी.
प्रोफ़ेसर सिंह कहते हैं, "तीस्ता जल बँटवारा एक संवेदनशील मुद्दा है और चीन उसी के लिए एक अरब डॉलर का योगदान करना चाह रहा है".
पत्रकार निर्माल्य मुखर्जी भी मानते हैं कि चीन भारत पर दबाव डालने के लिए बांग्लादेश में दिलचस्पी दिखा रहा है.
वो कहते हैं, "उन्हें पता है कि ममता बनर्जी ने पहले ही केंद्र सरकार पर दबाव बनाया हुआ है, तो भारत की मुसीबत इससे और बढ़ जाएगी."
हालाँकि, पूर्व उच्चायुक्त वीणा सीकरी इस बारे में प्रतिक्रिया देते हुए कहती हैं कि "ये ज़रूर है कि चीन अड़ंगा लगाएगा ही, मगर भारत उसमें क्या कह सकता है, ये चीन और बांग्लादेश का अपना मामला है."

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बांग्लादेश के साथ अन्य परियोजनाएँ
हालाँकि, तीस्ता नदी जल बँटवारे के मुद्दे के अलावा भी ऐसे कई क्षेत्र हैं जिनमें भारत और बांग्लादेश के बीच सहयोग के प्रयास चल रहे हैं.
भारतीय विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने इस सप्ताह अपने बांग्लादेश दौरे में प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के साथ इन परियोजनाओं की उच्च स्तर से निगरानी किए जाने को लेकर चर्चा की.
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने विदेश सचिव के दौरे पर अपनी ब्रीफ़िंग में बताया कि इन परियोजनाओं में से पाँच परियोजनाएँ अगले साल पूरी कर लिए जाने का लक्ष्य है.
अनुराग श्रीवास्तव ने कहा, "रामपाल मैत्री पावर प्लांट, भारत-बांग्लादेश फ़्रेंडशिप तेल पाइपलाइन और अखौरा-अगरतला, चैलाहाटी-हल्दीबारी व खुलना-मोंगला रेल लाइनें अगले साल तक पूरी हो जाने की उम्मीद है."
हालाँकि, निर्माल्य मुखर्जी बताते हैं कि ये सभी परियोजनाएँ अभी प्रस्ताव के ही स्तर पर रुकी हुई हैं.
वो साथ ही कहते हैं, कि तीस्ता नदी जल बँटवारे पर संधि नहीं होने की वजह से तीस्ता नदी पर प्रस्तावित 26 पनबिजली या हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजनाएँ भी अधर में लटकी हुई हैं.
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