ऊषा मेहताः अंग्रेजों के ख़िलाफ़ खुफ़िया रेडियो चलाने वाली महिला

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- Author, पार्थ पांड्या और रवि परमार
- पदनाम, बीबीसी गुजराती सेवा
8 अगस्त 1942 का दिन था. जगह थी बॉम्बे (अब मुंबई) का गोवलिया टैंक ग्राउंड. गांधीजी को सुनने के लिए हज़ारों लोग इकट्ठा हुए थे.
गांधीजी ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, "आज मैं आपको एक नारा दे रहा हूं. इसे अपने दिल में रखना. यह नारा है- करो या मरो." उन्होंने लोगों से 'भारत छोड़ो आंदोलन' से जुड़ने का आह्वान किया.
ऊषा मेहता उन तमाम युवा छात्रों में से एक थीं जिन्होंने महात्मा गांधी के करो या मरो के नारे को दिल में जज़्ब कर लिया था और जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी.

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'एक गुजराती लड़की का खुफ़िया रेडियो-स्टेशन'
भारत छोड़ो आंदोलन के आह्वान के साथ ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी समेत दूसरे बड़े कांग्रेसी नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया. नेताओं को जेल में डालने के ज़रिए सरकार इस पूरे आंदोलन को धराशायी करना चाहती थी.
लेकिन, आजादी के मतवालों ने पहले ही अंडरग्राउंड होकर अपनी गतिविधियां चालू कर दी थीं.
एक खुफिया रेडियो स्टेशन ऐसी ही एक गतिविधि थी. इतिहास की किताबों में इसे 'कांग्रेस रेडियो' और ऊषा मेहता की साहसी कहानियों के तौर पर दर्ज किया गया है.
ऊषा मेहता का जन्म 25 मार्च 1920 को गुजरात में हुआ था. सीता ओझा की लिखी किताब 'होमेज टू ऊषा मेहता' में लिखा गया है कि उनका जन्म सूरत ज़िले के सारस गांव में हुआ था. पिता के जज के पद से रिटायर होने के बाद उनका परिवार 1933 में मुंबई चला गया था.
उनके पिता ऊषा मेहता के आज़ादी की लड़ाई से जुड़ने के फ़ैसले से नाखुश थे क्योंकि वे खुद ब्रिटिश सरकार में एक जज के तौर पर काम कर चुके थे. लेकिन, इससे ऊषा रुकी नहीं.
नवीन जोशी ने अपनी किताब 'फ्रीडम फ़ाइटर रिमेंबर' में लिखा है कि ऊषा मेहता निगरानी करने, रैलियां निकालने और चरखा कातने के कामों से बचपन से ही जुड़ गई थीं.
ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ बुलेटिन, पर्चे बांटने और नमक बनाने और बेचने जैसे प्रतिबंधित काम करना उनकी रोजाना की ड्यूटी थी. जोशी की किताब में डॉ. मेहता का इंटरव्यू भी है.
मेहता ने इस इंटरव्यू में कहा है, "ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ मेरा लगाया गया पहला नारा 'साइमन वापस जाओ' था. यह 1928 का साल था और मैं महज 8 साल की थी."
उस वक्त ऊषा मेहता और दूसरी युवा लड़कियों ने मंजर सेना नाम से दल बनाया. लड़कों के दल का नाम वानर सेना था. गुजराती में मंजर शब्द बिल्ली के लिए इस्तेमाल करते हैं.
मेहता ने इंटरव्यू में कहा है, "मुझे किसी प्रेरणा की ज़रूरत नहीं थी. उस वक्त पूरा माहौल ही ऐसा था कि कोई भी इससे अछूता नहीं रह गया था."
अगस्त 1942 में गांधीजी, नेहरू, वल्लभभाई पटेल समेत दूसरे नेताओं ने ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) की बॉम्बे में हुई बैठक में जब भाषण दिए तो वे वहीं मौजूद थीं.
'अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ ब्रॉडकास्टिंग ड्यूरिंग क्विट इंडिया मूवमेंट' किताब के मुताबिक, खुफ़िया रेडियो स्टेशन के काम में 20 साल के विट्ठलदास खाखर, 23 साल के चंद्रकांत झावेरी, जगन्नाथ ठाकुर, 40 साल के पारसी इंजीनियर नरीमन प्रिंटर और उनके सहयोगी मिर्जा शामिल थे.
यह रेडियो ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ आज़ादी की आवाज़ बन गया था.
जिस वक्त प्रेस की आवाज़ दबा दी गई थी, उस वक्त में रेडियो के ज़रिए ही देश के दूरदराज के इलाकों तक आज़ादी की अलख जलाई जा रही थी.
इस तरह से ऊषाबेन ने शंकर उमा को 30 अक्तूबर 1969 को दिए गए इंटरव्यू में अपने योगदान का जिक्र किया है.
क्रांतिकारी गतिविधियों के रास्ते में एक बड़ी बाधा पैसों की कमी थी. मेहता को भी इससे जूझना पड़ रहा था.
शंकर उमा को दिए इंटरव्यू में मेहता कहती हैं, "हमारे कुछ रिश्तेदारों ने खुद ही अपने गहने दे दिए थे. हालांकि, हम ये लेने में हिचकिचा रहे थे."

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जब मेहता को पता चला कि कुछ अन्य समूह भी इस तरह की गतिविधियों की योजना बना रहे हैं तो मेहता ने उनसे संपर्क की कोशिश की. इनमें से एक डॉ. राम मनोहर लोहिया भी थे.
अपने इंटरव्यू में मेहता बताती हैं उन्हें लोहिया से एक पत्र मिला था और रेडियो स्टेशन शुरू करने से पहले वे उनसे मिलीं थीं. लोहिया ने भी इसमें सक्रिय भागीदारी की थी.
उन्होंने अपने संसाधन इकट्ठा किए और अपने एक दोस्त को खुफ़िया रेडियो के लिए एक ट्रांसमिटर बनाने का ज़िम्मा सौंपा. 13 अगस्त 1942 तक यह चालू हो गया था.
प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो को दिए एक इंटरव्यू में मेहता ने कहा, "14 अगस्त 1942 को हमने अपना पहला प्रसारण किया."
खुफ़िया रेडियो स्टेशन का कामकाज
प्रसारण इस वाक्य के साथ शुरू होता था- 'यह कांग्रेस रेडियो है. हम 42.4 एम पर भारत के किसी हिस्से से बोल रहे हैं.'
अरुण चंद्र भुयान की किताब 'क्विट इंडिया मूवमेंट' में दर्ज किया गया है कि मुंबई में चौपाटी के पास एक बिल्डिंग की छत पर एक ट्रांसमिशन सेंटर लगाया गया था.
इसके लिए टेक्निकल सहयोग और विशेषज्ञता शिकागो एंड टेलीफोन कंपनी मुहैया करा रही थी.
मेहता ने पीआईबी को दिए इंटरव्यू में बताया था, "हम एक अंडरग्राउंड एक्टिविटी के तौर पर रेडियो स्टेशन चला रहे थे और हम लगातार अपनी लोकेशन बदल रहे थे ताकि पुलिस हमें पकड़ न सके."
शुरुआत में वे दिन में दो बार हिंदी और इंग्लिश में प्रसारण कर रहे थे. बाद में इसे घटाकर एक बार कर दिया गया.

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ख़ास संदेशवाहकों की ख़बरें
शंकर उमा को दिए इंटरव्यू में ऊषा मेहता ने कहा, "हमें ख़ास संदेशवाहकों की ओर से ख़बरें मिलती थीं. साथ ही कांग्रेस कमेटी भी हमें अहम ख़बरें दिया करती थी."
उन्होंने कहा, "हमने सबसे पहले चिटगांव बम हमले, जमशेदपुर हमले और बलिया की घटनाओं की ख़बर दी थी."
उन्होंने इस इंटरव्यू में कहा है, "जब अख़बार सख़्त शर्तों के चलते इन विषयों को छूते भी नहीं थे, उस वक्त केवल कांग्रेस रेडियो ही आदेशों को धता बताते हुए लोगों को वास्तवकित हालात की जानकारी देता था."
डॉ. लोहिया ने अपने एक भाषण में कहा था, "अब तक हम एक आंदोलन चला रहे थे, लेकिन अब हम एक क्रांति में हिस्सा बन रहे हैं. क्रांति में या तो जीत होती है या फिर हार. यह क्रांति किसी एक पार्टी या समुदाय की नहीं है, बल्कि पूरे देश की है."

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खुफ़िया रेडियो स्टेशन का खुलासा
कांग्रेस रेडियो को लोगों की तरफ़ से बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली थी. हालांकि, इस रास्ते में कई मुश्किलें भी थीं.
एक मुश्किल पैसे की थी और दूसरी पुलिस से बचने की थी जो उनका लगातार पीछा कर रही थी.
उन्होंने ऊषा शंकर को इंटरव्यू में कहा है, "हमें पैसे जुटाने में दिक़्क़त हो रही थी. पुलिस की गाड़ी लगातार हमारा पीछा करती रहती थी. कई बार तो हम बाल-बाल बचे."
आखिरकार ब्रिटिश राज उन्हें पकड़ने में कामयाब रही. क्विट इंडिया मूवमेंट किताब के मुताबिक, 12 नवंबर 1942 को ऐसा हुआ.
ऊषा मेहता ने अपने इंटरव्यू में कहा है, "इससे एक हफ्ते पहले पुलिस ने कुछ अहम रेडियो दुकानों पर छापा मारा था. इनमें से एक शिकागो रेडियो कंपनी की दुकान भी थी."
पुलिस ने एक टेक्नीशियन को पकड़ लिया जिसने उनके बारे में बता दिया. बाद में पुलिस ने बाबूभाई खाखर के दफ्तर पर छापा मारा. ऊषाबेन प्रसारण की सामग्री के साथ बिल्डिंग में ही मौजूद थीं.
इंटरव्यू में उन्होंने बताया, "जब हमें पता चला कि पुलिस दफ्तर आई है तो हमने कुछ अहम फाइलें हटाने की कोशिश की."
वहां से वे रिकॉर्डिंग स्टेशन पहुंचने में सफल रहीं जहां डॉ. लोहिया और दूसरे साथी शाम के लिए एक कार्यक्रम तैयार कर रहे थे. उन्होंने उन्हें पूरी घटना बताई.
मेहता ने एक दूसरा ट्रांसमिटर तैयार कराया ताकि प्रोग्राम्स चलते रहें.
"हमने हिंदुस्तान हमारा चलाया. इसके बाद हमने कुछ बुलेटिन चलाए. जब हम कार्यक्रम के अंत में वंदे मातरम चला रहे थे तभी दरवाजे पर आवाज़ हुई."

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पुलिस ने छापा मारा था.
"उन्होंने हमसे वंदे मातरम बजाना बंद करने के लिए कहा. हमने उनकी बात नहीं मानी. रेडियो सुन रहे हमारे सहयोगियों को इसका पता चल गया. दरवाजे को तोड़कर अंदर आने ने हमारी गिरफ़्तारी का संकेत दे दिया था."
पुलिस ने ट्रांसमिटर सेट ज़ब्त कर लिया था. ब्राडकास्टिंग स्टेशन से उन्हें लॉकअप ले जाया गया. अगले दिन जांच शुरू हुई.
करीब दो महीने की जांच के बाद पुलिस ने ऊषा मेहता समेत पांच आरोपियों के ख़िलाफ़ चार्ज़शीट दाख़िल कर दी.
स्पेशल कोर्ट के ट्रायल में प्रख्यात लेखक कन्हैयालाल मुंशी बचाव वकील थे.
अपने इंटरव्यू में ऊषा मेहता ने कहा है, "यह जांच करीब छह महीने चली और यह मानसिक प्रताड़ना थी. जेल अधिकारियों ने मुझे विदेश पढ़ने भेजने जैसे ऑफ़र दिए ताकि मैं टूट जाऊं." लेकिन, उन्होंने हौसला नहीं खोया.
ऊषा मेहता को चार साल की सख़्त कैद दी गई. 1942 से 1946 तक वे जेल में रहीं. अप्रैल 1946 में ऊषा मेहता को यरवदा जेल से रिहा कर दिया गया.
रिहाई के बाद उन्होंने महात्मा गांधी के सामाजिक और राजनीतिक विचारों पर पीएचडी की.
उन्होंने बॉम्बे यूनिवर्सिटी के विल्सन कॉलेज में 30 साल तक पढ़ाया. वे राजनीतिक विभाग की हेड भी थीं. वे गांधी पीस फाउंडेशन की प्रेसिडेंट भी रहीं.
1998 में उन्हें पद्म विभूषण दिया गया. 11 अगस्त 2000 को 80 साल की उम्र में ऊषा मेहता गुजर गईं.
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