असम: सरकार की लीक हुई इस गोपनीय रिपोर्ट पर क्यों मचा है बवाल?

असम

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    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए

ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) ने 1985 में हुए असम समझौते के क्लॉज़ 6 के कार्यान्वयन पर केंद्रीय गृह मंत्रालय की एक उच्च-स्तरीय कमेटी की गोपनीय रिपोर्ट को सार्वजनिक कर दिया है.

इस रिपोर्ट में कमेटी ने 'असमिया लोगों की पहचान और विरासत' के संरक्षण से जुड़े उपाए पर अपने सुझाव दिए थे.

दरअसल भारत सरकार ने पिछले साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस बीके शर्मा की अध्यक्षता में 14 सदस्यीय एक उच्च-स्तरीय कमेटी का गठन किया था.

इस कमेटी में आसू के तीन सदस्यों को भी शामिल किया गया था. कमेटी ने 25 फरवरी को असम समझौते के क्लॉज़ 6 के कार्यान्वयन से जुड़ी अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल को सौंप दी थी. राज्य सरकार ने यह रिपोर्ट गृह मंत्री अमित शाह को भेजी थी.

आसू के अध्यक्ष दिपांका कुमार नाथ कहते है, "उच्च-स्तरीय कमेटी की रिपोर्ट को भेजे हुए पाँच महीने बीत गए हैं, लेकिन केंद्र सरकार अब तक इस रिपोर्ट पर ख़ामोश है. यह स्पष्ट नहीं है कि असम सरकार ने रिपोर्ट गृह मंत्रालय को भेजी भी है या नहीं."

आसू के मुख्य सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य ने मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा, "हम उम्मीद कर रहे थे कि कमेटी की सिफ़ारिशों को लागू किया जाएगा. लेकिन केंद्र सरकार ने इस रिपोर्ट की सिफ़ारिशों और कार्यान्वयन को लेकर चुप्पी साध रखी है. इसलिए हमने इसे सार्वजनिक करने का फ़ैसला किया ताकि असम के लोग इसके बारे में जान सकें."

बीजेपी के झंडे

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असमिया कौन है और कौन नहीं?

कमेटी ने इस रिपोर्ट में यहाँ के मूल असमिया लोगों के लिए राज्य विधानसभा, संसद और स्थानीय निकायों में 80 फ़ीसदी सीटों के आरक्षण की सिफ़ारिश की है.

इसके अलावा अन्य राज्यों के लोगों के असम में प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट प्रणाली की शुरुआत से लेकर भूमि अधिकारों के संरक्षण, उच्च सदन का निर्माण, भाषा और संस्कृति के संरक्षण के उपाय सहित कई व्यापक सिफ़ारिशें की हैं.

हालाँकि आरक्षित रखी जाने वाली सीटों की मात्रा पर कमेटी के सदस्यों के बीच मतभेद बताया गया है. आसू के सदस्यों का कहना है कि असम के लोगों के लिए सीटों में 100 प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए.

रोज़गार के मामले में भी कमेटी ने केंद्र सरकार, राज्य सरकार, केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों और निजी क्षेत्र में ग्रुप सी और डी स्तर के पदों में 80 प्रतिशत नौकरियों को असमिया लोगों के लिए आरक्षित रखे जाने के सुझाव दिए हैं.

लेकिन कमेटी की रिपोर्ट में 'असमिया लोगों' की परिभाषा को लेकर जो सिफ़ारिश की गई है, उससे प्रदेश में बसे ख़ासकर बंगाल मूल के लोगों में बैचेनी पैदा कर दी है. साथ ही देश के अन्य राज्यों से आकर स्थायी तौर पर असम में बसे लोगों के सामने भी परेशानी खड़ी हो सकती है.

फ़िलहाल सबके सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि 'असमिया कौन है' यानी 'असमिया व्यक्ति' की परिभाषा क्या होगी?

कमेटी ने यहाँ के मूल लोगों को संवैधानिक संरक्षण देने उद्देश्य से 'असमिया व्यक्ति' की परिभाषा के कथित मुद्दे पर अपनी सिफ़ारिश में कहा है कि भारत का नागरिक जो '1 जनवरी, 1951 को या उससे पहले' से असम के क्षेत्र में रह रहा है वो असमिया समुदाय का हिस्सा होगा.

इसके अलावा 1 जनवरी, 1951 को या उससे पहले असम के क्षेत्र में रहने वाला असम का कोई भी आदिवासी समुदाय, कोई भी स्वदेशी या फिर अन्य आदिवासी समुदाय और उसी तिथि में या उससे पहले असम के क्षेत्र में रहने वाले सभी अन्य भारतीय नागरिकों और उनके वंशजों को असम के लोगों के रूप में माना जाना चाहिए.

छात्रों का प्रदर्शन

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इन लोगों के लिए हो सकती हैं मुश्किलें

दरअसल बड़ी जटिल और लंबी प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में असम के लिए जो एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार की गई है, उसमें 24 मार्च 1971 या फिर उससे पहले से असम में रहे व्यक्ति को भारतीय नागरिक माना गया है.

ऐसे में 'असमिया व्यक्ति' की परिभाषा के लिए 1 जनवरी, 1951 को कट ऑफ़ तारीख के सुझाव से नई परेशानी उत्पन्न हो सकती है.

ऑल असम बंगाली यूथ स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन के अध्यक्ष दीपक डे ने बीबीसी से कहा, "असमिया व्यक्ति की परिभाषा को लेकर जो कट ऑफ़ तारीख का सुझाव दिया गया है, वो निश्चित तौर पर चिंता का विषय है. प्रदेश में लंबे आंदोलन और कई लोगों की जान की आहुति के बाद एनआरसी की तारीख़ 24 मार्च 1971 पर सभी लोग सहमत हुए और उसी आधार पर एनआरसी बनाई गई. अब फिर 1951 की बात क्यों हो रही है?''

''अगर केंद्र सरकार इन सिफ़ारिशें को लागू करती है, तो यहाँ बसे हिंदू बंगाली तथा दूसरे प्रदेशों से आए लोगों के लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी. हम लोगों ने कमेटी को इन सारी बातों से अवगत कराया था. लेकिन अब लग रहा है कि हमारी बातें सुनी ही नहीं गईं. 1951 से पहले के असम से जुड़े काग़ज़ात दिखाना किसी के लिए संभव नहीं है. यहाँ तक कि ट्राइबल लोगों के पास भी 1951 के काग़ज़ नहीं होंगे. एक देश एक क़ानून की बात करने वाली भाजपा सरकार अपने नागरिकों के साथ ऐसा कैसे कर सकती है?"

ऑल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ के मुख्य सलाहकार अजीजुर रहमान नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहते हैं, "बंगाल मूल के हिंदू और मुसलमानों को परेशान करने के लिए यह सबकुछ किया जा रहा है. अगर कमेटी ने 1951 की तारीख़ का सुझाव दिया है, तो कमेटी बताए कि किस तरह के काग़ज़ पेश करने होंगे. अगर यह तारीख़ असमिया व्यक्ति की परिभाषा के लिए है तो फिर किसी की नागरिकता से जुड़े दस्तावेज़ मांग नहीं सकते. क्योंकि इसके लिए गृह मंत्रालय ने असम में एनआरसी बनाई है.''

''आसू के प्रेस कॉन्फ़्रेंस से जो समझ आ रहा है उसका मतलब यह हुआ कि आप एनआरसी के अनुसार भारत के नागरिक तो हैं लेकिन असमिया नहीं हैं. इसलिए जो राजनीतिक आरक्षण या फिर सरकारी नौकरियों में असमिया लोगों के आरक्षण की सिफ़ारिश की गई है, उसका फ़ायदा नहीं मिलेगा."

दशरथ डेका

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'ध्रुवीकरण पर बंट चुका है असम का समाज'

असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनेवाल ने एक बयान जारी कर कहा, "हमारी सरकार राज्य को अवैध विदेशियों से मुक्त कराने के लिए गंभीर क़दम उठा रही है. इससे पहले राज्य में कई सरकारें आई लेकिन क्लॉज़ 6 के कार्यान्वयन के लिए एक कमेटी गठन करने में किसी ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. केंद्र सरकार इस संदर्भ में क़दम उठा रही है. ऐसे में एक निश्चित समय सीमा दिए बिना कमेटी के सदस्यों द्वारा इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है."

राज्य के वरिष्ठ पत्रकार नव कुमार ठाकुरिया का कहना है कि हाल के कुछ सालों में देश की राजनीति जिस क़दर बदली है कि उसमें किसी एक जाति या भाषा आधारित मुद्दों की कोई अहमियत नहीं है.

उन्होंने कहा, "भाजपा किसी भाषा आधारित राजनीति को प्राथमिकता नहीं देती है. असम का समाज अब ध्रुवीकरण की राजनीति पर बँटा हुआ है. यहाँ अब हिंदू और मुसलमान आधारित राजनीति हो रही है. पहले असम में जाति, क्षेत्र, भाषा और संस्कृति पर राजनीति होती थी, लेकिन अब यहाँ धर्म के आधार पर राजनीति हो रही है. भाजपा हिंदू के नाम पर सबको एकत्रित कर लेती है, जिसका फ़ायदा पार्टी को मिल रहा है."

ऐसे में उच्च-स्तरीय कमेटी की सिफ़ारिशें से प्रदेश की सरकार पर क्या दबाव बनेगा?

ठाकुरिया कहते हैं, "भाजपा को चुनावी डर नहीं है. बात जहाँ तक असमिया की परिभाषा तय करने की है, तो कोई भी कमेटी यह फ़ाइनल नहीं कर सकती. केवल प्रदेश की विधानसभा यह तय कर सकती है. अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में उतरने के लिए आसू एक राजनीतिक पार्टी बनाना चाहता है. यह उससे पहले की तैयारी भी हो सकती है. भाजपा सरकार असमिया लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषाई पहचान के लिए ज़रूर कोई न कोई क़दम उठाएगी, लेकिन इसके बदले अपने नागरिकों को कोई नुक़सान नहीं पहुँचाएगी."

असम में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के नेतृत्व में 1979 से लगातार छह साल तक चले असम आंदोलन के बाद 15 अगस्त 1985 को भारत सरकार और असम मूवमेंट के नेताओं के बीच असम समझौता हुआ था.

इस समझौते के क्लॉज़ 6 में कहा गया है कि असमिया लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषाई पहचान और विरासत की रक्षा, संरक्षण और संवर्धन के लिए उचित संवैधानिक, विधायी और प्रशासनिक सुरक्षा उपाय प्रदान किए जाएँगे.

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