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किसानों के किसी काम भी आ पाएगा मोदी का कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले रविवार को वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड की घोषणा की है. इस फंड के तहत एक लाख करोड़ रुपये के वित्तपोषण (फंड) सुविधा दी जाएगी.
इस फंड का उपयोग कृषि क्षेत्र में आधारभूत ढांचे के निर्माण में किया जाएगा. इस साल जुलाई में ही कैबिनेट बैठक के दौरान इसे मंज़ूरी दे दी गई थी लेकिन इसे रविवार को लॉन्च किया गया.
कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड कोरोना वायरस महामारी से निपटने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ रुपये के प्रोत्साहन पैकेज का हिस्सा है.
वित्त मंत्री ने आर्थिक पैकेज की तीसरी किश्त की घोषणा करते हुए कहा था कि इस कोष का इस्तेमाल फसल कटाई के बाद के प्रबंधन ढांचे पर किया जाएगा.
क्या है कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड
कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड से ग्रामीण क्षेत्र में कृषि क्षेत्र से जुड़ा आधारभूत ढांचा तैयार करने में मदद मिलेगी. इसकी अवधि 10 सालों तक यानी 2029 तक है.
इसका लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्र में निजी निवेश और नौकरियों को बढ़ावा देना है. इसके तहत बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा प्राथमिक कृषि ऋण समितियों, किसान समूहों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), कृषि-उद्यमियों, स्टार्टअप्स और एग्री-टेक से जुड़े लोगों को ऋण के रूप में लगभग एक लाख करोड़ रुपये प्रदान किए जाएंगे.
ये ऋण चार वर्षों में वितरित किया जाएगा. चालू वर्ष में 10,000 करोड़ रुपये और अगले तीन वित्तीय वर्षों में हर साल में 30,000 करोड़ रुपये के ऋण दिए किए जाएंगे.
इस वित्त पोषण (फंड) सुविधा के तहत 2 करोड़ की सीमा तक के सभी ऋणों पर सालाना तीन फीसदी की ब्याज पर मदद दी जाएगी.
इसका उद्देश्य कटाई के बाद के आधाराभूत ढांचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) प्रबंधन और सामुदायिक खेती परिसंपत्तियों से जुड़ी परियोजनाओं में निवेश के लिए ऋण की सुविधा प्रदान करना है.
क्या कहा पीएम मोदी ने
प्रधानमंत्री मोदी ने इस फंड की घोषणा करते हुआ कहा कि इससे छोटे किसानों को फायदा मिलेगा. साथ ही ग्रामीण स्तर पर उद्यमियों को बढ़ावा देने और रोज़गार पैदा करने में मदद मिलेगी.
उन्होंने कहा, ''इससे गांव-गांव में बेहतर भंडारण, आधुनिक कोल्ड स्टोरेज की चेन तैयार करने में मदद मिलेगी और गांव में रोज़गार के अनेक अवसर तैयार होंगे. अगर अन्य उद्योगों के विकास के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया जाता है वैसा ही आधुनिक कृषि क्षेत्र के लिए भी मिलना चाहिए.''
''इससे किसान अपने स्तर पर भी गांवों में भंडारण की आधुनिक सुविधाएं बना पाएंगे. इस योजना से किसानों के समूहों, समीतियों को कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउस, फूड प्रोसेसिंग से जुड़े उद्योग लगाने के लिए एक लाख करोड़ रूपये की मदद मिलेगी. ''
लेकिन, कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड क्या अपने इन उद्देश्यों को पूरा कर पाएगा. इससे आपदाओं की मार और फसल का उचित मूल्य ना मिलने जैसी समस्याओं से जूझते किसानों को कितनी मदद मिल पाएगी. कृषि सुधारों में इस फंड का क्या योगदान होगा इस संबंध में पढ़िए पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन का नज़रिया.
ये कोई अलग फंड नहीं
सरकार ये योजना कहीं ना कहीं फायदेमंद तो होगी लेकिन सबसे पहले ये समझना होगा कि ये कोई अलग फंड नहीं है बल्कि इसमें बैंक और वित्तीय संस्थान अपने मौजूदा फंड से ऋण देंगे. सरकार उस ऋण पर ब्याज़ में मदद उपलब्ध कराएगी यानी सरकार ब्याज़ के कुछ हिस्से का भुगतान करेगी. साथ ही क्रेडिट गारंटी प्रदान करेगी.
हो सकता है कि बैंक के लिए पोर्टल बना दिए जाएं जिसमें बैंक अपने अपडेट्स डालेंगे कि कितना ऋण दिया गया है. इस साल के लिए 10 हज़ार करोड़ का फंड है तो उसके इस्तेमाल का पोर्टल से पता चल पाएगा.
बैंक पहले से ही इस तरह की परियोजनाओं के लिए ऋण दे रहे थे. अब बदलाव ये हो सकता है कि जैसे बैंक पहले छह हज़ार करोड़ का ऋण दे रहे थे तो अब सरकार कह रही है कि आप इसमें चार हज़ार करोड़ और बढ़ा दीजिए.
इस योजना से विभिन्न परियोजनाओं में निवेश की कोशिश की जा रही है ताकि इससे आधारभूत ढांचे का विकास हो और उसे सुविधाएं व रोज़गार बढ़ें.
इन दो सुविधाओं से मिलेगा फायदा
निवेश के लिए ऋण के माध्यम से वित्तीय मदद देने की कोशिश की जा रही है. अब ऋण मिलने में सुविधा हो इसके लिए दो तरफ़ से काम किया गया है. एक तरफ़ दो करोड़ तक के ऋण पर तीन प्रतिशत ब्याज़ पर सरकार मदद देगी. यानी अगर 11 प्रतिशत ब्याज़ है तो ग्राहक को आठ प्रतिशत ही चुकाना होगा.
बहुत दिनों से हम लोगों की भी मांग थी कि फसल ऋण पर तो ब्याज़ पर मदद मिलती है लेकिन फसल कटाई के बाद के लिए ब्याज़ पर कोई मदद नहीं थी. इसलिए ये बहुत अच्छी ख़बर है. अगर बैंक वाकई ये ऋण दे दें तो इससे फायदा मिलेगा. मुझे लगता है कि लोग निवेश करेंगे. कम से कम महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक में तो करेंगे ही.
साथ ही पहले बैंकों के लिए कोई क्रेडिट गारंटी नहीं थी. यानी अगर कोई डिफॉल्टर हो जाए तो बैंक का नुक़सान होता. लेकिन, अब सरकार कह रही है कि हम उस ऋण के भुगतान की गारंटी देंगे.
क्रेडिट गारंटी बहुत महत्वपूर्ण है. अक्सर ऋण वापसी की गारंटी ना होने पर बैंक से लोन मिलने में समस्या आती है. बैंक ग्राहक पर भरोसा नहीं कर पाता है. लेकिन, अब सुरक्षा मिलने पर बैंकों से ऋण मिलना थोड़ा आसान होगा.
हालांकि, ये क्रेडिट गांरटी भी तीसरी पार्टी देगी. बस सरकार की इस गांरटी की फीस अदा कर देगी. जैसे कि एक लाख रूपये की क्रेडिट गारंट की फीस एक हज़ार रूपये है तो वो फीस सरकार दे देगी.
डाटा ज़ारी करना ज़रूरी
ऐसे में ये योजना अच्छी तो है लेकिन सिर्फ़ फंड कि सुविधा देने से संपूर्ण हल नहीं निकलेगा. पहले तो ये देखना होगा कि पिछली बार के मुक़ाबले हम अब क्या बदलाव ला पाएंगे. साथ ही उन राज्यों पर विशेष ध्यान देना होगा जहां अन्य ज़मीनी समस्याएं और योजनाएं ठीक से लागू नहीं हो पाती हैं.
ऋण के मामले ये डाटा नहीं मिलता कि इन योजनाओं के लिए 2019-20 में बैंकों ने कितना ऋण दिया है. जैसे कि कहा जा रहा है कि इस साल 10 हज़ार करोड़ दिया जाए. लेकिन, हो सकता है कि पिछले साल भी नौ हज़ार करोड़ दिया गया हो, तो इससे ज़्यादा अंतर नहीं आएगा.
वहीं, बहुत छोटे किसानों से ये उम्मीद करना कि वो उद्यमी बन जाएंगे ये थोड़ा गैरमुनासिब है. बात सिर्फ़ पैसों की नहीं है बल्कि आप में उद्यम की क्षमता भी होनी चाहिए. इसमें सही मार्गदर्शन की ज़रूरत होगी.
सबसे अच्छी बात ये होगी कि सरकार हर तीसरे महीने इसके आंकड़े ज़ारी करे ताकि ये पता चल सके कि कितना ऋण लिया गया. कितने छोटे तो कितने बड़े किसानों ने ऋण लिया और किस काम के लिया है.
कमज़ोर राज्यों पर दें विशेष ध्यान
इस योजना की एक बात और महत्वपूर्ण है कि इसमें राज्यवार टार्गेट भी बनाए गए हैं. अगर ये टार्गेट पूरे हो जाएं तो काफी फायदा होगा. जैसे यूपी को लगभग 12,831 करोड़, राजस्थान को नौ हज़ार करोड़ और बिहार को 3980 करोड़ रूपये का वित्तीय सुविधा दी जाएगी.
अभी तक इस तरह की ऋण सुविधा केवल विकसित राज्यों में दी जाती थी लेकिन इस बार गरीब राज्यों को भी शामिल किया गया है.
हालांकि, इसमें ये भी है कि जिस राज्य को ये ऋण दिया जा रहा है उसमें इसके इस्तेमाल की क्षमता भी हो. अब कई राज्यों में अपराध और प्रशासनिक अटकलों के चलते लोग निवेश ही नहीं करना चाहते. ऐसे में वो ऋण का इस्तेमाल कैसे करेगा.
ऐसे में फंडिंग की समस्या के अलावा अन्य ज़मीनी दिक्कतों को भी दूर करने पर काम करना होगा.
अगर भंडारण की सुविधा की बात करें तो इसमें ये देखना होगा कि किस राज्य में भंडारण गृहों की कमी है. देश के हर राज्य में भंडारण की कमी नहीं है. इसमें खासतौर पर पूर्वी भारत में भंडारण क्षमता कम है जैसे बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में सुधार की काफी गुजांइश है.
इसे ऐसे समझ सकते हैं कि अगर सरकार के पास 95 लाख टन अनाज है और भंडारण की क्षमता 62 लाख टन है तो कुछ अनाज खराब हो जाएगा. अब भंडारण तब बढ़ाया जाए जब उतनी मांग हो. जैसे यूपी में कहा जाता है कि भंडारण की क्षमता मांग के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है.
इसलिए ऋण की सुविधा, सरकारी मदद और निवेश के लिए प्रोत्साहन उन राज्यों को ध्यान में रखकर होना चाहिए जहां इसकी ज़्यादा ज़रूरत है.
(पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन से बीबीसी संवाददाता कमलेश मठेनी की बातचीत पर आधारित)
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