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क्या सच में किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी?
- Author, सिराज हुसैन
- पदनाम, पूर्व कृषि सचिव, बीबीसी हिंदी के लिए
जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 फ़रवरी 2016 को किसानों की एक रैली में सभी राज्यों से 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लिए प्रयास करने को कहा है तब से कृषि का मुद्दा यहीं तक सीमित हो कर रह गया है.
प्रधानमंत्री की घोषणा को अमल में लाने की सरकार की प्रतिबद्धता वित्त मंत्री के साल 2016-17 के बजट भाषण में भी देखी गई थी. वो भी ठीक अगले दिन जब पीएम मोदी ने कहा था कि पांच सालों में किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी.
इसके बाद सरकार ने कृषि मंत्रालय में सहायक सचिव डॉ. अशोक दलवई के तहत एक समिति बनाई थी. इस समिति ने नौ खंडों की एक लंबी रिपोर्ट दी है जिसमें कृषि नीति की एक व्यापक समीक्षा की गई है और भविष्य के लिए एक ऐसा विस्तृत रास्ता बताया है जिसे जमीन पर उतार पाना मुश्किल है.
प्रधानमंत्री की घोषणा ने बहस को किसानों की आय पर केंद्रित कर दिया और अब अगर सरकार इसे अन्य मुद्दों में छुपाना चाहती हो तो ये संभव नहीं है क्योंकि किसान बहुत आगे की कल्पना कर चुके हैं साथ ही सरकार से उनकी उम्मीदें भी बढ़ गई हैं.
ऐसे में यह सवाल उठ खड़ा होता है कि साल 2022 तक किसानों की आय दोगुनी होने की संभावना में कितनी हक़ीकत है?
न्यूतनम और वास्तविक आय
किसानों की आय का आंकड़ा स्थिति मूल्यांकन सर्वेक्षण से प्राप्त होता है, जिसके आधार पर नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) ने साल 2002-03 और 2012-13 के लिए आंकड़े जारी किये हैं.
पूरे भारत में 35,000 घरों पर किया गया साल 2012-13 का सर्वेक्षण दिखाता है कि किसानों की न्यूनतम आय 11.8 प्रतिशत से बड़ी थी. इसके अनुसार मान सकते हैं कि अगले छह सालों में किसानों की आय दुगनी हो सकती है.
संभवत: सरकार ये दावा करती कि उसके वादे का मतलब किसानों की न्यूनतम आय दुगनी करना था न कि वास्तविक आय.
लेकिन, मीडिया, किसान संगठनों और कृषि अर्थशास्त्रियों के दबाव और सवालों ने सरकार को ऐसा करने से रोक दिया. वो लगातार सरकार से पूछते रहे कि सरकार न्यूनतम या वास्तविक किस आय को दुगना करना चाहती है.
पर अंत में दलवई समिति ने इसे स्वीकार कर लिया कि किसानों की वास्तविक आय महंगाई के अनुसार साल 2022 तक दुगनी कर दी जाएगी.
किसानों की आय में अंतर
अलग-अलग राज्यों में किसानों की आय में बहुत अंतर है. पूरे देश में एक किसान की मासिक आय का औसत भले ही 6,426 रुपये हो लेकिन बिहार में एक किसान 3,558 रुपये और पश्चिम बंगाल में 3,980 रुपये कमाता है. वहीं, पंजाब के एक किसान की मासिक आय 18,059 रुपये तक होती है.
इसलिये उच्च आय वाले राज्यों जैसे केरल, पंजाब और हरियाणा के मुकाबले बिहार, झारखंड ओर ओडिशा जैसे कम आय वाले राज्यों में किसानों की आय बढ़ाना ज़्यादा आसान है. उदाहरण के लिए बिहार के इलाकों के किसान धान और गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का फायदा मिलने की बात से इनकार करते हैं.
साल 2015-16 में बिहार में चावल के 65 लाख टन उत्पादन के बावजूद 12.24 लाख टन चावल खरीदा गया था. इसी तरह झारखंड में चावल का 29 लाख टन उत्पादन हुआ था लेकिन 2.06 लाख टन ही खरीदा गया था. वहीं, पंजाब में ये उत्पादन 118.2 लाख टन था जिसमें से 93.5 लाख टन की खरीद हुई थी.
इसलिए चावल खरीद के सिस्टम में सुधार करके ही बिहार और झारखंड के किसानों की आय को 15-20 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है.
भारत में गन्ना सबसे ज़्यादा फायदेमंद था. एनएसएसओ के आंकड़ों के मुताबिक एक घर में पैदा की गई गन्ने की फसल की औसत कीमत 89,430 रुपये थी जबकि मक्का की फसल का मूल्य सिर्फ 9391 रुपये था.
गन्ना किसानों को अच्छी कीमत का आश्वासन दिया जाता है. लेकिन, देखा जाए तो साल 2022 तक गन्ना किसानों की आय दुगनी करना लगभग असंभव है जबकि सिंचाई के विस्तार से मक्का, दालों, कपास और अन्य फसलों के किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है.
हर जगह एक जैसी नीति नहीं
भारत के हर क्षेत्र की अपनी मजबूतियां और कमियां होती हैं. प्रधानमंत्री का किसानों की आय को दुगना करने की बात कहना अच्छी बात थी लेकिन पूरे देश के लिए एक ही तरीका नहीं अपनाया जा सकता.
उदाहरण के लिए बिहार और झारखंड में मंडी की व्यवस्था नहीं है और किसान छोटे व्यापारियों पर निर्भर हैं. कृषि उत्पाद बाज़ार समिति (एपीएमसी) की कमियां समय-समय पर सामने आती रहती हैं. वहीं, बाज़ार नियमों का न होना भी सही साबित नहीं हुआ है.
वास्तव में बिहार के मक्का किसान कम कीमतों से परेशान हैं क्योंकि उनके पास फसल बेचने के लिए असंगठित मंडियों के सिवा कोई और विकल्प नहीं है. कुछ मंडियां तो रेलवे यार्ड में चल रही हैं.
खेत के आकार का भी किसान की आय पर असर पड़ता है. एक हेक्टेयर से कम आकार वाले बहुत छोटे खेत वाले किसान की आय बढ़ाना मुश्किल है. इसके लिए उसके पास आय का दूसरा ज़रिया होना ज़रूरी है.
निर्माण क्षेत्र की हालत ठीक न होने के कारण किसानों के लिए मज़दूरी से अतिरिक्त आय कमाना आसान नहीं है. आय बढ़ाने के लिए न सिर्फ कृषि क्षेत्र बल्कि अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों का भी समान रूप से विकास करने की जरूरत है.
किसान डेयरी, मुर्गी व मछली पालन और बागवानी आदि से भी कमा सकते हैं. लेकिन, कई फैसले इसे भी प्रभावित करते हैं.
जैसे इस पर ध्यान नहीं दिया गया कि कई जगहों पर मिड-डे मील में अंडे देने पर रोक लगाने से मुर्गी पालन करने वाले गरीब किसानों को नुकसान हुआ है. इसी तरह पशुओं को एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाने पर लगे प्रतिबंध से किसानों की आय दुगनी करने के लक्ष्य को पूरा करने में मुश्किल आएगी.
सरकार की आय दुगनी करने का लक्ष्य बेहद कठिन है लेकिन अगर गरीब राज्य प्रधानमंत्री के इस विजन को पूरा करने की कोशिश करते हैं तो यह उद्देश्य हासिल किया जा सकता है.