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कोरोना संकट: जीडीपी को लेकर रिज़र्व बैंक की यह चुप्पी डराने वाली है- नज़रिया
- Author, आलोक जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
एक बार फिर रिज़र्व बैंक ने यह नहीं बताया कि इस साल भारत की जीडीपी में कितनी बढ़त या कितनी कमी होने का अनुमान है.
जैसी कि आशंका थी, बढ़त का तो सवाल ही नहीं उठता. मगर विद्वानों से उम्मीद की जाती है कि वो एकदम पक्का नहीं तो मोटा-मोटा अनुमान तो दें कि अभी तक मिले संकेतों के आधार पर अर्थव्यवस्था का हाल कैसा रहने वाला है.
लंबी परंपरा है कि रिज़र्व बैंक पॉलिसी के साथ जब अर्थव्यवस्था का हाल बताता है तो वो जीडीपी अनुमान का एक आँकड़ा भी सामने रखता है. लेकिन ये परंपरा टूट चुकी है और अब तो लगता है कि नई परंपरा ही बन रही है.
रिज़र्व बैंक गवर्नर शक्तिकांत दास गुरुवार को सिर्फ़ इतना कहकर रह गए कि जीडीपी नेगेटिव टेरिटरी में रहेगी.
सीधा अर्थ तो यह है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोत्तरी की बजाय कमी आएगी. लेकिन यह कोई नई बात तो है नहीं. पिछली बार भी यही कहा गया था और जिस वक़्त कोरोना की मार से सारा काम धंधा चौपट पड़ा हो इसे कोई अनहोनी भी नहीं कहा जा सकता.
कितनी बुरी ख़बर के लिए तैयार रहें?
लेकिन सवाल यह है कि जीडीपी बढ़ने की जगह घटेगी तो कितनी घटेगी? इस देश को कितनी बुरी ख़बर के लिए तैयार रहना चाहिए? और इसी सवाल का जवाब नहीं मिला.
अब सवाल है कि रिज़र्व बैंक अनुमान नहीं लगा पा रहा है या वो सच सामने रखना नहीं चाहता? या सरकार की तरफ़ से इशारा है कि जैसे 'राष्ट्रहित में दूसरे कई आँकड़े' नहीं बताए जा रहे हैं, वैसे ही यह भी न बताया जाए कि रिज़र्व बैंक की नज़र में जीडीपी कितनी गिर सकती है.
सरकार ने मई के औद्योगिक उत्पादन के आँकड़े सामने न रखने का तर्क दिया था कि हम एक ऐसे समय से गुज़र रहे हैं जैसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ. इसलिए पुराने आँकड़ों से आज के समय की तुलना कर के कोई नतीजा निकालना ठीक भी नहीं है और तर्कसंगत भी नहीं. यही तर्क जीडीपी पर भी लागू होता है.
मगर समझदारों का कहना है कि जब तक बीमारी का सही सही अंदाज़ा न हो तब तक उसका इलाज भी तो संभव नहीं होगा. इसीलिए इस मामले पर आरबीआई कि चुप्पी चिंता को और बढ़ाती है.
पूर्व आर्थिक पत्रकार और कांग्रेस पार्टी की प्रवक्ता सुप्रिया श्रिनाते का तो कहना है कि यह जानकारी न देने का साफ़ मतलब है कि जीडीपी में जितनी गिरावट की आशंका थी अब यह गिरावट उससे कहीं ज़्यादा होने का डर है, इसीलिए आरबीआई उसे सामने नहीं रख रहा है.
लेकिन इश्क़ और मुश्क़ की तर्ज़ पर बुरी ख़बर भी आसानी से छुपती नहीं है. आईआईपी का जितना ब्योरा सरकार ने सामने रखा था उसका ही हिसाब जोड़कर समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कुछ ही देर में ये बात सामने रख दी कि मई में औद्योगिक उत्पादन में क़रीब 38 फ़ीसद की गिरावट आई.
जीडीपी की फ़िक्र ज़रूरी क्यों है?
यही हाल जीडीपी का भी है. देश और दुनिया की एजेंसियां इसका हिसाब लगाने में जुटी हैं कि कोरोना संकट का भारत की जीडीपी पर कितना असर होगा. विश्व बैंक ने कहा कि इसमें 3.2% की गिरावट आ सकती है, जबकि अंतराष्ट्रीय मुद्राकोष को यह गिरावट 4.5 % होने का डर है. दूसरी कुछ एजेंसियां पाँच से 7.5% तक की गिरावट का अंदाज़ा लगा रही हैं.
मगर भारत की ही रेटिंग एजेंसी इकरा का कहना है कि जीडीपी 9.5% तक गिर सकती है.
भारत सरकार के वित्तीय मामलों के विभाग का कहना है कि अर्थव्यवस्था तेज़ी से पटरी पर लौट रही है. मगर साथ ही वो यह भी चेताता है कि जिस तरह कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं और जगह जगह बार-बार लॉकडाउन हटता और लगता है, इसमें हालात नाज़ुक बने हुए हैं और लगातार निगरानी की ज़रूरत है.
दुनिया भर की अर्थव्यवस्था पर नज़र रखनेवाले ऑक्सफ़ोर्ड इकोनॉमिक्स की तरफ़ से पिछले हफ्ते ही ये चेतावनी आ चुकी है कि अक्टूबर के बाद इकोनॉमी में और कमज़ोरी दिख सकती है. उनका कहना है कि देशबंदी के बाद कामकाज दोबारा खोलने का काम सही तरीक़े से नहीं होने का यह नतीजा होगा.
जीडीपी की फ़िक्र किसी आम इंसान को क्यों होनी चाहिए? क्योंकि यही देखकर आप समझ सकते हैं कि इस वक़्त देश में कुल मिलाकर कामकाज कैसा चल रहा है, कैसा चलेगा और आपकी अपनी कमाई कितनी बढ़ेगी, और बढ़ेगी भी या नहीं?
चूंकि देश का पूरा ख़ज़ाना रिज़र्व बैंक के हाथों से गुज़रता है. इसीलिए रिज़र्व बैंक के अनुमान पर सबकी नज़र रहती है. लेकिन अगर ड्राइवर को ही रास्ता न सूझ रहा हो तो फिर वो यात्रियों को कैसे बताएगा कि मंज़िल कितनी दूर है?
(लेखक आर्थिक राजनीति टिप्पणीकार हैं.)