कोरोना वायरस: मोदी सरकार कम्युनिटी ट्रांसमिशन को क्यों नकार रही है?

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- Author, विकास पांडे
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
जून की शुरुआत में 45 साल के राजेश कुमार को खांसी आनी शुरू हो गई. चंद दिनों के भीतर ही उन्हें तेज़ बुखार हो गया.
उन्होंने कोरोना वायरस का टेस्ट नहीं कराया. इसके बजाय वे पाँच दिनों तक बुखार की दवाई लेते रहे. लेकिन, बुखार बना रहा और जल्द ही उन्हें सांस लेने में भी तकलीफ़ होने लगी.
पता ही नहीं चला कि कहां से संक्रमण हुआ
उनके परिवार ने उन्हें टेस्ट कराने के लिए कहा लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया. उन्हें लग रहा था कि उन्हें किसी क़ीमत पर कोरोना नहीं हो सकता क्योंकि दिल्ली में अपने घर से वे शायद ही बाहर निकले हों. साथ ही उन्होंने किसी ऐसे शख्स से मुलाक़ात भी नहीं की थी जिसे वायरस का संक्रमण हुआ हो या जिसके संक्रमित होने का शक रहा हो.
लक्षण दिखाई देने के आठ दिन बाद उनकी हालत बिगड़ गई. उन्हें अस्पताल ले जाया गया. टेस्ट में वे कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए.
उन्होंने कहा, "मैं बच गया, लेकिन डॉक्टरों ने बताया कि अगर मुझे अस्पताल लाने में और देरी की गई होती तो ये चूक मेरी ज़िंदगी पर भारी पड़ सकती थी."
कुमार अब तक नहीं जान पाए हैं कि उन्हें कहां से संक्रमण हुआ था.

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सरकार ने कम्युनिटी ट्रांसमिशन की परिभाषा तय नहीं की
एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस तरह के कई मामले हैं. इससे साबित होता है कि भारत में कोरोना वायरस सामुदायिक फैलाव की शक्ल ले चुका है.
लेकिन, सरकार यह मानने से इनकार कर रही है कि देश कम्युनिटी ट्रांसमिशन के दौर में पहुंच गया है. सरकार का कहना है कि इस शब्द की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है और हर देश अपनी स्थानीय परिस्थिति के हिसाब से इसे तय कर रहा है.
अब तक केरल और बंगाल ही ऐसे राज्य हैं जिन्होंने मान लिया है कि उनके यहां कोरोना का सामुदायिक विस्तार हो चुका है.
लेकिन, इस मामले में वैश्विक समझ आसान है. जब बड़े पैमाने पर मामलों में यह पता न चल सके कि संक्रमण का ज़रिया क्या है तो इसे कम्युनिटी ट्रांसमिशन माना जाना चाहिए.
डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइंस भी यही कहती हैं, "अगर बड़े पैमाने पर संक्रमितों की कड़ियों को जोड़ा नहीं जा पा रहा हो तो इससे कम्युनिटी ट्रांसमिशन का पता चलता है."

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संक्रमण की दर में तेज़ इजाफा इस ओर इशारा कर रहा
दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के सेंटर फॉर चेस्ट सर्जरी के चेयरमैन डॉ. अरविंद कुमार के मुताबिक़ निश्चित तौर पर भारत में ऐसा हो रहा है.
उनका कहना है कि अस्पतालों में अब ऐसे काफ़ी ज़्यादा लोग आ रहे हैं, जिनके संक्रमण का ज़रिया पता नहीं लगाया जा सकता है. वह कहते हैं कि मामलों की बढ़ती संख्या इस चीज़ की पुष्टि कर रही है.
इस बीमारी से भारत में अब तक 12 लाख से ज़्यादा मामले आ चुके हैं और क़रीब 29,000 मौतें हो चुकी हैं.
डॉ. कुमार कहते हैं, "ये आँकड़े झूठ नहीं बोल रहे हैं. एक के बाद एक राज्यों में संक्रमण की दर में तेज़ी से बढ़ोतरी हो रही है. आपके सामने जो कुछ भी हो रहा है उसे आप नकार नहीं सकते हैं."
लेकिन, सरकार इससे सहमत नहीं है. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के एक बड़े डॉक्टर ने हाल में ही माना था कि भारत कम्युनिटी ट्रांसमिशन के दौर में पहुंच गया है. लेकिन, आईएमए दो दिन बाद इस बयान से पीछे हट गया. आईएमए ने कहा कि यह डॉक्टर की निजी राय हो सकती है.
वायरोलॉजिस्ट डॉक्टर शाहिद जमील का कहना है कि सरकार को डॉक्टरों और एक्सपर्ट्स की बात सुननी चाहिए और साक्ष्यों को स्वीकार करना चाहिए.

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वायरस के शहरी इलाक़ों से आगे जाने की आशंका नहीं थी
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि वायरस एक महीने पहले के मुक़ाबले ज़्यादा फैल चुका है. आंध्र प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में और शहरी घने बसे इलाक़ों से बाहर निकलकर दूसरी जगहों से भी बड़े पैमाने पर अब संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं.
इनमें से कई इसके लिए तैयार नहीं थे क्योंकि ये अभी तक दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों को क्वारंटीन करने और टेस्टिंग करने पर ज़्यादा ज़ोर दे रहे थे. लेकिन, इन्होंने वायरस के स्थानीय फैलाव को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए थे.
कई राज्यों के पास इतने साधन भी नहीं हैं जिनसे वे अपने यहां आने वाले हर शख़्स को ट्रेस कर सकें और उसकी टेस्टिंग कर सकें.
डॉ. जमील कहते हैं कि इस तरह की सोच रही है कि वायरस बड़े शहरों और कुछ खास हॉटस्पॉट राज्यों में ही रोक लिया जाएगा और यह देश के दूसरे हिस्सों में नहीं पहुंच पाएगा.
वह कहते हैं, "ऐसा नहीं हुआ और अब कोविड-19 बेधड़क फैल रहा है."
वायरस तेज़ी से एक-जगह से दूसरी जगह जा रहा है और इस ट्रांसमिशन की चेन का पता लगाना मुश्किल भरा हो गया है.

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कम्युनिटी ट्रांसमिशन में कई हफ़्ते लगे
डॉ. जमील बताते हैं कि सरकार के ख़ुद के सर्वे से यह ज़ाहिर हो रहा है कि संक्रमितों में से 40 फ़ीसदी रेस्पॉन्डेंट्स को यह पता ही नहीं चला कि उन्हें कहां से यह बीमारी हुई है.
वह कहते हैं, "हमारे पास इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि यह कम्युनिटी ट्रांसमिशन है."
लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह सब रातोरात नहीं हुआ है. इनका कहना है कि ऐसा कई हफ़्तों में हुआ है क्योंकि सरकार लगातार इसे नकारती रही है.
डॉ. कुमार का कहना है, "महामारी के शुरुआती चरणों में ही स्थानीय स्तर पर कम्युनिटी ट्रांसमिशन नजर आने लगा था. लेकिन, अब यह पूरे देश में फैल चुका है. अब यह सबके सामने मौजूद है."
सरकार इस ज़ाहिर सी चीज को मानना क्यों नहीं चाहती है?
एक्सपर्ट्स का कहना है कि वे केवल इसका अंदाज़ा लगा सकते हैं क्योंकि सरकार इस मसले पर ज़्यादा बोल नहीं रही है. साथ ही सरकार ने अपने रुख़ को साबित करने के लिए कोई आधिकारिक परिभाषा भी नहीं जारी की है.
नाकामी ज़ाहिर करने से बच रही है सरकार!
कम्युनिटी ट्रांसमिशन को न मानने की एक वजह यह हो सकती है कि सरकार इसे अपनी नीतियों के फेल होने के तौर पर देखती हो.
डॉ. जमील कहते हैं कि कम्युनिटी ट्रांसमिशन के लिए सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. वे कहते हैं कि यह चीज़ डेटा के साथ पुख्ता होनी चाहिए और वैज्ञानिक रूप से सामने आने वाली चीजों को स्वीकार किया जाना चाहिए.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसे नकारने से और दबाव बढ़ेगा और इससे एक गैरज़रूरी बहस शुरू हो जाएगी.
सरकार के साथ काम कर चुके एक प्रमुख महामारी विज्ञानी डॉ. ललित कांत कहते हैं कि यह तर्क अब बेमानी है. वे कहते हैं, "हमें अपनी स्ट्रैटिजी को ज़्यादा सुधारने की ज़रूरत है. इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि हम इसे कम्युनिटी ट्रांसमिशन कहते हैं या नहीं."
वे कहते हैं, "संक्रमण लगातार गंभीर हो रहा है और यही कड़वा सच है."
फिलहाल नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं करना चाहती सरकार
लेकिन, कम्युनिटी ट्रांसमिशन को स्वीकार कर लेने से एक बड़े नीतिगत बदलाव की ज़रूरत पड़ सकती है.
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि बड़े पैमाने पर कम्युनिटी ट्रांसमिशन के माहौल में हर केस को पहचानने, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और क्वारंटीन करने जैसी चीजों की ज़रूरत नहीं पड़ती है.

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इसकी बजाय डब्ल्यूएचओ सलाह देता है कि देशों को डेटा के ज़रिए वायरस के भौगोलिक फैलाव को देखना चाहिए और उसी हिसाब से हेल्थकेयर सुविधाओं की तैनाती करनी चाहिए.
डॉ. कांत का कहना है कि हो सकता है कि सरकार शायद इस वक्त नीतियों में कोई बड़ा बदलाव न चाहती हो.
इसकी वजह यह भी हो सकती है कि केंद्र और राज्यों की सरकारों को टेस्टिंग को बढ़ाने और ट्रेसिंग की व्यवस्थाएं स्थापित करने में इतने महीनों का वक्त लगा है.
दूसरी चुनौती यह है कि महामारी भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग चरणों में है जिससे पूरी नीति में बदलाव करना मुश्किल है.
कांत कहते हैं, "इसके बावजूद लगातार इनकार करने को उचित नहीं ठहराया जा सकता है."
वे कहते हैं कि लोगों को जानने का अधिकार है और सरकार को पारदर्शी होना चाहिए.
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