बिहार: पटना के निजी अस्पतालों में कोविड-19 का इलाज कितना आसान, कितना मुश्किल?

    • Author, नीरज प्रियदर्शी
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए

"मेरे पिताजी को सांस लेने में बहुत तकलीफ़ हो रही थी. शाम के सात बजे उन्हें पटना के पारस अस्पताल में ले कर गया. डॉक्टरों ने दो मिनट भी नहीं देखा होगा और कोविड-19 की मुहर लगाकर एनएमसीएच रेफर कर दिया. मैं विनती करता रह गया कि उन्हें कम से कम ऑक्सीजन दे दी जाए पर अस्पताल वालों ने नहीं दी."

"ऑक्सीजन की कमी से एनएमसीएच पहुंचते-पहुंचते पिताजी की मौत हो गई. एंबुलेंस वाले ने 10 किमी से भी कम दूरी के लिए मुझसे 15 हज़ार रूपये का किराया लिया. एनएमसीएच में भी 24 घंटे तक गिड़गिड़ाता रहा, तब जा कर बॉडी को बैग में डालकर श्मशान घाट ले गए. जलाने के लिए लकड़ी भी नहीं ली, बस पेट्रोल छिड़ककर जला दिया."

ये शब्द उस शख़्स के हैं जिन्होंने हाल ही में अपने पिता को कोरोना वायरस के चलते खो दिया है.

स्थानीय मीडिया से बात करते हुए वो कहते हैं, "हालात ऐसे हैं कि आप अस्पताल वालों के पैर भी पकड़ लीजिए लेकिन फ़िर भी वे आपकी नहीं सुनेंगे."

अस्पताल में भर्ती नहीं होने की वजह से ना तो कोरोना टेस्ट हो पाया और ना ही इस शख़्स को ये पता चल पाया कि उनके पिता कोरोना पॉजिटिव थे या नहीं.

संक्रमित प्रशासनिक अधिकारी की मौत

बीते बुधवार बेगूसराय के ज़िला कार्यक्रम अधिकारी अरविंद कुमार की कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद मौत हो गई है.

अरविंद कुमार के भाई डॉक्टर मनोज कुमार कहते हैं, "मेरे भाई को डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर और ठीक से सांस नहीं ले पाने की शिकायत पहले से थी. तबीयत बिगड़ने पर हम उन्हें पहले आईजीआईएमएस ले गए लेकिन भर्ती ही नहीं किया. वहां से निजी अस्पतालों पारस और रूबन में ये सोचकर गए कि भले ज़्यादा पैसा लगेगा मगर इलाज़ जल्दी हो जाएगा."

"वहां से भी कोविड-19 मरीज़ मानकर उन्हें पीएमसीएच में रेफ़र कर दिया गया. पीएमसीएच से उन्हें एम्स भेजा गया और वहां से एनएमसीएच भेजा गया. इस दौरान चक्कर लगाने में ही भाई की मौत हो चुकी थी."

कोरोना वायरस के इलाज़ में बिहार के सरकारी अस्पतालों में कुव्यवस्था और कुप्रबंधन की ख़बरें तो पहले से आ रही हैं. लेकिन अब यहां के निजी अस्पताल गंभीर मरीजों को भी अपने यहां भर्ती करने में आनाकानी कर रहे हैं.

कोरोना वायरस टेस्ट से पहले ही निजी अस्पताल मरीज़ों को सरकारी कोविड अस्पतालों में रेफ़र कर रहे हैं. जबकि 20 जुलाई को तत्काल प्रभाव से लागू सरकारी आदेश के मुताबिक़ पटना के 18 निजी अस्पतालों में कोविड मरीजों के लिए 290 बेड अलग से आवंटित हैं.

'कितना भी पैसा दीजिए, कोई भर्ती नहीं करेगा'

पारस और रूबन मेमोरियल हॉस्पिटल पटना के बड़े निजी अस्पतालों में शामिल हैं.

सरकारी आदेश के मुताबिक़ रूबन में उपलब्ध बेड की संख्या 180 है और इनमें से 40 बेड कोरोना संक्रमित मरीजों के लिए आरक्षित हैं.

सरकारी आदेश में अस्पतालों का फ़ोन नम्बर भी ज़ारी किया गया है लेकिन फ़ोन लगाने पर लगता नहीं और किसी का फ़ोन उठाया नहीं जाता.

22 जुलाई को रूबन मेमोरियल हॉस्पिटल में जाकर पूछने पर अस्पताल के कर्मचारियों ने कहा, "हम लोग अभी किसी कोरोना वायरस संक्रमित मरीज़ को नहीं ले रहे हैं क्योंकि उनके लिए अलग व्यवस्था अभी तक नहीं हो पाई है."

यह बताने पर कि सरकार ने इस बारे में आदेश भी जारी किया है, कर्मचारी बताते हैं, "आदेश जारी हुआ है तो हो सकता है कि कोई अलग व्यवस्था करके मरीजों को रखा जाए."

अस्पताल के अंदर प्रवेश से पहले शरीर का तापमान मापा जा रहा है. कोई भी लक्षण नहीं मिलने पर ही प्रवेश की अनुमति दी जा रही है.

इसी तरह का हाल दूसरे बड़े निजी अस्पताल पारस एचएमआरआई का है. यहां कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों के लिए 30 बेड आरक्षित हैं.

बिहार सरकार ने अपने आदेश में यह स्पष्ट लिखा है कि कोरोना पॉजिटिव मरीज़ अथवा उनके परिजन चाहें तो अपने खर्च पर निजी अस्पतालों में मरीज़ का इलाज करा सकते हैं.

पारस में भर्ती नहीं किए जाने और अस्पतालों के चक्कर काटने में अपने पिता को खो चुके नवीन कुमार कहते हैं, "इस वक़्त पारस अस्पताल में आप चाहें कितना भी पैसा दे दीजिए, लेकिन अगर मरीज़ में कोरोना का कोई एक भी लक्षण है तो भर्ती नहीं लिया जाएगा."

पारस के कर्मचारी भी मरीज़ों को भर्ती नहीं करने को लेकर सवालों पर वैसा ही जवाब देते हैं जैसा रूबन के कर्मचारियों से मिला.

हमने यह भी पूछा कि आख़िर कब तक वो अपने यहां कोरोना मरीज़ों को भर्ती करने लगेंगे? इस पर वो कहते हैं, "हमें कोई जानकारी नहीं है. बड़े अधिकारियों से पूछिए."

बीती 22 जुलाई तक पटना के निजी अस्पताल कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की भर्ती नहीं कर रहे थे.

लेकिन 24 जुलाई की शाम को अस्पताल प्रमुखों से बातचीत में पता चला कि वे 23 जुलाई से कोविड मरीजों को अपने यहां रखने लगे हैं.

पारस अस्पताल के प्रमुख डॉक्टर तलत हलीम कहते हैं, "बहुत जल्दी में हमें सारी तैयारियां करनी पड़ी हैं. 23 जुलाई की शाम से हमने कोविड के गंभीर मरीजों को रखना शुरू कर दिया है. हमारे यहां कुल 30 बेड हैं जिनमें से 3 आईसीयू के हैं. आईसीयू को छोड़ बाकी सारे बेड ऑक्यूपाई हो चुके हैं. आईसीयू को हमने जानबूझकर खाली रखा है ताकि ज़रूरत पड़ने पर किसी भी मरीज़ को तत्काल वहां शिफ्ट किया जा सके."

रूबन अस्पताल के प्रमुख डॉक्टर सत्यजीत कुमार सिंह के मुताबिक़ उनके यहां भी 23 जुलाई की शाम से कोरोना वायरस संक्रमित मरीजों को रखा जाने लगा है.‌ 40 में से 35 बेड ऑक्यूपाई हो चुके हैं, बाक़ी के पांच आईसीयू वाले बेड हैं.

डॉक्टर सत्यजीत कहते हैं, "फ़िलहाल तो हमारे सारे बेड ऑक्यूपाई हो चुके हैं. मगर हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि बिस्तरों की संख्या 45 से 50 हो जाए. सभी बिस्तरों तक पाइपलाइन से ऑक्सीजन पहुंचाने का काम शुरू हो गया है."

क्या है प्रक्रिया और कितना आएगा ख़र्च?

सरकार की तरफ़ से जारी किए गए आदेश के मुताबिक़ जो मरीज़ अपने खर्चे पर चाहें तो प्राइवेट अस्पतालों में इलाज़ करा सकते हैं.

हमने पारस अस्पताल के प्रमुख डॉक्टर तलत हलीम से यह भी पूछा कि उनके यहां कोविड-19 के इलाज़ का ख़र्च क्या आएगा?

वे कहते हैं, "डीएम के साथ सहमति बनी है कि हम अपने जनरल टैरिफ़ के अनुसार ही चार्ज करेंगे. हमारे अस्पताल में फिलहाल दिसंबर 2019 के टैरिफ़ के हिसाब से चार्ज किया जाता है. कोविड-19 के लिए कोई विशेष टैरिफ़ नहीं है."

डॉक्टर तलत ने बताया, "जो मरीज़ मामूली और गंभीर लक्षण वाले होंगे केवल उन्हीं को भर्ती किया जाना है. फ़िलहाल तो हमारे बेड भर गए हैं लेकिन नए मरीजों के लिए वेटिंग लिस्ट जारी किया जाएगा. कोरोना टेस्ट का रेट वही होगा जो सरकार ने तय किया है. लेकिन जिन मरीजों का एंटीजन टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आया है उनके लिए हम एचआरसीटी टेस्ट करेंगे. इसके अलावा एडमिट करने के समय‌ चार और टेस्ट किए जाएंगे. इन जांचों का कुल खर्च 10 से 12 हज़ार रुपये के क़रीब आएगा. जनरल वार्ड में एक दिन के बेड का चार्ज 2,650 रूपये है."

बिजनेस ख़राब होने का डर

20 जुलाई को तत्काल प्रभाव से लागू किए गए आदेश को प्राइवेट अस्पतालों ने तीन दिन बाद 23 मई से मानना शुरू तो कर दिया, मगर एक ही दिन बाद सबके यहां कोरोना के लिए आवंटित बेडभ र गए हैं.

एक मरीज़ के परिजन दोनों बड़े प्राइवेट अस्पतालों में गुहार लगाने के बाद लौट गए और आखिरकार मरीज़ को एनएमसीएच में भर्ती करा दिया.

वे कहते हैं, "दरअसल, प्राइवेट अस्पताल अपने यहां कोरोना वायरस का इलाज करना ही नहीं चाहते. इसलिए बेड भर जाने का बहाना दे रहे हैं."

आख़िर निजी अस्पताल अपने यहां कोरोना वायरस का इलाज करना क्यों नहीं चाहते हैं?

पटना के एक अस्पताल प्रबंधक नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "अस्पतालों का मुनाफ़् सर्जिकल इलाज़ में होता है. कोरोना का इलाज़ मेडिसिनल इलाज़ है. और इसके लिए एक बेड कम से कम 10 दिनों तक ऑक्यूपाई होगा. ज़्यादा दिन भी हो सकता है."

"यहां के अधिकांश निजी अस्पतालों की बिल्डिंग एक ही है. जो निजी अस्पताल अपने यहां एक बार कोविड-19 मरीज़ को एडमिट कर लेगा, दूसरे मरीज़ उसके यहां आने से डरेंगे. और कौन चाहेगा अपना बिजनेस ख़राब करना!"

सभी ज़िलों के निजी अस्पतालों के लिए आदेश

निजी अस्पतालों में कोरोना पॉज़िटिव मरीजों के इलाज़ के लिए बिहार सरकार का आदेश सभी जिलों के लिए ज़ारी हुआ है.

जिलाधिकारियों को यह ज़िम्मेदारी दी गई है कि वे अपने यहां के निजी अस्पतालों को जिनमें सुविधाएं और सेवाएं अच्छी हैं, चिह्नित करें और वहां पर कोरोना पॉज़िटिव मरीजों के इलाज़ की व्यवस्था कराएं.

मंगलवार को मुख्य सचिव दीपक कुमार की अध्यक्षता में कोरोना से निपटने के लिए बनाए गए सरकार के कोर ग्रुप की बैठक हुई थी. उसमें यह तय हुआ था कि इन अस्पतालों में कोरोना के लिए एक विशेष रिसेप्शन बनाया जाएगा जहां कोई भी व्यक्ति कोरोना से संबंधित हर तरह की जानकारी हासिल कर सकता है.

लेकिन पटना समेत दूसरे जिलों से जुटाई गई हमारी जानकारी में अभी तक सिर्फ़ पारस और रूबन में ही कोविड पॉज़िटिव पेशेंट को रखा जा रहा है. हालांकि, वहां फिलहाल बेड खाली नहीं हैं.

जबकि सूबे में कोरोना संक्रमण के मामले तेजी से बढ़कर 31 हज़ार को पार कर गए हैं, अस्पतालों में भर्ती नहीं किए जाने और इलाज़ के बिना मौत की खबरें आम हो चली हैं.

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