कोरोना का यूपी में कहर और ऊपर से भेदभाव का ज़हर- ग्राउंड रिपोर्ट

    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पूर्वी उत्तर प्रदेश से

23 साल के असदउल्लाह अब कोरोना से तो आज़ाद हो गए हैं लेकिन सामाजिक बहिष्कार से नहीं.

बीते अप्रैल पूर्वी उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर ज़िले के मगहर क़स्बे में रहने वाले असदुल्लाह के परिवार के 23 लोगों को कोरोना पॉज़िटिव घोषित किया गया था.

इसके बाद जो इस परिवार के साथ हुआ, वह ग्रामीण भारत में कोरोना को लेकर फैलती क्रूरता का सतही अंदाज़ा भर देती है.

मौलवी बनने की तमन्ना लेकर देवबंद में रहकर पढ़ाई कर रहे इस युवा के लिए कोरोना से पीड़ित होने और इसके बाद बदला हुआ चौतरफा माहौल जीवन बदलने वाला अनुभव रहा है.

काले मास्क के ऊपर झांकती उदास आंखों पर फ़ंसा चश्मा ठीक करते हुए असदउल्लाह कहते हैं, "अप्रैल के आख़िर में जैसे ही मेरे कोरोना पॉज़िटिव होने की सूचना आई, एक स्थानीय न्यूज़ चैनल ने हमसे बिना पूछे यह खबर चला दी कि मैं 'जमाती' हूँ. मेरे साथ-साथ मेरे घर के कुल 23 लोगों के कोरोना टेस्ट पॉज़िटिव आया था."

असदउल्लाह बताते हैं कि उस टीवी रिपोर्ट का नतीजा ये हुआ कि पूरे इलाक़े में लोग हमें 'जमाती' कहने लगे. वे बताते हैं, "मैं तो दिल्ली गया भी नहीं था...न ही मेरा जमात से कोई लेना देना था. मैं तो देवबंद में रहकर पढ़ता हूँ. जब से हम क्वारेंटीन से वापस आए हैं तब से यह हाल है कि अगर सामान लेने राशन की दुकान पर भी जाओ तो लोग कहते हैं- देखो कोरोना वाले आ गए! जमाती आ गए! कोई सीधे बात तक नहीं करता."

कोरोना जांच के पहले राउंड में असदउल्लाह के परिवार के 18 लोग पॉज़िटिव आए और कुछ ही दिन बाद 5 अन्य सदस्यों की जाँच रिपोर्ट भी पॉज़िटिव आई.

इन सभी 23 लोगों में से किसी में भी कोरोना के लक्षण नहीं थे. लेकिन क्वारंटीन के दौरान ज़िले के खलीलाबाद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में रहने वाले इस घर के 18 लोगों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ा.

असदउल्लाह के चाचा नसीबउल्लाह बताते हैं, "वहां साफ़-सफ़ाई बिल्कुल नहीं थी और न ही पीने के पानी की सुविधा. टायलेट के दरवाज़े टूटे हुए थे और हर तरफ़ गंदगी थी. घर की बच्चियों को अलग सेंटर में रखने की बात पर प्रशासन से कुछ बहस हो गई तो मामला पुलिस तक चला गया. उल्टे हमारे ही घर के पाँच लोगों के ख़िलाफ़ थाने से पूछताछ का नोटिस आया है".

मार्च के आख़िर में जब असदउल्लाह देवबंद से घर वापस आए तो सबसे पहले खलीलाबाद सामुदायिक स्वास्थ केंद्र पर उनकी जांच हुई थी.

नसीबउल्लाह याद करते हैं, "अचानक एक शाम पुलिस, प्रशासन और मीडिया के कितने ही लोग एक साथ हमारे घर आए. पूरी भीड़ लग गयी. हमें यह नहीं बताया गया कि हम बीस दिनों के लिए ले जा रहे हैं...सिर्फ़ इतना कहा गया कि टेस्ट करके वापस घर भेज देंगे. शाम का बना हुआ खाना वैसा ही रसोई में छोड़कर एक जोड़ी कपड़े तन पर डाले हम सारे गए और फिर दो हफ़्ते बाद घर लौटे तो रसोई में उस शाम का खाना सड़ा पड़ा था!"

बीते महीनों को याद करते हुए असदउल्लाह दार्शनिक अंदाज़ में कहते हैं, "मुझे इससे यह सबक़ मिला कि कई बार सिर्फ़ एक गलतफ़हमी की वजह से आपकी ज़िंदगी हमेशा के लिए यू-टर्न ले सकती है. कोरोना तो ठीक हो गया लेकिन मोहल्ले में हम पता नहीं कब तक 'कोरोना' और 'जमात' वाले बने रहेंगे".

बढ़ते मामले और खस्ताहाल अस्पताल

कोरोना से जुड़े सामाजिक बहिष्कार का यह अकेला मामला नहीं हैं. इस रिपोर्ट के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, बस्ती, महाराजगंज,सिद्दार्थनगर, संतकबीर नगर और कुशीनगर समेत 6 ज़िलों में की गई पड़ताल के दौरान पूरे क्षेत्र में कोरोना को लेकर लोगों के बीच मौजूद एक गहरी उदासीनता, लापरवाही और जागरूकता की कमी के कई उदाहरण सामने आए.

देश में जन-स्वास्थ सुविधाओं पर नीति आयोग की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करवाने में सबसे पीछे हैं. नीति आयोग की इस सूची में केरल पहले स्थान पर है.

वहीं जर्जर जन स्वास्थ्य सुविधाओं से सतत जूझ रहा उत्तर प्रदेश अब 32 हज़ार से भी ज़्यादा कोरोना पॉज़िटिव मामलों और 860 से ज़्यादा मौतों से साथ देश में कोरोना से सबसे ज़्यादा प्रभावित राज्यों में शामिल हो गया है.

बस्ती के कैली अस्पताल का हाल

पूर्वी उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले के कैली 'कोविड' अस्पताल में वह एक कमोबेश शांत दोपहर थी. तक़रीबन 25 लाख की जनसंख्या वाले बस्ती ज़िले के लिए यह अकेला सरकारी लेवल- 2 कोविड अस्पताल होने के साथ-साथ कोरोना से बचने की पहली बड़ी उम्मीद भी है.

अस्पताल परिसर में दाखिल होने से पहले किसी 'अनिवार्य तापमान की जाँच' के लिए नहीं गुज़रना पड़ा जबकि यह कोविड स्पेशिलिटी अस्पताल है, यानी आम दिनों में लगभग 1500 से अधिक मरीज़ों का ओपीडी पर्चा रोज़ काटने वाले इस अस्पताल को फ़िलहाल 'कोविड स्पेशेलिटी अपस्ताल' घोषित कर दिया गया है.

बीबीसी की टीम तो यहां शील्ड, मास्क और दस्ताने जैसे ज़रूरी चीजें पहनकर पहुँची तो चिकित्सा अधीक्षक डॉक्टर जीएम शुक्ला का मास्क उनकी गर्दन में झूल रहा था.

आधे घंटे के साक्षात्कार के दौरान उन्होंने एक बार भी मास्क नहीं पहना. यह स्थिति तब है जब बस्ती में तीन सरकारी स्वास्थ कर्मचारी कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं.

बस्ती ज़िले में वापस आए लगभग डेढ़ लाख से भी ज़्यादा प्रवासी मज़दूरों और संक्रमित स्वास्थ्य कर्मचारियों का ज़िक्र करते हुए का ज़िक्र करते हुए डॉक्टर जीएम शुक्ला कहते हैं, "कोरोना के बढ़ते मामलों की वजह से काम का बोझ तो बढ़ा है. तीन डॉक्टरों के संक्रमित होने की वजह से बाक़ी कर्मचारियों में भी संशय है लेकिन फिर भी सभी अपनी ड्यूटी पूरी कर ही रहे हैं."

अस्पताल में फ़िलहाल कोरोना के 39 गंभीर मरीज़ भर्ती हैं जिनमें से तीन वेंटिलेटर पर हैं. इससे पहले यहां अब तक तीन मौते हो चुकी हैं. 200 बिस्तरों के स्पेशल कोरोना वार्ड और मात्र 12 बिस्तरों के आईसीयू का विस्तार करने में सबसे बड़ी अड़चन डॉक्टरों की कमी है.

डॉक्टर शुक्ला कहते हैं, "अस्पताल को पिछले साल ही बस्ती मेडिकल कॉलेज में अपग्रेड किया गया है. हमारे पास 12 वेंटिलेटर भी हैं. बैंगलोर से 10 और मँगवाए गए हैं लेकिन 20 बिस्तरों का आईसीयू चलाने के लिए हमें कम-से-कम 12 एनेस्थीसिया स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की ज़रूरत है जबकि हमारे पास हैं सिर्फ़ 4. उन 4 डॉक्टरों में से भी 2 की उम्र साठ के आस-पास की है तो वह कोरोना का काम नहीं कर पा रहे हैं."

मास्क तक को मोहताज

लेवल दो (एल-2) के बड़े स्तर पर काम कर रहे कैली अस्पताल के बाद छोटे स्वास्थ केंद्रों की हालत जानने के लिए हमने बस्ती ज़िले के रुँधौली स्वास्थ्य केंद्र का रुख़ किया.

तक़रीबन तीन महीने तक बंद रहने के बाद अस्पताल का ओपीडी हाल ही में खुला था और परिसर के दरवाज़े पर ही एक कोरोना हेल्प डेस्क भी बनाई गई थी. भीतर बैठे अस्पताल के अधीक्षक डॉक्टर ए के चौधरी एक सैनिटाइज़र की बोतल के ख़राब सप्रे से जूझ रहे थे.

उन्होंने कहा, "हमारे पक्ष में जो बात जाती है वह यह है कि कोरोना से होने वाली मृत्यु दर हमारे यहां एक प्रतिशत से भी कम है. इसलिए उम्मीद बंधती है कि मामले बढ़ने पर भी हम स्थिति सम्भाल लेंगे. फिर हमारे पास मास्क, दस्ताने और पीपीई सुरक्षा किट की कोई कमी नहीं है. डॉक्टर भी पर्याप्त हैं."

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आशा जैसे ग्रामीण स्वास्थ्य कर्मचारी हर गांव में आने वाले प्रवासियों पर नज़र रख रही हैं. लोगों से मिलकर सर्वे कर रही हैं और शक़ होने पर हर व्यक्ति की सूचना अस्पताल तक पहुँचा रही हैं. इसी आधार पर हम सैम्पल लेकर जांच के लिए गोरखपुर भेज रहे हैं".

लेकिन इसी बीच रुँधौली की एक आशा कार्यकर्ता एक महिला मरीज़ को लेकर डॉक्टर चौधरी के चेम्बर में दाख़िल हुईं. आशा कार्यकर्ता और इस गर्भवती मरीज़, दोनों ने ही मास्क नहीं पहना था.

डॉक्टर खु़द ही नहीं लगा रहे हैं मास्क

अस्पताल के बाहर मिलने पर इस ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने भीतर किए गए डॉक्टर चौधरी और प्रशासन के सभी दावों की सच्चाई बताते हुए कहा कि उन्हें आज तक अस्पताल से कभी मास्क और दस्ताने नहीं दिए गए हैं. रुँधौली ब्लॉक के ही रौनाकलां गाँव की निवासी मालती देवी 2006 से आशा कार्यकर्ता के रूप में काम कर रही हैं.

बातचीत के वक़्त एक दुपट्टा चेहरे पर बांधे खड़ी मालती देवी कहती हैं, "मैंने अपने गाँव में बाहर से आए 234 लोगों का सर्वे किया है. ख़तरा तो महसूस होता ही है क्योंकि सबसे पहले हम ही मिलते हैं ऐसे लोगों से. हमें कोरोना के काम के लिए महीने के एक हज़ार रुपए अधिक दिए जाने की बात कही गई है. लेकिन इसके सिवा आज तक अस्पताल से मास्क या दस्ताने जैसी कोई सुविधा नहीं मिली है. कुछ नहीं हो मजबूरी में अपने ही पैसे से ख़रीद कर इस्तेमाल करना पड़ता है".

इसी तरह सिद्धार्थनगर ज़िले के मिठवल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अधीक्षक डॉक्टर बृजेश शुक्ला ख़ुद बिना मास्क और दस्ताने के बैठे हुए यही बताते रहे कि कैसे आम लोगों के मास्क न पहनने की वजह से कोरोना को नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा है.

उन्होंने कहा, "सिद्दार्थनगर में 2 लाख के आसपास प्रवासी मज़दूर वापस आए हैं और कुछ हफ़्ते पहले तक हम हर दिन दस-दस हाजर लोगों की कोरोना स्क्रीनिंग कर रहे थे. अब इतने लोग नहीं आते लेकिन फिर भी संक्रमण तब तक रोकना सम्भव नहीं है जब तक आम लोग सोशल डिसटेंसिंग और मास्क के नियमों का पालन नहीं करेंगे."

सिद्धार्थनगर का मिठवल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बस्ती का ऐसा तीसरा अस्पताल था जहां हमें बिना एन-95 मास्क और दस्तानों के बैठे डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों को काम करते देखा.

साथ ही, इन स्वास्थ्य परिसरों में प्रवेश से पहले आगंतुक का तापमान नापने की रस्म अदायगी भी नहीं की जा रही थी. अगले दिन महाराजगंज के श्यामदेउरवी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में का दौरा करने पर पता चला कि वहां लगातार काम कर रहे स्वास्थ्य कर्मचारियों के पास दस्ताने और मास्क उपलब्ध ही नहीं हैं.

थर्मल स्कैनर के न होने की वजह से स्टाफ़ इलाज के लिए आ रहे मरीज़ों के तापमान की भी जाँच नहीं कर पा रहा है.

कहाँ से आएंगे साज़ोसामान?

अपनी जीडीपी का मात्र 1.28 प्रतिशत जन स्वास्थ पर ख़र्च करने वाला भारत मूलतः प्राथमिक, सामुदायिक और ज़िला स्वास्थ्य केंद्रों की तीन परतीय प्रशासनिक व्यवस्था के आधार पर काम करता है.

उत्तर प्रदेश जैसी घनी आबादी वाले राज्यों में किया जाने वाला प्रति व्यक्ति ख़र्च केरल जैसे राज्यों के मुकाबले और कम हो जाता है क्योंकि अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को बहुत बड़ी आबादी का उपचार करना होता है.

कोरोना से लड़ाई का प्रमुख ज़िम्मा एक ओर जहाँ लेवल 1 के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और लेवल 2 के ज़िला अस्पतालों पर ज़्यादा है,वहीं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र इस बीच ग्रामीण क्षेत्रों में आपातकालीन प्रसव सुविधाएँ देना जारी रखे हुए हैं क्योंकि कोई और विकल्प भी नहीं है.

महाराजगंज के श्यामदेउरवी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के परिसर में अपने नवजात शिशु के साथ खड़ी नीलम प्रसव के बाद अपने डिस्चार्ज होने का इंतज़ार कर रही थीं. पास के ही मोहनपुरा गाँव की निवासी नीलम के साथ उनके माता-पिता भी खड़े हैं पर तीनों में से किसी ने मास्क नहीं पहना है.

भीतर बने डॉक्टर चेम्बर की बदरंग दीवारों के बीच स्टाफ़ नर्स विभा शर्मा नीलम की फ़ाइल तैयर कर रही हैं. मुख्य चिकित्सक डॉक्टर शोभिता श्रीवास्तव अभी तक अस्पताल नहीं पहुंची हैं. स्टाफ़ नर्स विभा के साथ-साथ उस वक़्त अस्पताल में मौजूद तीन पैरामेडिकल स्टाफ़ के सदस्यों ने भी न ही मास्क पहने थे और न ही दस्ताने.

पूछने पर विभा बताती हैं, "यह अस्पताल डिलिवेरी पोईंट भी है इसलिए इसको बंद नहीं रख सकते. लोग जांच करवाने नहीं आते और एकदम प्रसव के वक़्त मरीज़ को पहली बार यहां लेकर पहुँचते हैं. ऐसे में हमारे पास कोई विकल्प नहीं होता - न ही यह जांच पाने का कि मरीज़ को कोई कोरोना के लक्षण हैं या नहीं, न ही उसे रेफ़र करने का या वापस भेजने का".

विभा कहती हैं, "हमें ख़ुद अपने ऊपर ख़तरा लेकर प्रसव करवाना ही पड़ता है. ऊपर से हमारे पास अभी मास्क, दस्ताने वगैरह नहीं हैं, हालाँकि हमें कहा गया है कि जल्दी ही यह सब कुछ भिजवाया जाएगा."

ओपीडी खुलने के बाद बढ़ा है संक्रमण का ख़तरा

इस यात्रा में आगे पड़ने वाल महराजगंज के पड़तावल ब्लॉक का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ऐसा पहला अस्पताल था जहाँ हमें सभी स्वास्थ्य कर्मचारी मास्क लगाकर काम करते हुए दिखाई दिए.

अपस्ताल परिसर के पूर्ण सैनिटाइजेशन के निर्देश देने के बाद अपने चेम्बर आकर बैठे स्वास्थ्य केंद्र के अधीक्षक डॉक्टर राकेश कुमार बताते हैं कि 500 से अधिक रोगियों को इलाज मुहैया कराने वाले इस अस्पताल के ओपीडी के खुलने से संक्रमण का खतरा बढ़ गया है.

वे कहते हैं, "ज़िले के एक सरकारी डॉक्टर का कोरोना टेस्ट पॉज़िटिव आने के बाद स्वास्थ कर्मचारियों में तनाव बढ़ा हुआ है. लॉकडाउन के वक़्त सिर्फ़ आपातकालीन सेवाएँ जारी थीं इसलिए रोज़ 18 से 20 मरीज़ आते थे. लेकिन अब जबसे ओपीडी चालू हुई है तो सभी के लिए चुनौती बढ़ गई है".

डॉक्टर कुमार बताते हैं कि ओपीडी खुलेगी तो मरीज़ आएँगे ही, और यह पता लगाना मुश्किल है कि मरीज़ों में किसको कोरोना है और किसको नहीं.

वे कहते हैं, "फिर भी हम जितना बचाव कर सकते हैं उतना करने की कोशिश कर ही रहे हैं. मास्क के बिना किसी को भीतर आने नहीं दे रहे और अस्पताल की सफ़ाई करवा रहे हैं. हालाँकि हमारे पास फ़ोर्थ क्लास कर्मचारियों की कमी है लेकिन जो भी संसाधन हैं उसमें काम चला रहे हैं".

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कुशीनगर में टेस्ट रिज़ल्ट का इंतज़ार

आगे कुशीनगर के रामकोला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हमारी मुलाकत पूर्वांचल में मास्क, दस्ताने के साथ-साथ फ़ेस शील्ड लागाकर काम कर रहे पहले डॉक्टर से होती है.

लेकिन खुली ओपीडी में मरीज़ों की लंबी क़तार का परीक्षण कर रहे रामकोला स्वास्थ्य केंद्र के प्रमुख डॉक्टर शेषकुमार विश्वकर्मा के सामने आने वाले एक भी मरीज़ ने मास्क तक नहीं लगाया था.

कोरोना के बढ़ते मालमों से लड़ने की अस्पताल की क्षमता के बारे में पूछने पर डॉक्टर विश्वकर्मा ने दवाइयों की कमी जैसी इतनी बुनयादी चीज़ें गिनवाई जो रामकोला के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के भी जनस्वास्थ्य तालिका ने सबसे पीछे रहने की वजह को स्पष्ट करता है.

"हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है दवाइयों की कमी. पीपीई किट, दस्ताने, मास्क वगैरह की कमी. टेस्टिंग जैसे जैसे हो रही है वैसे वैसे लगातार और केस निकल रहे हैं इलसिए यह भी ज़रूरी है कि हमारे पास अपने स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए पर्याप्त मास्क, पीपीई किट और सुरक्षा संसाधन हों."

अभी तो डॉक्टर विश्वकर्मा अस्पताल के बाहर एक वाश बेसिन लगवा रहे हैं ताकि सब लोग हाथ धोकर ही अंदर आएँ.

कुशीनगर के सरकारी अस्पताल सिर्फ़ दवाइयों और मास्क जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी से ही नहीं, बल्कि कोरोना जांच के लिए दिए सैम्पल के नतीजों के लम्बे इंताजर से भी जूझ रहा है.

दरअसल, गोरखपुर और बस्ती मंडल के सात ज़िलों के कोरोना सैम्पल परीक्षण के लिए गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ही भेजे जाते हैं. इन सात ज़िलों में बस्ती, सिद्धार्थनगर, संतकबीर नगर, कुशीनगर, गोरखपुर, महाराजगंज और देवरिया शामिल हैं. अमूमन हर ज़िले से रोज़ाना सौ से तीन सौ के बीच सैम्पल परीक्षण के लिए भेजे जाते हैं और हर ज़िले में नतीजे आने की 'प्रतीक्षा समय' दो दिनों तक का है.

कुछ मामलों में नतीजे आने में सप्ताह भर की देर भी दर्ज की गई है. उदाहरण के लिए जुलाई के पहले हफ़्ते में ही कुशीनगर स्वास्थ्य प्रशासन ने ज़िले में कोरोना टेस्ट सैम्पल का आँकड़ा जारी करते हुए बताया कि ज़िले से भेजे गए 648 परीक्षण नमूनों के नतीजे आना पेंडिंग हैं. इस बीच 'संदिग्ध मरीज़' को लंबे समय तक 'होल्डिंग एरिया' में रखना भी ग्रामीण स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है.

अस्पताल प्रशासन का पक्ष रखते हुए गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर गणेश ने बीबीसी को बताया कि कई बार सैंपल को ठीक तरह से नहीं भेजने की वजह से भी नतीजे आने में देर होती है. "ज़िलों में लोग सुबह ही इंटरनेट पर भेजे जा रहे सैम्पलों का आँकड़ा चढ़ा देते हैं. लेकिन हमारे पास सैम्पल दिन ख़त्म होने के बाद देर शाम ही पहुँचते हैं. एक दिन की देर तो यहीं हो गयी. फिर 24 घंटे तो इन नतीजों का 'वेट टाइम' भी है".

बीआरडी मेडिकल कॉलेज के सामने आ रही चुनौतियों के बारे में बताते हुए डॉक्टर गणेश जोड़ते हैं, "हम समय से टार्गेट पूरा कर रहे हैं. लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि कई बार सही ढंग से सैम्पल नहीं भेजे जाते. मसलन, 'स्वॉब' की मात्रा कम भेजी गई हो तो जांच नहीं हो पाती और ज़िला अस्पताल को सही मात्रा वाला दूसरा स्वॉब सैम्पल भेजना पड़ता है इसलिए कुछ नतीजों के आने में देर होती है".

पानी तक की दिक्क़त

यात्रा के शुरू में दर्ज मगहर के असदउल्लाह की काहनी की परछाई कुशीनगर तक महसूस होती है. कुशीनगर में लक्ष्मीपुर के राजकीय आश्रम पद्धति विद्यालय में भर्ती 33 कोरोना पॉज़िटिव मरीज़ों में सुरक्षाबल के दो कर्मचारियों, आस-पास के ग्रामीणों के साथ-साथ गजियाबाद का निवासी बारह वर्षीय राजकुमार भी शामिल है.

बच्चे के लिए पानी की एक दस लीटर वाली कैन और खाने के सामना से भरे झोले पर पेन से 'राजकुमार' लिखकर सामान को चिन्हित करते उनके चाचा हीरालाल कहते हैं कि बच्चे ने सुबह-सुबह फ़ोन करके उन्हें बताया कि उसे यहां पानी नहीं मिल रहा है.

"सुबह ही फ़ोन पर बोला कि यहां पानी की बड़ी क़िल्लत है इसलिए हम उसके लिए पानी लेकर आए हैं. साथ में ओढ़ने के लिए चादर मांग था वो वह लाए हैं. और कुछ खाने-पीने का सामान और एक किलो आम."

मूलतः कुशीनगर के फतेहां गाँव का रहने वाला राजकुमार दरअसल गाजियाबाद में अपने माँ-पिता के साथ रहकर पढ़ने वाला एक छात्र है. लेकिन स्कूल बंद होने के बाद परिजनों से मिलने की ज़िद में वह गांव आ गया.

गांव में से ही किसी ने खबर दे दी कि लड़का बाहर से आया है तो उसे जाँच के लिए ले गए. फिर उसका नतीजा पॉज़िटिव आया तो सब परिजनों की जाँच हुई.

राजकुमार के चाचा कहते हैं, "हमारा नतीजा अभी तक आया नहीं है और हम घर पर ही रह रहे थे. लेकिन जब बच्चे ने पानी की कमी बताई तो हमें उसे सामान भिजवाने यहां आना ही पड़ा."

हालाँकि स्कूल की इमारत में चल रहे इस अस्थायी एल-वन कोरोना सेंटर के इंचार्ज डॉक्टर रोहित कहते हैं कि मेडिकल और नॉन-मेडिकल स्टाफ़ को मिलाकर आठ लोगों की उनकी एक टीम हर वक़्त यहां ड्यूटी पर रहती है.

वे मानते हैं कि "बीच में पानी की समस्या हुई थी लेकिन हमने उसे ठीक कर दिया है. यहां भर्ती सभी मरीज़ बिना लक्षण वाले हैं और सभी की हालत स्थिर है. हम उनके खाने-पीने और स्वास्थ्य का पूर ख़्याल रखते हैं. मरीज़ों और स्वास्थ्य कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए भी हम एसओपी (स्टैंडर्ड ओपेरेटिंग प्रोसिज़र) का पूरा पालन करते हैं."

हालाँकि जब बीबीसी ने इस एल-वन सेंटर में दो हफ़्ते गुज़ार कर हाल ही में लौटे 51 वर्षीय अशोक सिंह से बात की तो अस्पताल के भीतर के माहौल का उनका विवरण डॉक्टर रोहित के बयान से बिल्कुल उलट था.

वे बताते हैं, "जब मैं वहां गया तो भीतर बिल्कुल सफ़ाई नहीं थी. डॉक्टर नहीं आते थे. बाथरूम का नल टूटा हुआ था जिसकी वजह से सारा पानी बह जाता था. फिर मैंने कई बार शिकायत दर्ज करवाई तो चार दिन बाद डॉक्टर रोहित आए तो पता चला कि सफ़ाई कर्मचारी और पलंबर सभी भीतर आकर काम करने में डर रहे हैं. सभी को संक्रमण का डर है. तो फिर मैंने ही उनसे सफ़ाई और नल ठीक करने का सामान मांग और ख़ुद नल ठीक किया और सफ़ाई भी ख़ुद की. उस दिन डॉक्टर रोहित के आने के बाद से हमें देखने डॉक्टर भी आने लगे थे. आकर हाल पूछते और दवाई भी देते लेकिन इमारत की सफ़ाई और बाक़ी सारा काम हमें ख़ुद ही करना पड़ता था क्योंकि कोई अंदर आने को तैयार नहीं होता. खाना भी बाहर की तरफ़ एक टेबल पर रख दिया जाता था."

पॉज़िटिव होने पर गांव वाले गालियाँ दे रहे हैं

कुशीनगर के विजयपारा पोखरा टोला के रहने वाले अशोक सिंह को एल-वन सेंटर में ख़ुद पानी के टूटे नल सुधारने और झाड़ू लगाने से ज़्यादा तकलीफ़ अपने गांव में झेलनी पड़ी.

ओमान में प्रवासी मज़दूर की तरह काम करने वाले अशोक सिंह 10 जून को हिंदुस्तान वापस आए. "ओमान से यहां तक मेरी कई बार कोरोना और तापमान की जाँच हुई. फिर लखनऊ में उतरते ही जांच हुई. सब सही था इसलिए मुझे घर भेज दिया गया. घर में भी मैं अपने मकान के अंदर नहीं गया बल्कि बगीचे के बाहर बने मोटर घर में रहने लगा. फिर दस दिन बाद मैं अपनी राशन की दुकान पर जाकर बैठा और उसी दिन मुझे हल्की खांसी हुई."

कोरोना टेस्ट के नतीजे आने पर कुशीनगर में अशोक सिंह के साथ भी वही हुआ जो मगहर में असदउल्लाह के परिवार के साथ हुआ था. मरीज़ की निराधार निंदा और बहिष्कार का एक ऐसा सिलसिला जो यह स्पष्ट करता है कि राज्य में कोराना के साथ जीना कितना मुश्किल है.

रुंधे गले से अशोक कहते हैं, "जांच में कोरोना पॉज़िटिव आने पर गांव वालों ने मुझे इतनी गालियाँ दी और इतना बुरा-भला कहा की क्या बताऊँ! मेरे गांव को पुलिस ने सील कर दिया और गांव वालों में एकदम मेरा बहिष्कार ही कर दिया. हमारी परचून की दुकान पर रखे-रखे पाँच हज़ार से ऊपर का सामान सड़ गया. अब मैं ठीक हो गया हूँ फिर भी कोई हमारी दुकान से सामान लेने नहीं आता. सब कहते हैं कि मैंने बाहर से आकर बीमारी फैला दी."

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