नेपाल राजनीतिक संकटः चीनी राजदूत की मुलाक़ातों का मतलब?

नेपाल में चीनी राजदूत हाउ यांक़ी

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    • Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

नेपाल की राष्ट्रपति वीडी भंडारी और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के विरोधी माधव कुमार नेपाल से चीनी राजदूत हाउ यांक़ी की मुलाक़ातों को लेकर चर्चा जारी ही थी कि समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ चीन की राजदूत ने मंगलवार सुबह देश के एक अन्य पूर्व प्रधानमंत्री झाला नाथ खनाल से मुलाक़ात की.

नेपाल के सत्ताधारी दल 'कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल' में 'सत्ता-संघर्ष' के बीच चीनी राजदूत की इन गतिविधियों को जहां राजधानी काठमांडू में 'नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप' के तौर पर देखा जा रहा है, वहीं ओली और भारत के असहज रिश्ते, भारत-नेपाल सीमा विवाद और 'हाल तक भारत के क़रीबी रहे' नेपाल में चीन की खुली दख़लंदाज़ी को लेकर भारत के कान भी खड़े हैं.

काठमांडू में मौजूद एक सूत्र के मुताबिक़ चीनी राजदूत हाउ यांक़ी की पिछले शुक्रवार से लेकर अब तक नेपाल के पांच शीर्ष नेताओं से मुलाकातें हुई हैं. हालांकि माधव नेपाल से भेंट को छोड़कर बाक़ी मुलाक़ातों पर न तो चीनी दूतावास और न ही नेपाल के नेताओं की तरफ़ से किसी तरह का कोई बयान जारी किया गया है.

माधव नेपाल और हाउ यांक़ी की मुलाक़ात पर भी सीपीएन-यूएमएल के विदेश विभाग के डिप्टी प्रमुख बिष्णु रिजल ने बीबीसी नेपाली सेवा से इतना ही कहा कि दोनों के बीच 'मुलाक़ात हुई है, लेकिन क्या बातें हुईं ये मुझे नहीं मालूम'.

इन मुलाक़ातों और चर्चाओं के बीच सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की सोमवार को होनेवाली एक अहम बैठक रद्द हो गई जिसमें कहा जा रहा था कि ओली के त्यागपत्र की मांग शायद अपने नतीजे पर पहुंच सकती थी. नेतृत्व के अलावा कई जगहों पर पार्टी में टूट की संभावना भी जताई जा रही थी.

राजूदत यांक़ी की सीपीएन के नेताओं से इस तरह की बैठकों का ये पहला मौक़ा नहीं है. मई में भी प्रधानमंत्री ओली के ख़िलाफ़ तेज़ होते विरोध के बीच उनके इसी तरह के क़दमों की तरफ़ काफ़ी लोगों की नज़र पड़ी थीं.

त्रिभुवन यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रमुख केसी खड़गा कहते हैं कि 'राजनीतिक रस्साकशी के बीच राजदूत और सीपीएन नेताओं की मुलाक़ातों ने कई तरह की अटकलबाज़ियों को जन्म दिया है लेकिन मेरे ख्याल में हमारे आंतरिक मामलों में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए.'

चीन का बढ़ता प्रभाव

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इमेज कैप्शन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ नेपाल के प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली

कभी भारत के 'सहयोग' से सत्ता में पहुंची नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ धड़ों पर अब चीन का अधिक प्रभाव है जिसे भारत को क़रीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार युबराज घिमिरे के मुताबिक़ नेपाली जनता में भारत को लेकर बदले मत के नतीजे के तौर पर भी देखा जा सकता है.

भारत से साथ लिपुलेख, कालापानी और लिपियाधुरा को लेकर हुए विवाद के बाद तो प्रधानमंत्री ओली ने संसद में आरोप तक लगा दिया था कि कुछ लोग भारत की मदद से उनकी सरकार को गिराने की कोशिश कर रहे हैं. उस समय उनके दल के कई नेताओं ने मांग की थी कि या तो प्रधानमंत्री सरकार गिराने की कोशिशों को लेकर कोई सबूत दें या अपना पद छोड़ें.

इस बीच राजधानी काठमांडू के तीन होटलों में भारतीय जासूसों की तलाशी में छापे पड़ने की ख़बर है.

लेखक और जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक कनक मणि दीक्षित ने अपने एक ट्वीट में कहा है, 'क्या स्थिति है: अगर सीपीएन टूट जाती है तो भारत क़सूरवार ठहराया जाएगा. अगर पार्टी इकट्ठा रहती है तो इसका श्रेय चीन को मिलेगा.'

नेपाल - भारत

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पार्टी के प्रवक्ता काजी श्रेष्ठा ने हालांकि इस बात से इंकार किया है कि नेपाल की आंतरिक राजनीति किसी बाहरी ताक़तों के कहने पर चल रही है और आगे कहा कि, 'एक सार्वभौम देश के नाते नेपाल अपने फ़ैसले ख़ुद लेने में सक्षम है. हम अपने मामलों में किसी तरह के हस्तक्षेप का विरोध और इसे नापसंद करते हैं.'

हालांकि जब उनसे इस बयान की व्याख्या करने को कहा गया तो उन्होंने कहा कि उनका ट्वीट किसी विशेष व्यक्ति को लेकर नहीं है.

उन्होंने कहा, 'प्रधानमंत्री ने बयान दिया कि भारत उन्हें सत्ता से बेदख़ल करने की साज़िश रच रहा है. अब लोग कह रहे हैं कि चीन की राजदूत सीपीएन के विरोधी ख़ेमों के बीच के मतभेद को दूर करने की कोशिश कर रही हैं. मेरा नज़रिया है कि हम आज़ाद हैं और अपने मतभेदों को मिल बैठकर दूर कर सकते हैं.'

मगर पत्रकार युबराज घिमिरे का मानना है कि नेपाल में चीन के बढ़े प्रभाव से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता और इसे इस सदी में 'भारत के नेपाल में अति आक्रामक पालिसी की प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जाना चाहिए'.

प्रचण्ड, ओली और माधव नेपाल

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'एक ऐसे देश की सरकार जो ख़ुद माओवादियों को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा मानती रही हो वो पड़ोसी मुल्क में उन्हीं माओवादियों की सत्ता में भागेदारी तय करवाती है और फिर दूसरी शक्तियों को भी इसमें भागीदार बनाती है, एक चारों तरफ़ से घिरे मुल्क की ब्लॉकेड करवाती है तो इस सबका असर जनता के मन पर पड़ता है' और राजनीतिज्ञ भला उससे कैसे अलग रह सकता है, घिमरे सवाल करते हैं.

वो कहते हैं सीमा विवाद जैसी घटनाएं भारत विरोधी माहौल को और हवा देती हैं.

भारत के प्रति नेपाल में बदले मिजाज़ और एशिया में पांव फैलाने की ग़र्ज़ से चीन पिछले कुछ सालों में वहां निवेश से लेकर सामरिक संबंधों को मज़बूत करने की कोशिश करता रहा है.

घिमिरे कहते हैं कि नेपाल में जो आज चीन कर रहा है वो भारत भी करता रहा है हालांकि नेपाली चाहते हैं कि उसके संबंध दोनों से उतने ही दूर के रहें.

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