कोरोना वायरस: कुछ इस तरह बदल जाएगी हमारे काम-धाम की दुनिया

पूर्वी शाह इस साल मार्च से ही वर्क फ़्रॉम होम कर रही हैं. तब से, जब से लॉकडाउन के पहले चरण का ऐलान हुआ. पूर्वी पब्लिक रिलेशन्स के पेशे में काम करती हैं. वो दो छोटे बच्चों की मां भी हैं.

वर्क फ़्रॉम होम के दौरान पूर्वी अपनी निजी और पेशेवर ज़िंदगी के बीच तालमेल बिठाने के लिए लगातार कोशिश कर रही हैं.

वो कहती हैं, "बेशक़ घर से काम करना मुश्किल है लेकिन मुझे लगता है कि अब धीरे-धीरे इसकी आदत पड़ रही है. मेरा ऑफ़िस काफ़ी दूर है इसलिए मैं वहां जाकर काम नहीं करना चाहती लेकिन मैं घर से भी काम नहीं करना चाहती. मुझे ठीक से काम करने के लिए जगह बदलने की ज़रूरत है."

पूर्वी ने अब अपने घर के एक कोने को छोटे से ऑफ़िस में तब्दील कर दिया है.

उन्होंने घर में अपना एक डेस्क, प्रिंटर और इंटरनेट कनेक्शन लगवा लिया है. उनका कहना है कि ज़िंदगी थोड़ी सामान्य होते ही वो एक को-वर्किंग स्पेस में काम करना शुरू कर देंगी.

वर्क फ़्रॉम होम

ब्रैंड कंसल्टेंट हरीश बिजूर कहते हैं, "बड़े ऑफ़िस अब छोटी-छोटी यूनिट्स में तब्दील हो रहे हैं. लोग अब बिना चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों के काम कर रहे हैं और कइयों के लिए ये अहम का मसला बन रहा है."

लॉकडाउन ने लोगों को उनके घरों में बंद कर दिया है.

हरीश कहते हैं, "आजकल लोगों को दो मोबाइल फ़ोन रखना पड़ता है-एक ऑफ़िस के लिए और एक निजी ज़िंदगी के लिए. लोगों को अब ऑफ़िस का कोना बनाने के लिए बड़े घरों की ज़रूरत पड़ रही है. चूंकि अब यही न्यू नॉर्मल है इसलिए प्रिंटर और ऑफ़िस के लिए बाकी ज़रूरी चीज़ों की मांग भी बढ़ गई है."

समीर जोशी नामी फ़र्निचर ब्रैंड गोदरेज इंटीरियो में करते हैं. वो कहते हैं कि ज़्यादातर भारतीय घर छोटे होते हैं इसलिए उनमें ऑफ़िस की चीज़ें रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती.

समीर बताते है कि उनकी कंपनी की वेबसाइट पर कुर्सियों के लिए किए जाने वाले सर्च में 140 फ़ीसदी की बढ़त देखी गई और कुर्सियों के बाद लोगों ने जो चीज़ सबसे ज़्यादा बार ढूंढी है वो है-टेबल.

यही वजह है कि गोदरेज ऐसे फ़र्निचर को बढ़ावा दे रहा है जो घरों में आसानी से अडजस्ट हो सकें. जैसे कि फ़ोल्डेबल (मोड़ी जा सकने वाली) कुर्सियां और मेजें.

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्क फ़्रॉम होम सिर्फ़ काम करने वालों के लिए नहीं बल्कि संस्थानों के लिए भी चुनौती है.

सिक्योरिटी सर्विस कंपनी सिक्योरटेक (Sequretek) के को-फ़ाउंडर पंकित देसाई कहते हैं, "सबसे बड़ी चुनौती ये सुनिश्चित करने है लोग बिना किसी ताकाझांकी के काम कर सके. ये ताकाझांकी डेटा के छेड़छाड़ से लेकर किसी अन्य गोपनीय जानकारी के इधर-उधर होने तक हो सकती है. ख़ासकर जब आपके हाथ में किसी और का डेटा हो तो आपको इसकी सुरक्षा का पूरा ख़्याल रखना होता है."

फ़ेसबुक और टीसीएस जैसी बड़ी कंपनियों ने पहले से इस योजना पर काम करना शुरू कर दिया है कि उनका 30-50 फ़ीसदी से ज़्यादा स्टाफ़ दफ़्तर न आए. ये व्यवस्था अगर पूरी तरह लागू हो जाती है तो अगले तीन-चार वर्षों में नए क़ायदे-क़ानून भी लागू होंगे.

यूनिकॉर्न इंडिया वेंचर्स के मैनेजिंग पार्टनर भास्कर मजुमदार कहते हैं, "आने वाले दिनों में एक बड़ा बदलाव ये होने वाला है कि कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को हफ़्ते में सिर्फ़ एक या दो बार आने को कहेंगे और फिर इसी हिसाब से भुगतान करेंगे."

दफ़्तरों में मूल बदलाव

चूंकि अब घर से काम करना न्यू नॉर्मल बन गया है इसलिए कंपनियां अपने स्टाफ़ को सुरक्षित रखने के लिए दफ़्तरों और काम करने की जगहों में कुछ मूलभूत बदलाव कर रही हैं. कम से कम अभी कुछ दिनों के लिए तो दफ़्तरों में कोई भी कर्मचारी साथ-साथ या पास में नहीं बैठेंगे.

अभी का जो माहौल है वो कोलैबरेटिव ज़ोन्स बनाने के विचार से बिल्कुल उलट है. कोलैबरेटिव ज़ोन्स का मक़सद लोगों को साथ लाना है. अब लोगों को साथ लाने के लिए नए डिजिटल टूल्स की ज़रूरत है न कि ऐसे ज़ोन्स की.

अब दफ़्तरों में वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के लिए ज़्यादा जगह बनानी होगी. फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग के 'छह फ़ीट दूरी' वाले मानक को देखते हुए भी दफ़्तरों में ज़्यादा जगह की ज़रूरत पड़ेगी.

इसके साथ ही ग्लास और उससे बनी चीज़ों की मांग बढ़ेगी क्योंकि उन्हें आसानी से साफ़ और डिसइन्फ़ेक्ट किया जा सकता है. विषाणुरोधी मटीरियल कोटिंग वाली चीज़ों की मांग भी बढ़ सकती है.

खेती-बाड़ी कैसे होगी?

भारत की 50 फ़ीसदी जनता कृषि और इससे जुड़े क्षेत्र में काम करती है और जीडीपी में 17 फ़ीसदी योगदान देती है. कोरोना वायरस संक्रमण फैलने की वजह से अन्य व्यवसायों की तरह खेती का तौर-तरीका भी हमेशा के लिए बदल रहा है. किसान अब मिट्टी की गुणवत्ता की जांच और खाद खरीदने के लिए तकनीक की मदद लेने लगे हैं.

कृषि तकनीक से जुड़ी कंपनी उन्नति के सह-संस्थापक अमित सिन्हा कहते हैं किसानों को ये नई तकनीकें अपनाने में कम से कम तीन साल का वक़्त लगता लेकिन कोरोना महामारी की वजह से ये छह-सात महीनों में ही हो गया.

भारतीय किसानों के पास आमतौर पर इतने पैसे नहीं होते कि वो महंगी टेक्नॉलजी वाली चीज़ें खरीद सकें. कई किसान उन्हें इस्तेमाल करना भी नहीं जानते. यहीं पर कृषि तकनीक कंपनियों की एंट्री होती है. मिसाल के तौर पर, अगर कोई किसान फसल काटने वाली मशीन किराए पर लेता है तो वो इसे इस्तेमाल करने के लिए वीडियो कॉल के ज़रिए विशेषज्ञ की मदद ले सकता है.

किसान बारिश का अनुमान लगाने के लिए या मिट्टी की गुणवत्ता परखने के लिए भी गैजेट्स उधार ले सकते हैं. एक इलाके में रहने वाले किसान मिलकर ट्रैक्टर किराए पर ले सकते हैं और अपनी ज़रूरतों के हिसाब से इसे बारी-बारी इस्तेमाल कर सकते हैं. विशेषज्ञ किसानों को ये भी समझा सकते हैं कि वो अच्छी फसल कैसे पैदा करें और मंडी बंद होने की स्थिति में अनाज सीधे कैसे बेचें.

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में खेती भी काफ़ी हद तक तकनीक पर निर्भर होगी क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा किसान अब ये समझने लगे हैं कि मशीनों की मदद से काम करना इंसानों की मदद से काम करने के मुकाबले ज़्यादा सुरक्षित है.

कोरोना महामारी से पहले किसान और उद्यमी अपनी सुविधा के हिसाब से तकनीक का इस्तेमाल कर रहे थे लेकिन अब उन्हें ये अहसास हो गया है कि ये वक़्त का तकाज़ा है. सस्ते डेटा और स्मार्टफ़ोन्स की उपलब्धता ने इस प्रक्रिया में तेज़ी ला दी है.

नौकरियां बदलेंगे लोग?

दुनिया भर की कंपनियां अब नए बिज़नस मॉडल तलाश रहे हैं. कोरोना के बाद दुनिया में कुछ नौकरियां अपने-आप ख़त्म हो जाएंगी तो कुछ नई नौकरियां जन्म लेंगी.

साल 2017 में मैकिन्सी ग्लोबल इन्स्टीट्यूट ने अनुमान लगाया था कि बदलती दुनिया में आधुनिक मशीनों की अधिकता की वजह से साल 2030 तक लगभग 14 फ़ीसदी लोगों को अपनी नौकरियां बदलनी पड़ेंगी. अब महामारी की वजह से ये और ज़्यादा ज़रूरी हो गया है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले दिनों में फ़्रीलांस काम के प्रति लोगों का नज़रिया बदल जाएगा. फ़्रीलांस और शॉर्ट टर्म पर नौकरियों की अधिकता वाली अर्थव्यवस्था मज़बूत होगी. 'शेफ़ ऑन कॉल' जैसी चीज़ें सच्चाई में तब्दील हो जाएंगी क्योंकि लोग रेस्तरां जाने से तो बचेंगे लेकिन रेस्तरां के ज़ायके वाले खाने को अपनी रसोई में बनवाना चाहेंगे.

ऐसी नौकरियां जिनमें आपको ग्राहकों के साथ काम करना पड़ता है, जैसे सैंलॉ और ब्यूटी पार्लर, घर के काम और साफ़-सफ़ाई, फ़िज़ियो थेरेपिस्ट, जिम ट्रेनर, कोरियोग्राफ़र और अभिनेताओं के काम को पहले से ही असुरक्षित माना जा रहा है.

कई नौकरियां अब डिजिटल मोड में भी जा रही हैं. मिसाल के तौर पर, योग, डांस और संगीत के ट्रेनर लाइव स्ट्रीमिंग और वीडियो क्लास के ज़रिए अपना काम कर रहे हैं.

एचआर के पेशे में काम करने वाले कुछ लोगों का कहना है कि क्लाउड कंप्यूटिंग, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और साइबर सिक्योरिटी जैसी स्किल्स की जानकारी वाले इंजीनियर, डेटा एनेलिस्ट और डेटा वैज्ञानिकों की ज़्यादा ज़रूरत पड़ेगी. नौकरियों में ऐसे लोगों की ज़रूरत पड़ेगी जो भावनात्मक रूप से मज़बूत हों और दबाव में काम कर सकें.

रोबोटिक्स और ऑटोमेशन

भारत रोबोटिक्स के क्षेत्र में साल 2011 से ही काम कर रही है और महामारी ने इसकी ज़रूरत को और ज़्यादा बढ़ा दिया है. होटल, मॉल, हॉस्पिटल और घरों में ऐसे रोबोट्स की ज़रूरत है जो खिड़की-दरवाज़े साफ़ करने और लॉन की छंटाई करने जैसे काम कर सकें.

मिलग्रो रोबोट्स के संस्थापक राजीव करवाल कहते हैं, "

उनके हालिया मिलग्रो आईमैप 9 और ह्यूमनॉइड ईएलएफ़ को दिल्ली के एम्स में फ़र्श डिसइन्फ़ेक्ट करने के लिए किया जा रहा है. उन्होंने फ़ोर्टिस, अपोलो और मैक्स अस्पतालों को भी रोबोट दिए हैं.

कई मैन्युफ़ैक्चरिंग कंपनियां तो अपना पूरा सेटअप ऑटोमेटिक बना रही हैं ताकि उनका स्टाफ़ छोटे-मोटे काम मशीनों से करवा सके और ख़ुद ज़्यादा महत्वपूर्ण काम करे.

यहां तक कि रियल एस्टेट के ब्रोकर भी रिहायशी और कॉमर्शियल प्रॉपर्टी ग्राहकों को दिखाने के लिए ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल करने लगे हैं.

निगरानी

भारत में वर्क फ़्रॉम होम को शायद ही कोई अच्छा विकल्प मानता था. ज़्यादातर मैनेजरों का मानना है कि कर्मचारियों को बेहतर काम करने के लिए देर तक दफ़्तर में रहना ज़रूरी है.

यही वजह है कि कोरोना के दौर में मैनेजर और उनकी टीम के बीच के भरोसे की परीक्षा हो रही है. रिसर्च कंपनी गार्टनर के अनुसार लगभग 74 फ़ीसदी सीएफ़ओ (चीफ़ फ़ाइनैंशियल ऑफ़िसर) का मानना है कि महामारी ख़त्म होने के बाद भी कुछ कर्मचारियों को घर से ही काम करना पड़ेगा.

अपने स्टाफ़ पर नज़र रखने के लिए कंपनियां अब मोबाइल डिवाइस मैनेजमेंट (MDM) जैसे सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल कर रही हैं.

साइबर सिक्योरिटी फ़र्म इन्फ़ीसेक के सीईओ विनोत सेंतिल ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बताया था कि एमडीएम में एक ऐसा प्री-बिल्ट ट्रैकिंग मैकेनिज़्म होता है जो डेटा एक्सेस कर सकता, लैपटॉप की स्क्रीन देख सकता है और दूर बैठे व्यक्ति के सिस्टम में मौजूद संवेदनशील जानकारी को डिलीट कर सकता है.

साइबर सिक्योरिटी कंपनी क्रॉसओवर के पास एक ऐसा सॉफ़्टवेयर है जिसके ज़रिए मैनेजर, घर से काम कर रहे स्टाफ़ के कीबोर्ड की ऐक्टिविटी और ऐप के इस्तेमाल पर नज़र रख सकते हैं. इस सॉफ़्टवेयर से हर 10 मिनट में ऐसी रिपोर्ट बनती है जिससे स्टाफ़ के एक्टिविटी की वेबकैम फ़ोटो भी होती है. वर्कऐनेलिटिक्स, डेस्ट्रैक, आईमॉनिट और टेरामाइंड जैसी कंपनियों ने भी ऐसे सॉफ़्टवेयर की मांग में बढ़त दर्ज की है.

एक आईटी पेशेवर ने नाम ज़ाहिर न किए जाने की शर्त पर बीबीसी को बताया, "मेरे मैनेजर को ये तक पता होता है कि मैं कितनी बार वॉशरूम गया. मैं इन सबसे सहज नहीं हूं. ये कुछ ज़्यादा ही है."

कुछ कंपनियां अपने स्टाफ़ को काम के दौरान वेब कैमरा ऑन रखने को कहती हैं जो निजता का उल्लंघन है. हालांकि कुल मिलाकर लोगों ने इस न्यू नॉर्मल के साथ जीना सीख लिया है.

स्टोरी: निधि राय, इलस्ट्रेशन: निकिता देशपांडे

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