कोरोना महामारी: ग़रीबों की नौकरियां गईं, अमीरों का पैसा बढ़ा

    • Author, पैबलो उचाओ
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

अगर आप कोरोना महामारी के दौरान घर से काम कर रहे हैं तो इस बात की अधिक संभावनाएं हैं कि आप दफ्तर आने जाने और बाहर खाने के खर्च बचा रहे हैं.

लेकिन वहीं दूसरी तरफ इस महामारी को फैलने से रोकने के लिए लगाए लॉकडाउन के कारण हज़ारों ग़रीब मज़दूरों की नौकरियां चली गई हैं औऱ आय के स्रोत पूरी तरह ख़त्म हो गए हैं.

अर्थशास्त्री कहते हैं कि इस महामारी के कारण ऐसी अजीब स्थिति पैदा हुई है जो आज से पहले किसी महामारी के दौरान नहीं हुई थी.

कैपिटल इकोनॉमिक्स के प्रमुख अर्थशास्त्री नील शीरिंग कहते हैं कि इस महामारी ने "परिवारों की आय को अजीब तरह से बदल दिया है."

वो कहते हैं, "एक तरफ हज़ारों लोगों की आय का स्रोत ख़त्म हो गया है या वो इस डर में ज़िदगी गुज़ार रहे हैं कि उनकी नौकरी कभी भी जा सकती है और दूसरी तरफ कुछ लोगों की आय में अनचाहे तौर पर इज़ाफा हो गया है, उनके खर्च कम हुए हैं और सोविंग्स बढ़ गई हैं."

अचानक बढ़ने लगी हैं सेविंग्स

रेबेका ओ'कॉनर वेबसाइट गुड विद मनी की संस्थापक हैं और रॉयल लंदन में बतौर पर्सनल फाइनेन्स स्पेशिल्ट काम करती हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि "आर्थिक स्तर पर लोगों की वस्तुस्थिति अब बदल गई हैं. कुछ लोगों के लिए अब छोटी रकम जमा कर पाना भी मुश्किल हो गया है."

हालांकि रेबेका की तरह कई प्रोफ़ेशनल लोगों के खर्चों में मौजूदा दौर में भारी कमी आई है.

उनके लिए बच्चों को स्कूल छोड़ने जाने में पेट्रोल खर्च न करने और दफ्तर के लिए सार्वजनिक परिवहन में दो घंटे सफर न करने से हर महीने 450 डॉलर की बचत होती है. साथ ही आते जाते रास्ते से कॉफी न खरीदने, दफ्तर के अपने दोस्तों के साथ ड्रिंक और लंच न करने से उन्हें और 100 डॉलर का फायदा होता है.

साथ ही सुपरमार्केट से सामान न लाने के कारण उस पर होने वाला खर्च भी बचा रही हैं.

अलग लोगों के लिए लॉकडाउन की अलग-अलग सच्चाई

रेबेका अकेली नहीं हैं जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान पैसे बचाए हैं. ब्रिटेन में लॉकडाउन के कारण पैसे बचाने वाले ऐसे कई और लोग भी हैं जिनका कहना है कि अब वो विदेश घूमने और शानदार शादी करने के अपने सपने पूरे करना चाहते हैं.

ब्रिटेन में इस मुद्दे पर हुए विश्लेषण में रेज़ोल्यूशन फाउन्डेशन ने पाया कि हाई इनकम परिवारों में प्रत्येक तीन में से एक ने अपनी महीने की आय में बढ़ोतरी दर्ज की है जबकि पांच में से एक परिवार ने इसमें कमी दर्ज की है.

वो परिवार जो मौजूदा दौर में वर्क फ्रॉम होम कर पाने में सक्षम हैं वो अधिक पैसे भी बचा पा रहे हैं. जबकि लो से मिडल इनकम वाले परिवारों में से 20 फीसदी का कहना है कि महामारी के दौर में उनका उधार लेना बढ़ गया है, वो या तो क्रेडिट कार्ड का अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर उधार में खरीदारी कर रहे हैं.

लेकिन रेबेका कहती हैं हाथ में पैसा अधिक होने का मतलब ये कतई नहीं है कि उमपभोक्ता अब अधिक खर्च करने लगे हैं क्योंकि वैश्विक अर्थव्यव्स्था ख़तरे में है.

वो कहती हैं, "बच गए पैसों के साथ जो सबसे अच्छा काम आप कर सकते हैं वो है उसे ऐसे ही कहीं रख देना जहां से आप उसे ज़रूरत पड़ने पर निकाल कर इस्तेमाल कर सकें."

कोरोना संकट का असर

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइज़ेशन) में शोधकर्ता स्टीवन कैपसोस कहते हैं, "इससे पहले के आर्थिक संकट के मुकाबले मौजूदा संकट बेहद अलग तरह का है, क्योंकि इस महामारी ने सीधे लेबर मार्केट पर हमला किया है."

एक तरफ जब अर्थव्यव्स्था से कई सेक्टर में काम पूरी तरह बंद हो गया है,वहीं कुछ सेक्टर में ऐसा नहीं हुआ. संगठन के अनुसार रीटेल, निर्माण कार्य, उत्पादन, हॉस्पिटालिटी और खाद्य पदार्थ के मार्केट लॉकडाउन के दौरान लगी पाबंदियों से बुरी तरह प्रभावित हैं.

कैपसोस कहते हैं, "पाबंदियों से पहले मज़दूर जो काम कर रहे थे उस पर अचानक रोक लग गई."

संगठन के अनुसार इस दौरान काम के जितने घंटे बर्बाद हुए वो 30 करोड़ फुल-टाइम नौकरियों के बराबर थे. अमरीका और केंद्रीय एशिया में काम के घंटों में क़रीब 13 फीसदी की कमी आई जबकि लो और मिडल इनकम देशों में भी काम के घंटों में भारी कमी दर्ज की गई.

लेकिन इस महामारी से सबसे बुरी तरह प्रभावित होने वाले में 1.6 अरब ऐसे कामगार हैं जो अनौपचारिक सेक्टर्स में काम कर रहे थे.

35 साल की लूसीमारा रोडरिग इन्हीं में से एक हैं. मूल रूप से ब्राज़ील की लूसीमारा सोलह साल पहले अमरीका आ गई थीं. वो अब बॉस्टन के घरों में सफाई का काम करती हैं.

लूसीमारा ने बीबीसी को बताया कि वो कुछ धनी परिवारों में काम करती थीं और महीने का 3500 से 4000 डॉलर कमा लेती थीं, लेकिन लॉकडाउन के कारण उनका काम बंद हो गया.

वो कहती हैं, "मेरे जैसे लोगों के लिए ये सरप्राइज़ की तरह था. इससे पहले मुझे कभी भी बिना काम के अपने घर में दो महीनों के लिए नहीं रहना पड़ा था."

लूसीमारा के पति निर्माण मज़दूर हैं औऱ लॉकडाउन की वजह से उनका काम भी बंद है. दोनों के दो बच्चे हैं.

वो कहती हैं कि उनके कुछ मालिकों ने अपनी अच्छाई का परिचय देते हुए उन्हें तनख्वाह देना जारी रखा है लेकिन इसके बावजूद उन्हें अब एक-एक पैसा बचाना पड़ रहा है.

'अपने रास्ते खुद तलाशने की कोशिश'

नेशनल डोमेस्टिक वर्कस अलायंस में बतौर सीनियर पॉलिसी डायरेक्टर काम कर रहे हाएयंग यून कहते हैं कि अमरीका में घरों में काम करने वाले अधिकतर लोग या तो लातिनी प्रवासी हैं या फिर काले लोग हैं. वो कहते हैं कि लॉकडाउन के कारण ये लोग "अब अपने भरोसे हैं."

इस संगठन ने लॉकडाउन से प्रभावित दस हज़ार परिवारों को चार सौ डॉलर की आर्थिक मदद दी है.

घरों में काम करने वालों के पास पेड लीव, सिक लीव या हेल्थ इंश्योरेन्स भी नहीं होता जिसका वो ज़रूरत पड़ने पर इस्तेमाल कर सकें.

हाल में एक सर्वे में ये बात सामने आई थी कि घरों में काम करने वाले करीब 70 फीसदी काले लोगों का कहना था कि लॉकडाउन के कारण या तो उनकी नौकरी चली गई है या फिर उनकी तनख्वाह कम कर दी गई है.

इसके बावजूद मार्च में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दो ट्रिलियन डॉलर के राहत पैकेज से इन्हें कोई लाभ नहीं मिला. इसका कारण ये कि इस पैकेज में प्रवासी मज़दूरों और अपंजीकृत कामगारों के लिए कोई सुविधा शामिल नहीं थी.

हाएयंग यून कहते हैं, "वायरस लोगों के भेदभाव नहीं करता लेकिन इस देश के नीति निर्माता ऐसा करते हैं"

महामारी ने बढ़ाई असमानता की खाई

विश्व बैंक के एक आंकलन के अनुसार कोरोना महामारी के कारण दुनिया भर के करीब 10 करोड़ लोगों के बेहद गरीब होने का ख़तरा बढ़ गया है.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपील की है कि महामारी से उबरने के लिए जो नीतियां बनाई जाएं उनमें असमानता ख़त्म करने की तरफ विशेष ध्यान दिया जाए.

दुनिया भर की सरकार अपनी-अपनी अर्थव्यवस्थआ को कोरोना महामारी से लगी चोट से उबारने करे लिए अब तक लाखों डॉलर खर्च कर चुकी हैं. हालांकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का कहना है कि गरीबों की सुरक्षा के लिए ख़ास कदम उठाए जाने की ज़रूरत है और सरकारों के खाद्य सुरक्षा के प्रावधान करने और लोगों के हाथों में पैसा देने जैसे काम करने की ज़रूरत है.

लूसीमारा का कहना है कि फिलहाल उनके लिए मुश्किलें इसलिए नहीं बढ़ीं क्योंकि उन्होंने अपनी मां के इलाज के लिए जो पैसे बचा कर रखे थे वो उनका इस्तेमाल महामारी के दौर में कर रही हैं.

हालांकि उनका कहना है कि ये सेविंग्स अब जल्दी खत्म होने वाली है और उन्हें नहीं पता कि आगे वो परिवार चलाने के लिए क्या करेंगी.

वो कहती हैं, "मेरे कई मित्र हैं जिनके पास भी कुछ सेविंग्स हैं लेकिन उनकी सेविंग्स भी अब ख़त्म हो रही है. आप मुझे केवल इतना बता दीजिए कि महामारी कब ख़त्म होगी. मुझे नहीं पता कि इसका अंत कब होगा."

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