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रघुवंश प्रसाद सिंह का राजद उपाध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा क्यों?
- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, पटना से बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार में विधानसभा चुनाव की तारीख़ें अभी तय नहीं है लेकिन यहां राजनीति अब करवटें लेने लगी हैं.
विधानसभा चुनाव का सेमीफ़ाइनल माने जा रहे विधान परिषद की नौ सीटों पर चुनाव से ठीक पहले विपक्षी पार्टी राजद में भूचाल आ गया है.
मंगलवार को बिहार विधान परिषद की तरफ़ से जारी एक अधिसूचना के मुताबिक़ राजद के आठ में दो तिहाई यानी पाँच विधान पार्षदों ने एक अलग समूह बनाकर पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया और सत्तारूढ़ दल जदयू में शामिल हो गए. कार्यकारी सभापति, विधान परिषद के आदेश से उनके विलय को स्वीकृति भी मिल चुकी है.
राजद छोड़कर जदयू में शामिल होने वाले पाँचों एमएलसी हैं, राधाचरण साह, रण विजय सिंह, दिलीप राय, कमरे आलम और संजय प्रसाद.
इसके अलावा राजद को एक झटका और लगा है. पार्टी के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने भी अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.
रघुवंश प्रसाद सिंह इस वक़्त कोरोना वायरस से संक्रमित हैं और पटना स्थित एम्स अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती हैं.
बीबीसी से रघुवंश प्रसाद के सहायक केदार यादव ने कहा, "रघुवंश बाबू इस समय कोरोना से लड़ रहे हैं, लेकिन साथ ही उनकी लड़ाई अपराध से भी है. उनकी आपत्ति के बावजूद भी रामा सिंह जैसे आपराधिक छवि वाले आदमी को पार्टी में शामिल कर लिया गया है. इसी का विरोध जताने के लिए रघुवंश बाबू ने अपने पद से इस्तीफ़ा दिया है लेकिन, उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी है."
चुनाव कैंपेन पर असर पड़ेगा
रघुवंश प्रसाद सिंह ने पिछले महीने 28 मई को एक ट्वीट भी किया था जिसमें उन्होंने लिखा था, "बिहार में सत्ता के संरक्षण में अपराध का खेल चल रहा है. राज्य में अपराधी बेख़ौफ़ हो चुके हैं. गोपालगंज में जेडीयू के नेता पुलिस प्रसाशन को खुली चुनौती दे रहे हैं. बिहार में बढ़ते अपराध के ख़िलाफ़ बड़ा आंदोलन शुरू होगा और यह आंदोलन सरकार को हटाने तक चलेगा."
रघुवंश प्रसाद के साथी रहे राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने इस मसले पर बीबीसी से कहा, "ज़ाहिर है, अपराध के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ने वाले रघुवंश बाबू को अपनी ही पार्टी में रामा सिंह के शामिल हो जाने से दुःख पहुंचा है. लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि पार्टी ने ऐसा किया ही क्यों. चार दिन पहले हमारी बात रघुवंश बाबू से हुई थी. वे इसका ज़िक्र भी कर रहे थे. लेकिन, लालू जी से बातचीत में सब क्लियर हो गया था. फ़िर भी ऐसा होना समझ के बाहर है."
पाँच विधान पार्षदों के पार्टी छोड़कर जाने की बात पर शिवानंद तिवारी कहते हैं, "यह आश्चर्यजनक है. कहीं भी और कभी भी ऐसी चर्चा नहीं थी. लेकिन चूंकि अब चुनाव है, इसलिए स्पष्ट है कि यह सरकार के लोगों की साज़िश है और हमारे एमएलसी लोभ में गए हैं. आने वाले चुनाव में इसका पार्टी के कैंपेन के उपर प्रभाव पड़ेगा."
टूट का कारण क्या?
राजद में आए इस भूचाल पर स्थानीय मीडिया ये अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि विधानसभा चुनाव से पहले रघुवंश प्रसाद सिंह भी पार्टी छोड़कर जदयू में शामिल होने जा रहे हैं.
विधानसभा चुनाव को छोड़ भी दें तो रघुवंश प्रसाद के पद छोड़ने का कारण स्पष्ट है. मगर क्या कारण है कि पाँच विधान पार्षदों ने अचानक से पार्टी छोड़ दी.
राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता नवल किशोर यादव कहते हैं, "इसका कारण नीतीश कुमार ही बेहतर बता सकते हैं क्योंकि पाँचों उनकी पार्टी में ही शामिल हुए हैं. जहां तक बात रघुवंश बाबू के आपत्ति की है तो वे पार्टी में वरिष्ठ हैं और उनकी आपत्ति पर विचार किया जाना स्वाभाविक है. पार्टी ज़रूर विचार करेगी."
पांचों एमएलसी जिस वक़्त अपना इस्तीफ़ा सौंप कर और जदयू में शामिल होने का प्रस्ताव देकर विधान परिषद से बाहर आ रहे थे तब स्थानीय मीडिया को उन्होंने इसका कारण कुछ इस तरह बताया, "नीतीश कुमार जी के 15 साल में किए गए विकास के कामों को देखते हुए हम उनके साथ हुए हैं."
राजद प्रवक्ता नवल किशोर यादव ने इसपर सवाल उठाते हुए कहा, "क्या नीतीश कुमार के विकास के काम उन्हें 15 सालों से नहीं दिख रहे थे? पहले ही क्यों नहीं ऐसा कर लिया?"
स्वाभाविक है कि राजद के पाँच विधान पार्षदों के जदयू में जाने से सत्ताधारी पार्टी को मज़बूती मिलेगी. मगर विपक्ष के लालच देने और साज़िश कर उनकी पार्टी को तोड़ने के आरोप पर जदयू क्या जवाब देगी?
जदयू प्रवक्ता ने क्या कहा?
सरकार के सूचना और जनसंपर्क मंत्री और जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार कहते हैं, "जो नेता हमारे साथ आए हैं वे राजद की नीतियों से असंतोष के कारण आए हैं. अब तो स्पष्ट हो गया है कि राजद के नेताओं को भी तेजस्वी यादव में कोई लीडर नहीं दिखता. और राजद आख़िर किस मुंह से हमपर आरोप लगा रहा है, जब उसने अपने वरिष्ठतम नेता रघुवंश बाबू की भी नहीं सुनी जो कि अभी ख़ुद कोविड-19 से लड़ रहे हैं."
बीबीसी ने रामा सिंह से भी संपर्क करने की कोशिश की मगर उनसे बात नहीं हो सकी.
हालांकि, बिहार के विधानसभा चुनाव की तारीख़ों का एलान अब तक नहीं हुआ है और न ही चुनाव आयोग की तरफ़ से इसे लेकर कोई घोषणा की गई है, लेकिन जैसे-जैसे इस सरकार के कार्यकाल का वक़्त क़रीब आ रहा है, सूबे के सियासी गलियारे में हलचलें बढ़ गई हैं.
इस वक़्त सबका फ़ोकस बिहार विधान परिषद के चुनाव पर शिफ़्ट हो गया है. नौ सीटों के लिए उम्मीदवारों का चयन अंतिम चरण में है. नौ में से तीन सीटें जदयू के खाते में, तीन आरजेडी के खाते में, दो सीट बीजेपी और एक सीट कांग्रेस के खाते में है.
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