बिहारः राजद के मौन पर महागठबंधन में तकरार ही तकरार

    • Author, नीरज सहाय
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने सात जून को गृह मंत्री अमित शाह की वर्चुअल रैली और जनता दल यूनाइटेड ने राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार की पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर चुनावी तैयारी शुरू कर दी है.

इसके साथ ही प्रदेश में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को एनडीए का चेहरा भी घोषित कर दिया है.

उधर, महागठबंधन में चुनाव को लेकर कोई औपचारिक शुरुआत या घोषणा अब तक होती नहीं दिख पा रही है.

महागठबंधन से जिन पार्टियों का नाम जोड़ा जाता है उन्होंने एनडीए के कार्यक्रम के विरोध तक ही खुद को सीमित कर रखा है.

भाजपा की वर्चुअल रैली के विरोध में राष्ट्रीय जनता दल ने थाली पीटने का कार्यक्रम रखा तो यूथ कांग्रेस ने कोरोना संकट के दौरान भाजपा की वर्चुअल रैली को नकारते हुए काला गुब्बारा उड़ाया था.

जाहिर है कि एनडीए ने मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर बिहार में चुनावी बिगुल फूंक दिया है तो महागठबंधन के घटक दलों के बीच अब तक इस दिशा में बात बढ़ती हुई नहीं दिख रही है.

अब तक न तो कोऑर्डिनेशन कमिटी बन पाई है और न ही सीएम के चेहरे पर कोई आम सहमती बनती दिख रही है.

महागठबंधन की स्थिति

हालांकि, राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह इससे सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि महागठबंधन का स्वरूप अपने समय पर तय हो जाएगा. पार्टी का कार्यक्रम अलग होता है चुनाव एक साथ लड़ा जाता है. साथ ही वे सवाल भी करते हैं कि एनडीए का प्रारूप कैसा होगा, ये स्पष्ट है क्या?

वे एनडीए की एकजुटता पर सवाल पूछते हैं कि चिराग पासवान क्या बोल रहे हैं. आप लोगों को एनडीए का मुद्दा छोटा लगता है और यही बात जब हम पर लागू हो तो वह बड़ी हो जाती है. यह बात मेरी समझ से परे है.

राजद से एक्शन में कोई आगे नहीं है. हमारे नेता तेजस्वी प्रसाद यादव क्षेत्र में निकल चुके हैं. वे लोग तो सिर्फ टीवी पर ही बोल रहे हैं.

महागठबंधन के नेतृत्व पर उनका कहना है कि कांग्रेस ने उन्हें (तेजस्वी) कभी नकारा नहीं है. पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी कह चुके हैं कि वही इसके लायक हैं. लोकसभा चुनाव के मंच पर भावी मुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव होंगे, ये महागठबंधन पहले ही कह चुका है.

"उनके सीएम उम्मीदवार नीतीश कुमार हैं तो हमारे तेजस्वी हैं. आप विधानसभा की बनावट को देखिए. इस बात का अर्थ स्पष्ट हो जाएगा. वो सदन में तीन हैं और हम दो. बाकी को जोड़ना है. यहाँ कोई विवाद नहीं है. सदन में नेतृत्व के हिसाब से सब कुछ तय किया जाएगा. हम सब चुनाव एक साथ लड़ेंगे."

मौजूदा विधानसभा का गणित

243 सीटों वाली बिहार विधानसभा के लिए साल 2015 में हुए चुनावों में महागठबंधन की ओर से राजद और जदयू ने 101-101 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. शेष 41 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस को मौका दिया गया था. उस चुनाव में राजद ने 81, जदयू ने 71 और कांग्रेस ने 40 सीटें जीती थीं.

उधर, एनडीए को कुल सीटों में से महज 58 पर ही संतोष करना पड़ा था. लालू प्रसाद की रणनीति और नीतीश कुमार के चेहरे के आगे मोदी लहर बिहार में थम गई थी.

भाजपा ने 157 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, लेकिन उसे सफलता महज 53 सीटों पर ही मिल पाई. लोक जनशक्ति पार्टी 42 और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने 23 सीटों पर अपने-अपने प्रत्याशी दिए, लेकिन दोनों दलों को दो-दो सीट पर ही जीत मिली. वहीं, हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के कुल 21 प्रत्याशियों में से सिर्फ जीतन राम मांझी ही अपनी सीट बचा पाए थे.

महागठबंधन की शानदार जीत का सफ़र दो साल तक भी नहीं चल पाया. साल 2017 में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तत्कालीन महागठबंधन सरकार से अपनी दूरी बना ली और एनडीए के साथ आ गए. सत्ता से रातों-रात विपक्ष में आया राजद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर जनादेश का अपमान करने का आरोप बार-बार लगाता रहा है.

लोकसभा चुनाव में मोदी लहर

पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी 'हम' अब राजद के साथ आ गई है.

पिछले साल लोकसभा चुनाव में एनडीए को शानदार सफलता मिली. कुल 40 संसदीय क्षेत्रों में से 39 पर भाजपा-जदयू-लोजपा को सफलता मिली थी.

जबकि, महागठबंधन को सिर्फ़ एक सीट से ही संतोष करना पड़ा.

महागठबंधन की ओर से राजद ने 20, कांग्रेस ने नौ, रालोसपा ने पांच, 'हम' और 'वीआईपी' ने तीन-तीन और सीपीआई-माले ने एक संसदीय सीट पर अपनी ताक़त आजमाई थी.

लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद राजद नागरिकता कानून और एनआरसी के विरोध से फिर मुखर हुआ और अपने नेता तेजस्वी प्रसाद यादव को रीलॉन्च करने में जुट गया.

नागरिकता कानून पर विरोध प्रदर्शन को लेकर पिछले साल 18 दिसंबर को महागठबंधन के नेताओं ने साझा प्रेस वार्ता की, लेकिन इसमें महागठबंधन के सबसे बड़े घटक राष्ट्रीय जनता दल का कोई नेता उपस्थित नहीं था.

राजद की चुप्पी

महागठबंधन में मची तनातनी के बावजूद रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा कहते हैं कि हमलोगों का एक ही मकसद है, एनडीए और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बिहार को मुक्त कराना. इन लोगों ने 15 साल में बिहार को बर्बाद कर दिया है. गरीब, मजदूर और अकलियत समाज त्रस्त है. हम सब महागठबंधन के अंग हैं. किसी कार्यक्रम में किसी के नहीं पहुंचने भर से हमारी सोच में थोड़े बदलाव हो सकता है.

हालांकि, महागठबंधन के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव होंगे इस सवाल पर पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री कुशवाहा का कहना है कि ये अभी तय नहीं हुआ है. इसका फैसला महागठबंधन के नेता सामूहिक रूप से करेंगे.

उधर, पिछले महीने राजद के अलावा महागठबंधन के तीन बड़े नेता उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी लगातार पटना से दिल्ली तक आपस में मिल रहे हैं. ये लगातार कोऑर्डिनेशन कमिटी बनाने की मांग कर रहे हैं. कांग्रेस भी इनका समर्थन कर रही है, लेकिन राजद इसपर मौन है.

हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी इस संबंध में कहते हैं कि महागठबंधन को किसी प्रकार की हानि न हो इसलिए मैं, उपेंद्र कुशवाहा और मुकेश सहनी लगातार संपर्क में हैं. हम पिछले साल दिसंबर माह से ही कोऑर्डिनेशन कमिटी गठित किए जाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन महागठबंधन का सबसे बड़ा दल राजद इस पर मौन साधे हुए है. कोई बैठक भी नहीं बुलाई जा रही है. एक तरफा संवाद हो रहा है.

"जो भी निर्णय हो वह महागठबंधन का सामूहिक निर्णय हो. एक पार्टी- एक आदमी का कोई निर्णय भला कैसे स्वीकार्य हो सकता है. इस माह के 20 तारीख के बाद सभी नेताओं के साथ बात होगी. मैंने 25 जून अंतिम तारीख तय किया है और फिर उसके बाद हम कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होंगे."

कांग्रेस का रुख

उधर, मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से इस बात की भी चर्चा है कि बिहार कांग्रेस के कुछ वरीय नेताओं ने सोनिया गाँधी को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करने की मांग की है.

हालांकि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा इन बातों से इत्तेफाक नहीं रखते.

उनके अनुसार, "महागठबंधन को अंतिम रूप देने के लिए 20 जून के बाद बैठेंगे और फिर इस पर बात होगी. तेजस्वी को बतौर नेता कबूल करने के सवाल पर वो कहते हैं कि ये निर्णय पार्टी आलाकमान तय करेगा. तेजस्वी प्रसाद यादव अपने दल के नेता तो हो ही गए हैं. जब महागठबंधन के सारे नेता एक साथ बैठेंगे और राजद की ओर से कोई इस प्रकार का प्रस्ताव आता है तो उससे हम आलाकमान को अवगत कराएंगे. अंतिम निर्णय वहीं से होगा. हालाँकि अभी उसका समय ही नहीं आया है. अभी तो यह बात प्राथमिक स्तर पर भी नहीं है. हमारी तैयारी सभी 243 सीटों के लिए है. ऐसा सारी पार्टियां कर रही हैं. जब सीटों का बंटवारा होगा तब हम एक-दूसरे की मदद करेंगे."

जाहिर है कि महागठबंधन के घटक दलों के सब कुछ सामान्य नहीं है. कोऑर्डिनेशन कमिटी गठन पर मौन साधकर राजद खुद को बड़े भाई की भूमिका में रखना चाह रहा है तो छोटे दल महागठबंधन में अपनी सम्मानजनक उपस्थिति बनाए रखने के लिए लगातार एक दूसरे के संपर्क में हैं और उसपर मीडिया के माध्यम से दबाव डाल रहे हैं.

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