कोरोना की वजह से प्रोफ़ेशनल कोर्स के छात्र क्यों हैं परेशान?

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- Author, शुभम किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली की रहने वाली नेहा ग्रेजुएशन के बाद एडवर्टाइज़िंग और डिजिटल मार्केटिंग का कोर्स करना चाहती थीं. एक अच्छे प्राइवेट कॉलेज में उनका नाम शॉर्टलिस्ट भी हो गया लेकिन फिर उन्होंने दाख़िला नहीं लेने का फ़ैसला किया.
कोरोना के कारण कॉलेज ने ऑनलाइन सेशन शुरू करने का फ़ैसला किया और नेहा को लगा कि इस कोर्स को ऑनलाइन पढ़ना मुश्किल है.
बीबीसी से बातचीत नेहा ने कहा, "मुझे कॉलेज पसंद है. कोर्स मेरे मन मुताबिक़ है, लेकिन मैं एक प्रोफ़ेशनल कोर्स में इसलिए एडमिशन लेना चाहती हूँ ताकि मैं अपने स्किल्स पर काम कर सकूँ, ख़ुद को इंडस्ट्री के लिए तैयार कर सकूँ. मुझे नहीं लगता कि ऑनलाइन कोर्स से मुझे कोई मदद मिलेगी. ऑनलाइन क्लास में सिर्फ़ थ्योरी पढ़ाई जा सकती है."
ये समस्या सिर्फ़ नेहा की नहीं है. हर साल देश में हज़ारों लोग ऐसे कोर्स में दाख़िला लेते हैं जो किसी ख़ास स्किल पर आधारित होते हैं और इनकी अवधि छह महीने से लेकर एक साल तक की होती हैं.
कई लोग जिन्होंने पिछले साल दाख़िला लिया था, उनका कोर्स लॉकडाउन के कारण अधूरा रह गया, प्रैक्टिकल पर आधारित इन कोर्स को थ्योरी पढ़ाकर, असाइंमेंट देकर तो कहीं ओपन बुक परीक्षा करवा कर ख़त्म करना पड़ा.
भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) में विज्ञापन और जनसंपर्क की पढ़ाई कर रहीं सृष्टि सिंह बताती हैं, "जब लॉकडाउन का ऐलान किया गया तो हमारे कोर्स को ख़त्म होने में एक महीना रह गया था. पूरे साल हमने प्रैक्टिकल किए, नई चीज़ें सीखीं. कोर्स के अंत में हमें एक कैंपेन बनाना होता है जिसे इंडस्ट्री के लोग देखते हैं. हमारे लिए यही मौक़ा होता है ख़ुद को उनके सामने साबित करने का. इस बार हमने ज़ूम कॉल पर प्रज़ेंटेशन दिया, ऑनलाइन प्रेजेंटेशन का असर तो कम होता ही है. हमलोग इससे निराश हैं लेकिन इस हालात में कोई और विकल्प भी नहीं था."

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प्लेसमेंट पर भी असर
कई कॉलेज के छात्रों का कहना है कि कोरोना के कारण प्लेसमेंट पर भी काफ़ी असर पड़ा है. आर्थिक समस्याओं के कारण कंपनियाँ पहले की तरह नौकरियाँ नहीं दे रही हैं.
कुछ ऐसे लंबी अवधि के कोर्स भी हैं, जिनमें प्रैक्टिकल बहुत ज़रूरी होता है. प्रैक्टिकल नहीं होने से छात्रों को लग रहा है कि वो बहुत कुछ नहीं सीख पाएँगे.
दिल्ली के एक सरकारी कॉलेज से फ़िज़ियोथैरेपी की पढ़ाई कर रहीं आकृति कुमारी ने बीबीसी को बताया, "हमारे विषय में हर दिन प्रैक्टिकल क्लास की ज़रूरत होती है. पिछले कुछ महीनों से सिर्फ़ ऑनलाइन क्लास हो रहे हैं. जो टॉपिक छूट गए, वो शायद हम दोबारा नहीं पढ़ पाएँ, कॉलेज के बाद इंटर्नशिप और फ़िर नौकरी में हमें इसका काफ़ी नुक़सान होगा."
विदेश जाने वाले छात्र भी अधर में लटके
गुड़गाँव में रहने वाले अभिनव आनंद ने इस साल कनाडा के एक कॉलेज में एक साल के कोर्स में दाख़िला लिया था. उन्हें अप्रैल में कनाडा जाना था लेकिन अब वो गुड़गाँव के अपने घर से ही ऑनलाइन क्लास कर रहे हैं.
वो बताते हैं, "अगर आप सिर्फ़ पाठ्यक्रम की बात करें तो मुझे नहीं लगता कि कोई नुक़सान हुआ है. लेकिन ये एक साल नेटवर्किंग के लिए ज़रूरी होता है, वहाँ की लाइब्रेरी से फ़ायदा होता. अलग-अलग लोगों से बहुत कुछ सीखने को मिलता, ये सब ऑनलाइन क्लास में नहीं हो पाता."
प्रैक्टिकल नहीं फिर भी पूरी फ़ीस क्यों?
कई छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि किसी भी कॉलेज की फ़ीस उसके इंफ़्रास्ट्रक्चर और वहाँ मिलने वाली सुविधाओं के नाम पर ली जाती हैं. प्राइवेट कॉलेज इस नाम पर मोटी रक़म वसूलते हैं. ऐसे समय में जब इन सुविधाओं का इस्तेमाल नहीं हो रहा तो क्या पूरी फ़ीस लेना जायज़ है?
बीबीसी ने ये समझने के लिए एमिटी विश्वविद्यालय के चांसलर अतुल चौहान से बात की.
अतुल चौहान कहते हैं, "किसी विश्वविद्यालय का इंफ़्रास्ट्रक्चर में निवेश लंबे समय के लिए होता है. ये भी समझना होगा कि हम उनका इस्तेमाल करें या न करें कई तरह के ख़र्चे तय होते हैं. जैसे कि इतने बड़े कैंपस का बिजली बिल फ़िक्स होता है. हम इस्तेमाल करें या नहीं, उतना पैसा हमें देना पड़ेगा."
चौहान के मुताबिक़, "ये भी समझना ग़लत है कि ऑनलाइन कोर्स सस्ता है. हमें शिक्षकों के लिए लैपटॉप, ब्रॉडबैंड और नए सॉफ़्टवेयर इंतज़ाम करने पड़े, इन सबमें भी बहुत पैसे लगते हैं. हम ये भी कोशिश कर रहे हैं कि जो प्रैक्टिकल छूट गए हैं, उनसे जुड़ी ट्रेनिंग इंडस्ट्री के साथ पार्टनरशिप कर जॉब के दौरान दी जाए."
प्रोफ़ेशनल कोर्स के लिए ऑनलाइन माध्यम का भविष्य
अतुल चौहान के मुताबिक़, "हर कोर्स की अलग ज़रूरत होती है. जिनमें प्रैक्टिकल की ज़रूरत नहीं है, उनके लिए बहुत दिक़्क़्तें नहीं है. लेकिन जिनमें प्रैक्टिकल की ज़रूरत है, उनके लिए शायद ये उतने अच्छे साबित नहीं होंगे. हालाँकि मौजूदा हालात में यही सबसे अच्छा विकल्प है."
हमने दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया के जन संचार शोध केंद्र की डायरेक्टर प्रो. सोहिनी घोष से कोरोना महामारी का प्रोफ़ेशनल कोर्स पर पड़ने वाले असर पर विस्तार से बात करने के लिए संपर्क किया. लेकिन उन्होंने यह कहा कि इस मुद्दे पर अभी जवाब देना मुश्किल है.
उन्होंने बीबीसी को भेजे अपने मेसेज में लिखा, "हो सकता है आज से छह महीने बाद इसे लेकर मेरे पास बेहतर समझ हो"
छात्रों को क्या करना चाहिए?
करियर काउंसलर परवीन मल्होत्रा का मानना है कि इस समय छात्रों को कोर्स चुनते समय बहुत ध्यान देना होगा.
उन्होंने कहा, ''उन्हें ये समझना होगा कि जिस कोर्स के लिए वो अप्लाई करना चाहते हैं, कोविड-19 के बाद उसका क्या स्कोप है. अगर किसी फ़ील्ड में इस दौरान बहुत नौकरियाँ गई हैं, तो जब वेकेंसी आएगी तो कंपनियाँ पहले अनुभवी लोगों को लेंगी. ऐसे किसी कोर्स से बचना होगा जहाँ नौकरी का स्कोप इस महामारी के बाद कम है. लेकिन कई क्षेत्र हैं, जहाँ स्कोप काफ़ी बढ़ रहे हैं, उन कोर्स में दाख़िला लेने में कोई दिक़्क़त नहीं है."
परवीन ये भी कहती हैं कि किसी छात्र को ये नहीं समझना चाहिए कि वो इस दौरान पीछे छूट जाएगा.
वो कहती हैं, "ये समस्या सभी के लिए, ऐसा नहीं है कि इस दौरान कोई आपको पछाड़ कर बहुत आगे बढ़ जाएगा. इस दौरान आपको अपने स्किल्स पर काम करना चाहिए, कुछ छोटे ऑनलाइन कोर्स भी हैं जो आपके स्किल्स को बेहतर करने में मदद करते हैं. ऐसे कोर्स बहुत महंगे भी नहीं होते, ऐसे कोर्स भी बहुत उपयोगी साबित होंगे."
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