कोरोना वायरस: गुजरात में ज़्यादा लोग क्यों मर रहे हैं?

    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बीती 20 मई को परवीन बानो को सांस लेने में दिक्कत होना शुरू हुई.

जब ये बात उन्होंने अपने बेटे अमीर पठान को बताई तो वह अपनी माँ को लेकर अस्पताल भागे.

अमीर काफ़ी चिंतित थे क्योंकि उनकी 54 वर्षीय माँ डायबिटीज़ और दिल से जुड़ीं बीमारियां की भी शिकार थीं.

यही नहीं, अहमदाबाद के गोमतीपुर इलाके में कोविड 19 से जुड़े कई मामले सामने आए हैं. इसके बाद अगले 30 घंटे पूरे परिवार के लिए काफ़ी डराने वाले थे.

पठान कहते हैं कि वह तीन अस्पतालों में गए. दो सरकारी और एक निजी अस्पताल. लेकिन उन्हें कहीं भी एक बेड नहीं मिला. ऐसे में पठान अपनी माँ को घर लेकर आए गए.

पठान बताते हैं कि उस दिन और रात उनकी माँ को दिक्कत बढ़ गई. इस वजह से उनका परिवार अगले दिन उन्हें लेकर अहमदाबाद के सिविल अस्पताल लेकर गया.

जब माँ ने ली आख़िरी साँस

अस्पताल में कोविड 19 के टेस्ट के लिए उनके सैंपल लिए गए और ऑक्सीजन सपोर्ट दिया गया.

लेकिन डॉक्टरों को पता चला कि उनका ब्लड ऑक्सीजन लेवल काफ़ी कम है. पठान बताते हैं ब्लड ऑक्सीजन लेवल दिन भर काफ़ी अजीब रहा.

इस वजह से डॉक्टरों ने उन्हें एक वैंटीलेटर से जोड़ दिया. इसके कुछ घंटों बाद 22 मई को एक बजकर उन्तीस मिनट को परवीन बानो ने आख़िरी साँस ली.

इसके अगली सुबह उनके टेस्ट की रिपोर्ट आई जिसमें पता चला कि वह कोरोना वायरस से संक्रमित थीं.

अस्पताल ने बीबीसी के सवालों के जवाब नहीं दिए.

लेकिन पठान कहते हैं कि अगर उनकी माँ को एक दिन पहले अस्पताल में बेड मिल जाता तो शायद उनकी माँ की जान बच सकती थी.

कोविड 19 को ठीक से संभाल नहीं पाने की वजह से अहमदाबाद का ये अस्पताल लगातार चर्चा में बना हुआ है.

हाई कोर्ट ने इस अस्पताल में अब तक मर चुके 490 लोगों की संख्या का ज़िक्र करते अस्पताल को एक 'डंजन' यानी काली कोठरी की संज्ञा दी है.

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को भी इस महामारी को ठीक से नहीं संभाल पाने के लिए खरीखोटी सुनाई है.

लेकिन सरकार ने अपनी ओर से किसी भी तरह की ढील देने से इनकार किया है.

ऐसे में सवाल उठता है कि गुजरात में कोरोना वायरस से इतने ज़्यादा लोग क्यों मर रहे हैं.

अहमदाबाद में इतने लोग क्यों मर रहे हैं?

अहमदाबाद गुजरात का सबसे बड़ा शहर है जिसमें सत्तर लाख लोग रहते हैं.

ये शहर कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित है क्योंकि गुजरात के कुल मामलों में से 75 फीसदी मामले अहमदाबाद में हैं. और लगभग सारी मौतें अहमदाबाद में ही हुई हैं.

कोरोना वायरस संक्रमित लोगों की संख्या के आधार पर गुजरात 22527 मामलों के साथ चौथा राज्य है जहां पर ये महामारी अपना कहर ढा रही है.

लेकिन इस राज्य की फेटलिटी रेट 6.2 है जो कि भारत में सबसे ज़्यादा है. इसका मतलब ये है कि संक्रमित होने वाले कुल लोगों में से 6.2 फीसदी लोगों की मौत हो रही है.

ये नेशनल फेटलिटी रेट 2.8 फीसदी से भी दुगना है.

जब गुजरात हाई कोर्ट ने अहमदाबाद में होने वाली इतनी ज़्यादा मौतों को लेकर चिंता जताई तो राज्य सरकार ने कहा कि इनमें से 80 फीसदी मौतें को-मॉर्बिडिटी वाले मरीज़ों की हुई है.

इसका मतलब ये मरीज़ पहले से बीमार थे और इसी वजह से वे कोविड19 इनके लिए ख़तरनाक साबित हुआ.

लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य पर शोध करने वाले कहते हैं कि मृत्यु दर की कोई एक वजह बताना मुश्किल है.

कुछ विशेषज्ञ इसके लिए गुजरात में बीमार लोगों की अधिकता को ज़िम्मेदार बताते हैं.

लेकिन कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि बीमारियों का भार कोई एक कारण नहीं हो सकता है. क्योंकि तमिलनाडु में किसी भी राज्य की अपेक्षा ज़्यादा डायबिटीज़ रोगी रहते हैं. लेकिन मृत्यु दर काफ़ी कम है.

क्या ज़िम्मेदार है?

इस पहलू पर सवाल उठाए गए हैं कि क्या भारत कोविड 19 की मौतों की संख्या कम करके बता रहा है.

क्योंकि अगर ऐसा होता तो ऐसे कोई सबूत नहीं हैं जो कि ये बता सकें की गुजरात इस मामले में एक अपवाद है.

गुजरात के उप मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने बार बार इंटरनेशनल ट्रेवल और दिल्ली के धार्मिक आयोजन में शामिल होने वालों को ज़िम्मेदार ठहराते रहे हैं. दिल्ली का धार्मिक आयोजन भारत में कोरोना वायरस का अब तक का सबसे बड़ा क्लस्टर है.

लेकिन ये भी ऐसे कारक नहीं हैं जिनका असर सिर्फ गुजरात पर पड़ा हो.

केरल में भी गुजरात से ज़्यादा लोग विदेश से वापस आए. वहीं, तमिलनाडु ने कोरोना वायरस संक्रमित लोगों की कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग में ये पाया गया है कि बहुत सारे संक्रमित लोग किसी न किसी तरह दिल्ली के धार्मिक आयोजन में शामिल होने वाले लोगों से मिले थे.

ऐसे में ये सभी कारक संक्रमितों की संख्या में वृद्धि के लिए ज़िम्मेदार ठहराए जा सकते हैं.

लेकिन ये मरने वालों की इतनी बड़ी संख्या की वजह नहीं बताते हैं.

कम टेस्टिंग, अविश्वास, और शर्म

अहमदाबाद हॉस्पिटल एंड नर्सिंग होम एसोशिएसन के अध्यक्ष भारत गढ़वी कहते हैं, "इसकी एक वजह ये हो सकती है कि लोग अस्पताल तक काफ़ी देर से पहुंच रहे हैं."

डॉक्टर कहते हैं कि निजी अस्पताल मरीज़ों को लेने से मना कर रहे हैं या ऐसा करने में असमर्थ हैं, इस वजह से लोग सरकारी अस्पताल में इलाज़ कराने से बच रहे हैं.

इसकी वजह सरकारी अस्पतालों की बुरी हालत और लोगों का अविश्वास भी है.

डॉक्टर कहते हैं कि इसकी वजह शर्म भी हो सकती है.

भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक अस्पताल एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने मई में अहमदाबाद सिविल अस्पताल के डॉक्टरों से मुलाकात के बाद इसी ओर संकेत दिया था.

उन्होंने कहा था, "एक बहुत बड़ा मसला जिस पर बात हुई वो कोविड 19 के मरीज़ों के साथ जुड़ा शर्म का अहसास थी. लोग अभी भी टेस्टिंग के लिए अस्पताल आने में डर रहे हैं."

मई में अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में वृद्धि देखी गई. ये संभवतः इसलिए हुआ क्योंकि स्क्रीनिंग और टेस्टिंग बढ़ गई जिसकी वजह से डॉक्टर और अधिकारी वायरस को तेजी से फैलाने वालो संभावित तत्वों (जैसे सब्जी और फल वाले) की पहचान करने में सफल हो सके.

लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि अहमदाबाद में टेस्टिंग अभी भी काफ़ी कम है.

ख़ासकर अहमदाबाद का वो पुराना हिस्सा जिसके सामने दीवार खड़ी कर दी गई है.

अर्थशास्त्र के प्रोफेसर कार्तिकेय भट कहते हैं, "सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए ध्यान नहीं लगाया. ख़ासकर कंटेनमेंट ज़ोन में."

वह कहते हैं कि अहमदाबाद के पुराने शहर में 10-11 कंटेनमेंट ज़ोन हैं. और इन सभी जगहों पर घनी आबादी है.

वह कहते हैं कि इन इलाकों को शहर से काट दिया गया था. लेकिन अधिकारियों ने इन इलाकों में वायरस के प्रसार की रोकथाम के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए."

समाजशास्त्री गौरांग जानी कहते हैं, "इन जगहों पर शारीरिक या सामाजिक दूरी के नियमों का पालन करना मुश्किल है क्योंकि ये वो इलाके हैं जहां लोग घर के कपड़े और बर्तन भी घर से बाहर धोते हैं."

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन की एक रिपोर्ट कहती है, "विशेषज्ञ मानते हैं कि इन इलाकों में वायरस बेहद तेजी से फैला और जानकारी के अभाव एवं शर्म की वजह से लोगों ने अस्पताल जाना उचित नहीं समझा."

एक बड़ा शहर

लेकिन इस वायरस से संक्रमित होकर बचने वाले भी कहते हैं कि शहर के अस्पताल इस संकट को संभालने के लिए तैयार नहीं हैं.

दस दिनों तक कोविड 19 वार्ड में इलाज़ कराकर ठीक होने वालीं 67 वर्षीय लक्ष्मी परमार कहती हैं, "मुझे कई घंटों बाद बेड मिला था.

वे कहती हैं, "शुरुआत में किसी तरह का नाश्ता नहीं था. मुझे एक स्थानीय राजनेता से इसकी शिकायत करनी पड़ी. वहां पर चालीस से पचास मरीज़ों पर दो बाथरूम थे."

विशेषज्ञ कहते हैं कि इस महामारी ने गुजरात के ख़राब स्वास्थ्य तंत्र को उजागर कर दिया है.

प्रोफेसर भट कहते हैं, "ये सब नहीं होता तो कोई भी ये जानने में रुचि नहीं लेता कि गुजरात के अस्पताल किस हालत में हैं. अब डॉक्टरों की कमी और पैरामेडिक्स की संख्या में कमी सबके सामने आ गई है. हम ये देख रहे हैं कि लॉकडाउन के दौर में भी जल्दबाजी में लोगों को नौकरी पर रखा जा रहा है."

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट के एक हालिया अध्ययन में सामने आया है कि गुजरात में प्रति एक हज़ार लोगों के लिए 0.3 बेड हैं जो कि राष्ट्रीय औसत 0.5 से भी कम है. यानी गुजरात में प्रति दस हज़ार लोगों पर सिर्फ तीन बेड उपलब्ध हैं.

कोरोना वायरस के मामले बढ़ने की वजह से बेड, पीपीई किट और क्वारंटीन केंद्रों की कमी हो गई है.

बीते कुछ हफ़्तों में गुजरात ने कुल संक्रमित लोगों की संख्या तमिलनाडु से भी ज़्यादा हो गई है. लेकिन हालात अभी भी काफ़ी ख़राब हैं क्योंकि मृत्यु दर काफ़ी ज़्यादा है.

गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री नितिनभाई पटेल कहते हैं, "मैं इससे असहमत हूँ कि हम अपने कर्तव्यों का निर्वाहन करने में सफल नहीं रहे हैं. हमारे पास इस समय 23000 बिस्तर उपलब्ध हैं. हमारे स्वास्थ्य कर्मी लगातार काम कर रहे हैं. हम उन्हें बेहतरीन मेडिकल उपकरण दे रहे हैं ताकि वे स्थिति को संभाल सकें. और स्थिति अब धीरे धीरे नियंत्रण में आ रही है."

लेकिन गुजरात सरकार की आलोचना की वजह ये भी है कि गुजरात में पहला मामला लॉकडाउन लगने से कुछ दिन पहले 19 मार्च को सामने आया था. और वह इसे समय रहते रोकने में नाकामयाब रही.

गड़वी कहते हैं, "सरकारी नीतियां थोड़ी बेहतर हो सकती थीं. टेस्टिंग और क्वारंटीन केंद्र दिखने में मजबूत थे. लेकिन समय के साथ कमजोर होते चले गए, जैसे जैसे प्रशासन थकता नज़र आने लगा."

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