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कोरोना वायरस की महामारी के कारण भविष्य में कितना बदल जाएगा धर्म
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में जब कोरोना वायरस पहुंचा तो एक ओर मंदिर और मस्जिदें बंद कर गईं. वहीं, दूसरी ओर रामायण सबसे ज़्यादा देखा जाने वाला टेलीविज़न शो बन गया.
ऐसे में क्या लोग अपने भगवान से निराश थे या फिर इस दौरान उनकी आस्था में इज़ाफा हुआ?
रामायण धारावाहिक में सीता का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री दीपिका चिकालिया टोपीवाला मानती हैं कि कोरोना वायरस के बाद की दुनिया ज़्यादा आध्यात्मिक हो जाएगी.
वह मानती हैं कि इस महामारी का असर ये होगा कि भारतीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा 'प्रकृति और आध्यात्मिकता' की ओर जाएगा.
वह कहती हैं, "मुझे लगता है कि आपको पार्क में ध्यान लगाते हुए लोगों की संख्या बढ़ी हुई मिलेगी."
कोरोना वायरस
अजमेर में 13वीं शताब्दी के पूज्यनीय सूफी संत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह का ध्यान रखे वाले सैयद गौहर इस वायरस को अल्लाह का प्रकोप बताते हैं.
गौहर के समुदाय में कई लोग और धार्मिक नेता ये मानते हैं कि फरिश्ते कोरोना वायरस को मस्जिदों में घुसने से रोक देंगे.
अन्य लोगों ने गौमूत्र से कोरोना वायरस ठीक करने की बात कही है.
ऐसा लगता है कि कोरोना वायरस को दूर रखने के लिए धार्मिक प्रतीकों और प्रक्रियाओं को आधिकारिक मान्यता मिली हुई है.
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ से जुड़े डॉक्टर हिलाल अहमद कहते हैं, "आधुनिक धर्मों का विज्ञान के साथ कोई टकराव नहीं है. बल्कि उन्हें विज्ञान को उचित ठहराया है."
जब उनके सामने कोई अभूतपूर्व चीज़ आती है तो वे हमेशा कहते हैं, "उनके धर्म में हमेशा से ऐसा चल रहा था."
धर्मों के लिए 'न्यू नॉर्मल'
अनिश्चितताएं परेशान करने वाली हैं. लेकिन आख़िरकार लोगों को एक नई दुनिया में अपनी ज़िंदगी शुरू करनी होगी जब तक एक वैक्सीन नहीं बन जाती, और सभी लोगों को दे नहीं दी जाती. विशेषज्ञ कहते हैं कि इस प्रक्रिया में महीनों से लेकर कई सालों का समय लग सकता है.
हालांकि, इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल है कि भारतीय समाज पहले से ज़्यादा धार्मिक हो जाएगा या इस समाज में विज्ञान के प्रति बेहतर समझ विकसित होगी. लेकिन इस कोलाहल भरे दौर में भी कुछ संकेत मिल रहे हैं.
दिल्ली में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता गीता शर्मा एक स्मार्ट और खुद में विश्वास करने वाली महिला हैं. इस लॉकडाउन के दौर में भी वह ज़्यादा शिकायत किए बिना अपनी जिंदगी जी रही है. अगर कोई पूछे कि गीता ऐसा कैसे कर पा रही हैं तो इसका "ध्यान" होगा.
गीता मानती हैं कि अब वे ज़्यादा आध्यात्मिक हैं. वह कहती हैं, "अगर मैं वर्तमान स्थिति की बात करूं तो मैं कहूंगी कि भगवान ने हमें आध्यात्मिकता की ओर जाने का एक मौका दिया है."
गीता पेशे से एक पत्रकार हैं लेकिन इस दौर में वे खुद के साथ समय बिताना पसंद करती हैं. वह इस महामारी को लेकर भावहीन हैं. वह कहती हैं, "कोरोना एक अभिशाप नहीं है, बल्कि एक सबक है. ध्यान इसका जवाब है."
बेंगलुरु में एक काफ़ी बड़ा आश्रम चलाने वाले योग गुरु श्री श्री रवि शंकर के दुनिया भर में लाखों फॉलोअर हैं.
रविशंकर ने एक वीडियो मैसेज़ जारी करके कहा है कि उन्होंने इस महामारी से उपजे दुख के उपचार के लिए ध्यान लगाने का सुझाव देते हैं.
सैयद गौहर कहते हैं, "मुझे लगता है कि लोग अब ज़्यादा आध्यात्मिक होकर अल्लाह के नज़दीक आएंगे."
ऑनलाइन प्रार्थनाओं का दौर
भारत में दो महीने से ज़्यादा समय तक के लिए लगभग हर मस्जिद, मंदिर, चर्च और गुरुद्वारे बंद थे. बीते 8 जून को इन मंदिरों को एक बार फिर खोला गया है. लेकिन अभी भी इन जगहों पर जाने के लिए कई प्रतिबंध और दिशानिर्देश हैं.
धार्मिक दुनिया में भी सामाजिक दूरी को स्वीकार्यता मिलने के आसार नज़र आ रहे हैं. ये वो जगहें थी जहां एक बड़े और एक दूसरे में गुथे समुदाय अपेक्षित हुआ करते थे.
महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अब तक धार्मिक स्थलों को आम जनता के लिए नहीं खोला गया है. लेकिन इसके बावजूद भक्तों ने इंटरनेट के ज़रिए इन स्थानों तक पहुंचने की कोशिश की.
राजस्थान के कोटा में एक दुकानदार खुर्शीद आलम ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के भक्त हैं जिनकी अजमेर स्थित दरगाह में हर साल लाखों लोग अपना माथा टेकते हैं.
खुर्शीद कहते हैं, "मैं दरगाह तक नहीं जा सकता हूँ, इसलिए मैं बीच बीच में वीडियो कॉल करके उनका आर्शिवाद ले लेता हूँ.
खुर्शीद जैसे कई लोग हैं जो इंटरनेट के ज़रिए अपनी आध्यात्मिक ज़रूरतों को पूरा कर रहे हैं.
लॉकडाउन के दौरान दरगाह में इंटरनेट के ज़रिए नज़राना करने की दरख्वास्तों में भारी उछाल आया.
सैयद गौहर कहते हैं कि ये ट्रेंड जारी रहेगा.
वे कहते हैं, "हम इंटरनेट के ज़रिए सेवाएं देते हैं लेकिन मुझे लगता है कि कोरोना के बाद की दुनिया में इन सेवाओं की माँग में बढ़ोतरी होगी.
स्वर्ण मंदिर की देखरेख रहने वाली संस्था एसजीपीसी के मुख्य सचिव रूप सिंह कहते हैं कि सिख भक्त स्वर्ण मंदिर में आने की राह देख रहे हैं.
वह कहते हैं, "मैं समझता हूँ कि भक्त इस बात का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं कि हरमिंदर साहब को जनता के लिए कब खोला जाएगा. इसमें कोई शक नहीं है कि दुनिया भर से लोग यहां आना चाहते हैं लेकिन मुझे लगता है कि लॉकडाउन के कुछ प्रतिबंध स्थितियां सामान्य होने के बाद भी जारी रहेंगे."
वेटिकन से पोप फ्रांसिस के मास और साप्ताहिक प्रवचनों को इंटरनेट पर प्रसारित किया जा रहा है.
अमरीका में चर्च और इसराइल में सिनेगोग में धार्मिक अनुष्ठानों को इंटरनेट पर लाना शुरू कर दिया है.
इस्लाम का सबसे पवित्र स्थान मक्का की ग्रांड मॉस्क भी बंद है. सिर्फ दिन में पांच बार अज़ान की लाइव स्ट्रीमिंग से मक्का की हवा में मौजूद परेशान करने वाला सन्नाटा टूटता है.
धर्म से जुड़ा अर्थशास्त्र
अचानक से बंद हो जाने की वजह से धर्मस्थलों को भक्तों से जो चंदा मिलता था उसमें भी भारी कमी आई है.
दिल्ली सिख गुरुद्वार प्रबंधन समिति के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा कहते हैं, "पहले हज़ारों लोग गुरुद्वारा आया करते थे और वे दानपात्र में कुछ दान डाला करते थे. लेकिन अब वह पैसा आना पूरी तरह बंद हो गया है."
सिरसा कहते हैं ये शायद इस समिति के लिए सबसे ज़्यादा चुनौतीपूर्ण समय है और वे हर रोज़ इंटरनेट और टीवी के माध्यम से चंदा देने की अपील कर रहे हैं.
लॉकडाउन से पहले दिल्ली का बांग्ला साहिब गुरुद्वारे में वॉलिंटियर और स्टाफ़ 25 हज़ार लोगों के लिए खाना बनाते थे. शनिवार रविवार को ये संख्या एक लाख के पार पहुंच जाया करती थी.
अब चूंकि भारत में लॉकडाउन चल रहा है और दिल्ली में ग़रीबों के पास कोई काम और खाने पीने के लिए कुछ नहीं है. ऐसे में गुरुद्वारे कर्मचारी प्रतिदिन दो लाख़ लोगों के लिए खाना बना रहे हैं.
सिरसा बताते हैं, "हमारा मानना है कि लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद ये संख्या दो से तीन गुना बढ़ जाएगी."
सिरसा कहते हैं कि वह जानते हैं कि जब धर्म स्थल खुल जाएंगे, इसके बाद भी कोरोना वायरस के बाद की दुनिया में काफ़ी कम लोग ही गुरुद्वारे आएंगे. ऐसे में गुरुद्वारा को पहले की तरह पैसा जुटाने में कई साल लग जाएंगे.
हालांकि, गुरुद्वारा जिस पैसे से अपना खर्च चलाता था, उसमें भारी कमी आई है.
लेकिन अभी भी दुनिया के कोने कोने से अलग - अलग धर्मों के लोग इंटरनेट के माध्यम से दान दे रहे हैं. इस तरह काम चल रहा है.
सिरसा कहते हैं, "अभी हम एक एक दिन करके काट कर रहे हैं. ये काफ़ी अच्छा अनुभव है कि धार्मिक संस्थाओं के बंद होने के बावजूद लोगों में मानवता की सेवा करने का हौसला कम नहीं हुआ है."
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