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अरविंद केजरीवाल: दिल्ली को 'कोरोना कैपिटल' बनने से बचा पाएंगे?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना वायरस के मरीज़ों को लेकर शुक्रवार को स्वतः सज्ञान लेते हुए चार राज्यों से जवाब माँगा है.
उनमें से महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के साथ साथ दिल्ली भी है. जस्टिस कॉल ने दिल्ली को लेकर कहा कि यहाँ टेस्ट बहुत कम हो रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मीडिया रिपोर्ट में अस्पतालों में शवों की जो हालत है वो भयावह है.
इस बेंच ने कहा कि वेटिंग एरिया में शवों को रखा गया है.
ये बताता है कि दिल्ली में स्थिति कितनी ख़राब हैं. कुछ इसी तरह की भयावह स्थिति की बात ख़ुद दिल्ली सरकार ने की है.
दिल्ली में जुलाई के अंत तक में कोरोना के साढ़े पाँच लाख मरीज़ हो जाएंगे.
- 9 जून 2020 मनीष सिसोदिया, उप-मुख्यमंत्री, दिल्ली सरकार
इस बयान को सुनने के बाद से ही दिल्ली एनसीआर में डर का माहौल है. अभी इस बयान के डर और सदमे से लोग उबर भी नहीं पाए थे कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का इससे भी बड़ा बयान आ गया.
अगर बाहर वालों का इलाज दिल्ली में करना पड़ा तो दिल्ली में दोगुने बेड्स की ज़रूरत पड़ेगी. यानी जुलाई के अंत तक डेढ़ लाख बेड्स की ज़रूरत पड़ेगी.
-10 जून 2020 अरविंद केजरीवाल, मुख्यमंत्री, दिल्ली सरकार
इसके बाद चर्चा शुरू हुई कि क्या दिल्ली में बढ़ते मामलों को देखते हुए दोबारा लॉकडाउन लगाने की ज़रूरत पड़ेगी? इस पर शुक्रवार को दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री ने बयान देकर सभी अटकलों को शांत कर दिया.
दिल्ली में लॉकडाउन अब और नहीं बढ़ेगा.
-12 जून 2020 सत्येंन्द्र जैन, स्वास्थ्य मंत्री, दिल्ली सरकार
ऐसे में सवाल उठता है कि 68 दिन के लॉकडाउन में आख़िर दिल्ली की सरकार ने क्या तैयारी की?
कहां कमी रह गई? केजरीवाल से कहां चूक हुई? इसी सवाल का जबाव तलाशती है ये रिपोर्ट.
दिल्ली कोरोना ऐप
सबसे पहले आपको बताते हैं दिल्ली कोरोना ऐप की कहानी. 2 जून को दिल्ली सरकार ने ये ऐप लॉन्च किया. नीयत अच्छी थी, इसमें कोई दो राय नहीं.
लेकिन इस ऐप ने लोगों का भला कम किया सरकार की दिक़्क़तें ज़्यादा बढ़ा दीं.
ऐप लॉन्च होते ही मरीज़ों, उनके रिश्तेदारों और पत्रकारों ने सभी अस्पतालों में फ़ोन करके पता लगाना शुरू कर दिया कि किस अस्पताल में कितने बेड ख़ाली हैं.
पता चला कि ऐप में जो दिख रहा है और जो वास्तव में अस्पतालों की स्थिति है, वो एक जैसी नहीं है.
दिल्ली कोरोना ऐप के आँकड़ों पर ध्यान देंगे तो तीन अहम बातें नज़र आती हैं :
- पहली बात - दिल्ली में कोरोना मरीज़ों का सबसे ज्यादा लोड 10 बड़े सरकारी (केन्द्र और राज्य) और पाँच बड़े प्राइवेट अस्पतालों पर हैं. सरकारी अस्पतालों में लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल , जीबी पंत अस्पताल, राजीव गांधी सुपर स्पेशियैलिटी अस्पताल, गुरु तेग बहादुर अस्पताल, दीप चंद गुप्ता अस्पताल, एम्स (दिल्ली और झज्जर), सफदरजंग और राम मनोहर लोहिया अस्पताल शामिल हैं. प्राइवेट अस्पतालों की बात करें तो मैक्स, सर गंगाराम और अपोलो अस्पताल में ज्यादा लोग जा रहे हैं.
- दूसरी बात जो निकल कर सामने आ रही है वो ये कि ऐप में तो दिख रहा है कि अस्पतालों में बेड ख़ाली हैं, लेकिन मरीज़ वहां जाते नहीं हैं या फिर वहाँ पहुँचने पर उन्हें एडमिशन नहीं मिल रहा है, या आईसीयू और वेंटिलेटर वाले बेड नहीं मिल रहे.
- तीसरी बात है इलाज का ख़र्च. कई अस्पताल लाखों में आईसीयू का ख़र्च बता रहे हैं. कुछ अस्पताल तो पैसा भी पहले ही जमा करवाने को कह रहे हैं. संत परमानंद अस्पताल ने फोन पर बीबीसी ने बताया कि आईसीयू के लिए 9 लाख रुपये पहले जमा करवाने होंगे तभी जाकर मरीज़ को अस्पताल में दाखिला मिलेगा. फ़ोर्टिस एस्कॉर्ट अस्पताल, न्यू फ़्रेंड्स कॉलोनी ब्रांच ने फोन पर बताया कि कोविड19 के इलाज के लिए एक बेड के लिए एक दिन का ख़र्चा 9000 रुपये आएगा. साथ ही डॉक्टर की हर विज़िट के लिए चार्ज अलग से देना होगा जो 4200 रुपये प्रति विज़िट होगा. आम तौर पर एक दिन में डॉक्टर दो से तीन बार मरीज़ को देखने आते हैं. अस्पताल के मुताबिक़ अगर मरीज़ को आईसीयू में रखने की आवश्यकता पड़ती है तो उसका ख़र्च एक लाख रुपये प्रति दिन होगा. जिसमें 50 हज़ार से 80 हज़ार अस्पताल में दाख़िले के दौरान ही जमा करवाने होंगे.
साफ़ है कि दिल्ली सरकार का ये ऐप फिलहाल के लिए एक छलावा है और इससे मरीज़ों का कुछ ख़ास कल्याण नहीं हो रहा है.
सुप्रीम कोर्ट के वकील अशोक अग्रवाल के मुताबिक छोटे अस्पतालों का ही नहीं, बड़े अस्पतालों का भी हाल बुरा है. इसलिए लोग केवल बड़े नाम वाले अस्पतालों में जाना चाह रहे हैं. रोज़ ट्विटर पर सरकारी अस्पतालों की तस्वीरें वायरल हो रही है जिनमें कॉरिडोर में मरीज़ बुरे हाल में पड़े दिखाई देते हैं, उन्हें अटेंड करने के लिए ना तो कोई नर्स है और ना ही कोई डॉक्टर. ऐसी तस्वीरें देखकर दूसरे मरीज़ों का भी हौसला टूटता है.
अशोक अग्रवाल का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं के लिए लोगों का डाक्टरों पर भरोसा बहुत बड़ी बात होती है. और वो बरसों की मेहनत से ही जीता जा सकता है.
लगातार मिल रही शिक़ायतों के बाद अब दिल्ली सरकार कोरोना ऐप के डेटा और अस्पतालों में ख़ाली बेड में तालमेल बिठाने की बात कर रही है. जल्द ही अस्पतालों में इस कमी को दूर करने के लिए सरकार हर अस्पताल में एक नोडल अफ़सर तैनात करने जा रही है, जो इस ऐप में सही डेटा भरने के लिए ज़िम्मेदार होंगे. बीबीसी से बातचीत में दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर गिरीश त्यागी ने ये जानकारी साझा की.
दिल्ली के उप-राज्यपाल ने 10 जून को एक सर्कुलर जारी कर सभी अस्पतालों को आदेश दिया है कि सभी अस्पताल और नर्सिंग होम अपने संस्थान के बाहर खाली बेड की संख्या और इलाज के ख़र्च का बोर्ड लगाएंगे.
उम्मीद है कि इन आदेशों के बाद दिल्ली में कोरोना के इलाज की स्थिति थोड़ी बेहतर होगी.
रोज़ बदलते सरकारी आदेश
ऐप में दिख रहा है कि बेड ख़ाली है लेकिन इसके बाद भी कुछ मरीज़ों को बेड नहीं मिल पा रहा है, इस स्थिति को समझने के लिए हमने राजीव गांधी सुपर स्पेशियैलिटी अस्पताल के निदेशक डॉक्टर बीएल शेरवाल से बात की.
उनका कहना है कि पहले माइल्ड सिम्प्टम वाले मरीज़ों को हम भर्ती नहीं करते थे. इसका मतलब ये नहीं कि हम इलाज नहीं कर रहे थे. जिनको इलाज की जरूरत थी, केवल उनको ही अस्पताल में भर्ती किया जा रहा था.
लेकिन 6 जून को दिल्ली सरकार ने नया आदेश जारी किया जिसके बाद कोरोना के लक्षण वाले हर मरीज़ का ट्रीटमेंट करना अनिवार्य कर दिया गया है. नए आदेश के मुताबिक कोई मरीज़ कोविड19 पॉज़िटिव है या नहीं इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता, अगर उसमें कोरोना के लक्षण हैं तो अस्पताल को उसे एडमिट करना ही होगा. फिर हर सुबह ऐसे मरीज़ों की दोबारा जाँच की जाती है और ज़रूरत पड़ने पर उसको नॉन-कोविड अस्पताल में शिफ्ट किया जाता है. कोरोना के क़हर के बीच आम आदमी इस वक़्त पैनिक की स्थिति में है और रिपोर्ट पॉज़िटिव आते ही वो सीधा अस्पताल की ओर भाग रहा है. बीमारी का पता चलते ही हर कोई अब अस्पताल में ही भर्ती होना चाहता है. ऐसे में अगर किसी एसिम्प्टोमैटिक पॉज़िटिव मरीज़ को नॉन कोविड अस्पताल जाने या घर में ही आइसोलेशन में रहने की सलाह दी जा रही है तो वो ये शिक़ायत करने लगते हैं कि अस्पताल उनका इलाज करने से कतरा रहा है. असल दिक्कत यहां है.
टेस्टिंग पर सवाल
सरकारी आदेशों से ग़लतफ़हमियों का सबसे ताज़ा उदाहरण सर गंगाराम अस्पताल है. इस अस्पताल पर कोरोना टेस्ट के लिए RT-PCR ऐप का इस्तेमाल ना करने के मामले में एफआईआर दर्ज़ की गई.अब अस्पताल में कोविड19 के मरीज़ों का इलाज तो हो रहा है लेकिन उनके टेस्ट नहीं हो पा रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में सर गंगाराम अस्पताल के मेडिसिन डिपार्टमेंट के हेड डॉक्टर एसपी बायोत्रा ने बताया कि ये हास्यास्पद है कि एक तरफ सरकार कह रही है सब लक्षण वाले मरीज़ों को दाख़िला दो और दूसरी तरफ हम टेस्ट कर ही नहीं सकते. ऐसे में कैसे पता लगाएं कि कौन मरीज़ कोरोना पॉज़िटिव है और कौन नहीं.
उनके मुताबिक दिक़्क़त तो बहुत हो रही है, लेकिन राज्य सरकार को इस पर पहल करनी चाहिए. नहीं तो क़ानूनी तौर पर हम जो कर सकेंगे, वो ही कर पाएंगे. अब गुरुवार को दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश आया है कि सभी अस्पताल में कोविड19 के टेस्ट की व्यवस्था हो, जहाँ कहीं भी लैब की सुविधा है.
दिल्ली के अस्पतालों में किसको दाख़िला मिलेगा और किसको नहीं, इसको लेकर तीन दिन तक जो कन्फ़्यूज़न चला वो भी किसी से छुपा नहीं है.
इतना ही नहीं पिछले हफ़्ते दिल्ली सरकार ने 6 प्राइवेट लैब को भी कोरोना टेस्ट करने से मना कर दिया. उनपर आईसीएमआर के नियमों की अनदेखी करने का आरोप था. इन 6 लैब की प्रतिदिन टेस्ट करने की क्षमता 4000 थी.
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में टेस्टिंग कम होने के मुद्दे पर सवाल खड़े किए. आपको बता दें कि दिल्ली सरकार का दावा है कि देश में प्रति 10 लाख लोगों पर सबसे ज्यादा टेस्ट दिल्ली में किये जा रहे हैं. लेकिन सच्चाई ये भी है कि जून के शुरुआती 10-12 दिनों में टेस्ट मई के मुकाबले कम हुए हैं. दिल्ली की विधायक आतिशी ने एक टीवी चैनल डिबेट में बताया कि, जून में टेस्टिंग कम होने के पीछे की वजह कुछ लैब पर दिल्ली सरकार द्वारा की गई कार्रवाई भी है.
इससे पहले 24 मई को दिल्ली सरकार ने आदेश पारित किया था कि जिन अस्पतालों/नर्सिंग होम की क्षमता 50 बेड से ज़्यादा है, उन्हें अपना 20 फ़ीसदी बेड कोरोना के मरीज़ों के लिए रिज़र्व रखना होगा.
कुछ अस्पतालों ने नाम ना छापने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि सरकार रातों-रात बिना हमसे सलाह-मशविरा किए ऐसे फैसले ले लेती है. एक आदेश से स्थितियां नहीं बदली जा सकतीं. ज़मीनी स्तर पर कई चैलेंज हैं. अगर किसी अस्पताल में हार्ट पेशेंट है, किडनी का पेशेंट है तो हम रातों-रात कैसे उसे दूसरी जगह शिफ्ट कर सकते हैं. सरकारी आदेश इस बारे में ना तो सोचते हैं और ना ही अस्पतालों को सोचने का मौक़ा दे रहे हैं.
पिछले कुछ दिनों में दिल्ली में ऐसे कई आदेश आए, जिनका सीधा असर दिल्ली में कोविड19 के आँकड़ों वाले ग्राफ पर पड़ा है.
अस्पतालों में बेड तो हैं पर वेंटिलेटर की कमी है
दिल्ली सरकार ने मार्च के महीने में ही कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए पाँच डॉक्टरों की एक टीम बनाई थी. दिल्ली के इंस्ट्टीयूट ऑफ लीवर एंड बाइलिनिरी साइंसेस (ILBS) के डॉक्टर एसके सरीन इसकी अध्यक्षता कर रहे थे. 27 मार्च को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में बताया था कि अगर हर रोज़ कोरोना के 1000 मरीज़ आते हैं तो उसके लिए दिल्ली सरकार की तैयारी पूरी है.
फ़िलहाल दिल्ली में हर रोज़ 1000 से 1600 के बीच नए मामले आ रहे हैं और दिल्ली की मेडिकल व्यवस्था चरमराती नज़र आ रही है.
इसके पीछे एक बड़ी वजह वेंटिलेटर की कमी भी है. कोरोना के कुल मरीज़ों में से केवल तीन से पाँच फ़ीसदी मरीज़ों को ही वेंटिलेटर की जरूरत होती है.
अगर जुलाई के अंत तक साढ़े पाँच लाख कोरोना मरीज़ होने के सरकारी आँकड़ों की बात मान लें तो उस वक़्त तकरीबन 16 से 20 हज़ार वेंटिलेटर बेड की ज़रूरत पड़ेगी. केन्द्र और राज्य सरकार दोनों इसके लिए इस वक़्त तैयार नहीं दिख रहे.
देश के पूर्व डॉयरेक्टर जनरल हेल्थ सर्विसेज़ डॉक्टर जगदीश प्रसाद ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि दिल्ली में सबसे ज्यादा वेंटिलेटर सफदरजंग, आरएमएल और एम्स जैसे बड़े अस्पतालों में हैं. उनके मुताबिक सफदरजंग में इस वक्त 250 वेंटिलेटर होंगे और तकरीबन इतने ही एम्स और आरएमएल में भी.
दिल्ली सरकार के आँकड़ों के मुताबिक उनके पास 561 वेंटिलेटर हैं. प्राइवेट अस्पतालों में जो सुपर स्पेशियैलिटी वाले अस्पताल हैं उनमें भी वेंटिलेटर होते हैं. डॉक्टर जगदीश के मुताबिक सब मिलाकर भी दिल्ली में मौजूदा वेंटिलेटरों का आँकड़ा 1200 से ज्यादा नहीं होगा. इस लिहाज से दिल्ली जुलाई के अंत में बनने वाले हालात से निपटने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं नज़र आती.
अमेरिका में न्यू जर्सी की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी ने भी भारत के क्रिटिकल केयर इंफ़्रास्ट्रक्चर पर इसी साल अप्रैल में एक रिसर्च प्रकाशित की थी. इस रिसर्च के मुताबिक सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों को मिलाकर दिल्ली में 986 वेंटिलेटर ही हैं.
डॉक्टर जगदीश इसी साल फरवरी में डीजीएचएस के पद से रिटायर हुए हैं. वो साल 2002 से 2010 तक सफदजंग अस्पताल के एमएस भी रहे हैं. उनके मुताबिक माइल्ड और बिना लक्षण वाले मरीज़ों को तो सरकार घर पर रख कर इलाज करवा सकती है. लेकिन मॉडरेट और सीवियर कैटेगरी वाले मरीज़ों के लिए अस्पताल में बेड की जरूरत होगी. जिसमें से मॉडरेट कैटेगरी के मरीज़ों के लिए ऑक्सिजन के साथ वाले बेड की जरूरत होगी. डॉ. जगदीश को लगता है कि उस स्थिति के लिए हम तैयार हैं. लेकिन सीवियर कैटेगरी के मरीज़ों के लिए दिल्ली की तैयारी बिलकुल नहीं दिख रही, जिन्हें वेंटिलेटर बेड की आवश्यकता होगी.
ज़ाहिर है 68 दिनों के लॉकडाउन में इस कमी को पूरा करने की कोई कोशिश सरकार की तरफ से नहीं की गई.
केन्द्र सरकार ने देश के स्वास्थ्य सुविधाओं में बढ़ोतरी के लिए 15000 करोड़ के पैकेज की घोषणा अप्रैल के महीने में की थी. उस पैकेज में कितना ख़र्चा हुआ, और क्या किया गया, इसका कोई लेखा जोखा अभी तक जारी नहीं किया गया है.
इसी तरह से पीएम केयर्स फंड से 2000 करोड़ रुपए वेंटिलेटर ख़रीदने के लिए ख़र्च करने की बात केन्द्र सरकार ने की थी. लेकिन उस रक़म से कितने वेंटिलेटर ख़रीदे गए, इसकी अभी कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है.
बीबीसी ने दिल्ली सरकार से इस बारे में सम्पर्क किया लेकिन उनका कोई आधिकारिक बयान अभी तक नहीं आया है.
डॉक्टरों की कमी
दिल्ली की वर्तमान स्थिति में दूसरा सबसे बड़ा डर डॉक्टरों की कमी का है.
दिल्ली मेडिकल काउंसिल के आँकड़ों के मुताबिक 70 हज़ार डॉक्टर यहां रजिस्टर्ड हैं. एक अनुमान कहता है कि कुल रजिस्टर्ड डॉक्टरों में से 15 से 20 फ़ीसदी डॉक्टर ही सही में प्रैक्टिस करते पाए जाते हैं.
लेकिन जिस हिसाब से रोज़ाना कई डॉक्टर और नर्स ख़ुद कोविड19 का शिकार हो रहे हैं. इसके लिए उन्हें भी क्वॉरंटीन में भेजा जाता है. जिसके बाद 14 दिन से 21 दिन तक वो काम पर नहीं आ पाते. फिर उनके साथियों को भी एहतिहातन क्वॉरंटीन में भेजा जाता है. ऐसी सूरत में डॉक्टर, नर्स और दूसरे मेडिकल स्टॉफ की कमी वाक़ई में एक बड़ी समस्या तो है ही. दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के डॉक्टर गिरीश इसे एक बड़ी चुनौती मानते हैं.
डॉक्टर जगदीश, देश के पूर्व डायरेक्टर जनरल हेल्थ सर्विसेज भी डॉक्टर गिरिश की इस बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं. उनके मुताबिक़ वैसे तो कोविड19 ऐसी बीमारी है जिसमें माइल्ड और मॉडरेट मरीज़ों के लिए कोई भी जनरल फ़िज़िशियन काम आ सकते हैं. लेकिन वेंटिलेटर और आईसीयू में रहने वाले मरीज़ों की देखभाल के लिए ख़ास डॉक्टरों की ज़रुरत पड़ती है.
आने वाले दिनों में इससे निपटना सरकार के लिए सबसे मुश्किल भरा काम होगा.
राजीव गांधी सुपर स्पेशियैलिटी अस्पताल में फिलहाल कोरोना के 500 मरीज़ों का इलाज होता है. लेकिन आने वाले दिनों में सरकार ने अस्पताल प्रबंधन को अपनी क्षमता बढ़ा कर 650 करने के लिए बोला है. दिल्ली के रोहिणी में स्थित इस अस्पताल ने हाल ही में 80 डॉक्टरों, 200 नर्स और 100 टेक्निशियन की भर्ती के लिए वैकेंसी निकाली है.
राज्य सरकार जैसे हर दिन के हिसाब से कोरोना बेड की संख्या अस्पतालों से बढ़ाने की मांग कर रही है. उसे देखते हुए दिल्ली सरकार की महेश वर्मा कमेटी ने स्टेडियम और प्रगति मैदान जैसे बड़ी जगहों पर मेक-शिफ्ट अस्पताल बनाने की मांग की है. महेश वर्मा कमेटी, वही कमेटी है जिसने दिल्ली सरकार को दिल्ली के अस्पताल दिल्ली वालों के लिए रिजर्व रखने का सुझाव दिया था. लेकिन इसमें सबसे बड़ी दिक़्क़त ये है कि खाली जगहों पर मेक-शिफ़्ट अस्पताल तो बन सकते है, बेड भी खरीदे जा सकते हैं, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टर रातों-रात नहीं खड़े किये जा सकते हैं. ऐसे में डॉक्टरों और मेडिकल स्टॉफ के काम की शिफ्ट लंबी हो रही है और उन पर काम का बोझ बढ़ता ही जा रहा है.
दिल्ली में मौत के आँकड़ों पर सवाल
गुरुवार को दिल्ली नगर निगम ने कोरोना संक्रमित शवों के दाह संस्कार के आंकड़े जारी किए. उनके मुताबिक दिल्ली में अब तक 2098 लोगों की कोरोना से मौत हुई है. दक्षिणी एमसीडी में1080, उत्तर एमसीडी में 976 और पूर्वी एमसीडी में 42 मौतों का आँकड़ा उन्होंने जारी किया.
जबकि दिल्ली सरकार के मुताबिक गुरुवार तक दिल्ली में कोरोना से 984 लोगों की मौत हुई.
शुक्रवार को सुप्रीमकोर्ट ने भी शवों के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार करने की बात कही है. मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर पूरे मामले पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने दिल्ली सरकार से जवाब भी माँगा है.
विवाद के बाद जब दिल्ली सरकार ने कहा कि कोरोना से होने वाली मृत्यु के आंकलन के लिए दिल्ली सरकार ने वरिष्ठ डॉक्टर्स की एक डेथ ऑडिट कमेटी बनाई है जो निष्पक्ष तरीके से अपना काम कर रही है. माननीय दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कमेटी को सही ठहराते हुए कहा था कमेटी के काम करने के तरीके पर सवाल नहीं उठाया जा सकता.
स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च
आम आदमी पार्टी ने पाँच सालों में 900 मोहल्ला क्लीनिक खोलने का वादा किया था. जनवरी 2020 तक आधे मोहल्ला क्लिनिक ही बना कर तैयार थे. इन मोहल्ला क्लिनिकों में सामान्य टेस्ट, मेडिकल चैक-अप और मुफ़्त दवा मिलती है. ये कम आय वर्ग के लोगों, ख़ासकर महिलाऔं और गृहणियों को ध्यान में रखकर खोले गए थे. लेकिन कोरोना संक्रमण से निपटने में इनकी कितनी अहम भूमिका रही है, इसका पता नहीं चल सका है.
मोहल्ला क्लिनिक बनाने के अलावा आम आदमी पार्टी ने 125 पॉली क्लिनिक बनाने का भी वादा किया था जिनमें महिला रोग विशेषज्ञ और बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों की ख़ास सुविधा देने का वादा किया था. लेकिन इस साल जनवरी तक आम आदमी पार्टी की सरकार सिर्फ़ 25 पॉली क्लिनिक ही बना सकी है.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में आम आदमी पार्टी की तीसरी बड़ी योजना सरकारी अस्पतालों में तीस हज़ार नए बेड लगाने की थी. लेकिन ये वादा भी पूरा नहीं किया गया. सरकार के अपने डाटा के मुताबिक़ मई 2019 तक सिर्फ़ तीन हज़ार नए बेड ही सरकारी अस्पतालों में लगाए जा सके हैं.
बीबीसी रिएलटी चैक की रिपोर्ट के मुताबिक जहां तक स्वास्थ्य क्षेत्र में ख़र्चों का सवाल है, अधिकारिक डाटा बताता है कि स्वास्थ्य का बजट 2015 के बाद से बढ़ा ही है.
आम आदमी पार्टी का ये भी कहना है कि दिल्ली देश का एकमात्र राज्य है जहां कुल बजट का 12 से 13 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च किया जाता है. आरबीआई के डाटा के मुताबिक़ सरकार का ये दावा सही है.
ये बताता है कि दिल्ली देश का एकमात्र राज्य है जो अपने बजट का इतना बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च करता है.
वास्तव में, साल 2002 के बाद से, दिल्ली ने स्वास्थ्य सेवाओं पर पूरे देश में सबसे ज़्यादा ख़र्च किया है.
आख़िर समाधान क्या है?
इस पड़ताल में हमने पाया कि कोरोना के इलाज से जुड़ी ये समस्या अकेले दिल्ली की नहीं है. केन्द्र को भी इसमें सहयोग देना होगा. ज़्यादातर जानकारों की भी सलाह यही है कि इस मुश्किल घड़ी में केंद्र और राज्य को मिलकर काम करना होगा.
•अशोक अग्रवाल, सुप्रीम कोर्ट के वकील - सेंट्रलाइज्ड सिस्टम बनाने की जरूरत है. केन्द्र और राज्य सरकारों को मिलकर कोरोना के हर मरीज़ का ख़र्च वहन करना होगा
•डॉ. गिरीश त्यागी, अध्यक्ष, डीएमए - अस्पतालों और सरकार के बीच बेहतर तालमेल की ज़रूरत है. हमारी बैठकें हुई है लेकिन एक दिन में समाधान नहीं निकल सकता.
•डॉ. जगदीश प्रसाद, पूर्व डीजीएचएस - सबसे पहले तो सरकार को मंदिर, मस्जिद और चर्च दोबारा बंद करने चाहिए. सिनेमाहॉल और मॉल्स भी बंद करने चाहिए. जहां दुकानें खोलने की इजाजत है, वहां एक समय में एक आदमी को ही अंदर जाने की इजाज़त होनी चाहिए.
•डॉ. बीएल शेरवाल, निदेशक, राजीव गांधी सुपर स्पेशियैलिटी अस्पताल - अस्पतालों को तैयारी करने के लिए थोड़ा वक़्त देना होगा. डॉक्टर, नर्स और टेक्नीशियन भी मिल जाएंगे.
•डॉ. एसपी बायोत्रा, हेड, मेडिसिन विभाग, सर गंगाराम अस्पताल - सरकारी आदेशों में तालमेल की जरूरत है. सरकार इस बारे में विचार करे.
समय कम है और दिल्ली का कोरोना ग्राफ तेज़ी से बढ़ता जा रहा है.
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