पर्यावरण दिवस विशेष: लॉकडाउन के बीच पौने तीन लाख पेड़ काटने पर विचार?

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पर्यावरण दिवस ऐसा मौक़ा है जब दुनिया भर के नेता आब-ओ-हवा और जंगलों के बारे में अच्छी-अच्छी बातें करते हैं लेकिन पर्यावरण बनाम विकास की बहस में ऐसे मौक़े कम ही आते हैं जब जंगल और जैव विविधता का पूरा ख़्याल रखा गया हो.
इसी सिलसिले में लॉकडाउन के दौरान वर्चुअल बैठकों के ज़रिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की दो समितियों- नेशनल बोर्ड फ़ॉर वाइल्ड लाइफ़ और फ़ॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी (एफ़एसी) ने जैव विविधता और जंगलों से जुड़े 30 प्रस्तावों को मंज़ूरी देने के सिलसिले में चर्चा की है और कुछ को मंज़ूरी दी भी गई है.
ये चर्चा और म़ंजूरी देने का काम लॉकडाउन में वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए किया गया है.
इनमें सबसे ज़्यादा चर्चा अरूणाचल प्रदेश की दिबांग घाटी में प्रस्तावित हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर हो रही है. 3097 मेगावाट वाला ये प्रोजेक्ट देश के सबसे बड़े पावर प्रोजेक्टों में से एक होगा.
23 अप्रैल को पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की फ़ॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी (एफ़एसी) ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए एक रिव्यू बैठक की. इस बैठक के औपचारिक ब्यौरे के मुताबिक़ इसमें पावर प्रोजक्ट पर चर्चा की गई जिसे पूरा करने के लिए 2.7 लाख पेड़ों को काटना होगा. ब्यौरा आप यहाँ देख सकते हैं.
बैठक के मिनट्स के मुताबिक़, एफ़एसी ने जब अपना पक्ष रखा तो वह हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के 'पक्ष'में नज़र आई, तकनीकी शब्दों में कहें तो इस रिपोर्ट को एफ़एसी ने आधिकारिक तौर पर 'मंज़ूरी' नहीं दी, लेकिन 'एतराज़' भी नहीं जताया.

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एफ़एसी, पर्यावरण मंत्रालय की एक ऐसी कमेटी है जो वन क्षेत्र में निर्माण कार्य के लिए हरी झंडी देने का काम करती है. ध्यान देने वाली बात ये है कि अगर किसी प्रोजेक्ट को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की ये कमेटी या एक्सपर्ट अप्रेज़ल कमेटी क्लीयरेंस दे दे तो मंत्रालय की ओर से ऐसे प्रोजेक्ट को भी हरी झंडी दे ही दी जाती है.
इस तरह से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके ग्रीन क्लीयरेंस या प्रोजेक्ट पर चर्चा करने पर पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश सहित कई पर्यावरण वैज्ञानिकों ने पूछा है कि पर्यावरण से जुड़े इतने अहम फैसले इतनी जल्दीबाज़ी में क्यों किए जा रहे हैं?
हालांकि एफ़एसी ने साफ़ किया कि अब तक कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल एफ़एसी की सब-कमेटी और वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट की उस रिपोर्ट को लेकर उठाया जा रहा है जिस पर एफ़एसी ने इस वीडियो कॉन्फ़्रेस बैठक के दौरान चर्चा की है. देश के नामचीन पर्यावरण शोधकर्ताओं नंदिनी वैल्लो, उमेश श्रीनिवासन, चिंतन सेठ जैसे 28 पर्यावरणविदों के मुताबिक़ इस रिपोर्ट में कई ख़ामियां होने के बावजूद इसे एफ़एसी की उपसमिति ने 'सराहा' है.
क्या है पूरा मामला?
28 फ़रवरी 2017 को एफ़एसी ने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर बैठक की थी. ये प्रोजेक्ट एक इतालवी कंपनी, जिंदल पावर लिमिटेड और अरूणाचल प्रदेश के हाइड्रोपावर विभाग का साझा वेंचर है. इस बैठक में जिंदल पावर लिमिटेड की पर्यावरण इम्पैक्ट असेसमेंट रिपोर्ट यानी ईआइए को ख़ारिज कर दिया गया था.
कमेटी ने "जैव विविधता पर होने वाले असर के मूल्यांकन के लिए "मल्टी सीज़नल स्टडी" करने का आदेश वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया को दिया था.
साल 2019 में वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने जैव विविधता पर मूल्यांकन रिपोर्ट की जगह एक कंज़र्वेशन प्लान सौंपा जिसका शीर्षक था 'वाइल्ड लाइफ़ कंज़र्वेशन प्लान फ़ॉर इम्पैक्ट ज़ोन ऑफ़ दिबांग वैली.'

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जाने-माने इकॉलजिस्ट और बायोडाइवर्सिटी पर काम करने वाले उमेश श्रीनिवासन उन चार पर्यावरण शोधकर्ताओं में से एक हैं जिन्होंने एफ़एसी को चिट्ठी लिखकर इस रिपोर्ट पर सवाल उठाए हैं.
उमेश श्रीनिवासन बीबीसी से कहते हैं, "वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट को प्रोजेक्ट के प्रभावों पर अध्ययन करना था तो ये कंज़र्वेशन प्लान में क्यों बदल गया. पर्यावरण पर पड़ने वाले असर का मूल्यांकन जिसे एनवॉयरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट (ईआईए) कहा जाता है जिसका अर्थ होता है जो नुक़सान होगा उसका अध्ययन हो फिर उसे देखकर एफ़एसी क्लियरेंस देगी. कंज़र्वेशन प्लान क्लियरेंस मिलने के बाद होता है यानी इसमें ये बताया जाता है कि प्रोजेक्ट से होने वाले नुक़सान को कैसे कम किया जाएगा. अब ये समझ पाना मुश्किल है कि ये ईआईए कैसे वाइल्ड लाइफ़ का कंज़र्वेशन प्लान में बदल गया".
श्रीनिवासन आगे कहते हैं, "पर्यावरण ये जुड़े रिव्यू और क्लीयरेंस के लिए जिस तरह मैप और डिटेल समझनी पड़ती है वो ऑनलाइन बैठकों में संभव ही नहीं है. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में जितनी जानकारी की ज़रूरत है इस प्रोजेक्ट को पास करने के लिए, वह वीडियो कॉन्फ्रेंस में मुमकिन नहीं है."
साल 2019 में एफ़एसी ने मंत्रालय को एक उप-समिति बनाने का सुझाव दिया जिसका गठन 15 जनवरी 2020 को किया गया. इस उप-समिति का काम दिबांग घाटी के प्रभावित इलाक़े का दौरा करना और स्थानीय अधिकारियों से बात करना था. ये तय करना था कि कितने पेड़ काटे जा सकते हैं और वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट को देखने जैसे काम इस उपसमिति के लिए तय किए गए.
23 अप्रैल की बैठक की जानकारी के मुताबिक़ इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए 2 लाख 78 हज़ार से अधिक पेड़ काटे जाएंगे. यहां देखें विवरण
एफ़एसी ने भी वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट को 'डिटेल रिपोर्ट' बताया है और इसके 'पक्ष' में भी नज़र आ रही है.
एफ़एसी ने भी कुछ सवाल तो उठाए हैं मसलन-
बिजली मंत्रालय से राय मांगी गई है कि 6 साल पहले 2014 में प्रस्तावित हुए इस प्रोजेक्ट के बाद अब वर्तमान समय में टैरिफ़ नीतियां काफ़ी हद तक बदल गई हैं. साल 2014 में जब ये प्रोजेक्ट प्रस्तावित किया गया था उसी वक़्त इसकी बिजली क़ीमत का मॉडल काफ़ी मंहगा था. क्या बिजली मंत्रालय इस प्रोजेक्ट को इसके मूल स्वरूप में आगे बढ़ाना चाहता है?

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पिअर-रिव्यू ने भी गहरी चिंताएँ ज़ाहिर की हैं. 23 अप्रैल की एफ़एसी की बैठक के बाद 28 पर्यावरण वैज्ञानिकों ने कंज़र्वेशन प्लान का पिअर-रिव्यू किया. पिअर रिव्यू स्वतंत्र पर्यावरणविदों की एक समिति की समीक्षा को कहते हैं.
इस रिव्यू को लिखने वाले स्वतंत्र पर्यावरण वैज्ञानिक चिंतन सेठ 13 साल से अरूणाचल की जैव विविधता पर काम कर रहे हैं. वे कहते हैं कि ''एक बेहद बड़े प्रोजेक्ट को मंज़ूरी देने के लिए एक ऐसे अध्ययन का सहारा लिया जा रहा है जो गहन अध्ययन तो नहीं करती, साथ ही इस इलाक़े की जैव विविधता को भी समझने में नाकाम साबित हो रही है".
वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट के प्लान पर पिअर-रिव्यू के सवाल
फ़ॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी के निर्देश के मुताबिक़ ये अध्ययन 'मल्टी सिज़नल' होना चाहिए था जबकि इस कंज़र्वेशन प्लान को फ़रवरी 2018 से जून 2018 यानी पाँच महीने के अध्ययन पर तैयार किया गया है. इस अवधि में थोड़ी ठंड और थोड़ी गर्मी के मौसम को ही कवर किया गया जबकि आम तौर पर इस इलाक़े में चार तरह के मौसम होते हैं.
जून से जनवरी तक की अवधि को छोड़ दिया गया जिस मौसम में इस इलाक़े की वनस्पतियां उगती हैं, कुछ माइग्रेट्री पक्षी आते हैं. ऐसे में ये प्लान एफ़एसी के 'मल्टी सीज़नल' के पैमाने पर कैसे खरा उतरता है?
पिअर रिव्यू में कहा गया है कि "ये अध्ययन 122 वर्ग किलोमीटर पर ही किया गया है जबकि 50 तरह के कंस्ट्रक्शन किए जाने हैं जिसमें दो डैम, चार पुल, 50 किलोमीटर की सड़क निकाली जाएगी ऐसे में इनका असर आस-पास के ज्यादा इलाक़ों पर होगा. उन पर पड़ने वाले प्रभाव को कैसे मापा गया है इसका कोई ठीक डेटा रिपोर्ट में नहीं है".
तक़रीबन 80 औषधीय वनस्पतियां दिबांग घाटी के दो ज़िलों में पाई जाती हैं लेकिन वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट कहती है कि ये संख्या केवल नौ है. इससे पहले कई ऐसे रिसर्च सामने आए हैं और यहां रहने वाले ईदू मिश्मी आदिवासी समुदाय जिनकी वनस्पतियों को लेकर समझ काफ़ी बेहतर है, उनसे बात करके 80 वनस्पतियों का पता लगाया गया है.
पिअर रिव्यू का कहना है, "वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट बनाने की कार्यप्रणाली में कई गड़बड़ियां हैं. जिन 21 स्तनधारी जीवों की प्रजातियों को इस प्रोजेक्ट के बनने से नुक़सान होगा, उसमें कई ऐसी प्रजातियां है जिन पर 'गंभीर ख़तरा' है. जैसे चाइनीज़ पैंगोलिन और ऐसे ही दूसरे स्तनधारी. कई इलाक़ों में जहां वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट ने सर्वे किया ही नहीं, वहां भी 'जैव विविधता पर हल्का असर होगा' ऐसे निष्कर्ष दिए गए हैं. जब सर्वे ही नहीं हुआ तो असर तय कैसे हो सकता है?"

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पिअर रिव्यू में कहा गया है, "वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट मानती है कि कई ऐसी प्रजातियां हैं जो लुप्त होने की कागार पर हैं या उन पर गंभीर ख़तरा है. लेकिन अपने कंज़र्वेशन प्लान में तितलियों के पार्क, रेप्टाइल पार्क, एम्फ़ीबियन पार्क जैसी सलाह दी गई है जो प्रजातियों को बचाने में सफल नहीं होंगी".
पर्यावरण वैज्ञानिक इस घाटी में किसी भी तरह का निर्माण कार्य करने के ख़िलाफ़ हैं. वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट पर पियर-रिव्यू लिखने वाले 28 वैज्ञानिकों में से एक और स्वतंत्र शोधकर्ता पर्यावरण वैज्ञानिक चिंतन सेठ ने बीबीसी को बताया, "दिबांग घाटी का 90 प्रतिशत क्षेत्र ऐसा है जहां लोग अभी तक जा ही नहीं पाए हैं. कई जगहों का सर्वे तक नहीं हो सका है. 443 तरह की चिड़ियों की प्रजातियां यहां है, देश में पाए जाने वाले पक्षियों में से 50 फ़ीसदी से ज्यादा तरह के पक्षियों की प्रजातियां यहां पाई जाती हैं."
सेठ कहते हैं, "ये दुनिया की दूसरी ऐसी जगह है जहां रिवराइन पक्षी सबसे ज़्यादा हैं. अभी तक एम्फ़ीबियन जीवों के बारे में तो जानकारी भी नहीं जुटाई जा सकी है."
साल 2017 में ख़ुद एफ़एसी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था, "जिस ज़मीन पर इस प्रोजेक्ट का प्रस्ताव रखा गया है वह प्राचीन जंगल है, जहां नदियां है. इसे अगर एक बार काट दिया गया या नुक़सान हुआ तो वापस नहीं पाया जा सकेगा". रिपोर्ट आप यहाँ देख सकते हैं.
उमेश श्रीनिवासन कहते हैं, "दुनिया में 30 बायो डायवर्सिटी हॉटस्पॉट हैं. हिमालयन रेंज उनमें से हैं. दुनिया भर में पक्षी और जीव-जन्तुओं की प्रजातियों के मामले में एंडीज़ और एमेज़न बेसिन के बाद अरूणाचल प्रदेश का नंबर आता है. ये असमान्य तौर पर जैव विविधता से भरा क्षेत्र है. ये जो जंगल है वो हज़ारों सालों में बनते हैं. सरकार जंगलों को काटकर जो कॉम्पमसेंट्री एफॉरेंटेशन करती है उनमें कई बार इको सिस्टम बदल जाता है, मोनो कल्चर यानी एक ही तरह के पेड़ लगा दिए जाते हैं जिससे बायो डायवर्सिटी ख़त्म हो जाती है. सरकार की इस पहल से इन जंगलों को रिप्लेस नहीं किया जा सकता".
बीबीसी ने इस पर सवालों की एक लिस्ट पर्यावरण मंत्रालय और डायरेक्टर जनरल ऑफ़ फ़ॉरेस्ट, इंडिया को भेजी है और एक सप्ताह से अधिक इंतज़ार करने के बाद कोई जवाब नहीं मिला, अगर उनकी तरफ़ से जवाब आया तो उसे इस रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा.
इसके अलावा बीबीसी ने वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के सदस्य जीवी गोपी से ईमेल के ज़रिए संपर्क किया लेकिन उनका भी कोई जवाब नहीं मिला है.

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जानी-मानी पर्यावरण शोधकर्ता नंदिनी वैल्लो कहती हैं कि इस लॉकडाउन में 30 ऐसे प्रोजेक्ट हैं जिन पर पर्यावरण मंत्रालय की समितियों ने या तो चर्चा की या उन्हें पास किया है.
चिंतन सेठ दावा करते हैं, "जो बैठकें पूरे दिन चला करती थीं अब 10 मिनट में क्लियरेंस दिया जा रहा है. एक ऐसा तरीक़ा है जिसके ज़रिए ऐसे क्लियरेंस को तेज़ी दी जा रही है या दिए जाने की कोशिश हो रही है. आख़िर इतनी जल्दी है क्यों"?
जिस इलाक़े को इस प्रोजेक्ट के लिए लिया जा रहा है वह सामुदायिक जंगल है यानी ऐसा जंगल जहां एक ख़ास समुदाय या जनजाति रहती है और जंगल की देखभाल भी करती है. यहां ईदू मिश्मी जनजाति के लोग रहते हैं, ये जंगल ही उनका घर है. इस प्रोजेक्ट के आने के बाद वो कहां जाएंगे? इसका ज़िक्र किसी योजना में नहीं है.
प्रोजेक्ट की कहानी क्या है?
ये प्रोजेक्ट इटालिन हाइड्रो-पावर प्रोजेक्ट लिमिटेड, जिंदल पावर लिमिटेड और अरुणाचल प्रदेश के हाइड्रोपावर विभाग का ज्वाइंट वेंचर है. साल 2008 में इस प्रोजेक्ट को सबसे पहले प्रस्तावित किया गया. इस प्रोजक्ट में दिबांग घाटी की दो नदियों टैंगोन और दरी पर बड़े डैम बनने हैं.
इस प्रोजेक्ट की लागत तक़रीबन 25 हज़ार करोड़ रुपए है. इसके लिए 1,165 हैक्टेयर जंगल की ज़मीन भी चाहिए होगी. ये देश के सबसे प्राचीनतम जंगल हैं जिनमें से 2.7 लाख पेड़ काटे जाएंगे.
जुलाई 2013 और अप्रैल 2014 में इस प्रोजेक्ट को एफ़एसी ने ख़ारिज कर दिया था लेकिन सितंबर 2014 को पहली बार इस प्रोजेक्ट को एफ़एसी ने सहमति दी.
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