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चीन: मनमोहन सिंह की राह पर चल रहे हैं पीएम मोदी?
- Author, सिंधुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मशहूर अमरीकी राजनीतिज्ञ ह्यूबर्ट एच. हंफ़्री ने कहा था कि विदेश नीति, घरेलू नीति का ही विस्तार है.
आज जब लद्दाख़ में भारत और चीन के बीच कई दिनों से तनाव की स्थिति क़ायम है, सत्ताधारी मोदी सरकार और उसकी विदेश नीति पर बहस भी जारी है.
अपनी घरेलू नीति में अति-राष्ट्रवाद और आक्रामक रवैये वाली मोदी सरकार क्या चीन के साथ भी यही रुख़ अपनाती है?
साल 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने चीन को उसकी 'विस्तारवादी की मानसिकता' के प्रति चेताया था.
नरेंद्र मोदी के इस भाषण से भारतीय मीडिया में यह धारणा बनी कि बीजेपी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मामलों में सख़्त रवैया अपनाएगी, ख़ासकर चीन के मामले में.
अभी कैसे हालात हैं?
भारत-चीन सीमा पर मई से तनाव की स्थिति बरक़रार है. पहले उत्तरी सिक्किम के नाकू ला सेक्टर में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई और अब लद्दाख़ में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने हैं.
पिछले दिनों सोशल मीडिया में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच कथित हिंसा से जुड़ी कुछ तस्वीरें और वीडियो ख़ूब सर्कुलेट हुए. हालांकि भारतीय सेना ने इन्हें प्रामाणिक नहीं माना है.
इस बीच भारत में #BoyCottChina का ट्रेंड भी ज़ोर पकड़ रहा है.
रैमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और भारतीय इनोवेटर सोनम वांगचुक लगातार वीडियो बनाकर चीन का बहिष्कार करने की अपील कर रहे हैं. इधर, विपक्षी कांग्रेस पार्टी केंद्र सरकार पर स्थिति स्पष्ट न करने और चुप्पी साधने का आरोप लगा रही है.
इतना कुछ होने के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने सोमवार को कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार भारत की सीमाओं को लेकर कोई समझौता नहीं करेगी.
सीएनएन-आईबीएन न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में शाह ने कहा, "एलएसी पर तनातनी को कोई सार्वभौम राष्ट्र हल्के में नहीं ले सकता. कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर हमारी बातचीत जारी है. लेकिन मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि नरेंद्र मोदी सरकार हमारी सीमाओं को लेकर कोई समझौता नहीं करेगी और हम इसके लिए अडिग खड़े रहेंगे."
हालांकि ये पूछे जाने पर कि क्या चीनी सैनिक भारतीय सीमा में घुस आए हैं, शाह ने कोई जवाब नहीं दिया.
भारत सरकार की चुप्पी
क़रीब महीने भर से चीन और भारत में सीमा पर अलग-अलग जगहों पर टकराव जारी है. लेकिन इस बारे में न तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल का कोई बयान आया है और न ही चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ (सीडीस) बिपिन रावत का. रक्षा मंत्रालय या पीएमओ ने भी आधिकारिक रूप से इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा है.
हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ दिनों पहले तीनों सेनाओं के प्रमुख, अजित डोभाल और बिपिन रावत के साथ एक बैठक ज़रूर की थी. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी तीनों सेनाओं के प्रमुख, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ के साथ बैठक की थी.
हालांकि इन बैठकों में क्या बातें हुईं, इस बारे में अब तक कुछ भी सार्वजनिक नहीं है.
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य लेफ़्टिनेंट जनरल एसएल नरसिम्हन ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा है कि इस बार चीनी पक्ष 2017 के डोकलाम विवाद के समय से कहीं ज़्यादा आक्रामक मालूम हो रहा है, हालांकि उसके सैनिकों की संख्या इस बार उतनी ज़्यादा नहीं लगती.
'भारत के पास बहुत सीमित विकल्प'
रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी का मानना है कि चीन के मामले में भारत अपनी आक्रामकता नहीं दिखा पाता क्योंकि चीन उससे लगभग हर क्षेत्र में कहीं ज़्यादा मज़बूत स्थिति में है. फिर चाहे वो सामरिक और भौगोलिक रूप से हो या इंफ़्रास्ट्रक्चर के मामले में.
उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि बिना समझौते के भारत इस विवाद का हल नहीं ढूंढ सकता और आक्रामक रवैये के ज़रिए तो बिल्कुल भी नहीं. वैसे भी चीन अमूमन भारत पर भारी ही पड़ता है. अगर आप डोकलाम विवाद को याद करें तो लगभग दो महीने तक आमने-सामने रहने के बाद भी चीन ने उस इलाक़े में कई हैलीपैड और इमारतें बना ही ली थीं. डोकलाम विवाद में चीन भारत के सामने झुका हो, ऐसा नहीं हुआ था."
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार डोकलाम पर विवाद इसलिए भी कम हो गया था क्योंकि चीन सितंबर में ब्रिक्स सम्मेलन की मेज़बानी करने वाला था.
उस समय चीनी राजदूत माओ सिवेई ने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा था कि दोनों देश डोकलाम को लेकर अस्पष्ट बयान जारी करने पर इसलिए सहमत हुए थे क्योंकि मुद्दा संवेदनशील था और कोई भी पक्ष कमज़ोर नज़र आने को तैयार नहीं था.
सिवेई ने दावा किया था कि भारत ने पहले अपने सैनिक हटाए थे और चीन ने सड़क का निर्माण बाद में रोका था.
डोकलाम विवाद के समय तत्कालीन भारतीय रक्षामंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि चीन अब भारत को 1962 वाला भारत न समझे.
कांग्रेस से कितनी अलग बीजेपी?
क्या तब से अब तक चीन के प्रति भारत की रणनीति में कोई फ़र्क़ नज़र आया है? यूपीए सरकार पर 'कमज़ोर चीन नीति' अपनाने का आरोप लगाने वाली बीजेपी सरकार क्या ख़ुद भी उसी राह पर चलती नज़र आ रही है? चीन के प्रति जो आक्रामकता चुनावी भाषणों और बयानों में दिखती है वो क्या ज़मीनी कार्रवाई में तब्दील हो पाती है?
इस सवालों के जवाब में राहुल बेदी कहते हैं, "भारत एक संसदीय प्रणाली वाला लोकतांत्रिक देश है जहां नेताओं का मक़सद हर पाँच साल में चुनाव जीतना होता है. ऐसे में चुनाव से पहले बढ़ा-चढ़ाकर भाषण देना कोई असामान्य बात नहीं है. चुनाव जीतने के बाद भी सरकारें अपने कार्यकाल और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर ही फ़ैसले करती हैं. चीन में ऐसी स्थिति नहीं है. वहां सरकारें एक दूरगामी लक्ष्य लेकर चलती हैं और उसी हिसाब से अपनी रणनीति तय करती हैं."
हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि डोकलाम विवाद के समय तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा में कहा था कि विवाद सुलझाने का एकमात्र रास्ता कूटनीतिक वार्ता है.
सुषमा स्वराज ने चीन के साथ युद्ध की अटकलों को ख़ारिज़ कर दिया था और कहा था कि चीन का भारत की आर्थिक तरक़्क़ी को बढ़ावा देने में योगदान है.
वेलिंगटन (न्यूज़ीलैंड) की विक्टोरिया यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशन्स के सीनियर लेक्चरर मंजीत एस. परसेदी ने भी अपने रिसर्च पेपर 'Modi's China Policy-Change or Continuity?' में लिखा है कि स्पष्ट बहुमत से आम चुनाव जीतने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन नीति, यूपीए की चीन नीति को आगे ले जाती है.
मंजीत एस. परदेसी लिखते हैं, "पीएम मोदी की चीन नीति द्विपक्षीय और बहुपक्षीय, दोनों स्तरों पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नीति का ही अनुसरण है. पिछले कुछ वर्षों में भारत चीन के नेतृत्व वाले तीन अंतरराष्ट्रीय संगठनों का सदस्य बना है: न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी या ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक), एशियन इंफ़्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) और शांघाई कॉर्पोरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (SCO)."
हालांकि परदेसी ये भी कहते हैं कि भारत के इन संगठनों से जुड़ने का मतलब ये नहीं कि उसने चीन को एशिया का नेता मान लिया है. भारत ने चीन की 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना का कभी समर्थन नहीं किया और इसे लेकर हमेशा सशंकित रहा है.
'मोदी सरकार ने नीति बदली है'
वहीं, पूर्व भारतीय राजनायिक और चीन मामलों के विशेषज्ञ फुनचुक स्टॉबडन का कहना है कि मोदी सरकार ने पहले की सरकारों की तुलना में सीमा की सुरक्षा को लेकर ज़्यादा सख़्ती दिखाई है.
उन्होंने कहा कि सरकार के आने के बाद भारत-चीन सीमा पर गश्त बढ़ा दी गई है, जिसे 'एग्रेसिव पेट्रोलिंग' कहा जाता है.
स्टॉबडन का कहना है कि मोदी सरकार ने सीमा पर सख़्ती दिखाने के साथ ही चीन के साथ आपसी भरोसा पैदा करने की कोशिशें भी की हैं.
वो कहते हैं, "डोकलाम विवाद के बाद अगले ही साल 2018 में वुहान समिट का होना अभूतपूर्व था. इसके बाद महाबलीपुरम में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ जो अनौपचारिक सम्मेलन हुआ, वो भी अपने-आप में महत्वपूर्ण था. इस तरह की शुरुआत मोदी सरकार में ही हुई. यूपीए के समय में ये एप्रोच नहीं था."
हालांकि फुनचुक स्टॉबडन भी ये दुहराते हैं कि चीन के साथ विवाद सुझलाने के लिए भारत के पास कूटनीतिक बातचीत और समझौता का ही विकल्प है.
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