मशहूर अमरीकी राजनीतिज्ञ ह्यूबर्ट एच. हंफ़्री ने कहा था कि विदेश नीति, घरेलू नीति का ही विस्तार है.
आज जब लद्दाख़ में भारत और चीन के बीच कई दिनों से तनाव की स्थिति क़ायम है, सत्ताधारी मोदी सरकार और उसकी विदेश नीति पर बहस भी जारी है.
अपनी घरेलू नीति में अति-राष्ट्रवाद और आक्रामक रवैये वाली मोदी सरकार क्या चीन के साथ भी यही रुख़ अपनाती है?
साल 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने चीन को उसकी 'विस्तारवादी की मानसिकता' के प्रति चेताया था.
नरेंद्र मोदी के इस भाषण से भारतीय मीडिया में यह धारणा बनी कि बीजेपी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मामलों में सख़्त रवैया अपनाएगी, ख़ासकर चीन के मामले में.
अभी कैसे हालात हैं?
भारत-चीन सीमा पर मई से तनाव की स्थिति बरक़रार है. पहले उत्तरी सिक्किम के नाकू ला सेक्टर में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई और अब लद्दाख़ में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने हैं.
पिछले दिनों सोशल मीडिया में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच कथित हिंसा से जुड़ी कुछ तस्वीरें और वीडियो ख़ूब सर्कुलेट हुए. हालांकि भारतीय सेना ने इन्हें प्रामाणिक नहीं माना है.
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इस बीच भारत में #BoyCottChina का ट्रेंड भी ज़ोर पकड़ रहा है.
रैमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और भारतीय इनोवेटर सोनम वांगचुक लगातार वीडियो बनाकर चीन का बहिष्कार करने की अपील कर रहे हैं. इधर, विपक्षी कांग्रेस पार्टी केंद्र सरकार पर स्थिति स्पष्ट न करने और चुप्पी साधने का आरोप लगा रही है.
इतना कुछ होने के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने सोमवार को कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार भारत की सीमाओं को लेकर कोई समझौता नहीं करेगी.
सीएनएन-आईबीएन न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में शाह ने कहा, "एलएसी पर तनातनी को कोई सार्वभौम राष्ट्र हल्के में नहीं ले सकता. कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर हमारी बातचीत जारी है. लेकिन मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि नरेंद्र मोदी सरकार हमारी सीमाओं को लेकर कोई समझौता नहीं करेगी और हम इसके लिए अडिग खड़े रहेंगे."
हालांकि ये पूछे जाने पर कि क्या चीनी सैनिक भारतीय सीमा में घुस आए हैं, शाह ने कोई जवाब नहीं दिया.
भारत सरकार की चुप्पी
क़रीब महीने भर से चीन और भारत में सीमा पर अलग-अलग जगहों पर टकराव जारी है. लेकिन इस बारे में न तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल का कोई बयान आया है और न ही चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ (सीडीस) बिपिन रावत का. रक्षा मंत्रालय या पीएमओ ने भी आधिकारिक रूप से इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा है.
हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ दिनों पहले तीनों सेनाओं के प्रमुख, अजित डोभाल और बिपिन रावत के साथ एक बैठक ज़रूर की थी. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी तीनों सेनाओं के प्रमुख, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ के साथ बैठक की थी.
हालांकि इन बैठकों में क्या बातें हुईं, इस बारे में अब तक कुछ भी सार्वजनिक नहीं है.
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य लेफ़्टिनेंट जनरल एसएल नरसिम्हन ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा है कि इस बार चीनी पक्ष 2017 के डोकलाम विवाद के समय से कहीं ज़्यादा आक्रामक मालूम हो रहा है, हालांकि उसके सैनिकों की संख्या इस बार उतनी ज़्यादा नहीं लगती.
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'भारत के पास बहुत सीमित विकल्प'
रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी का मानना है कि चीन के मामले में भारत अपनी आक्रामकता नहीं दिखा पाता क्योंकि चीन उससे लगभग हर क्षेत्र में कहीं ज़्यादा मज़बूत स्थिति में है. फिर चाहे वो सामरिक और भौगोलिक रूप से हो या इंफ़्रास्ट्रक्चर के मामले में.
उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि बिना समझौते के भारत इस विवाद का हल नहीं ढूंढ सकता और आक्रामक रवैये के ज़रिए तो बिल्कुल भी नहीं. वैसे भी चीन अमूमन भारत पर भारी ही पड़ता है. अगर आप डोकलाम विवाद को याद करें तो लगभग दो महीने तक आमने-सामने रहने के बाद भी चीन ने उस इलाक़े में कई हैलीपैड और इमारतें बना ही ली थीं. डोकलाम विवाद में चीन भारत के सामने झुका हो, ऐसा नहीं हुआ था."
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार डोकलाम पर विवाद इसलिए भी कम हो गया था क्योंकि चीन सितंबर में ब्रिक्स सम्मेलन की मेज़बानी करने वाला था.
उस समय चीनी राजदूत माओ सिवेई ने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा था कि दोनों देश डोकलाम को लेकर अस्पष्ट बयान जारी करने पर इसलिए सहमत हुए थे क्योंकि मुद्दा संवेदनशील था और कोई भी पक्ष कमज़ोर नज़र आने को तैयार नहीं था.
सिवेई ने दावा किया था कि भारत ने पहले अपने सैनिक हटाए थे और चीन ने सड़क का निर्माण बाद में रोका था.
डोकलाम विवाद के समय तत्कालीन भारतीय रक्षामंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि चीन अब भारत को 1962 वाला भारत न समझे.
कांग्रेस से कितनी अलग बीजेपी?
क्या तब से अब तक चीन के प्रति भारत की रणनीति में कोई फ़र्क़ नज़र आया है? यूपीए सरकार पर 'कमज़ोर चीन नीति' अपनाने का आरोप लगाने वाली बीजेपी सरकार क्या ख़ुद भी उसी राह पर चलती नज़र आ रही है? चीन के प्रति जो आक्रामकता चुनावी भाषणों और बयानों में दिखती है वो क्या ज़मीनी कार्रवाई में तब्दील हो पाती है?
इस सवालों के जवाब में राहुल बेदी कहते हैं, "भारत एक संसदीय प्रणाली वाला लोकतांत्रिक देश है जहां नेताओं का मक़सद हर पाँच साल में चुनाव जीतना होता है. ऐसे में चुनाव से पहले बढ़ा-चढ़ाकर भाषण देना कोई असामान्य बात नहीं है. चुनाव जीतने के बाद भी सरकारें अपने कार्यकाल और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर ही फ़ैसले करती हैं. चीन में ऐसी स्थिति नहीं है. वहां सरकारें एक दूरगामी लक्ष्य लेकर चलती हैं और उसी हिसाब से अपनी रणनीति तय करती हैं."
हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि डोकलाम विवाद के समय तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा में कहा था कि विवाद सुलझाने का एकमात्र रास्ता कूटनीतिक वार्ता है.
सुषमा स्वराज ने चीन के साथ युद्ध की अटकलों को ख़ारिज़ कर दिया था और कहा था कि चीन का भारत की आर्थिक तरक़्क़ी को बढ़ावा देने में योगदान है.
वेलिंगटन (न्यूज़ीलैंड) की विक्टोरिया यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशन्स के सीनियर लेक्चरर मंजीत एस. परसेदी ने भी अपने रिसर्च पेपर 'Modi's China Policy-Change or Continuity?' में लिखा है कि स्पष्ट बहुमत से आम चुनाव जीतने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन नीति, यूपीए की चीन नीति को आगे ले जाती है.
मंजीत एस. परदेसी लिखते हैं, "पीएम मोदी की चीन नीति द्विपक्षीय और बहुपक्षीय, दोनों स्तरों पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नीति का ही अनुसरण है. पिछले कुछ वर्षों में भारत चीन के नेतृत्व वाले तीन अंतरराष्ट्रीय संगठनों का सदस्य बना है: न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी या ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक), एशियन इंफ़्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) और शांघाई कॉर्पोरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (SCO)."
हालांकि परदेसी ये भी कहते हैं कि भारत के इन संगठनों से जुड़ने का मतलब ये नहीं कि उसने चीन को एशिया का नेता मान लिया है. भारत ने चीन की 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना का कभी समर्थन नहीं किया और इसे लेकर हमेशा सशंकित रहा है.
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'मोदी सरकार ने नीति बदली है'
वहीं, पूर्व भारतीय राजनायिक और चीन मामलों के विशेषज्ञ फुनचुक स्टॉबडन का कहना है कि मोदी सरकार ने पहले की सरकारों की तुलना में सीमा की सुरक्षा को लेकर ज़्यादा सख़्ती दिखाई है.
उन्होंने कहा कि सरकार के आने के बाद भारत-चीन सीमा पर गश्त बढ़ा दी गई है, जिसे 'एग्रेसिव पेट्रोलिंग' कहा जाता है.
स्टॉबडन का कहना है कि मोदी सरकार ने सीमा पर सख़्ती दिखाने के साथ ही चीन के साथ आपसी भरोसा पैदा करने की कोशिशें भी की हैं.
वो कहते हैं, "डोकलाम विवाद के बाद अगले ही साल 2018 में वुहान समिट का होना अभूतपूर्व था. इसके बाद महाबलीपुरम में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ जो अनौपचारिक सम्मेलन हुआ, वो भी अपने-आप में महत्वपूर्ण था. इस तरह की शुरुआत मोदी सरकार में ही हुई. यूपीए के समय में ये एप्रोच नहीं था."
हालांकि फुनचुक स्टॉबडन भी ये दुहराते हैं कि चीन के साथ विवाद सुझलाने के लिए भारत के पास कूटनीतिक बातचीत और समझौता का ही विकल्प है.
कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले
बीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल
बाीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.