हिमाचल: बिंदल के इस्तीफ़े से बीजेपी कमज़ोर होगी या मज़बूत

    • Author, अश्विनी शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, शिमला

पाँच बार बीजेपी के विधायक रह चुके और हिमाचल बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल के लिए मंगलवार की शुरुआत वैसा थी जैसी आम दिनों में होती है.

पार्टी ऑफ़िस दीप कमल में उस दिन भी सबकुछ वैसा ही था, जैसा आमतौर पर होता है. सब कुछ पहले से तय कार्यक्रम के मुताबिक़ चल रहा था.

एक के बाद एक वीडियों कॉन्फ्रेंस. बीजेपी के ज़िलास्तरीय यूनिट के साथ एक के बाद दूसरी और दूसरी के बाद तीसरी मीटिंग हो रही थी. कार्यकर्ता और फ्रंट पर रहकर काम करने वाले नेता 30 मई के लिए योजनाओं पर चर्चा कर रहे थे.

उन्होंने अपनी पार्टी के सदस्यों को क़रीब 10 बजे सुबह संबोधित किया.

अपने संबोधन में उन्होंने कहा, "30 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के एक साल पूरे हो रहे हैं. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने हमें विस्तृत प्रोग्राम दिया है. यह प्लान देशभर में वर्चुअल रैली और लाइव बातचीत का है. सोशल मीडिया और ऑनलाइन माध्यम से यह किया जाना है. हम चाहते हैं कि यह एक बेहद सफल आयोजन साबित हो. यह वो मौक़ा है जब हमें मोदी के दूसरे कार्यकाल की सफलताओं को व्यापक तौर पर उजागर करना है."

उनका यह संबोधन क़रीब डेढ़ घंटे चला और सुबह 11 बजकर 35 मिनट पर समाप्त हुआ.

इसके तुरंत बाद ही उनके पास एक रिकॉर्डेड वीडियो मैसेज आया और एक प्रेस नोट भी. जो मीडिया के लिए तैयार किया गया था.

कुछ महीने पहले ही बीजेपी ने बिंदल को पदभार दिया था. हालाँकि उन्हें इस बात का अंदाज़ा तक नहीं था कि वहाँ से दूर दिल्ली स्थित राष्ट्रीय कार्यालय में उन्हें लेकर क्या कुछ चल रहा है.

कुछ ऐसा जिससे बतौर बीजेपी राज्य प्रमुख उनके भाग्य का फ़ैसला होने वाला है.

पार्टी ऑफ़िस में कोई नहीं जानता था कि इसके बाद बिंदल और पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं के बीच क्या कुछ हुआ.

क़रीब दो बजे तक बिंदल राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को अपना इस्तीफ़ा सौंपने के लिए उस पर हस्ताक्षर कर चुके थे. उन्होंने अपने मीडिया सहयोगियों को एक वीडियो संदेश जारी करके इस्तीफ़े की सूचना देने के लिए भी कह दिया था.

वहीं दिल्ली में जेपी नड्डा लगातार सक्रिय बने हुए थे. उन्होंने उनका इस्तीफ़ा स्वीकार किया और उन्हें जवाब में लिखा कि आने वाले कुछ घंटों में पार्टी उन्हें अपना फ़ैसला बता देगी.

अब, यह स्पष्ट हो गया है कि बिंदल ने ना तो स्वेच्छा से इस्तीफ़ा दिया और ना ही यह नैतिकता के आधार पर दिया गया इस्तीफ़ा था. (जैसा कि वो पहले दावा कर रहे थे.)

इस तूफ़ान के आने से पहले एक ऑडियो क्लिप सामने आई थी जिसमें कथित रूप से हेल्थ सर्विस के डायरेक्टर डॉ. अजय कुमार गुप्ता को पांच लाख रुपए के फाइनेंशियल कंसिडरेशन (वित्तीय विचार) के बारे में बात करते सुना गया था.

यह बातचीत एक व्यापारी के साथ थी, जो कि पीपीई किट्स जैसी स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी ज़रूरी चीज़ों की सप्लाई स्वास्थ्य विभाग को करता था. इस व्यापारी के बिंदल के साथ घनिष्ठ संबंध थे, इसके अलावा उनके बेटे भी सोलन में एक डायग्नोस्टिक सेंटर चलाते हैं. सोलन बिंदल का होम-टाउन है.

यह ऑडियो क्लिप जब मुख्यमंत्री के पास पहुंची तो विजिलेंस और एंटी करप्शन ब्यूरो ने डॉ. गुप्ता को 20 मई को गिरफ़्तार कर लिया गया. शीर्ष सरकारी अधिकारियों का कहना है कि कस्टडी में लिए जाने के एक दिन पहले भी बिंदल और डॉ. गुप्ता की मुलाक़ात हुई थी.

भ्रष्टाचार का ये मामला सीधे तौर पर कोविड19 में सुरक्षाकर्मचारियों के लिए कवच के तौर पर इस्तेमाल होने वाले पीपीई किट से जुड़ा हुआ है.

पीपीई किट की उपलब्धता को लेकर पहले भी काफ़ी विवाद सामने आ चुका है और ऐसे में बीजेपी शासित किसी राज्य में पीपीई से जुड़े भ्रष्टाचार के इस मामले की वजह से परिस्थिति काफ़ी तनावपूर्ण हो गई.

जिसकी गर्मी पार्टी के आला नेताओं ने भी महसूस की. इसके साथ ही यह राज्य में साफ़ छवि वाले मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के लिए भी एक ख़तरा था.

ठाकुर ने इस मसले पर एक फ़ैसला किया और विजिलेंस टीम को स्वतंत्र तरीक़े से बिना किसी दबाव के जाँच करने को कहा. दरअसल, कांग्रेस पार्टी की ओर से बिंदल और उस व्यापारी के संबंधों को लेकर निशाना साधा जाना शुरू हो गया था.

अंदरुनी सूत्रों का कहना है कि यह ऐसा मामला नहीं था जिस पर पार्टी के आला कमान शांत बैठते. यह भ्रष्टाचार का मामला था, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था. भले ही यह पार्टी के सदस्य से जुड़ा ही क्यों ना हो.

इसी बीच बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने दिल्ली को सख़्त लहज़े में एक पत्र भेज दिया. यह पत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी भेजा गया. जिसमें उन्होंने हेल्थ सर्विस से जुड़े इस भ्रष्टाचार को लेकर अपना दर्द ज़ाहिर किया.

उन्होंने इस पत्र में लिखा, "यह कोई अपराध नहीं बल्कि पाप है. यह वाकई शर्मनाक है, ख़ासतौर पर उस राज्य के लिए जहाँ कोविड फंड के लिए मनरेगा के तहत काम करने वाली एक मज़दूर पांच हज़ार रुपए का दान देती है. वही पैसा एक ऐसा शख़्स खा जाता है जिस पर लोगों की ज़िंदगी बचाने की ज़िम्मेदारी है."

इसके अलावा पूर्व बीजेपी मंत्री मोहिंदर सोफ़त ने भी प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर इस भ्रष्टाचार में बीजेपी के एक नेता के शामिल होने की शिकायत की है. (हालांकि उन्होंने इसमें कहीं भी किसी के नाम का ज़िक्र नहीं किया है.)

बहुत से लोगों का मानना है कि मोदी ने इस मामले पर गंभीरता दिखाई और फिर यही संदेश मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को भेजा कि वो भ्रष्टाचार के मामले पर किसी भी तरह की नरमी ना बरतें.

डॉ. बिंदल के इस्तीफ़े के मायने

लेकिन अब सवाल यह उठता है कि इस पूरे प्रकरण में बिंदल कहां से आ गए? 'नैतिक आधार' पर दिए गए इस इस्तीफ़े के मायने क्या हैं? क्या उन्होंने यह इस्तीफ़ा मुख्यमंत्री के दबाव के बाद दिया या फिर विपक्ष के दबाव में?

अभी तक जो बिंदल ने कहा है, वो कुछ इस तरह है.

"कुछ तत्व बीजेपी को फँसाने के लिए झूठे आरोप लगा रहे हैं और डॉ गुप्ता की गिरफ़्तारी के साथ इसे जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. इस संगठन के प्रमुख के रूप में उन्होंने नैतिक आधार पर इस्तीफ़ा देने का निर्णय लिया है."

सीपीएम के विधायक राकेश सिंह यह स्वीकार करते हैं कि अभी तक किसी भी विपक्षी नेता ने, या फिर मीडिया ने भ्रष्टाचार के मामले में बिंदल का नाम नहीं जोड़ा है.

तो ऐसे में उन्होंने इस बात को ख़ुद से ही अपने ऊपर क्यों ले लिया और इससे पहले कि उनकी संलिप्तता की पुष्टि होती, उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया. नैतिक ज़िम्मेदारी उस शख़्स की बनती है जो या तो सरकार में हो या फिर सरकार का नेतृत्व कर रहा हो.

वो आगे कहते हैं "हालाँकि यह कोई साधारण सा मामला नहीं है. कोविड19 फंड की बर्बादी हुई है. ज़रूरी चीज़ों की ख़रीद में भ्रष्टाचार हुआ है और साथ ही इस सारी परिस्थिति को बहुत ही ग़लत तरीक़े से डील किया गया है. कोविड19 के मामले हर रोज़ बढ़ रहे हैं. लोगों की ज़िंदगी ख़तरे में हैं. बावजूद इसके कुछ लोग पैसे बनाने की सोच रहे हैं."

इस मसले पर कांग्रेस की अपनी राय है.

विपक्ष के नेता मुकेश अग्निहोत्री का कहना है, "अगर बिंदल ने हेल्थ डिपार्टमेंट की ख़रीद में कुछ भी नहीं किया है और डॉ. गुप्ता की गिफ़्तारी से उनका कोई लेना-देना नहीं है तो उन्होंने इस्तीफ़ा क्यों दिया? हमने कभी भी उनका नाम नहीं लिया. हालांकि हमें पता था कि इसमें सत्ता दल के कुछ बड़े नेता शामिल हैं. हमारा स्टैंड स्पष्ट हो गया है. उनकी भूमिका जानने के लिए उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश को जाँच करनी चाहिए."

मुख्यमंत्री ने विपक्ष की निष्पक्ष जाँच को लेकर जताई गई आशंकाओं को ख़ारिज किया है.

मुख्यमंत्री ने कहा कि बिंदल ने नैतिक मूल्यों के आधार पर पार्टी के पद से इस्तीफ़ा दे दिया है और पार्टी ने उनका इस्तीफ़ा स्वीकार कर लिया है.

ठाकुर-बिंदल के बीच घमासान

पूर्व प्रवक्ता बिंदल, साल 2000 में हुए राज्य विधानसभा के चुनाव से पहले तक ख़ुद भी सोलन में एक मेडिकल प्रैक्टिशनर थे.

हालाँकि उनका राजनीतिक सफ़र बहुत सहज और सुगम नहीं रहा. वो अक्सर विवादों में रहे. सोलन नगर समिति के अध्यक्ष के तौर पर उन्हें सतर्कता आयोग की जाँच का सामना करना पड़ा.

हालाँकि कुछ महीने पहले ही राज्य के मुख्यमंत्री ने इस मामले को वापस ले लिया था.

इसके बाद भी वो बीजेपी के जनरल सेक्रेटरी बने रहे लेकिन उनकी प्रतिबद्धता धूमल से हटकर जेपी नड्डा की ओर हो गई. जिन्हें साल 2017 के विधानसभा चुनावों से पहले भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखा जा रहा था.

हालांकि जब बीजेपी साल 2017 में सत्ता में आई तो उनके लिए परिस्थितियां उस तरह से नहीं बनीं और जय राम ठाकुर मुख्यमंत्री बने.

बिंदल के सोलन से विधायक चुने जाने में पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की अहम भूमिका मानी जाती है.

बिंदल धूमल के क़रीबी माने जाने रहे हैं. चुनाव में शांता कुमार के क़रीबी माने जाने वाले पूर्व मंत्री मोहिन्दर सोफट की जगह बिंदल को टिकट दिया गया था.

लेकिन ज़मीन खरीदने के मामले में धाँधली के आरोपों के बाद बिंदल ने साल 2011-12 में उनके कैबिनेट से इस्तीफ़ा दे दिया था. वो धूमल कैबिनेट में स्वास्थ्य मंत्री के पद पर थे.

ठाकुर ने बिंदल की हाई प्रोफाइल छवि और उनके साथ जुड़े विवादों को देखते हुए उन्हें कैबिनेट में तो शामिल नहीं किया लेकिन उन्हें स्पीकर का पद ज़रूर दिया. लेकिन बिंदल इससे ख़ुश नहीं थे.

जनवरी 2020 में उन्होंने स्पीकर के पद से इस्तीफ़ा दे दिया और खुद को बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर काम करने के लिए आग्रह किया. यह पद जेपी नड्डा के अधीन था.

यह मुख्यमंत्री की इच्छा के खिलाफ़ भी था क्योंकि शुरू में बिंदल ने मंत्रिमंडल में शामिल होने की पैरवी की थी क्योंकि मंत्रिमंडल में अभी भी तीन रिक्तियां हैं.

बिंदल धीरे-धीरे खुद को मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल करने की कोशिश कर रहे थे.

बिंदल का इस्तीफ़ा देना ऐसे समय में बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि विपक्ष इसे एक मुद्दे के तौर पर ले रही थी और इससे जय राम ठाकुर पर भी निशाना साधा जाना शुरू कर दिया था.

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने निष्पक्ष जाँच की मांग करते हुए कहा है कि बिंदल का इस्तीफ़ा बीजेपी की आंतरिक राजनीति का परिणाम है और यह पावर-गेम से जुड़ा हुआ है.

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