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कोरोना काल में भारत की संसद मौन क्यों है?- नज़रिया
- Author, अनिल जैन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
इंटरनेशनल पार्लियामेंट्री यूनियन (आईपीयू) एक ऐसी वैश्विक संस्था है, जो दुनिया भर के देशों की संसदों के बीच संवाद और समन्वय का एक मंच है.
कोरोना महामारी के इस संकटकाल में दुनिया के तमाम छोटे-बड़े देशों की संसदीय गतिविधियों का ब्योरा इस संस्था की वेबसाइट पर उपलब्ध है.
लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानी भारत की संसदीय गतिविधि का कोई ब्योरा आपको वहाँ नहीं मिलेगा. ज़ाहिर है, इस कोरोना काल में भारत की संसद पूरी तरह निष्क्रिय रही है और अब भी उसके सक्रिय होने के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं.
हालाँकि, संसद का बजट सत्र जनवरी में 31 तारीख़ को शुरू हो गया था, जो 23 मार्च तक चला. पूरे सत्र के दौरान 23 बैठकों में कुल 109 घंटे और 23 मिनट कामकाज हुआ था.
लेकिन इस दौरान दोनों सदनों में कोरोना संकट पर कोई चर्चा नहीं हुई थी, जबकि कोरोना संक्रमण जनवरी महीने में ही भारत में दस्तक दे चुका था.
अलबत्ता सत्र का आकस्मिक समापन निर्धारित समय से 10 दिन पहले ही कोरोना संकट के नाम पर कर दिया गया, संसद को तय कार्यक्रम के मुताबिक़ तीन अप्रैल तक चलना था.
उम्मीद जताई जा रही थी कि सरकार कोरोना संकट से निबटने के लिए आवश्यक क़दम उठाने के बाद संसद का एक विशेष संक्षिप्त सत्र आयोजित करेगी, हालाँकि ऐसा करने की कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है.
संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक़ एक वर्ष में संसद के तीन सत्र होना अनिवार्य है और किन्हीं दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए.
विपक्षी सांसदों की गुज़ारिश
इसके बावजूद मानवीय आपदा और लोकतांत्रिक तकाजे के तहत अपेक्षा की जा रही थी कि सरकार संवैधानिक प्रावधान या तकनीकी पेंच का सहारा नहीं लेगी और संसद का विशेष सत्र बुलाएगी,
लेकिन इस दिशा में सरकार ने न तो अपनी ओर से कोई दिलचस्पी दिखाई और न ही इस बारे में विपक्षी सांसदों की मांग को कोई तवज्जो दी.
कोई कह सकता है कि सोशल या फिजिकल डिस्टेंसिंग बनाए रखने की ज़रूरत की वजह से संसद का कामकाज चल पाना संभव नहीं है लेकिन यह दलील बेदम है, क्योंकि इसी कोरोना काल में दुनिया के तमाम देशों में सांसदों ने अपने-अपने देश की संसद में अपनी जनता की तकलीफों का मुद्दा उठाया है और उठा रहे हैं.
उन्होंने अपनी सरकारों से कामकाज का हिसाब लिया है और ले रहे हैं.
लॉकडाउन प्रोटोकॉल और फिजिकल डिस्टेंसिंग की अनिवार्यता का ध्यान रखते हुए तमाम देशों में सांसदों की सीमित मौजूदगी वाले संक्षिप्त सत्रों का या वीडियो कांफ्रेंसिंग वाली तकनीक का सहारा लेकर 'वर्चुअल पार्लियामेंट्री सेशन' का आयोजन किया गया है.
कई देशों ने संसद सत्र में सदस्यों की संख्या को सीमित रखा है, तो कुछ देशों में सिर्फ़ संसदीय समितियों की बैठकें ही हो रही हैं.
लेकिन इस सबके विपरीत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में सरकार की जवाबदेही को तय करने वाली संसद अभी तक निष्क्रिय बनी हुई है.
सरकार की दिलचस्पी
संसद अपनी सक्रिय भूमिका निभाए, इसमें सरकार की दिलचस्पी तो नहीं ही है, संसद के दोनों सदनों के मुखिया यानी लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति भी कुछ करते नहीं दिख रहे,
यही वजह है कि विभिन्न मंत्रालयों से संबंधित संसदीय समितियों की बैठकें भी नहीं हो पा रही हैं जबकि इन समितियों में सीमित संख्या में ही सदस्य होते हैं.
संसद के प्रति सरकार यानी प्रधानमंत्री की उदासीनता को देखते हुए सत्तारूढ़ दल के सांसदों ने भी अपनी अध्यक्षता वाली संसदीय समितियों की बैठक आयोजित करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.
गौरतलब है कि भारत में विभिन्न मंत्रालयों से संबंधित 24 स्थायी संसदीय समितियाँ हैं, जिनमें से इस समय 20 समितियों के अध्यक्ष सत्तारूढ़ दल के सांसद हैं.
जिन विपक्षी सांसदों ने अपनी अध्यक्षता वाली समितियों की बैठक वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए बुलाने की पहल की, उन्हें राज्यसभा और लोकसभा सचिवालय ने रोक दिया.
राज्यसभा में कांग्रेस के उप नेता आनंद शर्मा गृह मंत्रालय सें संबंधित मामलों की संसदीय समिति के अध्यक्ष हैं. पिछले दिनों वे चाहते थे कि समिति की बैठक वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए हो, लेकिन राज्यसभा सचिवालय ने इसके लिए मना कर दिया है.
इसी तरह सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष शशि थरूर ने भी अपनी समिति की बैठक वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए कराने की अनुमति मांगी थी, जो लोकसभा सचिवालय से नहीं मिली.
दोनों सदनों के सचिवालयों की ओर से दलील दी गई कि संसदीय समिति की बैठकें गोपनीय होती हैं, लिहाजा वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए बैठक करना नियमों के विरुद्ध है.
ऐसे में सवाल उठता है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर के मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए बैठकें की हैं, पीएम मोदी की पहल पर ही दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के सदस्य देशों के प्रमुखों की वर्चुअल मीटिंग हो चुकी है, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए मामलों की सुनवाई कर रहे हैं, देश के कैबिनेट सचिव अक्सर राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए मीटिंग करते ही हैं, तो फिर संसदीय समिति की बैठक वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए क्यों नहीं हो सकती?
कोरोना के ख़िलाफ़ जंग में जनप्रतिनिधि कहाँ?
एक तरफ सरकार ऐप बनाकर देश के हर नागरिक को उसे डाउनलोड करने का दबाव बना रही है, ताकि तकनीक के ज़रिए कोविड-19 से लड़ा जा सके और दूसरी ओर संसद में तकनीक का इस्तेमाल कर समितियों की बैठक करने से मना किया जा रहा है.
यह स्थिति तब है जब प्रधानमंत्री जीवन के हर क्षेत्र में तकनीक के अधिक से अधिक इस्तेमाल का आग्रह करते हैं.
कुल मिलाकर पिछले दो महीने से देश में जो कुछ हो रहा है, उसका फ़ैसला सिर्फ़ और सिर्फ़ सरकार और नौकरशाह कर रहे हैं.
इतनी बड़ी वैश्विक मानवीय त्रासदी के दौरान देश की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था और सबसे बड़े राजनीतिक मंच यानी संसद को भूमिकाहीन बना दिए जाने की अभूतपूर्व घटना भारत में हो रही है.
संसद और विधान मंडलों के निर्वाचित सदस्यों की बतौर जनप्रतिनिधि आख़िर कोई भूमिका है जबकि देश की बहुत बड़ी आबादी कुप्रबंधन की ज़बरदस्त मार झेल रही है. सरकार को इसके निर्णयों के लिए जवाबदेह बनाने का कोई तरीक़ा देश में नहीं दिख रहा.
ऐसे में जो कोई भी अव्यवस्था, संवेदनहीनता, अमानवीयता से त्रस्त लोगों की आवाज़ उठाने की कोशिश कर रहा है, उसे यह नसीहत देकर चुप कराने की कोशिश की जा रही है कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए.
नेहरू युग के प्रखर संसदविद और समाजवादी विचारक राम मनोहर लोहिया कहा करते थे, जब सड़क सूनी हो जाए तो संसद बांझ और सरकार निरंकुश हो जाती है."
आज कमोबेश यही हालत दिख रही है. भारी बहुमत वाली सरकार तो कई बार संसद को ठेंगे पर रखकर ऐसे मनमाने फ़ैसले करने लगती है, जो कुछ ही समय बाद देश के लिए घातक साबित होते हैं.
अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण
मसलन, पिछले दिनों एक-एक करके छह राज्य सरकारों ने अपने यहाँ श्रम क़ानूनों को तीन साल के लिए स्थगित करने का आनन-फानन में ऐलान कर दिया.
ऐसा सिर्फ़ भाजपा शासित राज्यों ने ही नहीं बल्कि कांग्रेस शासित राज्यों ने भी किया जबकि यह फ़ैसला राज्य सरकारें नहीं कर सकतीं, क्योंकि यह विषय संविधान की समवर्ती सूची में है, लिहाजा श्रम क़ानूनों के मामले में ऐसा कोई फैसला संसद की मंज़ूरी के बगैर हो ही नहीं सकता.
संविधान ने संसद के बनाए क़ानूनों को स्थगित करने या उनमें संशोधन करने का अधिकार राज्यों को नहीं दिया है, लेकिन कोरोना संकट की आड़ में राज्य बेधड़क अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर चले गए.
कोरोना संकट की चुनौतियों का सामना करने और ढहती अर्थव्यवस्था को थामने के लिए घोषित किए गए 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज़ और नए आर्थिक सुधार लागू करने के मामले में भी ऐसा ही हुआ,
दोनों मामलों में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने ऐलान तो कर दिया, लेकिन संसद की मंज़ूरी लेना ज़रूरी नहीं समझा. अमरीका, ब्रिटेन जैसे कई देशों में भी राहत पैकेज घोषित किए गए हैं, लेकिन ऐसा करने के पहले वहाँ की सरकारों ने विपक्षी दलों से सुझाव मांगे और पैकेज को संसद से मंज़ूरी की मुहर लगवाने के बाद घोषित किया.
लेकिन भारत में ऐसा कुछ नहीं हुआ जबकि हमारा संविधान साफ़ कहता है कि सरकार संसद की मंज़ूरी के बगैर सरकारी ख़जाने का एक पैसा भी ख़र्च नहीं कर सकती.
बजट और वित्त विधेयक के पारित होने से सरकार को यही मंज़ूरी मिलती है इसलिए अभी कोई नहीं जानता, यहाँ तक कि शायद कैबिनेट भी नहीं कि 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज में से जो 2 लाख करोड़ रुपए वास्तविक राहत के रूप में तात्कालिक तौर पर ख़र्च हुए हैं, वे 23 मार्च को पारित हुए मौजूदा बजटीय प्रावधानों के अतिरिक्त हैं अथवा उसके लिए अन्य मदों के ख़र्च में कटौती की गई है.
संसद - सुख दुख का आईना
किसी भी लोकतंत्र में संसद और विधानसभाएं जनता के सुख-दुख का आईना होती हैं, लेकिन कोरोना काल में इस आईने पर पर्दा डला हुआ है.
लॉकडाउन लागू होने के बाद देश भर की सड़कों पर बिखरे तरह-तरह के हज़ारों दर्दनाक दृश्यों, घरों में क़ैद ग़रीब लोगों की दुश्वारियों और करोड़ों किसानों की तकलीफ़ों को सुनने के लिए भी देश की सबसे बड़ी पंचायत नहीं बैठी.
जनता के चुने हुए नुमाइंदों को मौक़ा ही नहीं मिल रहा है कि वे अपने-अपने इलाक़े की ज़मीनी हक़ीकत और लोगों की तकलीफ़ों से प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को अवगत करा सकें या उनसे जवाब-तलब कर सकें.
सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि वह इस समय सरकार के कामकाज में कोई दखल देना उचित नहीं समझता.
इस प्रकार भारत दुनिया का शायद एकमात्र ऐसा लोकतांत्रिक देश बन गया, जहाँ कोरोना के संकटकाल में व्यवस्था तंत्र की सारी शक्तियां कार्यपालिका यानी सरकार ने अघोषित रूप से अपने हाथों में ले ली है.
मशहूर इतिहासकार और दार्शनिक युवाल नोहा हरारी ने महज दो महीने पहले ही अपने एक लेख के जरिए भविष्यवाणी की थी कि कोरोना महामारी के चलते दुनिया भर में लोकतंत्र सिकुड़ेगा, और सरकारें अपने आपको सर्वशक्तिमान बनाने के लिए नए-नए रास्ते अपनाएँगी, क्या यह उनकी इस भविष्यवाणी के सच साबित होने की शुरुआत है?
(ये लेखक की निजी राय है)
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