कोरोना वायरस और बाढ़ से एक साथ लड़ना असम के लिए कितना मुश्किल

    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, असम के जोरहाट से, बीबीसी हिंदी के लिए

असम में तेज़ी से सामने आ रहे कोविड-19 के मामलों ने प्रशासन की चिंताएं बढ़ा दी हैं. दरअसल बीते केवल सात दिनों में राज्य में कोरोना वायरस से संक्रमण के 646 नए मामले सामने आए हैं.

इस तरह गुरुवार शाम क़रीब 7 बजे तक असम में कोविड-19 मरीजों की कुल संख्या 856 हो गई है. जबकि बीती 21 मई रात 10 बजे तक प्रदेश में कोरोना मरीजों की संख्या केवल 210 थी. वहीं, असम तथा इसके पड़ोसी राज्य मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में बीते कुछ दिनों से लगातार हो रही तेज बारिश से कई इलाकों में बाढ़ आ गई हैं.

असम राज्य आपदा प्रबंधन विभाग की तरफ से 28 मई शाम साढ़े पांच बजे जारी की गई एक जानकारी के अनुसार प्रदेश के 9 जिलों में 300 गांव बाढ़ के पानी में डूब गए है.

जबकि करीब 2 लाख 94 हजार से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए है. इन बाढ़ प्रभावित जिलों में कुल 91 राहत शिविर खोले गए है जिनमें बेघर हुए करीब 16 हजार लोगों ने शरण ले रखी है. अबतक बाढ़ के पानी में बह जाने से दो लोगों की मौत हो गई है.

ऐसे में राज्य प्रशासन के अधिकारियों के सामने कोरोना वायरस से उत्पन्न स्थिति से निपटने के साथ ही प्रदेश में पहले चरण की आई बाढ़ ने दोहरा संकट खड़ा कर दिया है.

दोहरा संकट

प्रशासनिक अधिकारी फिलहाल बाढ़ की चपेट में आए लोगों को सुरक्षित स्थान पहुंचाने और उनके लिए खाने-पीने की व्यवस्था करने में लगे है.

लेकिन कोविड-19 की स्थिति से निपटने के लिए मौजूद दिशानिर्देश और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे तमाम नियमों के बीच बाढ़ में फंसे लोगों को कैसे और कहां रखा जाएगा तथा उनके लिए इतनी तादाद में शिविरों की व्यवस्था कैसे होगी. ऐसे कई सवाल प्रशासन को समस्या में डाल रहें है.

कोरोना वायरस और बाढ़ जैसी दोहरी चुनौतियों का सामना कर रहे असम के मुख्य सचिव कुमार संजय कृष्णा ने बीबीसी से कहा, "हमने स्थिति से निपटने के लिए कुछ दिन पहले जिला प्रशासन को स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर अर्थात एसओपी जारी की हुई है. उसमें जिला प्रशासन अधिकारी से साफ कहा गया है कि बाढ़ग्रस्त इलाकों में काम करते वक्त सोशल डिसटेंशिग का पूरा ध्यान रखना है. राहत शिविरों में लोगों को सोशल डिसटेंसिंग का पालन करवाना है. बाढ़ग्रस्त इलाकों में पहले से ही ऐसी जगह तलाश करके रखने का निर्देश दिया गया है जहां जरूरत पड़ने पर क्वारंटीन सेंटर बनाया जा सके. इसके साथ ही मेडिकल सुविधाओं से जुड़ी तैयारियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा हैं."

असम में बीते सालों में आई बाढ़ के मुक़ाबले इस बार खासकर कोविड-19 संक्रमण के दौरान आई बाढ़ सरकार के लिए कितनी बड़ी चुनौती है?

इस सवाल का जवाब देते हुए मुख्य सचिव कृष्णा कहते है, "आम तौर पर आने वाली बाढ़ के मुकाबले इस बार हमारे लिए चैलेंज बड़ा है. बाढ़ के समय इतनी बढ़ी संख्या में प्रभावित लोगों को बचाना और उनको सुरक्षित स्थान पहुंचाना आसान काम नहीं है. कोविड-19 गाइडलाइन के तहत लोगों को राहत शिविरों में रखना होगा लिहाज़ा इस बार काफी बड़ी चुनौती है. जिला प्रशासन से कहा गया है कि बचाव कार्य के दौरान लोगों को मास्क पहना कर लाया जाए तथा जो भी कोविड-19 के लिए एडवाइजरी है उसका पूरा पालन किया जाए."

असम में प्रत्येक साल बाढ़ के कारण बड़ी तादाद में जानोमाल का नुकसान होता है. इस बार पहले चरण की बाढ़ में ग्वालपाड़ा जिला सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है. ग्वालपाड़ा जिले में 161 गांव बाढ़ के पानी की चपेट में आ गए है. जबकि 2 लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए है.

ग्वालपाड़ा की जिला उपायुक्त वर्नाली डेका ने बीबीसी से कहा,"जिले में बाढ़ के कारण 56 राहत शिविर खोले गए है जिनमें सोशल डिसटेंसिंग का ध्यान रखते हुए करीब 18 हजार लोगों को रखा गया है. हमने कोविड-19 बीमारी को ध्यान में रखते हुए बाढ़ पीड़ित लोगों के बचाव कार्य के लिए एक अलग नेटवर्क बनाया है. इसके अलावा प्रत्येक रिलीफ कैंप में एक डेसिग्नेटेड कैंप इंचार्ज नियुक्त किया है ताकि वह हमें कैंप में रहने वाले लोगों की क्षमता तथा सोशल डिसटेंसिंग के बारे में लगातार जानकारी देते रहें."

"राहत शिविरों में आए ज्यादातर पुरुष अपने सामान-संपत्ति का ध्यान रखने के लिए घर पर बांस का ऊंचा चांग बनाकर ही रहते है. केवल महिलाएं और बच्चे शिविरों में रह रहें है.इसके लिए हमारी एक अधिकारी भी स्कूलों में बने राहत शिविरों के एक नेटवर्क पर ध्यान रख रही है. अगर किसी राहत शिविर में क्षमता से अधिक लोग आ जाते है तो हम उन्हें दूसरे कैंपो में पहुंचाते है ताकि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन होता रहे."

ग्वालपाड़ा जिला प्रशासन के सामने केवल बाढ़ पीड़ितों को ही राहत शिविरों में पहुंचाने की जिम्मेवारी नहीं है बल्कि सामने आ रहें कोविड-19 के मामलों के बाद उन इलाकों के लोगों को भी क्वारंटीन सेंटर पहुंचाना पड़ रहा है. जिला प्रशासन के अनुसार ग्वालपाड़ा जिले में अब तक कोरोना वायरस से संक्रमण के कुल 17 मामले सामने आ चुके है. जबकि 32 क्वारंटीन सेंटरों में 1154 लोगों की देखभाल की जा रही है.

पहाड़ जैसी चुनौतियां

जिला उपायुक्त डेका कहती है, "बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से तो निपटना होगा ही लेकिन इस बार पूरा बचाव कार्य सोशल डिसटेंसिंग के तहत करना पड़ रहा है. इसके लिए हमारी एक अलग टीम क्वारंटीन सेंटर के नेटवर्क पर काम कर रही है. जिन लोगों को क्वारंटीन के लिए लाया जा रहा है उसकी पूरी व्यवस्था अलग रखी गई है. इस बार की बाढ़ में हमारा काम करने के तरीक बिलकुल अलग है ताकि कोविड-19 की गाइडलाइन का पूरा पालन कर सके. यह निश्चित तौर पर चुनौतियों से भरा काम है."

कोविड-19 और बाढ़ को लेकर सरकार द्वारा किए जा रहे तमाम इंतजामों के बीच कामरूप ग्रामीण जिले के गोरोइमारी राजस्व सर्कल के अंतर्गत आने वाले सरलपाड़ा चर इलाके के लोग बेहद परेशान है. ब्रह्मपुत्र के बीच रेतीले हिस्से में जिसे यहां चर इलाका कहते है, सालों से लोग बसे हुए है. करीब 15 हजार आबादी वाले सरलपाड़ा चर इलाके में बीते सात दिनों से बाढ़ ने तबाही मचा रखी है लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन की तरफ से अबतक उनकी मदद के लिए कोई नहीं आया.

सरलपाड़ा में रहने वाले 35 साल के सलाम अली ने बीबीसी से कहा,"पिछले सात दिनों से हमारे घर बाढ़ के पानी में डूबे हुए है लेकिन सरकार की तरफ से अबतक कोई मदद नहीं मिली है. कोविड-19 बीमारी के कारण हमारी आर्थिक हालत पहले से ही खराब चल रही है और बाढ़ के समय अगर सरकार की तरफ से राहत सामग्री के तौर पर खाने-पीने का समान नहीं मिलेगा तो हमें भूखा रहना होगा. मैंने परिवार के लोगों के लिए बाजार से मास्क खरीदें थे. सरकार से मिल जाते तो मुझे पैसे खर्च करने नहीं पड़ते."

प्रत्येक साल चार इलाकों में ब्रह्मपुत्र से बाढ़ आती है, तो क्या सरकार के लोग आपको अलर्ट नहीं करते? सुरक्षित जगहों पर जाने के लिए नहीं कहते? आप बाढ़ के समय इतने जोखिम वाले इलाके में क्यों रहते है?

इन सवालों का जवाब देते हुए सलाम कहते है, "हम गरीब लोग है. खेती करके और मछलियां पकड़कर जैसे-तैसे अपना गुजारा करते है. हमारे पिता जी के जमाने से हम लोग यहीं पर बसे है. हमें सरकार की तरफ से कोई अलर्ट करने नहीं आता. फिर हमारे पास खुद की जमींन भी नहीं है. यहां से दूसरी जगह कहां जाएंगे. इसलिए हर साल बाढ़ का जोखिम उठाते है. बाढ़ का पानी जब ज्यादा हो जाता है तो पूरा परिवार नाव में बैठकर उंची जगह का तरफ चले जाते है."

"अभी तो बाढ़ शुरू हुई है.जैसे बारिश और बढ़ेगी, हमारा पूरा चर इलाका बाढ़ में डूब जाएगा. हर साल हमें मकान दोबारा बनवाना पड़ता है. जो थोड़े बहुत पैसे खेती करके जमा करते है वो मकान बनाने में चला जाता है."

अब तक मिली सरकारी मदद के बारे में सलाम कहते है,"सरकार ने हमें तीन साल पहले एक सोलर सेट, कुछ लाइटे और एक पंखा दिया था. मोदी सरकार आने के बाद पहली बार मुझे जब सोलर सेट मिला था तो ऐसी उम्मीद जगी थी कि यह सरकार बाढ़ से हम लोगों को बचाने के लिए आगे और ज्यादा मदद करेगी. जब बहुत ज्यादा बाढ़ आती है तो सरकारी अधिकारी राहत सामग्री बांटने चर इलाके में आते है लेकिन हजार-1500 लोगों को ही यह मदद मिलती है. बाकि के सैकड़ों लोग ऐसे ही रह जाते है."

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