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कोरोना के दौर में बिहार में चुनाव की आहट, प्रवासी मज़दूर बने बड़ा मुद्दा
- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
क्या बिहार का विधानसभा का चुनाव अपने तय समय से होगा? अगर "हां" तो चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा क्या होगा?
यह दोनों सवाल मौजूदा समय में बिहार की राजनीति के केंद्र में हैं. कोरोना वायरस के बढ़ते प्रसार के कारण लॉकडाउन लंबा खिंच रहा है, जबकि चुनाव का समय क़रीब आ रहा है.
यह बात राजनेता समझ रहे हैं, चुनाव को लेकर वे अलग-अलग दावे कर रहे हैं, वोटरों को लुभाने की हरसंभव कोशिश हो रही है, विपक्ष अपने लिए मुद्दे तैयार कर रहा है और चर्चा है कि हर स्तर पर चुनाव की तैयारियाँ भी शुरू हो गई हैं.
क्या कहता है चुनाव आयोग?
बात जहाँ तक चुनाव के समय से होने की है, तो बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एचआर श्रीनिवास कहते हैं, "नियमों के मुताबिक़ इलेक्शन पीरियड छह महीने का होता है. जो 27 मई से शुरू हो रहा है. मौजूदा विधानसभा 27 नवंबर को भंग हो जाएगी. राज्य के मौजूदा हालात और चुनाव संबंधित दूसरी अन्य जानकारियाँ हमने केंद्रीय चुनाव आयोग से साझा कर दी हैं. आगे जैसा गाइडलाइन केंद्र की तरफ़ से जारी किया जाएगा, उसी अनुसार निर्णय होगा."
चुनाव से संबंधित तैयारियों को लेकर श्रीनिवास ने बताया, "वोटर लिस्ट अपडेट करने और नए वोटरों को जोड़ने का काम तो हम जनवरी-फ़रवरी माह से ही कर रहे हैं. अभी भी चुनाव में काफ़ी समय है. तैयारियों के लिए जो निर्धारित समय है वह 27 मई से शुरू हो गया है, हमें उम्मीद है कि केंद्रीय चुनाव आयोग जल्द ही इस संबंध में कोई फ़ैसला ले लेगा. यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आने वाले हफ़्तों में बिहार में संक्रमण के प्रसार की स्थिति क्या रहती है."
कैसे होगा चुनाव?
फ़िलहाल बिहार में कोविड 19 का संक्रमण बहुत तेज़ी से फैल रहा है. रोज़ाना सैकड़ों की संख्या में संक्रमित बढ़ रहे हैं.
पॉज़िटिव मामलों की संख्या तीन हज़ार को पार कर गई है और विशेषज्ञों का अनुमान है कि जून-जुलाई के दरम्यान संक्रमण का प्रसार सबसे ज़्यादा होगा.
ऐसे में अक्तूबर-नवंबर के माह में अपने पूर्व-निर्धारित समय पर चुनाव होने की संभावना कितनी है इसे लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के एक बयान ने चर्चाओं का बाज़ार गर्म कर दिया है.
भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने 26 अप्रैल को कहा था, "चुनाव आयोग कोरोना वायरस के संक्रमण और लॉकडाउन के दौरान दक्षिण कोरिया में संपन्न हुए राष्ट्रीय चुनाव का अध्ययन कर रहा है कि कैसे जब महामारी अपने चरम की तरफ बढ़ रही थी, तब दक्षिण कोरिया ने इतने बड़े स्तर पर राष्ट्रीय चुनाव करा लिया."
भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयिक्त एस वाई कुरैशी बीबीसी से कहते हैं, "वैसे तो चुनाव की तारीख़ और उसे लेकर अधिसूचना जारी करने का समय नियम के मुताबिक मतदान की तिथि से कम से कम 26 दिन पहले का है, इसके अतिरिक्त अधिक से अधिक और 21 दिनों का समय भी चुनाव आयोग के पास रहता है इस लिहाज से आने वाले दो-तीन महीने काफ़ी अहम होने वाले हैं, ताकि यह पता किया जा सके कि क्या हमारे पास पर्याप्त संसाधन और व्यवस्था है कि हम दक्षिण कोरिया के मॉडल पर चुनाव करा सकें. मेरी समझ से अगर आयोग दक्षिण कोरिया के मॉडल पर विचार कर रहा है तो यह अच्छी बात है, इसे अपने यहाँ भी लागू किया जा सकता है."
शुरू हो गई है चुनाव की राजनीति!
बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं, ये तो सबको पता है, लेकिन कोरोना महामारी की वजह से इसे लेकर चर्चा बहुत कम हुई.
सरकार का फ़ोकस लॉकडाउन को लागू कराने, संक्रमण के प्रसार को रोकने और लॉकडाउन के कारण बाहर फँसे प्रवासियों को बुलाने एवं उनके इंतज़ाम पर चला गया था. बिहार का विपक्ष इन्हीं मुद्दों पर सरकार को घेरने में लगा था.
लेकिन राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने यह ट्वीट कर कहा, "कोरोना संक्रमण ने दुनिया भर में जब कामकाज का तरीक़ा बदल दिया, तब इस साल बिहार विधानसभा का चुनाव भी ऑनलाइन क्यों नहीं हो सकता?" इससे एक नई चर्चा शुरू हो गई.
इसी चर्चा के क्रम में राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने यह बयान देकर विवाद पैदा कर दिया है कि "भाजपा अब नीतीश कुमार और सुशील मोदी दोनों से मुक्ति चाहती है. इसलिए इसमें मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव में इन दोनों से अलग किसी तीसरे चेहरे को सामने लाती है."
शिवानंद तिवारी के इस बयान के बाद से भाजपा और जदयू के नेता उनपर लगातार हमलावर हैं.
इस तरह धीरे-धीरे ही सही, लेकिन कोरोना काल में भी अब बिहार के विधानसभा चुनाव की चर्चा होने लगी है. नेता एक-दूसरे के ऊपर हमलावर हो रहे हैं. राजनीतिक बयानबाजियां तेज़ गई हैं, राजनीतिक पार्टियों की तरफ़ से ऑनलाइन माध्यमों का सहारा लेकर जनता से जुड़ने की कोशिशें भी शुरू हो गईं.
जो जितनी बड़ी पार्टी है, उसके पास उतना ही विशाल नेटवर्क है और उतना ही असरदार प्लेटफॉर्म.
प्रवासी मज़दूरों का मुद्दा कितना बड़ा?
इस बात में तो अब कोई दो राय नहीं कि बिहार का विधानसभा चुनाव अगले दो महीनों में कोरोना संक्रमण के प्रसार की स्थिति पर निर्भर करेगा, लेकिन राजनीतिक पार्टियां, निर्वाचन आयोग और राजनेता अभी तक यही मानकर चल रहे हैं कि चुनाव का तरीक़ा भले बदल जाए, लेकिन चुनाव अपने समय पर होगा.
अब आते हैं कि अपने दूसरे सवाल पर कि आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा क्या होगा? इसका जवाब मिलता है लॉकडाउन के दौरान काम-धंधे बंद होने के कारण राज्य में वापस लौट रहे प्रवासी मज़दूरों की संख्या, उनके दुखों और संघर्ष की ख़बरों से जिनकी चर्चा देश से लेकर विदेश तक में है.
बिहार सरकार के आँकड़ों के मुताबिक़ मंगलवार तक देश के अलग-अलग शहरों से 1026 ट्रेनों के ज़रिए 15.41 लाख लोग वापस बिहार आ चुके हैं.
आने वाले दिनों में इनकी संख्या 20 लाख को पार कर जाएगी क्योंकि 323 ट्रेनें अभी और शेड्यूल हैं. इसके अलावा भी लाखों की संख्या में प्रवासी मज़दूर पैदल, साइकिल, ठेले, ऑटोरिक्शा या अन्य निजी वाहन से किसी तरह घर वापस लौटे हैं.
लाखों की संख्या में राज्य वापस लौटे ये मज़दूर आने वाले विधानसभा चुनाव के लिहाज से निर्णायक भूमिका में हैं क्योंकि विपक्ष ने प्रवासियों के मुद्दे पर शुरू से ही सरकार को घेर रखा है.
चाहे वह कोटा में फँसे छात्रों को बुलाने का बात हो या प्रवासी मज़दूरों के लिए लौटने की व्यवस्था की बात हो, बिहार सरकार का स्टैंड प्रवासियों के मुद्दे पर लगातार बदलता आया है.
शुरू में सरकार ने प्रवासियों को प्रवेश देने से मना कर दिया. बाद में जब केंद्र की तरफ से स्पेशल ट्रेनें चलाई जाने लगीं तो बिहार सरकार को अपना रुख़ बदलना पड़ा.
इसी तरह शुरू में सरकार ने कहा कि वह लौटने वाले सभी लोगों के लिए क्वारंटीन सेंटर बनाएगी. लेकिन बाद में जब क्वारंटीन सेंटर कम पड़ने लगे और वहां से बदइंतजामी की ख़बरें आने लगीं तो लोगों के लिए होम क्वारंटीन का विकल्प भी दे दिया गया.
श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से प्रवासी मज़दूर फ़िलहाल आ तो रहे हैं, लेकिन अपने किराए का पैसा और रास्ते का ख़र्च ख़ुद वहन कर रहे हैं. सरकार ने घोषणा की हुई है कि लोगों को टिकट का पैसा और आने का ख़र्च 21 दिनों को क्वारंटीन पीरियड पूरा करने के बाद दिया जाएगा.
क्या लौट आए प्रवासी मज़दूर आगामी बिहार विधानसभा चुनाव का मुद्दा बनेंगे? और अगर बनेंगे तो किसे नुक़सान और किसको फ़ायदा होगा?
वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "फ़िलहाल तो सबसे बड़ा मुद्दा प्रवासी मज़दूर ही हैं. क्योंकि अभी उनमें ग़ुस्सा है मौजूदा सरकार के प्रति. शुरू में उन्हें बुलाने पर सरकार का रुख़ नरम रहा और अब जब किसी तरह लौट आए तब यहाँ की कुव्यवस्था की मार झेल रहे हैं. कई क्वारंटीन सेंटर्स से शिकायतें आई हैं. लेकिन यह देखने वाली बात होगी कि चुनाव तक यह ग़ुस्सा बना रहता है कि नहीं!"
मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "प्रवासियों के मुद्दे पर दोनों सत्ताधारी पार्टियों जेडीयू और भाजपा को नुक़सान हो सकता है. लेकिन यह नुक़सान जेडीयू के लिए ज़्यादा होगा क्योंकि भाजपा केंद्र के स्तर से एक अलग भूमिका में है. विपक्ष को इसका सीधा फ़ायदा मिल सकता है, अगर वह बीते दिनों की तरह ही इस मुद्दे पर सरकार पर लगातार दबाव बनाए रखें."
क्या हैं सरकार के इंतजाम?
प्रवासी मज़दूरों के लिए सबसे बड़ी चिंता राज्य में रोज़गार की है. क्योंकि यहाँ काम और उचित मज़दूरी नहीं मिल पाने के कारण ही वे दूसरे शहर में मज़दूरी करके कमाने गए थे.
क्या प्रवासी मज़दूरों की चिंता सरकार की चिंता भी है? यह जानने के लिए हमने बात की बिहार सरकार के श्रम संसाधन मंत्री विजय कुमार सिन्हा से.
सिन्हा कहते हैं, "मनरेगा, जल-जीवन-हरियाली, कृषि आधारित उद्योग और अन्य सरकारी योजनाओं के तहत हमने 50 लाख लोगों के काम का इंतज़ाम किया है. उनमें से कुशल श्रमिकों को छांटकर उनके स्किल के आधार पर काम में लगाया जाएगा. सारे ज़िलों से उनकी लिस्ट मंगा ली गई है."
सिन्हा ने यह भी कहा कि लॉकडाउन पीरियड के दौरान क़रीब ढाई लाख से अधिक लोगों के मनरेगा के नए जॉब कार्ड बने हैं. पांच लाख से अधिक लोगों को काम मिला है.
लेकिन हमारी पड़ताल में ऐसा कोई प्रवासी मज़दूर अभी तक क्यों नहीं मिला जिसका जॉब कार्ड बना या फिर उसे काम मिला हो जबकि हमने पटना, भोजपुर, छपरा में लौटे दर्जनों प्रवासी मज़दूरों से बात की है!
मंत्री विजय कुमार सिन्हा इसके जवाब में कहते हैं, "हमारा काम वो बताना हैं जहाँ हमने काम किया और लोगों को लाभ मिला है. मैं आपको बताता हूं कि पूर्णिया और उसके आस-पास के दो हज़ार मज़दूरों को उनके स्किल के आधार पर टेलरिंग का काम मिला है. दूसरी तमाम जगहों पर भी कोशिशें चल रही हैं और जिसका मनरेगा का जॉब कार्ड बना है वो ऑन रिकार्ड है, केवल हमारे कहने से नहीं. इस सरकार का अधिक से अधिक फोकस यहां की कृषि आधारित व्यवस्था में अधिक से अधिक रोज़गार पैदा करने पर है."
विपक्ष कहाँ है?
जहाँ तक सवाल प्रवासी मज़दूरों के मुद्दे पर विपक्ष की भूमिका की है तो वह पिछले कई दिनों से इस मुद्दे पर सरकार को घेर रही है.
इस दौरान बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया के ज़रिए लगातार बाहर फँसे मज़दूरों के साथ संवाद स्थापित किया है. उनकी मदद के इंतजाम भी किए हैं.
लेकिन इतना कुछ करने के बाद भी क्या बिहार की विपक्षी पार्टी राजद को आने वाले विधानसभा चुनाव में प्रवासियों का सपोर्ट मिल पाएगा?
इसके जवाब में राजद के नेता और तेजस्वी यादव के राजनीतिक सलाहकार संजय यादव कहते हैं, "हमारी पार्टी हमेशा से ग़रीबों और वंचितों की मदद के लिए आगे आती रही है. हमने राजनीति के लिए नहीं बल्कि मानवता के लिए मज़दूरों की मदद की. इस सरकार ने जिनके साथ परायों की तरह व्यवहार किया, हमने उन्हें अपना माना. तब जाकर सरकार को भी विवश होना पड़ा."
वे कहते हैं, "एक बात पक्की है कि लौटकर आए ये प्रवासी मज़दूर भले राजद को सपोर्ट करें या नहीं करें, लेकिन वे इस सरकार को किसी क़ीमत पर सपोर्ट नहीं करेंगे क्योंकि इस सरकार ने उनके लिए कुछ नहीं किया, उल्टा उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया."
प्रवासियों का मुद्दा तो है ही, इसके अलावा विपक्ष इन दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से यह भी सवाल कर रहा है कि वे इस पूरे कोरोना काल के दौरान अभी तक एक बार भी आवास से बाहर क्यों नहीं निकले हैं, जबकि दूसरे अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री लगातार लोगों के बीच जा रहे हैं, सड़क पर दिख रहे हैं.
विपक्ष के इस सवाल के जवाब में जदयू के प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद नीतीश कुमार का बचाव करते हुए कहते हैं, "हमारे मुख्यमंत्री दिखावे में नहीं भरोसा करते हैं. वे दिन-रात प्रवासियों की चिंता में ही लगे हैं. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए लगातार उनसे बात कर रहे हैं. उनकी समस्याएं सीधे सुन रहे हैं. उनका निपटारा तत्काल कर रहे हैं. और रही बात बाहर निकलने की तो मुख्यमंत्री सोशल डिस्टेंसिंग का मतलब समझते हैं."
विपक्ष के आरोपों पर सरकार और सत्ताधारी पार्टी भले अपने अंदाज में जवाब दे, लेकिन उनके जवाब से एक बात स्पष्ट है कि आने वाले चुनाव में प्रवासियों की भूमिका अहम रहने वाली है. यह अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी समझने लगे हैं इसलिए सरकार का सारा फ़ोकस प्रवासियों को रोज़गार देने पर शिफ़्ट हो गया है.
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