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कोरोना वायरस: बिहार में पहली मौत और उसके बाद के सवाल
- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, पटना से
बिहार में रविवार सुबह तक आधिकारिक रूप से कोरोना वायरस के संक्रमण वाले एक भी मरीज़ नहीं थे.
इस बात पर एक तरफ़ यहां की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे थे, वहीं दूसरी तरफ़ ये चर्चा थी कि बिहार अभी तक कोरोना वायरस से बचा हुआ है. लेकिन, दोपहर तक यह ख़बर देश भर की सुर्खियों में शामिल हो गई कि भारत में कोरोना से होने वाली छठी मौत बिहार की राजधानी पटना में हो गई है.
जिस व्यक्ति की मौत हुई है, वो 13 मार्च को क़तर से लौटे थे. 20 मार्च को उन्हें संदिग्ध के तौर पर पटना के एम्स में भर्ती कराया गया था. जहां उनकी मौत हो गई और शव को परिवारवालों को सौंप दिया गया.
पटना एम्स के प्रबंध निदेशक प्रभात कुमार ने बीबीसी को बताया, "मरीज़ में कोरोना के लक्षण पाए गए थे, इसलिए उन्हें आइसोलेशन में रख कर इलाज हो रहा था. कल (शनिवार) की सुबह ही उनकी मौत हो गई. हमारी जांच में पाया गया कि उन्हें किडनी से संबंधित समस्या भी थी. लेकिन कोरोना की जांच रिपोर्ट आज सुबह आयी है, जिसमें वे पॉजिटिव हैं."
हालंकि, समाचार एजेंसी पीटीआई ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधिकारियों के हवाले से लिखा है कि "पटना की मौत में COVID-19 की पुष्टि होनी अभी बाक़ी है. रिपोर्ट के डीटेल की जांच चल रही है."
शव को लेकर सवाल
कोरोना के संदिग्ध मरीज़ सैफ़ के शव को AIIMS, पटना के रिकॉर्ड के मुताबिक शनिवार की दोपहर में ही उनके परिवारवालों के सुपुर्द कर दिया गया था. अस्पताल की डेथ रिपोर्ट में मौत की वज़ह किडनी फेल होना बताया गया है.
लेकिन एम्स प्रशासन के ऐसा करने से सवाल खड़ा हो गया है. क्योंकि शव के मामले में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर जो गाइडलाइंस जारी की गई हैं उसमें किसी का पालन नहीं किया गया.
गाइडलाइंस के अनुसार शवों को आइसोलेशन से हटाने के बाद से लेकर अंतिम संस्कार तक की सारी प्रक्रिया विशेष सावधानी के साथ करनी है. मसलन कोई भी ऐसी प्रक्रिया नहीं है जो बिना मास्क, ग्लव्स, आंखों के लिए विशेष चश्मा के बिना करनी है. अंतिम संस्कार के वक़्त तक शव को एक विशेष तरह के बैग में ही रखना है.
परिजनों को दिखाने और रस्म अदायगी के लिए बैग की चेन खोलकर केवल मुंह दिखाना है.
गाइडलाइंस का पालन
एम्स, पटना के निदेशक प्रभात कुमार गाइडलाइंस का अनुपालन नहीं होने के सवाल पर कहते हैं, "हमें तब पता नहीं था कि मरीज़ संक्रमित था या नहीं इसलिए शव को घरवालों को दे दिया गया. इसमें हमारी कहां कोई गलती है. अगर रिपोर्ट पहले मिल गई होती तो हम अवश्य ही सारी गाइडलाइंस का पालन करते."
मृतक व्यक्ति के गृह ज़िले के स्थानीय पत्रकार आनंद कुमार कहते हैं, "शव शनिवार की रात में 11 बजे तक घर आ गया था. लेकिन तब किसी को यह नहीं पता था कि उन्हें संक्रमण था या नहीं. घरवालों ने पैकेट खोलकर शव घर में रखा. आखिर की जो रस्में होती हैं, उनको अदा करने की प्रक्रिया देर रात चलती रही. "
आनंद आगे बताते हैं, "परिजनों की तैयारी थी कि सुबह दफ़ना दिया जाएगा. लेकिन उसके पहले ही ये ख़बर मिल गई कि उनका कोरोना का रिज़ल्ट पॉजिटिव आया है. तब से पूरे शहर में डर और दहशत है. घरवाले शव को छोड़कर घर के बाहर आ गए हैं, कोई छूने भी नहीं जा रहा है. रविवार दोपहर तीन बजे तक प्रशासन से कोई नहीं पहुंचा है."
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विदेश से लौटे थे...
क़तर से लौटने के बाद गृह ज़िले के सरकारी अस्पताल में उस व्यक्ति की जांच कराई गई थी. वहां उनके सैंपल लिए गए. डाक्टरों ने पीएमसीएच रेफर कर दिया. रिकार्ड्स के मुताबिक, 17 मार्च को पीएमसीएच में भी उनकी जांच हुई. सैंपल लिए गए और आइसोलेशन में जाने को कहा गया.
लेकिन वहां की व्यवस्था को देखकर वे भर्ती नहीं हुए. घरवालों ने एम्स में भर्ती कराया.
आनंद बताते हैं कि "वे 13 मार्च को क़तर से लौटे थे. घरवालों के मुताबिक पहले मुंबई आए, वहां से दिल्ली और फिर वहां से पटना और फिर मुंगेर. अस्पताल में तो दो दिन बाद गए हैं, दो दिनों तक शहर में ही रहे. बाहर भी बहुत से लोगों से मिले. इसलिए अब पूरा शहर खौफ़ के साए में जी रहा है."
शव के प्रबंधन और रखरखाव को लेकर उठ रहे सवालों पर हमने बिहार के स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय कुमार से बात की.
वे कहते हैं, "अस्पताल प्रबंधन से गलती हुई है. लेकिन वे कह रहे हैं कि तब तक उनके पास टेस्ट रिपोर्ट नहीं आई थी. मगर उन्हें प्रोटोकॉल का पालन करना चाहिए था. जब तक रिज़ल्ट नहीं आ रहा था, इंतजार करना चाहिए था. हम इस मामले की जांच कर रहे हैं. अस्पताल से जवाब मांगा गया है."
संजय कुमार ने कहा कि "जब से रिपोर्ट आई है उसके बाद से संबंधित सभी लोगों को दिशा निर्देश दे दिए गए हैं. जिले के डीएम की देखरेख में शव को दफनाने का काम किया जाएगा. मृतक से जुड़े सभी लोगों की जांच कराई जाएगी."
जांच पर सवाल
बिहार में कोरोना से हुई पहली मौत के मामले ने यहां कोरोना की जांच प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
कहा जा रहा है कि अगर जांच की रिपोर्ट पहले आ गई होती तो मरीज़ पर विशेष ध्यान दिया जाता, उनकी जान भी बचाई जा सकती थी.
जांच रिपोर्ट देरी से आने का यहां कोई अकेला मसला नहीं है. दरअसल यहां हर जांच रिपोर्ट ही दो, तीन, चार दिन की देरी से आ रही है.
पीएमसीएच में भी हमें करीब आधे दर्जन ऐसे संदिग्ध मरीज़ मिले थे जिनकी जांच रिपोर्ट तीन दिन बाद भी नहीं आयी थी.
अब तक कितने संदिग्ध मरीज?
देरी के सवालों पर विभाग ने पहले यह कहा कि सैंपल कोलकाता भेजे जाते हैं, वहां से रिपोर्ट आती है, इसलिए वक़्त लगता है. लेकिन अब विभाग कहता है कि कोरोना की जांच बिहार में ही आरएमआरआई में होती है. केवल कुछ विशेष केस में ही सैंपल पुणे या कोलकाता भेजे जाते हैं.
ऐसे में सवाल है कि अगर कोरोना की जांच बिहार में ही हो रही है, तो फिर मरने वाले की रिपोर्ट तीन दिन बाद क्यों आई?
स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक बिहार में अभी तक कोरोना के 504 संदिग्धों को राज्य भर के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है. इनमें से 143 लोगों के सैंपल टेस्ट के लिए लैब भेजे गए हैं. अब तक दो लोग कोरोना संक्रमण से पॉजिटिव पाए गए हैं जबकि 96 लोगों की रिपोर्ट नेगेटिव आई है.
इसके साथ ही स्वास्थ्य विभाग ने यह भी जानकारी दी है कि 119 लोग जो बाहर से यात्रा करके आए थे उन्होंने 14 दिन की निगरानी का वक़्त पूरा कर लिया है.
आखिर बाक़ी के टेस्ट रिज़ल्ट पेंडिंग क्यों हैं? आरएमआरआई के निदेशक डॉक्टर प्रदीप दास इसके जवाब में कहते हैं, "हमारे पास जो सैंपल आ रहे हैं, उन्हीं की जांच हो रही है. अभी तक जितने सैंपल आए हैं हमने उनकी जांच करके दे दी है. एक सैंपल की जांच में अधिक से अधिक पांच-छह घंटे का वक़्त लगता है. "
स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय कुमार कहते हैं, "अलग-अलग जगहों से सैंपल आने में वक़्त लगता है. दूर-दराज के जिलों से भी सैंपल आते हैं. उन्हें एकत्र करने में वक़्त लग रहा है. हम इस प्रक्रिया को और सहज बना रहे हैं."
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