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कोरोना अपडेट: यूपी, बिहार में इतनी देरी से क्यों पहुंच रही हैं श्रमिक स्पेशल ट्रेनें?
- Author, समीरात्मज़ मिश्र/नीरज प्रियदर्शी/रवि प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लगाए गए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान देश के कई महानगरों और अन्य बड़े शहरों से हज़ारों की संख्या में प्रवासी मज़दूरों ने बोरिया बिस्तर समेट कर अपने गृह राज्यों की ओर पैदल ही जाना शुरू किया क्योंकि इनके लिए कोई परिवहन सुविधा उपलब्ध ही नहीं थी.
ट्रेनें और बसें नहीं चल रही थीं. लेकिन दबाव के बाद केंद्र सरकार ने प्रवासियों को उनके गृह राज्यों में वापस लाने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाने का फ़ैसला किया.
लाखों लोगों को इन ट्रेनों ने उनके गंतव्य पर उतारा भी. लेकिन बीते कुछ दिनों के दौरान यह देखने को मिला कि कुछ श्रमिक ट्रेनें अपना रास्ता भटक कर गंतव्य की बजाए कहीं और पहुँच गईं. हालांकि बाद में उन्हें वापस उनके गंतव्य तक वापस पहुँचाया गया.
वहीं रेलवे का कहना है कि ये ट्रेनें अपना रास्ता नहीं भटकी हैं बल्कि इनका रूट बदला गया है.
रेल मंत्री पीयूष गोयल ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से एक ट्वीट में लिखा कि हर एक ट्रेन अपने गंतव्य स्थान तक पहुँची है, कुछ कंजेशन की वजह से डाइवर्टेड रूट से लेकर जाना पड़ा है.
उधर रेलवे मंत्रालय ने पीआईबी फ़ैक्ट चेक की उस ट्वीट को रीट्वीट किया जिसमें ये लिखा गया कि 80 फ़ीसदी श्रमिक ट्रेनें या तो यूपी या बिहार जा रही हैं, इसकी वजह से कंजेशन है. इन ट्रेनों के रूट में बदलाव करना पड़ा है न कि ये अपना रास्ता भटकी हैं.
अब जिस किसी भी वजह से अपने गंतव्य तक तय समय से क़रीब तीन गुना में पहुँच रही हों, इनमें सफ़र कर रहे यात्रियों का तो गर्मी से बुरा हाल रहा ही वहीं खाने-पीने में भी उन्हें बहुत परेशानी हुई.
इसके अलावा ऐसी रिपोर्ट भी मिलीं कि इन लेट हुई ट्रेनों में सफ़र कर रहे कुछ बीमार लोग की साँसों पर यात्रा के दौरान ही ब्रेक लग गया.
श्रमिक ट्रेनों के यात्रियों को हो रही परेशानियों पर बीबीसी ने उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में अपने सहयोगियों से परेशानियों का जायजा लिया.
यूपी में देर से पहुंचने वाली इन ट्रेनों के यात्रियों का हाल
उत्तर प्रदेश से हमारे सहयोगी समीरात्मज़ मिश्र ने जानकारी दी कि भूख-प्यास से बेहाल यात्री रेलवे की बदइंतज़ामी झेलने को मजबूर हैं.
श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के देरी से चलने और रास्ते में गर्मी से बेहाल यात्रियों के हंगामे करने की घटनाएं लगातार जारी हैं.
यूपी में इस समय सबसे व्यस्त रहने वाले रेलवे स्टेशनों में से एक वाराणसी जंक्शन पर मंगलवार को ट्रेनों का सबसे ज़्यादा दबाव रहा. विभिन्न ट्रेनों से सुबह 8 बजे से लेकर शाम तक क़रीब आठ हज़ार श्रमिक यहां पहुँचे.
वाराणसी कैंट स्टेशन और मंडुआडीह आने वाली ट्रेनें आठ से दस घंटे या इससे भी ज़्यादा देरी से पहुंचीं.
सूरत-जौनपुर स्पेशल ट्रेन निर्धारित समय से 13 घंटे की देरी से वाराणसी कैंट पहुंची. ट्रेन में सवार जौनपुर के रहने वाले त्रिलोचन निषाद अपनी पत्नी और दो छोटे बच्चों के साथ बैठे थे.
बताने लगे, "ट्रेन ऐसी जगहों पर रुकती रही जहाँ न तो पानी उपलब्ध था और न ही कुछ खाने-पीने का सामान. ट्रेन में तो खाने-पीने की कोई चीज़ मिल ही नहीं रही है. चार साल के बच्चे के लिए दूध लेकर चले थे लेकिन वह दूध एक दिन भी नहीं चला. रास्ते भर बच्चे परेशान होते रहे. घर पहुंचने में अभी और पता नहीं कितना समय लगेगा."
वहीं मंडुआडीह स्टेशन पर मुंबई से आई श्रमिक स्पेशल ट्रेन क़रीब 11 घंटे की देरी से यहां पहुंची.
इस ट्रेन में क़रीब डेढ़ हज़ार यात्री थे जो वाराणसी के अलावा आस-पास के ज़िलों के थे. कई यात्रियों ने मीडिया से इस यात्रा में होने वाली परेशानी की ज़िक्र किया.
चंदौली के रहने वाले मोहम्मद यूनुस बताने लगे कि उनके साथ आ रहे एक व्यक्ति के तीन छोटे बच्चे थे. गर्मी से बेहाल और बच्चों के परेशान करने से तंग आकर वो रास्ते में ही कहीं उतर गए. यूनुस बताने लगे कि यात्रियों ने कई जगह हंगामा भी किया लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था.
तीन दिन पहले चंदौली में ही ट्रेन के रूट बदले जाने और लेट-लतीफ़ी से परेशान होकर सैकड़ों यात्रियों ने रेलवे ट्रैक को ही जाम कर दिया था.
रोज़ हो रहे हंगामों को देखते हुए रेलवे प्रशासन ने वाराणसी जंक्शन से गुज़रने वाली हर श्रमिक स्पेशल ट्रेन में भोजन और पानी का प्रबंध करने का निर्देश दिया है.
वाराणसी ज़ोन के डीआरएम विजय पांजियार बताते हैं, "वाराणसी जंक्शन से गुज़रने वाली हर श्रमिक स्पेशल ट्रेन में यात्रियों को भोजन-पानी जैसी सुविधा मुहैया कराने के लिए रेलवे के अधिकारियों और कर्मचारियों को कहा गया है. इसके अलावा स्थानीय प्रशासन की ओर से भी पानी की बोतलें और केले बांटे जा रहे हैं. आईआरसीटीसी के कर्मचारियों ने भी कुछ ट्रेनों में खाने के पैकेट बांटे."
वहीं मुंबई से प्रयागराज पहुंची एक श्रमिक स्पेशल ट्रेन के यात्रियों ने बताया कि तीन दिन के सफ़र में उन्हें न तो खाने का कुछ मिला और न ही रास्ते में कहीं पानी मिला.
यात्रियों का कहना था कि जिन यात्रियों के पास अतिरिक्त पानी था, उससे ही प्यासे लोगों की मदद की गई. हां, प्रयागराज स्टेशन पर ज़रूर कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से पानी और खाने के पैकेट की व्यवस्था की गई थी.
बिहार पहुंचे यात्रियों का हाल बेहाल
बिहार से बीबीसी के सहयोगी नीरज प्रियदर्शी ने बताया कि लॉकडाउन में प्रवासी मज़दूरों के लिए घर लौटना जंग जीतने जैसा हो गया है.
जब सड़क के माध्यम से ये मज़दूर आ रहे थे इनमें से कई सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए वहीं पैदल चलते हुए ट्रैक से जा रहे थे तो कुछ पहियों के नीचे आ गए और अब जब उनके लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं तो अब वहां से भी मौत की ख़बरें आने लगी हैं.
बीते कुछ दिनों के दौरान कुछ ट्रेनें देर से अपने गंतव्य पर पहुंच रही हैं.
सोमवार को दिल्ली से पटना आई श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सवार पश्चिम चंपारण के पिंटू जब मुज़फ्फरपुर स्टेशन से बेतिया की ट्रेन पर चढ़ने का इंतजार कर रहे थे, तभी उनके चार साल के बेटे इरशाद की मौत हो गई.
मोहम्मद पिंटू ने बताया, "उमस भरी गर्मी और पेट में अन्न का दाना नहीं होने के कारण बेटा मर गया."
बच्चे के मौत की तस्दीक मुज़फ़्फ़रपुर के ज़िला सूचना जनसंपर्क पदाधिकारी कमल सिंह ने किया.
उन्होंने बताया, "यात्रा के क्रम में बच्चे की तबीयत बिगड़ी और इसके बाद मौत हो गई. शव के पोस्टमार्टम के बाद शव वाहन से पूरे परिवार को बेतिया भेज दिया गया."
मुज़फ़्फ़रपुर रेलवे स्टेशन पर ही सोमवार को श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सवार अरबीना खातून की मौत संदिग्ध परिस्थिति में हो गई.
शव को मुज़फ़्फ़रपुर रेलवे स्टेशन पर ही उतार लिया गया. जीआरपी ने शव को पोस्टमार्टम के लिए एसकेसीएचएम भेज दिया. मुज़फ़्फ़रपुर के डीपीआरओ ने इस मौत की भी पुष्टि की है.
स्थानीय अख़बारों में छपी रिपोर्ट्स की मानें तो सिर्फ़ सोमवार को श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से आए सात प्रवासियों की मौत सफ़र के दौरान हुई है. हालांकि बीबीसी इन ख़बरों की पुष्टि नहीं कर पाया है.
पूर्व मध्य रेल के आँकड़ों के अनुसार अलग-अलग स्टेशनों से चलकर अब तक लगभग 1100 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें बिहार आई हैं. इनमें लगभग 15 लाख प्रवासी श्रमिकों को अब तक लाया जा चुका है.
लेकिन इन ट्रेनों में शायद ही कोई अपने निर्धारित समयानुसार आई हों. ट्रेनों के लेट होने की शुरुआत पहले दिन आई पहली श्रमिक स्पेशल ट्रेन से ही हुई थी.
सोमवार को महाराष्ट्र के पनवेल से पटना आई श्रमिक स्पेशल ट्रेन 01886 शुक्रवार को सुबह 10 बजे पनवेल स्टेशन से खुली थी जो 77 घंटे बाद सोमवार को तीन बजे पटना पहुंची.
ट्रेन में सवार सिवान के धर्मेंद्र बताते हैं, "ट्रेन को कई राज्यों से घुमाते लाया गया. इससे काफ़ी परेशानी हुई. ट्रेन में खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं थी, इसलिए बुरा हाल हो गया."
ट्रेन में सवार दूसरे यात्री ने बताया "नागपुर तक ट्रेन में खाने के पैकेट, पानी के बॉटल वगैरह बांटे गए थे. उसके बाद से कहीं कुछ नहीं मिला."
आखिर ट्रेनें लेट क्यों हो रही हैं या रास्ता क्यों भटक जा रही हैं, जबकि अभी सिर्फ स्पेशल ट्रेनों को ही चलाया जा रहा है?
इसके जवाब में गोरखपुर रेल मंडल के सीपीआरओ पंकज सिंह ने बीबीसी को बताया, "कोई ट्रेन रास्ता नहीं भटकी है. ट्रेनें रास्ता नहीं भटकतीं. वे सिग्नल से चलती हैं. ट्रेन का क्रू तय करता है कि किस रूट से जाना है, कहां से डाइवर्ट करना है. कहीं-कहीं समय पर सिग्नल नहीं मिलने के कारण गड़बड़ियां हो जाती हैं."
सिंह आगे बताते हैं, "पायलट, लोको पायलट, गार्ड और स्टेशन मास्टर मिलकर तय करते हैं कि किस स्टेशन से और किस रूट से किस ट्रेन को लेकर जाना है. चूंकि ये स्पेशल ट्रेनें हैं जिनका पहले से कोई रूट या समय निर्धारित नहीं था. ट्रेनें उसी हिसाब से चल रही हैं, जैसा कि उसका क्रू फ़ैसला ले रहा है."
'ट्रैक पर ट्रेनें नहीं 'अव्यवस्था' का परिचालन हो रहा है'
झारखंड से बीबीसी के सहयोगी रवि प्रकाश बताते हैं कि लातेहार जिले के महिपत सिंह अपने भाइयों के साथ महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग से झारखंड के हटिया के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन पर सवार हुए थे.
वे बीमार थे. चाहते थे कि मनिका स्थित अपने गाँव लौट जाएँ लेकिन उनकी मुराद पूरी नहीं हो सकी. ट्रेन में ही उनकी मौत हो गई.
जबलपुर के पास उनकी तबीयत ज़्यादा बिगड़ गई. उन्हें बचाया नहीं जा सका. जिस ट्रेन से वे हटिया आ रहे थे, वह कई घंटे विलंब से यहाँ पहुँची.
उनके भाई बाबूलाल सिंह ने बीबीसी से कहा कि अगर ट्रेन समय से चल रही होती और उसमें ज़रूरी यात्री सुविधाएँ भी मिलतीं तो शायद महिपत ज़िंदा होते. वे टीबी के भी मरीज़ थे. उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट अभी नहीं मिली है.
इसी तरह महाराष्ट्र के कोल्हापुर से झारखंड के बोकारो के लिए चली श्रमिक स्पेशल में ओडिशा के यात्रियों को भी चढ़ा दिया गया.
घंटों विलंब से चल कर इस ट्रेन के राउरकेला और झारसुगुड़ा स्टेशनों पर ठहराव के बावजूद नहीं उतरने देने के बाद इन यात्रियों ने झारखंड के चक्रधरपुर और राँची डिविजनों के दो रेलवे स्टेशनों के पास चेन पुलिंग कर दी और क़रीब 500 यात्री ट्रेन से उतर गए.
फिर झारखंड सरकार के अधिकारियों ने उन्हें बसों से ओडिशा भेजा.
दरअसल, ये घटनाएँ सिर्फ उदाहरणों तक ही सीमित नहीं हैं. अधिकतर श्रमिक स्पेशल ट्रेनें लेट चल रही हैं. उनमें सवार यात्रियों को वक़्त पर पानी-खाना नहीं मिल पा रहा है.
रेलवे अधिकारी आधिकारिक तौर पर इस मुद्दे पर कुछ भी नहीं बोल रहे.
हालांकि, नाम गोपनीय रखने की शर्त पर एक वरिष्ठ रेलवे अधिकारी ने कहा कि रेलवे अधिकारियों और राज्य सरकार के अधिकारियों के बीच तालमेल का अभाव है. ट्रेनें बगैर सूचना खोल दी जा रही हैं. उसके बाद संबंधित डिविज़न को इसकी ख़बर दी जा रही है. इस कारण सारी दिक़्क़तें हैं. उन्होंने कहा कि ट्रैक पर ट्रेनों का नहीं बल्कि अव्यवस्था का परिचालन हो रहा है.
अब चाहे ये ट्रेनें लापरवाही की वजह से या अन्य जिस किसी भी वजह से अपने गंतव्य तक पहुँचने में तय समय से करीब तीन गुना अधिक समय पहुँचाने में ले रही हों इनमें सफ़र कर रहे यात्रियों का एक तरफ जहाँ गर्मी से बुरा हाल हो रहा है, वहीं खाने-पीने में भी उन्हें बहुत परेशानी हो रही है.
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