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क्या कोरोना काल में समय जल्दी बीत रहा है?
- Author, क्लाउडिया हेमंड
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
दो महीने से ज़्यादा के लॉकडाउन के बाद अब दुनिया के तमाम देशों में इसे धीरे धीरे हटाया जा रहा है.
ऐसे में आपको नहीं लगता कि ये ढाई महीने बड़ी जल्दी बीत गए? हमने सोचा भी नहीं था कि लॉकडाउन का मुश्किल दौर इतनी जल्दी गुज़र जाएगा. हम घर में, पाबंदियों में रहने की आदत ही डाल रहे थे कि इससे रियायतें भी मिलने लगी हैं.
आम तौर पर होता यही है कि बुरा वक़्त बिताना मुश्किल होता है. आप ट्रेन या फ्लाइट का इंतज़ार करते हों, तो समय बिताते नहीं बीतता. मगर, किसी प्रिय के साथ हों या किसी पसंदीदा जगह घूमने जाते हों, तो समय मानो फुर्र से उड़ जाता है.
ऐसे में लॉकडाउन का वक़्त, जिसे ज़्यादातर लोगों ने बुरा समय ही माना था, वो इतनी जल्दी कैसे गुज़र गया?
असल में हम समय के गुज़रने का आकलन दो तरह से करते हैं. पहला तो ये कि अभी समय कितनी जल्दी बीत रहा है? और, पिछला हफ़्ता या पिछला दशक कैसे बीता था?
लॉकडाउन के दौरान हम सब अपने परिजनों, रिश्तेदारों, दोस्तों से दूर रहने को मजबूर थे. खाना पकाना सीख कर, बाग़बानी करके या फिर ऐसे ही अन्य काम करके अपना वक़्त बिता रहे थे. लेकिन, जब आप अपने हर दिन को घर में ही, एक जैसे बिता रहे हों, तो दिन एक जैसे मालूम होते रहते हैं. दिन, हफ़्ते में और हफ़्ते महीने में बीत जाते हैं. पिछले दिन या पिछले हफ़्ते का तजुर्बा, अगले हफ़्ते जैसा ही था. तो दिनों के बीच फ़र्क़ करना नामुमकिन था.
अगर हम रोज़ एक जैसा ही तजुर्बा करते हैं, तो हमारे ज़हन में नई यादों का पिटारा नहीं बनता. असल में हम यादों के सहारे ही ये तय करते हैं कि कितना वक़्त गुज़र गया. अगर आप किसी नई जगह पर घूमने जाते हैं, तो समय तेज़ी से बीतता है. मगर आप नई यादों के साथ लौटते हैं. नई यादों के साथ ये गुज़रा हुआ समय लंबा लगता है.
मगर, लॉकडाउन के दौरान इसका उल्टा हुआ. एक जैसे दिन रात और हफ़्तों ने हमारे लिए नई यादों की पोटली नहीं तैयार की. अब जब पिछले और अगले दिन में अंतर ही नहीं है, तो आख़िर हम कैसे महसूस करें कि कितना दिन बीता या कितने हफ़्ते गुज़र गए.
लॉकडाउन के दौरान भले ही आपके दिन व्यस्तता भरे रहे हों. घर के तमाम काम करने पड़े हों. मगर, नई यादें सहेजने के लिहाज़ से इनमें कुछ भी नया नहीं था.
सामान्य दिनों हम भविष्य के ख़्वाब सजाते हैं. मगर, लॉकडाउन के दौरान हम आज में जीने को मजबूर थे. भविष्य में झांकने के लिए हमारे पास आज का कोई ख़ास तजुर्बा नहीं था. और हमें ये भी नहीं पता था कि आगे हालात कैसे होगे. नतीजा ये कि न तो नई यादें इकट्ठा हुईं. न ही हम आगे की सोच पाए.
आने वाले समय में जब हम इस दौर के बारे में सोचेंगे, तो शायद इतना ही याद रहेगा कि फलां रोज़ हमारे देश में वायरस आया था और उसके कितने दिनों बाद लॉकडाउन लगा था. मनोवैज्ञानिक इसे फ्लैशबल्ब मेमोरी कहते हैं. ये तब होता है जब हम किसी बड़ी घटना के बारे में सुनते हैं.
लेकिन, जब लॉकडाउन शुरू हो गया, तो ऐसी कोई बड़ी घटना तो हुई नहीं, जो बाक़ी दिनों से अलग हो. नतीजा ये कि हम पिछले और अगले हफ़्ते में फ़र्क़ नहीं कर सके. अक्सर हम दिनों में भेद तब कर पाते हैं, जब एक साथ हमारे जीवन में कई घटनाएं घट रही होती हैं. जैसे कि किसी ने नई नौकरी शुरू की, या किसी के जन्मदिन की पार्टी की. मगर, लॉकडाउन के दौरान ऐसा नहीं हुआ. जब आप बमुश्किल ही घर से बाहर निकल पा रहे हो. तो सारे दिन मिल कर एक जैसे हो गए.
यही कारण है कि जब लॉकडाउन के दिन शुरू हुए, तो कुछ दिन के बाद हमारे लिए उनमें अंतर कर पाना मुश्किल हो गया. दिन लगभग उतने ही बीते हैं, जितने दिन से लॉकडाउन लगा है. ये तो हमारी यादों का पिटारा ही इतना सीमित है कि हमें लगता है कि लॉकडाउन का दौर जल्द बीत गया.
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