महाराष्ट्र में कोरोना संकट के बीच राजनीति और रेल का खेल

उद्धव ठाकरे, शरद पवार

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कोरोना संकट से यूँ तो कहीं न कहीं पूरा भारत जूझ रहा है. लेकिन महाराष्ट्र की राज्य सरकार के लिए चुनौती बाक़ी राज्यों के मुक़ाबले ज़्यादा बड़ी है.

पूरे देश के कोरोना मरीज़ों में से एक तिहाई मामले अकेले महाराष्ट्र से हैं, जिनमें से सबसे ज़्यादा देश की आर्थिक राजधानी मुंबई शहर से है.

राज्य सरकार कोरोना की बीमारी से ही नहीं लड़ रही, बल्कि राजनीति के मोर्चे पर घमासान मचा है.

आपदा में अवसर तलाशने वालों में विरोधी के साथ-साथ कुछ अपने भी शामिल है, जिसने महाराष्ट्र सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी है.

अब तक एनसीपी प्रमुख शरद पवार और राज्यपाल की मुलाकात के मायने पत्रकार और नेता तलाश ही रहे थे, कि रेल मंत्री पीयूष गोयल ने श्रमिक स्पेशल ना चलाने को लेकर अलग मोर्चा खोल दिया.

बीजेपी सांसद नारायण राणे ने राष्ट्रपति शासन की मांग कर दी और उधर राहुल गांधी ने गठबंधन की राजनीति पर बयान दे कर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की चिंता और बढ़ा दी है.

अब महा विकास अगाड़ी की समन्वय समिति की एक अहम बैठक हो रही है, जिसके बाद शाम तक सत्ताधारी पार्टी शिवसेना की प्रेस कॉंफ्रेंस कर तमाम सवालों का जवाब दे सकती है.

वैसे ये तीनों अलग अलग घटनाएं हैं, लेकिन इन्हें जोड़ कर देखना भी ज़रूरी है. राज्य सरकार को वरीयता के हिसाब से ये जल्द तय करना होगा तीनों समस्याओं से कैसे निपटा जाए.

देवेन्द्र फडणवीस

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राज्य सरकार कितनी ख़तरे में

भले ही बीजेपी सांसद नारायण राणे ने राज्यपाल से मिल कर महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है. भले ही पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने प्रेस कॉंफ्रेंस कर राज्य सरकार में समन्वय की कमी की बात कह रहे हों, लेकिन इतना तो तय है कि इस समय राज्य की सरकार ख़तरे में नहीं दिखती.

जानकार इसे विपक्ष की भूमिका और दवाब की राजनीति के तौर पर ही देख रहे हैं.

महाराष्ट्र की राजनीति पर करीब से नज़र रखने वाले पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी की मानें तो फिलहाल सरकार पर कोई संकट नहीं हैं. वो इसके पीछे कारण भी गिनाते हैं.

उनके मुताबिक़ राज्य में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर इतना मज़बूत नहीं कि राष्ट्रपति शासन के दौरान कोरोना संकट को झेल पाए. नारायण राणे केवल सक्रिय दिखना चाहते हैं और राज्यपाल से उनकी मुलाक़ात के ज़्यादा बड़े मायने नहीं निकाला जाना चाहिए.

नारायण राणे शिवसेना में भी रह चुके हैं और कांग्रेस में भी रह चुके हैं और फ़िलहाल बीजेपी में हैं.

रही बात बीजेपी के सरकार गिराने की. बीबीसी मराठी सेवा के संपादक आशीष दीक्षित के अनुसार फ़िलहाल बीजेपी वो रिस्क नहीं लेगी. कुछ ही महीने पहले देवेंद्र फडणवीस ने ऐसी कोशिश की थी, जिसके बाद ख़ुद का ही मज़ाक बना लिया था. ऐसे माहौल में बीजेपी ऐसी कोई कोशिश करते दिखती भी है, तो ये दांव उन पर उलटा पड़ सकता है.

लेकिन देवेंद्र फडणवीस को गंभीरता से लेने की ज़रूरत हैं. पूर्व मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा है कि सरकार अपने वोट से गिरेगी, हम नहीं गिरा रहे.

इस बारे में आज ही उन्होंने एक ट्वीट भी किया है, जिसमें सरकार गिराने की साज़िशों को कोरोना से ध्यान भटकाने का तरीक़ा बताया है.

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अनुराग की मानें, तो महाराष्ट्र में सरकार तीनों पार्टियों में किसी एक पार्टी के समर्थन वापसी से ही गिरेगी. फ़िलहाल महाराष्ट्र में पूरे राजनीतिक घटनाक्रम को वो दवाब की राजनीति अधिक और सरकार गिराने की राजनीति कम मानते हैं.

आशीष की राय भी अनुराग से अलग नहीं है. उनका भी मानना है कि फ़िलहाल राज्य सरकार को कोई ख़तरा नहीं है. लेकिन वो विपक्ष की कोशिशों को उद्धव ठाकरे को 'डिसक्रेडिट' करने की एक कोशिश ज़रूर मानते हैं.

आशीष की नज़र में उद्धव ठाकरे फ़िलहाल राज्य में पॉपुलर नेता के तौर पर देखे जा रहे हैं. विपक्ष हर रोज़ उन पर हमला करके जनता में ये संदेश भेजना चाहती है कि उनसे महाराष्ट्र का कोरोना संकट संभल नहीं रहा है.

वो मुख्यमंत्री के तौर पर फेल हैं. इसलिए कभी पीयूष गोयल, कभी देवेंद्र फडणवीस तो कभी नारायण राणे बयान दे रहे हैं.

उद्धव ठाकरे

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उद्धव ठाकरे की अनुभवहीनता

अनुराग चतुर्वेदी महाराष्ट्र में कोरोना के बीच के इस राजनीतिक संकट को उद्धव ठाकरे की अनुभवहीनता से जोड़ कर भी देखते हैं. उनका मानना है कि उद्धव ठाकरे राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी नहीं है. उनको राजनीति और प्रशासन का अनुभव नहीं के बराबर है. उद्धव के लिए ये गठबंधन की सरकार ना सिर्फ़ नई है बल्कि अपरिचित भी है. वैचारिक रूप से भी और प्रशासनिक रूप से भी.

क्राइसिस मैनेजमेंट, उद्धव ठाकरे के बायोडेटा में नहीं है. ख़ास तौर पर कोरोना जैसे बड़े स्तर का क्राइसिस जिसमें दिक्कतें केवल राज्य स्तर पर नहीं हैं बल्कि केंद्र और दूसरे राज्यों से तालमेल बिठाने की बात है, उद्धव के लिए ये बिल्कुल नया अनुभव है.

इसलिए अनुराग मानते हैं कि सीमित समझ के साथ उद्धव ठीक काम कर रहे हैं. फ़िलहाल वो अपने अफसरों पर ज्यादा और सहयोगी पार्टियों के मंत्रियों पर कम भरोसा करते दिख रहे हैं.

लेकिन अनुराग को लगता है कि महाराष्ट्र की इस गठबंधन सरकार में एनसीपी प्रमुख शरद पवार का दखल अब भी है. कांग्रेस को वो इस वक्त जरूर साइडलाइन मानते हैं.

एनसीपी प्रमुख शरद पवार और राज्यपाल की मुलाकात

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सहयोगियों से दिक्कत

उद्धव ठाकरे को तीसरी दिक्कत अपने ही सहयोगियों से आ रही है. पहले शरद पवार ने राज्यपाल से मुलाकात की. महाराष्ट्र में चल रही गठबंधन सरकार के पीछे शरद पवार को ही सबसे महत्वपूर्ण कड़ी के तौर पर देखा जाता है.

ऐसे में राज्यपाल से उनकी मुलाक़ात के टाइमिंग के बीच सवाल उठने लाज़मी भी है. लेकिन राहुल गांधी के ताज़ा बयान ने जले पर नमक छिड़ने का काम किया है.

मंगलवार को राहुल गांधी ने कहा- हम महाराष्ट्र में राज्य सरकार को सपोर्ट कर रहे हैं, लेकिन फ़ैसला लेने वाले हम नहीं हैं. हम पंजाब, राजस्थान छत्तीसगढ़ और पुडुचेरी में फैसला लेने वाले रोल में हैं. सरकार चलाने में और सरकार को समर्थन देने में एक जरूरी फ़र्क है.

आशीष का मानना है कि राहुल गांधी इस बयान के ज़रिए ये बताना चाहते हैं कि जिस राज्य में कोरोना के सबसे ज्यादा मामले हैं उस राज्य में हमारी भूमिका सबसे कम है. ऐसा बयान देकर वो महाराष्ट्र के कोरोना क्राइसिस से ख़ुद एक दूरी बनाना चाह रहे हैं.

आशीष के मुताबिक शिवसेना के साथ गठबंधन के लिए राहुल हमेशा से तैयार नहीं थे. उनकी झिझक ही वो वजह थी जिसके कारण कांग्रेस ने महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार में सबसे अंत में हामी भरी.

राहुल गांधी

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दरअसल जानकार राहुल के इस बयान के पीछे भी राज्य सरकार की कांग्रेस के प्रति बेरुखी को भी वजह मानते हैं.

अनुराग के मुताबिक महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा मामले मंबई में हैं और वहां भी सबसे ज़्यादा धारावी में. वहाँ की एमएलए फ़िलहाल वर्षा गायकवाड़ हैं. वो राज्य की शिक्षा मंत्री भी हैं. वर्षा के पिता मुंबई रीजन कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हैं. वर्षा कांग्रेस कोटे से मंत्री भी हैं.

288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में महाविकास अगाड़ी के पास 170 विधायकों का बहुमत है. जिसमें 56 शिवसेना के 54 एनसीपी के और 44 कांग्रेस के हैं. बाक़ी कुछ दूसरी छोटी पार्टियों का समर्थन उन्हें मिला है.

इतना ही नहीं कांग्रेस नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के पिछले दिनों कोरोना पॉज़िटिव पाए जाने की ख़बर आई. अनुराग का दावा है कि उन्होंने इलाज़ के लिए नांदेड़ से मुंबई आने की इजाजत मांगी जो उन्हें देर से मिली.

ये कुछ ऐसे उदाहरण अनुराग ने गिनाए जिससे साफ़ हो जाता है महाराष्ट्र में राज्य सरकार कांग्रेस को ये अहसास बार बार कराती आई है कि वो सरकार में केवल भागीदारी का सुख ले रहे हैं. ज़िम्मेदारी नहीं.

रेल मंत्री पीयूष गोयल

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रेल पर राजनीति

महाराष्ट्र राजनीति में रही सही कसर रेल मंत्री पीयूष गोयल ने पूरी कर दी. श्रमिक ट्रेनों को चलाने को लेकर भी राज्य सरकार पर केंद्र की तरफ़ से दवाब बढ़ता जा रहा है.

लेकिन राज्य सरकार की मानें, तो देरी उनकी तरफ़ से नहीं बल्कि सहयोगी राज्यों की तरफ़ से हो रही है, जहाँ मज़दूरों को उन्हें पहुँचाना है.

मंगलवार यानी 26 मई को देर रात रेल मंत्रालय ने महाराष्ट्र से श्रमिकों को ले जाने के लिए 34 ट्रेन भेजी.

महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख का दावा है कि ये ट्रेनें पश्चिम बंगाल के लिए चलाई जानी थी. लेकिन पश्चिम बंगाल में अंफन तूफान के चलते 26 मई तक ट्रेने ना भेजने की गुजारिश महाराष्ट्र सरकार से की थी.

बावजूद इसके रेल मंत्री पीयूष गोयल ने सिर्फ़ राजनीति के लिए ट्रेनें महाराष्ट्र में भेज दी.

जबकि रेल मंत्री पीयूष गोयल ने ट्वीट कर ये जानकारी दी कि महाराष्ट्र सरकार ने ही रेल मंत्रालय से ट्रेनें भेजने को कहा था.

26 मई को किए गए ट्वीट में उन्होंने लिखा, "महाराष्ट्र सरकार ने जितनी ट्रेन माँगी, उतनी हमने उन्हें दी, लेकिन ट्रेनें वहां से बिना यात्रियों के लौटी क्योंकि वो पैसेंजर ही नही ला पाए. कल शाम को महाराष्ट्र सरकार ने रेलवे से 145 ट्रेन मांगी, हमने पूरी रात समीक्षा कर के, योजना बना कर 145 ट्रेन महाराष्ट्र पहुंचाई."

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राज्य और केंद्र सरकार के अपने अपने दावों के बीच बीबीसी ने ग्राउंड पर जाकर पता लगाने की कोशिश की.

बीबीसी ने वहाँ पाया कि मुंबई के वसई इलाके में ट्रेन के इंतजार में हज़ारों की संख्या में आज भी भीड़ जुटी है. लेकिन अगले चार दिन तक वसई से ट्रेन चलने के कोई आसार नहीं हैं.

राज्य सरकार के पास ना तो कोई पैसेंजर की लिस्ट है और ना ही इंतजाम और ऐसे में श्रमिक हो रहे हैं परेशान. मंगलवार को एक महिला की मौत हो गई. वो तेज धूप में वसई के सन सिटी ग्राउंड में घंटों ट्रेन के इंतजार में बैठी थी.

इलाके के डीसीपी अश्विनी पाटिल ने बीबीसी को बताया, "हज़ारों की संख्या में लोग वहां जमा हुए थे. इस महिला की अचानक तबीयत बिगड़ी और पुलिस उन्हें अस्पताल ले गई लेकिन वहां उनकी मौत हो गई."

पुलिस के मुताबिक उनको ब्लड प्रेशर की बीमारी भी थी.

राज्य में कोरोना संकट से निपटने में समस्याएँ आ रही हैं. ना तो लोग एक दूसरे से दो गज़ दूरी बना कर रख पा रहे हैं और ना ही इनकी स्क्रीनिंग और टेस्टिंग ही हो पा रही है.

रेल मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों की बात करें तो, 25 मई तक महाराष्ट्र से 550 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें अलग-अलग राज्यों से चली है. इससे ज्यादा ट्रेनें केवल गुजरात से दूसरे राज्यों के लिए गई है.

दरअसल इस पूरे विवाद के पीछे रेल मंत्रालय का नया आदेश है जो 19 मई को निकाला गया. इस आदेश के मुताबिक श्रमिक ट्रेन को चलाने के लिए राज्यों की अनुमति नहीं लेनी नहीं पड़ रही है.

इसके पहले 2 मई को जारी आदेश में जहां से ट्रेन चलेगी और जहाँ पहुँचेगी, दोनों राज्यों की अनुमति अनिवार्य थी.

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