You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कोरोना: लॉकडाउन में छूट है लेकिन वायरस यहीं है, कैसे बचेंगे?
- Author, सिंधुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
‘साउथ एक्स मार्केट में आपका पसंदीदा शोरूम अब खुल गया है. हमें आपका इंतज़ार है. हैप्पी शॉपिंग.’
आजकल मोबाइल फ़ोन पर दिन में एक-दो बार इस तरह के मेसेज आ ही जाते हैं.
अब धीरे-धीरे सबकुछ पहले जैसा होने लगा है. बाज़ार खुलने लगे हैं, दुकानें खुलने लगी हैं, लोग ऑफ़िस जाने लगे हैं और सड़कों पर ट्रैफ़िक जाम लगने लगा है.
ये सब हमें यक़ीन दिलाने की कोशिश करते हैं कि सबकुछ सामान्य हो गया है. लेकिन क्या सचमुच सबकुछ सामान्य हो गया है?
लॉकडाउन-4 में सरकार की तरफ़ से पाबंदियों में कई तरह की छूट दी गई है. लेकिन लॉकडाउन में छूट का मतलब कोरोना वायरस से छूट नहीं है.
हालात डराने वाले हैं
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार भारत में कोविड-19 संक्रमण के मामले 1,38,845 हो गए हैं और जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के आँकड़ों के अनुसार भारत सबसे ज़्यादा संक्रमण वाले टॉप-10 देशों की लिस्ट में आ गया है.
अमरीका, ब्राज़ील,रूस, ब्रिटेन, स्पेन, इटली, फ़्रांस, जर्मनी और तुर्की के बाद भारत अब 10वें नंबर पर है.
भारत सरकार बार-बार ये कह रही है कि अब पिछले दिनों के मुकाबले टेस्टिंग बढ़ी है, इसलिए संक्रमण के मामले भी ज़्यादा आ रहे हैं. सरकार की ओर से लगातार ये भी कहा जा रहा है कि देश में जितनी तेज़ी से संक्रमण मामले बढ़ रहे हैं, उतनी ही तेज़ी से लोग ठीक भी हो रहे हैं.
स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक़ भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित हुए 57,721 लोग इलाज के बाद ठीक भी हो चुके हैं.
इन सभी आश्वासनों और उम्मीदों के बावजूद इन डराने वाले तथ्यों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि वर्तमान में भारत में एक लाख से ज़्यादा लोग कोविड-19 से संक्रमित हैं और इसकी चपेट में आकर 4,021 लोग अपनी जान गँवा चुके हैं.
फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग की उड़ती धज्जियां
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब पहली बार देशव्यापी लॉकडाउन का ऐलान किया था तब उन्होंने ज़ोर देकर कहा था कि इस बीमारी के संक्रमण को काबू में करने का एकमात्र कारगर तरीका सोशल डिस्टेंसिंग ही है.
अब इसके दो महीने बाद हालात बिल्कुल बदल गए हैं. अब लॉकडाउन-4 ‘नए रंग-रूप’ में हमारे सामने है और इस दौरान फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग के नियमों का बमुश्किल पालन होता दिखता है.
धार्मिक स्थल, स्टेडियम और स्कूल-कॉलेज भले बंद है लेकिन सार्वजनिक जगहों पर भीड़ इकट्ठा होने लगी है. मज़दूर किसी तरह बसों और ट्रकों में भर-भरकर घर जाने पर मजबूर हैं और अब तो घरेलू हवाई उड़ानें भी शुरू हो गई हैं.
उड़ानों के बारे में जानकारी देते हुए नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा था कि चूँकि विमानों में बीच की सीट ख़ाली रखने पर फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग के मानक पूरे नहीं होते इसलिए उन्हें भी भरा जाएगा.
सोशल मीडिया पर उनके इस बयान का ख़ूब मज़ाक उड़ा और सवाल किया गया कि आम जनता से फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करने वाली ख़ुद इसका पालन क्यों नहीं कर रहे हैं?
हालाँकि अब सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए विमानों में बीच की सीट ख़ाली रखना अनिवार्य होगा.
और बुरे हो सकते हैं हालात
एक महत्वपूर्ण तथ्य ये भी है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक भारत अब भी कोरोना संक्रमण के ‘पीक’ (संक्रमण के सबसे बुरे दौर) में नहीं पहुंचा है.
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के निदेशक डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने भी माना है कि भारत में अभी ‘पीक’ नहीं आया है.
ज़्यादातर स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में जून-जुलाई के महीने में ‘पीक’ आ सकता है. यानी उस वक़्त हालात आज के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बदतर हो सकते हैं.
मार्च महीने में सेंटर फ़ॉर डिज़ीज डायनेमिक्स के निदेशक डॉक्टर रामानन लक्ष्मीनारायण ने बीबीसी संवाददाता रजनी वैद्यनाथन को दिए एक इंटरव्यू में चेताया था कि भारत को कोरोना वायरस संक्रमण की ‘सुनामी’ के लिए तैयार रहना चाहिए.
उन्होंने कहा था, “स्थिति ऐसी हो सकती है कि हर पांच में से एक व्यक्ति संक्रमण के गंभीर स्तर पर होगा. यानी 40 से 50 लाख लोग गंभीर स्थिति में होंगे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की ज़रूरत पड़ेगी.’’
कुछ दिनों पहले जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और संक्रामक बीमारियों के इतिहास पर नज़र रखने वाले जेरेमी ग्रीन ने बीबीसी मुंडो को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि हम लोग बड़ी जल्दी ये ये मान लेते हैं कि महामारी ख़त्म हो गई है. महामारी के असल में ख़त्म होने से पहले ही हम इसे ख़त्म मानकर इसके बारे में बात करना भी बंद कर देते हैं.
संक्रमण का दूसरा दौर
ज़ाहिर है, इन सबके नतीजे ख़तरनाक हो सकते हैं. दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे कई देशों में लॉकडाउन में ढील देने और पर्याप्त एहतियात न बरतने के बाद संक्रमण की दूसरा दौर देखने को मिला.
दक्षिण कोरिया ने टेस्टिंग बढ़ाकर और फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन कर संक्रमण पर काफ़ी हद तक काबू ज़रूर पाया लेकिन पाबंदियों में ढील दिए जाने के बाद वहां के बार और पब्स में जुटने वाली भीड़ से सैकड़ों लोगों में संक्रमण फैल गया.
कुछ ऐसा ही हाल बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस और सिंगापुर का भी हुआ जहां प्रवासी मज़ूदरों का ध्यान न रखे जाने की वजह से बड़े स्तर पर संक्रमण फैल गया.
इन सबसे भारत और भारत के लोगों को क्या सबक लेना चाहिए?
'भारत सरकार का असंतोषजनक रवैया'
प्रोग्रेसिव मेडिकोज़ एंड साइंटिस्ट्स फ़ोरम के अध्यक्ष डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी का कहना है कि मौजूदा वक़्त में कोरोना संक्रमण के प्रति भारत सरकार का रेस्पॉन्स बेहद असंतषोजनक है.
वो कहते हैं, “अभी कुछ दिनों पहले ही गुजरात सरकार ने हाई कोर्ट में कहा था कि अगर सभी लोगों का कोविड-19 टेस्ट किया जाए तो 70 फ़ीसदी लोग पॉज़िटिव पाए जाएंगे और इससे लोगों में घबराहट बढ़ जाएगी.”
डॉक्टर भट्टी कहते हैं कि चूंकि भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों का बड़ा प्रतिशत एसिंप्टोमैटिक (बिना लक्षणों वाला) है इसलिए सरकार टेस्टिंग और उपचार को गंभीरता से नहीं ले रही है.
डॉक्टर हरजीत भट्टी इन दिनों दिल्ली के मनिपाल हॉस्पिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, “अपनी पिछली दो शिफ़्ट में मैंने चार मरीज़ भर्ती किए हैं जिनमें से तीन कोविड-19 संक्रमण का शिकार हैं.”
डॉक्टर भट्टी कहते हैं कि दो महीने के लॉकडाउन का मक़सद ये होना चाहिए था कि सरकार लोगों की ज़्यादा से ज़्यादा टेस्टिंग करती और संक्रमित मरीज़ों को जल्द से जल्द क्वारंटीन कर उनका इलाज किया जाता.
अगर ये सब किया जाता तो हम संक्रमण की चेन कमज़ोर में कामयाब हो सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ और सरकार सिर्फ़ गंभीर मरीज़ों का इलाज करने में जुटी रही.
फिर बचाव कैसे किया जाए?
डॉक्टर भट्टी कहते हैं कि अपर्याप्त टेस्टिंग, नाकाफ़ी स्वास्थ सुविधाओं और लचर सरकारी रवैए के बीच अपने बचाव का लगभग पूरा ज़िम्मा ख़ुद जनता पर है.
ऐसे में लोगों को इन बातों का ध्यान रखने की कोशिश ज़रूर करनी चाहिए:
-मास्क, ग्लव्स और सैनिटाइज़र को अपना साथी बना लें. अक्सर देखा जाता है कि लोग ऑफ़िस जाते वक़्त और गाड़ी में तो मास्क लगाए रहते हैं लेकिन ऑफ़िस में घुसते ही इसे हटा देते हैं. ऐसा न करें.
ऑफ़िसों में हम बहुत सी सतहों को छूते हैं जैसे: कंप्यूटर, माउस, डेस्क और फ़ोन. इसलिए मास्क और ग्लव्स पहने हुए ही काम करें. संभव हो तो अपने डेस्क पर ही सैनिटाइज़र रखें और थोड़ी-थोड़ी देर में हाथ साफ़ करते रहें. थोड़े अंतराल पर अच्छी तरह हाथ धोने को अपनी आदत में शुमार कर लें.
-बाहर से आने पर सभी कपड़ों को अच्छी तरह धोएं और नहाएं.
-दरवाजे और लिफ़्ट हाथों के बजाय कोहनी या पैरों से खोलने की कोशिश करें.
-बाहर से लाई सब्ज़ियां, फल और अन्य पैक्ड सामानों को अच्छी तरह धोने के बाद ही इस्तेमाल करें.
-खाना खाने से पहले हाथ धोने और सफ़ाई का ख़ास तौर पर ख़याल रखें. चूंकि खाते वक़्त हम अपने हाथों का इस्तेमाल करते हैं और इस दौरान हमारा हाथ हमारे नाक के भी बहुत करीब होती है, इसलिए संक्रमण की आशंका भी ज़्यादा रहती है.
-घर का बना खाना ही खाएं क्योंकि ‘नो कॉन्टैक्ट’ होम डिलिवरी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है.
-आख़िरी और सबसे महत्वपूर्ण बात. लॉकडाउन ख़त्म होने का मतलब कोरोना वायरस ख़त्म होना नहीं है. इसलिए फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग समेत उन सभी नियमों का पालन करते रहें जिनका आप लॉकडाउन के दौरान पालन करते थे.
- कोरोना वायरस के क्या हैं लक्षण और कैसे कर सकते हैं बचाव
- कोरोना महामारीः क्या है रोगियों में दिख रहे रैशेज़ का रहस्य
- कोरोना वायरसः वो शहर जिसने दुनिया को क्वारंटीन का रास्ता दिखाया
- कोरोना वायरस से संक्रमण की जांच इतनी मुश्किल क्यों है?
- कोरोना संकट: गूगल, फ़ेसबुक, ऐपल और एमेज़ॉन का धंधा कैसे चमका
- कोरोना वायरसः वो छह वैक्सीन जो दुनिया को कोविड-19 से बचा सकती हैं
- कोरोना वायरस: संक्रमण से बचने के लिए इन बातों को गाँठ बांध लीजिए
- कोरोना वायरस: सरकार का आरोग्य सेतु ऐप कितना सुरक्षित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)