राजस्थान: कोरोना वायरस से लड़ने के लिए इंटर्न डॉक्टरों को 7000 रुपये भत्ता

राजस्थान के पास हैं 'सबसे सस्ते कोरोना वॉरियर'

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    • Author, प्रशांत चाहल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

कोविड-19 से जुड़ी ड्यूटी करने वाले एक एमबीबीएस इंटर्न डॉक्टर को एम्स अस्पतालों में 23,500, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में 20,000, हरियाणा में 17,000, पंजाब, बिहार और हिमाचल प्रदेश में 15,000 और जम्मू-कश्मीर में 12,300 रुपए मासिक भत्ता (स्टाइपेंड) मिल रहा है जबकि राजस्थान में इंटर्न डॉक्टर को उसी काम के 7,000 रुपए दिए जा रहे हैं.

राजस्थान के एमबीबीएस इंटर्न डॉक्टरों का सवाल है कि ‘जब कोरोना वायरस महामारी किसी आधार पर भेदभाव नहीं कर रही, ख़तरा सब को बराबर है, तो इसके ख़िलाफ़ लड़ रहे इंटर्न डॉक्टरों के भत्ते में इतना फ़र्क क्यों? क्यों नहीं देश में इसके लिए ‘वन नेशन, वन स्टाइपेंड’ की नीति अपनाई जानी चाहिए?’

लॉकडाउन की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस महामारी के ख़िलाफ़ पहली पंक्ति में खड़े होकर लड़ रहे लाखों वर्करों, जैसे सभी डॉक्टरों, नर्सों, पुलिसवालों और सफ़ाई कर्मियों को ‘कोरोना वॉरियर’ कहा था. इनके सम्मान में भारतीय वायु सेना ने देश के बड़े सरकारी अस्पतालों पर फूल भी बरसाए थे.

मगर पिछले तीन सप्ताह से राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में इंटर्नशिप कर रहे एमबीबीएस डॉक्टर अपने कम भत्ते के बारे में सोशल मीडिया पर खुलकर लिख रहे हैं. इंटर्न डॉक्टर चाहते हैं कि ‘उनके भत्ते में वाजिब वृद्धि की जाए.’

राजस्थान में इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपेंड का मुद्दा बीते दो सप्ताह में कम से कम चार बार प्रदेश के टॉप ट्रेंड में रह चुका है.

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इमेज कैप्शन, राजस्थान में इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपेंड का मुद्दा बीते दो सप्ताह में कम से कम चार बार प्रदेश के टॉप ट्रेंड में रह चुका है.

‘इंटर्न डॉक्टर भी कोरोना वॉरियर हैं’

राजस्थान के मेडिकल एजुकेशन विभाग में अतिरिक्त निदेशक (अकादमिक) डॉक्टर एस सी सोनी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि ‘राजस्थान में सालाना 1750 से अधिक इंटर्न डॉक्टर होते हैं जिन्हें हर महीने सात हज़ार रुपये भत्ता मिलता है.’

उन्होंने कहा कि “इंटर्न डॉक्टर भी ‘कोरोना वॉरियर्स’ में शामिल हैं, लेकिन प्रशासन की कोशिश रहती है कि इंटर्न डॉक्टरों से कोविड-19 के आइसोलेशन वार्ड में ड्यूटी ना कराई जाए, बल्कि सर्वे और टेस्टिंग में इनकी मदद ली जाए.”

लेकिन जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, कोटा और अजमेर के सरकारी अस्पतालों में काम कर रहे इंटर्न डॉक्टरों ने उनकी ड्यूटी से जुड़े कुछ आधिकारिक आदेश बीबीसी के साथ शेयर किए हैं और बताया है कि ‘वो ज़िलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों के कहने पर कोरोना आइसोलेशन वार्ड, क्वीरंटीन सेंटर, कोविड-19 जाँच केंद्रों के अलावा ज़िलों की सीमा पर बने हाइवे-चेक पॉइंट पर भी ड्यूटी कर रहे हैं.’

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भारत में एमबीबीएस यानी डॉक्टर बनने की डिग्री को तभी पूरा माना जाता है, जब मेडिकल का छात्र नौ सेमेस्टर यानी साढ़े चार वर्ष की पढ़ाई के बाद एक वर्ष की इंटर्नशिप (व्यवहारिक प्रशिक्षण) कर लेता है. इस लिहाज़ से इंटर्नशिप करना अनिवार्य है.

राजस्थान के मेडिकल एजुकेशन विभाग के अनुसार ‘एमबीबीएस के छात्र नौवाँ सेमेस्टर पास करने के बाद, हर वर्ष मार्च महीने से इंटर्नशिप की शुरुआत करते हैं.’ लिहाज़ा, इस साल इंटर्नशिप की शुरुआत से ही राजस्थान में इंटर्न डॉक्टरों को कोविड-19 से संबंधित ड्यूटी मिल रही हैं.

राजस्थान के पास हैं 'सबसे सस्ते कोरोना वॉरियर'
इमेज कैप्शन, डॉक्टर राहुल मोदी ने बताया कि अपनी सुरक्षा के लिए उन्होंने यह सामान खुद खरीदा है

‘सेनेटाइज़र भी अपनी जेब से ख़रीदने पड़े’

जयपुर स्थित, राजस्थान के सबसे बेहतर, सवाई मानसिंह चिकित्सा महाविद्यालय के इंटर्न डॉक्टर, 24 वर्षीय राहुल कुमार मोदी ने बताया कि ‘जब राजस्थान में सबसे पहले, इटली के कुछ सैलानियों में कोरोना वायरस संक्रमण की पुष्टि हुई थी, वो और उनके साथी इंटर्न तभी से कोविड-19 से संबंधित ड्यूटी कर रहे हैं.’

बीबीसी से बातचीत में डॉक्टर राहुल ने कहा, “लॉकडाउन से पहले, मार्च के शुरुआती हफ़्तों में हमें विदेशों से लौटे लोगों की स्क्रीनिंग में लगाया गया था. हमें उनके घर जाना होता था, उनके पासपोर्ट का नंबर और कुछ ज़रूरी डिटेल लाने होते थे, उनका बुखार और संक्रमण के बाकी लक्षणों की जाँच करनी होती थी, तब हमें सिर्फ़ दस्ताने और मास्क दिये जा रहे थे, सेनेटाइज़र या सुरक्षा का कोई अन्य सामान जैसे पीपीई किट उपलब्ध नहीं थे और इंटर्न डॉक्टरों को इनकी ख़रीद अपनी जेब से करनी पड़ रही थी.”

डॉक्टर राहुल ने बताया कि “रेज़िडेंट और इंटर्न डॉक्टरों ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, जिसे कॉलेज प्रबंधन से समर्थन मिला और प्रशासन को बताया गया कि इंटर्न डॉक्टर जवान हैं और अगर उन्हें बिना लक्षण वाला संक्रमण हुआ, तो उनके ज़रिये कोरोना वायरस बहुत सारे लोगों तक पहुँच सकता है. इसके बाद कुछ लोगों को सुरक्षा संबंधी सामान मिलना शुरू हुआ. अभी भी बहुत सी चीज़ें इंटर्न डॉक्टरों को ख़ुद ख़रीदनी पड़ रही हैं.”

जोधपुर स्थित, डॉक्टर संपूर्णानन्द चिकित्सा महाविद्यालय के इंटर्न डॉक्टर सुभाष माँवलिया ने जयपुर के इंटर्न डॉक्टरों की बात की तस्दीक की.

डॉक्टर सुभाष
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‘अब तक मार्च-अप्रैल का भत्ता नहीं मिला’

उन्होंने कहा कि “राजस्थान में एमबीबीएस करने वाले बहुत से बच्चे साधारण या ग़रीब परिवारों से आते हैं. सात हज़ार रुपये में खाना-पीना, आना-जाना और महामारी से अपना बचाव करना, भला कैसे संभव है? ये परिस्थितियाँ सामान्य नहीं हैं. ज़्यादातर बच्चों को, जो यहाँ ड्यूटी कर रहे हैं, उन्हें अपने घरों से पैसे मँगवाने पड़ रहे हैं, जिसकी अहम वजह ये है कि मार्च से लेकर अब तक अधिकांश इंटर्न डॉक्टरों को स्टाइपेंड का एक रुपया नहीं मिला है.”

डॉक्टर सुभाष माँवलिया ने बताया कि ‘कॉलेज प्रबंधन ने उनके यहाँ सभी इंटर्न डॉक्टरों से बैंक व अन्य ज़रूरी डिलेट माँगे हैं और कहा है कि मार्च-अप्रैल का स्टाइपेंड जल्द मिलेगा.’

डॉक्टर संपूर्णानन्द चिकित्सा महाविद्यालय के एक प्रशासनिक अधिकारी ने नाम ना देने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि ‘सब इंटर्न डॉक्टरों का शुरुआती महीनों का स्टाइपेंड बनाने और कागज़ी कार्यवाही पूरी करने में थोड़ा समय लगता ही है, लेकिन सभी इंटर्न डॉक्टरों को पूरा पैसा मिलता है.’

जयपुर, बीकानेर और जोधपुर के इंटर्न डॉक्टरों ने दावा किया है कि उनके यहाँ किसी को अभी तक भत्ता नहीं मिला है.

राजस्थान स्वास्थ्य विभाग के अनुसार प्रदेश में अब तक 6700 से ज़्यादा लोगों में कोरोना वायरस संक्रमण की पुष्टि हुई है और 160 से अधिक लोग कोविड-19 की वजह से मर चुके हैं.

राजस्थान के पास हैं ‘सबसे सस्ते कोरोना वॉरियर’

अधिकारियों के अनुसार राजस्थान में जयपुर के बाद जोधपुर और उदयपुर ज़िला, कोरोना वायरस महामारी से सबसे अधिक प्रभावित हैं.

उदयपुर स्थित, रविन्द्र नाथ टैगोर अवुर्विज्ञान महाविद्यालय की एक महिला इंटर्न डॉक्टर को कोरोना पॉज़िटिव पाया गया है और उनके 25 से अधिक सहयोगियों को फ़िलहाल क्वारंटीन में रखा गया है.

रविन्द्र नाथ टैगोर अवुर्विज्ञान महाविद्यालय के एक इंटर्न डॉक्टर ने नाम ना देने की शर्त पर बताया कि ‘इंटर्न डॉक्टरों की इस टीम को बहुत कच्ची तैयारी के साथ उदयपुर से सवा सौ किलोमीटर दूर, राजस्थान-गुजरात के रतनपुर बॉर्डर पर भेजा गया था. इन लोगों को दूसरे राज्यों से आये प्रवासी मज़दूरों की टेस्टिंग की ड्यूटी दी गई थी.’

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‘हम जोखिम बताते हैं, तो वो कहते हैं- बीमा है’

एमबीबीएस इंटर्न डॉक्टरों के अनुसार 365 दिन की इंटर्नशिप में से क़रीब डेढ़ महीने की ‘डिस्ट्रिक्ट पोस्टिंग’ भी अनिवार्य होती है. इसके तहत इंटर्न डॉक्टरों को कॉलेज से डेढ़ सौ किलोमीटर के दायरे में पोस्टिंग मिलती है, जहाँ उन्हें अपनी सेवाएं देनी होती हैं.

डॉक्टरों के मुताबिक़ वहाँ उन्हें ख़ुद आना-जाना होता है और बाकी ख़र्चे भी ख़ुद ही करने होते हैं.

बीकानेर स्थित, सरदार पटेल चिकित्सा महाविद्यालय के इंटर्न डॉक्टर अशोक बाजिया ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि “मास्क और दस्ताने देकर हमें कह दिया जाता है कि ज़िले की सीमा पर बने चेक पोस्ट पर रहना है और आने-जाने वालों का बुखार चेक करना है, उनका रिकॉर्ड रखना है. पीपीई सूट अब तक हमें देखने को नहीं मिले. साथ ही प्रशासन हम से उम्मीद करता है कि हम अपनी बाइक या कार इस्तेमाल कर ये ड्यूटी कर लें.”

डॉक्टर अशोक बाजिया ने कहा, “लॉकडाउन में ढील दिये जाने से सड़क पर भीड़ बढ़ी है, संक्रमण भी बढ़ रहा है और हमारे काम में जोखिम भी. जब जोखिम की बात प्रशासन से करते हैं तो वो कहते हैं कि केंद्र सरकार ने कोरोना वॉरियर्स का 50 लाख रुपये का बीमा किया है. हम कहते हैं कि मरने के बाद जो पैसे देंगे, उसका एक मामूली हिस्सा भी इंटर्न डॉक्टरों को अभी दे दें तो हमारे काम आयेगा, जान बची रहेगी.”

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मनरेगा मज़दूरों से इंटर्न डॉक्टरों की तुलना

राजस्थान में विपक्ष के कुछ नेता लगातार इस मुद्दे पर टिप्पणी कर रहे हैं. बीजेपी के सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने ट्विटर पर लिखा है, “राजस्थान के इंटर्न डॉक्टर जान जोखिम में डालकर कोरोना से लड़ रहे हैं. पर दुख की बात है कि इन्हें महज़ 233 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से स्टाइपेंड मिल रहा है.”

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सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने इसकी तुलना मनरेगा मज़दूरों और प्रदेश में अकुशल श्रमिकों को मिलने वाली दिहाड़ी से की है.

मेडिकल एजुकेशन विभाग के डॉक्टर एस सी सोनी ने बीबीसी से बातचीत में दावा किया कि ‘उनके महकमे ने डॉक्टरों से ज्ञापन प्राप्त होने के बाद प्रदेश के वित्त विभाग से इंटर्न डॉक्टरों के भत्ते में संशोधन करने की गुज़ारिश की है जिसपर राजस्थान सरकार को निर्णय लेना होगा.’

राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर रघु शर्मा का इस मुद्दे पर क्या नज़रिया है? ये हमने जानने की कोशिश की थी. लेकिन उनके निजी सचिव चार दिन इंतज़ार करवाने के बाद भी स्वास्थ्य मंत्री का जवाब हमें नहीं दे पाये. अगर उनका जवाब हमें मिलता है तो उसे इस रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा.

कोविड-19 के दौरान काम करने की स्थिति और भत्ते के बारे में हमने राजस्थान के कम से कम सात ज़िलों में ड्यूटी कर रहे इंटर्न डॉक्टरों से बात की. सभी ने खुलकर अपनी बात रखी, जैसा कि वो पिछले कुछ सप्ताह से लगातार सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं.

लेकिन एक बात पर सभी डॉक्टरों ने विशेष ज़ोर दिया. उन्होंने कहा कि ‘हम स्टाइपेंड में वृद्धि ज़रूर चाहते हैं, लेकिन देश को इस वक़्त हमारी ज़रूरत है, इसलिए कोई भी इंटर्न डॉक्टर काम बंद नहीं करेगा. मगर प्रतीकात्मक तरीक़ों से और सोशल मीडिया पर विरोध जारी रहेगा.’

कर्नाटक, पंजाब के बाद यूपी के डॉक्टरों को भी आस

अप्रैल 2020 में, कोविड-19 से संबंधित ड्यूटी लगने के बाद कर्नाटक के डॉक्टरों ने अपने वेतन, मानदेय और स्टाइपेंड के लिए प्रदर्शन किया था, जिसके बाद प्रदेश की बीएस येदियुरप्पा सरकार ने 10 मई को रेज़िडेंट-पीजी डॉक्टरों के साथ-साथ इंटर्न डॉक्टरों का स्टाइपेंड बढ़ाकर क़रीब 30,000 रुपये कर दिया है.

वहीं कर्नाटक से पहले, पंजाब की कांग्रेस पार्टी सरकार ने भी इंटर्न डॉक्टरों का स्टाइपेंड बढ़ाया है. 24 अप्रैल 2020 को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इंटर्न डॉक्टरों का स्टाइपेंड 9,000 से बढ़ाकर 15,000 रुपये करने की घोषणा की थी.

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पिछले वर्ष महाराष्ट्र सरकार ने भी डॉक्टरों का स्टाइपेंड 6,000 से बढ़ाकर 11,000 रुपये कर दिया था. उस समय महाराष्ट्र में भी डॉक्टरों की राजस्थान के इंटर्न डॉक्टरों जैसी शिकायतें थीं.

वर्तमान में उत्तर प्रदेश में भी इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपेंड को लेकर चर्चा ज़ोरो पर है. यूपी के इंटर्न डॉक्टर भी पंजाब और कर्नाटक की तर्ज़ पर स्टाइपेंड बढ़ाये जाने की माँग कर रहे हैं.

यूपी में फ़िलहाल एक इंटर्न डॉक्टर को प्रति माह 7,500 रुपये मिलते हैं. उत्तर प्रदेश के इंटर्न डॉक्टर भी सोशल मीडिया पर खुलकर लिख रहे हैं. उनकी दलील है कि ‘वो इतने कम स्टाइपेंड में हर किस्म के ख़र्चों के साथ, अपनी सुरक्षा का ध्यान नहीं रख सकते.’

यूपी के इंटर्न डॉक्टरों के लिए हाल ही में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने भी ट्वीट किया था.

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उन्होंने लिखा था, “यूपी में एमबीबीसी इंटर्न डॉक्टर पूरे जी-जान से इस संकट में ड्यूटी कर रहे हैं. उनका जीवन भी संकट में रहता है. लेकिन उनको दिन का केवल 250 रुपये मिलता है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ये मानदेय बेहद कम है. मेरी समझ में, इस संकट के समय में इंटर्न डॉक्टरों का मानदेय बढ़ाना आपका फ़र्ज़ है.”

हालांकि राजस्थान के इंटर्न डॉक्टर प्रियंका गांधी के इस ट्वीट पर चुटकी लेते हैं कि ‘प्रियंका गांधी के ट्वीट की भाषा विपक्षी पार्टी के नेता किरोड़ी लाल मीणा के ट्वीट से कितनी मिलती-जुलती है. काश! वे अपनी सरकार के मुख्यमंत्री को भी उनका फ़र्ज़ याद दिलातीं और हमारे बारे में सोचतीं.’

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