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कोरोना: 'लॉकडाउन खुल जाए तो फिर शहर जाकर काम-धंधा करेंगे'- राजस्थान से ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, मोहर सिंह मीणा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
अचानक हुए लॉकडाउन के बाद देश के कई शहरों में काम कर रहे प्रवासी मज़दूरों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था. जिसके बाद किसी तरह शहर से गांव लौटे मज़दूरों के सामने अब फिर से रोटी का संकट है.
इसके चलते वो लॉकडाउन ख़त्म होने के तुरंत बाद फिर शहर लौटने के बारे में सोच रहे हैं. क्योंकि गांव में उनके पास रोज़गार का कोई साधन नहीं है, इसलिए मज़दूरों को रोज़गार के लिए शहर लौटने पर मजबूर होना पड़ेगा.
दिल्ली के चमचमाते कार्यालयों से सरकार ने भले ही बड़ी बड़ी घोषणाएं करने में कोई कसर नहीं छोड़ी हो, बहुत से वादे और दावों की राजनीति के बीच सुर्ख़ियां बटोरने के भरसक प्रयास किए जा रहे हों, लेकिन सरकार के इन दावों की सच्चाई क्या है और शहरों से लौटे प्रवासी मज़दूरों के हालात क्या हैं. यह जानने के लिए सरकार का कोई नुमाइंदा अभी तक इन मज़दूरों के पास नहीं पहुंचा.
राजस्थान में लौटे प्रवासी मज़दूरों की कहानी उनकी ही ज़ुबानी जानने और सरकार की घोषणाओं के बाद इन मज़दूरों के बदले हालातों की हक़ीक़त देखने के लिए हम इनके घरों तक पहुंचे.
राजधानी जयपुर से 180 किलोमीटर दूर डांग क्षेत्र का करौली ज़िला है. ज़िला मुख्यालय से क़रीब 6 किलोमीटर दूर श्यौरया ग्राम पंचायत और क़रीब 10 किलोमीटर की दूरी पर ससेड़ी ग्राम पंचायत है.
इन जगहों पर केरल, हैदराबाद, तमिलनाडु, हरियाणा, दिल्ली, तेलंगाना समेत कई राज्यों से प्रवासी लौटे हैं और क्वारंटीन में समय बिता रहे हैं, जबकि बहुत से प्रवासियों का आना जारी है.
श्यौरया ग्राम पंचायत में कई प्रवासी मज़दूर लौटे हैं और उनमें से ही एक हैं सजन सिंह, जो उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से पैदल ही घर पहुंचे हैं.
प्रयागराज से करौली तक का दर्दनाक सफ़र
जिस उम्र में युवक कॉलेजों में अपने सपनों को उड़ान देने का प्रयास करते हैं. उस 24 साल की उम्र में सजन 5 सदस्यों के परिवार की ज़िम्मेदारी उठा रहे हैं.
सजन बताते हैं कि वो पिछले चार साल से प्रयागराज के सिविल लाइंस इलाक़े में टाइल और पत्थर के कामों में मज़दूरी किया करते हैं.
लॉकडाउन के बाद पैसे की तंगी और खाने की परेशानी बढ़ती देख वो अपने कुछ साथियों की टोली के साथ हिम्मत जुटाकर पैदल ही गांव के लिए निकल पड़े.
वो बताते हैं गांव आने के लिए उन्होंने हद से ज़्यादा परेशानियां उठाईं. पैरों में छाले पड़ गए और अधमरी हालत में 8 दिन बाद घर पहुंचे.
वो बताते हैं, "रास्ते में पुलिस वालों ने हमें बहुत टॉर्चर किया, ख़ूब गालियां और लाठियां बरसाईं. किसी ने कोई मदद नहीं की और रास्ते में किसी ने पानी तक नहीं पिलाया."
"सभी दूरी बनाने और हमसे बचने के लिए मदद का हाथ तक नहीं बढ़ा रहे थे. बरसात से खेतों में भरे पानी को पीकर हमने प्यास बुझाई."
सजन कहते हैं, "घर पहुंचने के लिए हम दिन-रात चले. गांव पहुंचने तक एक ही रात सोए. रास्ते में एक टैंपो ने क़रीब 25 किलोमीटर तक छोड़ा और 11 हज़ार रुपए तक वसूले, जो हम एक महीने में कमाते हैं."
वो आगे बताते हैं, "प्रयागराज से कानपुर, आगरा होते हुए जैसे-तैसे उत्तर प्रदेश-राजस्थान की सीमा पर कोटथाना (तांतपुर) पहुंचे. तब तक हिम्मत टूट चुकी थी और शरीर जवाब दे गया था. हमने गांव वालों से गाड़ी लाने को कहा."
पुलिस से बचने के लिए गाड़ी वाले ने डांग के कच्चे रास्तों से होते हुए हमें धौलपुर-करौली जिलों की सीमा तक पहुंचाया, जहां पुलिस ने गाड़ी जब्त कर ली.
अधमरी हालत में गांव पहुंचे तो यहां पिता की मौत की ख़बर ने बिलकुल तोड़ दिया. उनके अंतिम दर्शन तक नसीब नहीं हुए. यह कहते हुए सजन सिंह के चेहरे की उदासी उनके दर्द को बयान कर रही थी.
सजन 3 मई को घर पहुंचे और 14 दिन के लिए होम क्वारंटीन रहे. क्वारंटीन का समय पूरा होने के बाद अब वो अपनी माता, भाई, भाभी और भतीजी समेत 5 सदस्यों के परिवार की ज़िम्मेदारियों को लेकर बेहद चिंतित हैं.
वो बताते हैं कि करौली में कोई रोज़गार नहीं है, सरकार की तरफ़ से कोई मदद नहीं मिली है और मनरेगा के तहत कई साल से किसी को भी काम नहीं मिला है.
वो कहते हैं, "बहुत परेशानियां उठाकर वापस घर आए, लेकिन अब लॉकडाउन खुल जाए तो फिर जाकर काम धंधा करेंगे. क्योंकि यहां तो भूखे मरने की नौबत आ जाएगी. यहां कोई धंधा है नहीं और हमें पत्थर व टाइल के काम के अलावा और कुछ आता भी नहीं है."
फ़रीदाबाद से करौली के 4 घंटे का सफ़र बना 4 दिन का
करौली ज़िला मुख्यालय से क़रीब 10 किलोमीटर दूर कच्चे-पक्के रास्ते और पत्थर की खानों के बगल से होते हुए हम ससेड़ी ग्राम पंचायत पहुंचे.
इस गांव के युवा कई राज्यों में मज़दूरी कर गांव में रहने वाले अपने परिवार की ज़िम्मेदारी उठा रहे हैं.
गांव में आठ सदस्यों के परिवार में अकेले कमाने वाले 35 वर्षीय नरेश जाटव हमें मिले.
उन्होंने अपना क्वारंटीन का समय पूरा कर लिया है और अब घर में एक रुपया भी नहीं होने से बेहद तनाव की स्थिति से गुज़र रहे हैं.
वो कहते हैं, "परिवार को भूखा मरना पड़ेगा, इस समय कोई क़र्ज़ भी नहीं दे रहा. फ़रीदाबाद से आया तब कुछ एक हज़ार रुपये पास थे, जिससे अब तक ख़र्च चल गया. लेकिन अब आगे मुश्किल है और यही हालात रहे तो परिवार को भूखे मरना पड़ेगा. सरकार से तो कुछ भी राहत और राशन नहीं मिला है. मुझे तो सरकार बीपीएल भी नहीं मानती है."
नरेश जाटव राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे फ़रीदाबाद में 350 रुपये पर दिहाड़ी मज़दूरी करते थे.
नरेश के पास एक कमरे का बड़े पत्थरों से बना एक कमरा ही है, जिसमें उनकी मां, पत्नी, एक बच्चा और बहन के तीन अनाथ बच्चे रहते हैं.
करौली तक 4 घंटे का सफ़र नरेश जाटव ने पैदल और कुछ दूरी तक टैंपो की मदद से 4 दिन में पूरा किया. लेकिन अब उनके लिए एक-एक दिन गुज़ारना भारी हो गया है.
नरेश कहते हैं, "सड़कों पर मज़दूरों की कतारें थीं और मदद के लिए कोई हाथ नज़र नहीं आया. मैं कैसे लौटा हूं यह तो मैं ही जानता हूं. सरकारों ने मज़दूर की कोई मदद नहीं की."
वो बताते हैं कि माहौल ख़राब होते देख और पैसा व खाना नहीं होने के कारण वो फ़रीदाबाद से 30 मार्च को सुबह 6 बजे गांव के लिए निकल गए थे. पलवल, मथुरा, भरतपुर, हिंडौन होते हुए बेहद मुश्किलों से करौली और फिर गांव पहुंचे.
वो हमसे ही एक सवाल करते हैं कि परिवार को क्या खिलाएं और किस तरह जीवन की गाड़ी को चलाएं. अब दो महीने से रोज़गार नहीं है, पैसा भी नहीं है और राशन भी ख़त्म होने के कगार पर है.
प्रवासी मज़दूर नरेश जाटव यूं तो 350 रुपये दिहाड़ी के हिसाब से कमाते हैं, लेकिन वो ग़रीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) की सूची में शामिल नहीं हैं.
न उनके पास ज़मीन है और न ही परिवार पालने के लिए अन्य कोई कमाई का ज़रिया है. वो इस क़दर परेशान हैं कि बातों ही बातों में कई बार उन्होंने शासन-प्रशासन पर मज़दूरों की अनदेखी का आरोप लगाया.
वो सरकार से किसी भी तरह की सुविधा नहीं दिए जाने पर भी ख़ासी नाराज़गी ज़ाहिर करते हैं. अपने हालात बताते हुए नरेश की आंखें नम हो जाती हैं.
ससेड़ी पंचायत के ग्रामीणों ने बताया कि, यहां मनरेगा जैसा कुछ नहीं है. लोग मनरेगा को भूलते जा रहे हैं क्योंकि पिछले पांच साल से ग्रामीणों को मनरेगा के तहत एक दिन का भी रोज़गार नहीं मिला है.
जबकि राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री व पंचायती राज विभाग मंत्री सचिन पायलट दावा कर रहे हैं कि देश में सबसे ज़्यादा राजस्थान में ही मनरेगा के तहत रोज़गार दिया जा रहा है. हालांकि, ज़मीनी हालात कुछ और ही बयान कर रहे हैं.
प्रवासी मज़दूर फिर काम पर लौटने की जल्दी में क्यों
डांग विकास संस्थान के कार्यक्रम समन्वयक राजेश शर्मा कहते हैं कि करौली ज़िले के क़रीब 25 हज़ार प्रवासी मज़दूर हैं. अधिकतर के पास एक बीघा ज़मीन से कम है, इसलिए खेती से परिवार पालना संभव नहीं है.
करौली में पत्थर की खान पर ही लोग गुज़ारा कर रहे हैं, लेकिन इन खानों से सिलिकोसिस की बीमारी और कम आय के चलते भी लोग बाहर जाने को मजबूर हुए हैं.
करौली ज़िले की ससेड़ी और श्यौरया पंचायत के ग्रामीणों का कहना है कि यहां मनरेगा के तहत कई साल से किसी भी ग्रामीण को काम नहीं मिला है. इस कारण लोगों को जीवनयापन के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ता है.
अधिकतर प्रवासी अपने ही देश में बेगानों की तरह सैकड़ों किलोमीटर भूखे-प्यासे, पुलिस की लाठियां झेलते हुए पैदल ही अपने गांवों की ओर लौटे हैं.
दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले इन प्रवासी मज़दूरों का जीवनयापन दिनभर की कमाई से ही होता था.
अब लॉकडाउन के दो महीने बीत जाने के बाद इनके हाथ खाली और पेट रोटी तलाश रहे हैं.
परिवार पालने की समस्याएं किसी पहाड़ की तरह खड़ी हो गई हैं, जिसे तोड़ने के लिए यह मज़दूर दशरथ मांझी बन जाना चाहते हैं.
ये अपने दर्द भरे सफ़र को भूल कर फिर एक बार अन्य राज्यों में रोज़गार की तलाश में लौट जाना चाहते हैं.
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