कोरोना वायरस: सर्कस के जोकरों की ये हँसी रुलाने वाली है

    • Author, चिंकी सिन्हा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सभागृह के बीचों-बीच जोकर की पोशाक पहने दो लोग खड़े थे. उनकी भँवें तनकर आसमान की ओर उठी हुई थीं. प्लास्टिक की एक लाल नाक उनके चेहरे पर चिपकी थी. वो अपना कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी में थे.

50 साल के बीजू पुष्करन ने पोलका प्रिंट का ढीला ढाला लाबादा पहना हुआ था. उनके चेहरे पर सफेद पाउडर और गाल पर सिंदूरी रंग और लिपस्टिक चढ़ी हुई थी.

मेकअप का यह गुर उन्होंने तभी सीख लिया था जब उन्होंने जोकर बनने का फ़ैसला किया था. वो मंच पर एक दूसरे जोकर के साथ पहुँचे, जो शायद उनका शागिर्द था. 6 मार्च के बाद से वो कोई शो नहीं कर पाए थे.

लेकिन 16 अप्रैल की रात रैम्बो सर्कस के ये जोकर दूसरे कलाकारों के साथ नवी मुंबई के ऐरोली इलाक़े में शो कर रहे थे. लेकिन वहां वाहवाही करने और तालियां बजाने के लिए कोई दर्शक नहीं था. फिर भी उन्होंने अपना शो जारी रखा.

वो 18 अप्रैल को विश्व सर्कस दिवस पर इस कार्यक्रम के वीडियो को स्ट्रीम करना चाहते थे. वो दुनिया को यह भेंट देना चाहते थे. जोकरों, कलाबाज़ों, तनी हुई रस्सी पर चलने वाले करतबगारों या कहें कि सर्कस की पूरी दुनिया की ओर से.

जोकर बने बीजू नायर ने कहा, "हम आपके घर आएंगे और आपको हंसाएंगे."

मुश्किल भरा दौर

यह अजीब दौर है. जोकर ने कार्यक्रम की शुरुआत में ही लोगों से अपील की कि वो हाथ धोया करें, मास्क पहनें. घर के भीतर रहें वगैरह-वगैरह.

फिर एक लड़की की एंट्री हुई. उनके हाथों और पांवों पर जलती मोमबत्तियों वाले झूमर टिके थे और एक झूमर उन्होंने अपने मुंह से उठाया हुआ था. उन्होंने उनका संतुलन बरकरार रखते हुए अपने शरीर को मोड़ा.

एक पल को लगा जैसे मोमबत्तियां गिर जाएंगी और झूमर बिखर जाएगा. लेकिन वो ना गिरे ना बिखरे. उन्होंने अपने शरीर को सीधा किया और खड़ी हो गई. उन्होंने ख़ाली बेचों की ओर अभिवादन किया.

बीजू नायर लगभग 40 साल से सर्कस मे काम कर रहे हैं. कई सर्कसों के साथ वे जुड़े, लेकिन वो उस मंज़र के इतने क़रीब कभी नहीं रहे, जहाँ शायद पर्दा आख़िरी बार गिरे.

कई हफ़्तों से सर्कस का तंबू मुंबई के एक उपनगर के मैदान में लगा हुआ है लेकिन कोई शो नहीं हो पाया है. लॉकडाउन की घोषणा के बाद ही इन लोगों के पास खाद्य सामग्री और पैसे ख़त्म हो गए थे.

रैम्बो सर्कस के मालिक सुजीत दिलीप पुणे में फंसे हुए हैं. उन्होंने कहा कि उन लोगों को जनता से मदद की अपील करनी पड़ी.

जोकर बनने वाले बीजू ने मदद की गुहार लगाने के लिए 5 अप्रैल को एक वीडियो अपलोड किया. वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया और मदद भी आई.

मिली मदद

सबसे पहले मदद मिली एक लड़की जिनिशा पटेल से जिन्होंने एक महीने पहले बेलापूर में सर्कस के मैदान पर बीजू के साथ सेल्फ़ी ली थी.

11 अप्रैल को जिनेशा पटेल के जन्मदिन पर उनके पिता उन्हें ऐरोली में रैम्बो सर्कस ले गए थे. वहां उन्होंने सर्कस के 90 कर्मचारियों को राशन बाँटा. उनके चाचा मूक-बधिर हैं और पेशे से टेलर हैं.

उन्होंने सर्कस के लोगों के लिए 100 मास्क सिले.

11 अप्रैल को जिनेशा 21साल की हो गई. उन्होंने कहा, ''मै हमेशा सोचती थी सर्कस के जोकरों के बारे में. वो कितनी मेहनत करते हैं हमें हँसाने के लिए."

अब बहुत लोग मदद करने के लिए आगे आए है. हालात बेहतर हैं लेकिन डर और चिंता बाक़ी है.

वैसे बीजू को ये पता है कि एक बार मेकअप लग जाए तो वो अपनी चिंता को दूर भगा सकते हैं. बीजू कहते हैं- यही तो करते हैं जोकर."

उधर देश के दूसरे छोर पर पश्चिम बंगाल के आरामबाग़ शहर में ओलंपिक सर्कस ने हमेशा की तरह अपना तंबू लगाया था.

लेकिन 19 मार्च मे इस सर्कस मे काम करने वाले सभी 75 लोग वहां से चले गए.

जीना यहाँ मरना यहाँ

सर्कस के मालिक चंद्रनाथ बनर्जी के मोबाइल फ़ोन की घंटी काफ़ी देर बजती रही. फ़ोन का रिंगटोन राज कपूर की पुरानी फ़िल्म मेरा नाम जोकर का एक गाना था- जीना यहाँ मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहां.

फ़िल्म में राज कपूर ने सर्कस के जोकर की भूमिका निभाई थी. वो शीशे का एक दिल हाथों में लिए यह गीत गाते हैं जो सर्कस को एक दुनिया की शक्ल में देखता है जिसमें एक जोकर मंच पर आता है और लोगों को हँसाता है.

61 साल के चंद्रनाथ बनर्जी को यह सर्कस 1975 में अपने पिता सुबोधचंद्र बनर्जी से विरासत में मिला था. बनर्जी ने सभी कर्मचारियो को उनकी तनख़्वाह दी और कहा कि अगर वो इस अंधकार वाले दौर से निकल गए तो उन्हें वापस बुलाएंगे.

उस पल को याद करते हुए वो कहते हैं, "लोग रो पड़े थे. हम चाहते थे कि लोग आएं और शो देखें. लेकिन इस दौर में, जब लोगों को सामाजिक दूरी बनाकर रहने को कहा जा रहा है, हमें सर्कस बंद करना पड़ा."

ओलंपिक सर्कस

ओलंपिक सर्कस की स्थापना 1942 में उनके पिता ने की थी. जो उन दिनों सर्कस में ख़ुद कलाबाज़ी करते थे. वो हमेशा गाँवों, क़स्बों और शहरों में घूम घूम कर शो करते थे. बनर्जी कहते हैं एक बार तो वे लोग जापान भी गए थे.

वो कहते हैं, "एक समय था जब सर्कस बड़ी बात हुआ करता था. इसने लोगों को हँसाया, लोगों ने यहाँ ऐसे-ऐसे जानवर देखें, जिन्हें उन्होंने कभी नहीं देखा था. हमारे पास शेर थे, हाथी और ऊंट थे."

ये उस समय की याद है, जब सर्कस एक मनोरंजन था. सर्कस एक तिलस्मी दुनिया में खुलने वाली खिड़की था, जहाँ बातचीत के माध्यम से एक ठहराव आता था.

टेलीविज़न के आने के बाद से बहुत कुछ चला गया. लेकिन इसके बावजूद वो किसी तरह बचे रहे. शायद इसलिए क्योंकि यही एक ज़िंदगी थी जिसे वो जानते समझते थे- एक घुमंतू ज़िंदगी.

चंद्रनाथ बनर्जी कहते हैं, "अब हम फंस गए हैं. महामारी हम पर अंतिम प्रहार है."

हार नहीं मानूँगा

लेकिन द ग्रेट बॉम्बे सर्कस के मैनेजर जयप्रकाशन अभी हार मानने को तैयार नहीं हैं. वे 52 साल के हैं.

तमिलनाडु के मनारगुडी शहर में सर्कस का तंबू लगा हुआ है. सर्कस यहां 22 फ़रवरी को आया था. 17 मार्च को यहां लॉकडाउन हो गया.

वो कहते हैं, "लॉकडाउन के हटने के बाद क्या होगा हम नहीं जानते. कोरोना वायरस ने हमें इंतज़ार करने पर मजबूर कर दिया है."

द ग्रेट बॉम्बे सर्कस 100 साल पुराना है. यह उनका शताब्दी वर्ष है. और इसके सभी 138 कर्मचारी एक छोटे शहर में लगे तंबू में रह रहे हैं.

जयप्रकाशन कहते हैं, "मैं 31 साल से सर्कस के साथ जुड़ा हुआ हूँ और मै आपको यह बता दूं कि सर्कस ज़िंदगी है और सर्कस चलता रहेगा."

लगभग 20 साल पहले भारत में 23 सर्कस चलते थे जो एक नेशनल फ़ेडरेशन का हिस्सा थे. इसके अलावा देश भर में क़रीब 300 छोटे सर्कस थे.

भारत सरकार ने 2013 में सर्कस में जंगली जानवरों से काम करवाने पर पाबंदी लगा दी. साथ ही इसमें बच्चों के काम करने पर भी रोक लग गई. इसके चलते कई सर्कस दीवालिया हो गए और आख़िरकार बंद हो गए.

हालांकि भारत में गांव-गांव घूम कर करतब दिखाने वालों की परंपरा रही है लेकिन सर्कस जिस तरह पश्चिमी देशों में होते थे उस शक्ल में भारत में इसकी शुरुआत 1880 में हुई थी.

महामारी ख़त्म होने का इंतज़ार

रैम्बो सर्कस के दिलीप भारतीय सर्कस फ़ेडरेशन के सदस्य भी है. वो कहते हैं, "अब भारत में 10 से भी कम रजिस्टर्ड सर्कस बचे हैं और लगभग 25 छोटे सर्कस हैं जिनमें 1500 कलाकार काम करते हैं जिनमें मणिपुर की कलाबाज़ टीमें भी शामिल हैं. उनके लिए हालात मुश्किल हैं. नोटबंदी से भी उन्हें काफ़ी नुकसान पहुंचा था."

सर्कस चलाने का मासिक ख़र्च 15 लाख रुपए है और बमुश्किल ख़र्च भर निकल पाता है. लेकिन पिछले कई सालों से यही उनका परिवार है.

इस मुश्किल घड़ी में भी दिलीप कहते हैं कि वो सरकार पर बोझ नहीं बनना चाहते. वो बस इतना चाहते हैं कि क़र्ज़ लेकर तब तक खींच लें जब तक इस महामारी का टीका विकसित नहीं हो जाता.

वो कहते हैं, "मैंने इतिहास में पढ़ा है कि कई महामारियां आईं और चली गईं. हमारे लिए यह लंबा संघर्ष है. हमें मदद चाहिए. मुफ़्त पैसे नहीं चाहिए. हम भी मदद करना चाहते हैं. हमारे पास दर्जी हैं जो लोगों के लिए मास्क सिल सकते हैं. हमें पता है कि भविष्य में सोशल डिस्टेंसिंग सामान्य जीवन का हिस्सा बन जाएगा. हो सकता है हम अपने शो जारा रखने का कोई तरीक़ा खोज लें. मुझे तो उम्मीद है."

इन लोगों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर सहायता की अपील की है और अब जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं.

तब तक बीजू अपना मेकअप करके तंबू के गिर्द मैदान में घूमते रहते हैं, औरों के साथ साथ अपना मन बहलाने की कोशिश करते रहते हैं.

फ़िलहाल तो उनके पास खाना है. रिंग मास्टर से लेकर दूसरे कलाकार अपने करतब का अभ्यास करते रहते हैं ताकि जब सर्कस शुरू हो तो वो तैयार रहें. जब भी वो शुरू हो.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)