ये क्यों नुकीली छड़ों को चुभो कर ख़ुद को दर्द दे रहे हैं?

- Author, सहर जैंड
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
पश्चिम बंगाल में प्राचीन काल से फ़सलों की कटाई से पहले त्योहार मनाने की परंपरा रही है, इस त्योहार में पुरुष अपने शरीर में लोहे की छड़ों और हुक घुसा लेते हैं.इस साल कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते यह उत्सव नहीं मनाया जा रहा है. लेकिन पिछले साल इस उत्सव में सहर जैंड शामिल हुईं थीं. वह बता रही हैं कि शिवभक्तों के मुताबिक़ उत्सव के बिना फ़सल अच्छी नहीं होती.क़रीब एक साल पहले मध्य अप्रैल की एक सुबह थी. गंगा नदी के किनारे एक विशाल पेड़ के नीचे कुछ युवक घेरा बनाकर बैठे थे. इन सबसे चमकीले लाल रंग की धोती पहन रखी थी.इनमें से अधिकाशं लड़के लोहे की नुकीली छड़ों को तेज़ कर रहे थे, जिसे बरछी कहते हैं. क़रीब दो फीट लंबी और नुकीली छड़ को बरछी कहते हैं. छड़ जितनी नुकीली होगी उतना ही इस उत्सव में युवाओं के घायल होने का ख़तरा कम होगा.समूह के सबसे उम्रदराज़ युवा है संदोष और वो महज़ 26 साल के हैं. संदोष समूह के इकलौते ऐसे सदस्य हैं जो इससे पहले भी ख़ुद को दर्द पहुंचाने वाले इस आयोजन में हिस्सा ले चुके हैं.
उन्होंने मुझे बताया कि बीते कई सालों में ऐसे आयोजनों में हिस्सा लेकर वे अपने ओठ, कान, बांह, छाती, पेट और पीठ सब में नुकीली छड़ों को चुभा चुके हैं. उन्होंने बताया, "थोड़े समय तक तकलीफ़ होती है लेकिन इसका फल मीठा है. हम जो चाहते हैं उसकी क़ीमत तो हम सबको चुकानी होती है."

दरअसल ये लोग चाहते हैं कि इनकी फ़सल की पैदावार अच्छी हो. पश्चिम बंगाल के कृष्णदेवपुर गांव के लोग फ़सल की कटाई से पहले यह त्योहार मनाते हैं जिसे गजान कहते हैं. यह साल का सबसे बड़ा उत्सव होता है और संयोग से यह बंगाली कैलेंडर के समापन के मौक़े पर मनाया जाता है.इसमें हिस्सा लेने वाले किसान भगवान शिव के प्रति अपनी आस्था का प्रदर्शन करते हैं. इन लोगों के मुताबिक़ शिव भगवान की इच्छा पर ही अच्छे फ़सल के लिए उपयुक्त मौसम का होना संभव है.
संतोष ने बताया, "जब हम एक बार उत्सव शुरु कर देते हैं तब भगवान शिव हमलोगों को अपनी शरण में लेते हैं. हमलोगों को उनकी ताक़त और साहस मिल जाता है."
पास में बैठे राहुल उनकी बातों को गंभीरता से सुन रहे थे. वे 10 साल की उम्र से ही इस आयोजन में हिस्सा लेने के लिए अपने माता-पिता को मना रहे थे. 15वें साल में ख़राब फ़सल होने के चलते माता-पिता ने ना चाहते हुए भी उनके इस आयोजन में भाग लने की अनुमति दे दी.

राहुल ने बताया था, "शिव भगवान ख़ुश नहीं हैं. यही वजह है कि हम सब मुश्किल में हैं. वे हम लोगों को दंड दे रहे हैं."राहुल की बातों से हर कोई सहमत नज़र आया. राहुल ने आगे कहा, "इसलिए उनके क्रोध से अपनी रक्षा, अपने परिवार की रक्षा के लिए यह ज़रूरी है कि हमें उनकी प्रति अपनी भक्ति को प्रदर्शित करना होगा."जब लोहे की छड़ नुकली हो गईं, तब एक के बाद इन युवाओं ने शरीर और आत्मा दोनों की शुद्धि के लिए गंगा नदी में डुबकी लगाई थी.

इस आयोजन से पहले के लगातार छह सालों तक, 22 साल के अजॉय इसमें शामिल होते रहे लेकिन 2019 के आयोजन में वे शरीक नहीं हुए. समय के साथ उनका भरोसा अब आयोजन में नहीं रहा. उन्होंने बताया, "जब मैं कोई परिणाम नहीं देख रहा हूं तो फिर ख़ुद को क्यों नुक़सान पहुंचाता रहूं."वे मुझे अपने पारिवारिक खेत पर ले गए. जहां मेरे सामने सड़ रही सब्जियों की क़तारें थीं. खेत के किनारे आम के पेड़ थे, जिनकी फलों पर कीड़ों का असर था.अजॉय ने बताया, "कई बार ज़रूरत के मौक़ों पर बारिश नहीं होती है और हमारी फ़सल सूखे के चलते ख़राब हो जाती है. कई बार असमय बारिश हो जाती है, बहुत ज्यादा बारिश होती है, हमारे खेतों में पानी भर जाता है और हमारी फ़सल तबाह होती है."अब तक गर्मी भी काफ़ी तेज़ होने लगी है. अजॉय ने बताया कि समस्या भगवान शिव की नाराज़गी की नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है. अजॉय के मुताबिक़ कोलकाता के कॉलेज से बंगाली साहित्य में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वह किहीं भी नौकरी के लिए कोशिश करेंगे.इसके बाद दिन में उत्सव की शुरुआत के वक़्त फ़ुटबॉल मैदान जितने बड़े अहाते में सैकड़ों लोग जमा हो गए थे. इनमें रंगबिरंगी साड़ियां पहनीं महिलाएं और उमंग में दौड़ते बच्चों का समूह भी शामिल था. अलाव जलाए जा रहे थे. स्थानीय नाश्ते के आइटम और मसालों की ख़ुशबू थी और लाउडस्पीकरों से तेज़ संगीत बज रहा था.

संतोष और राहुल मैदान के बीचोंबीच खड़े थे और उनके साथ कम से कम 100 पुरुष भी थे. इन सबने कमर के नीचे लाल रंग की धोती लपेटी हुई थी और ऊपर कुछ नहीं पहना था. वे लोग भजन की तरह गा रहे थे, "शिव सबसे ताक़तवर देवता हैं. सभी भक्तों को उनकी पूजा में शामिल होना चाहिए."इसे भजन के तरह लोग घंटों तक गाते रहे. यह उत्सव का बेहद अहम हिस्सा है क्योंकि इसके ज़रिए ही लोग साधना में लीन होते हैं. अमूमन उत्सव के दिन लोग उपवास रखते हैं लेकिन शराब पी सकते हैं और गांजा भी. माना जाता है कि इससे घायल होने का ख़तरा कम होता है.राहुल, पुजारी के चारों तरफ़ नाच रहा था. पुजारी ही भक्तों को नुकीली छड़ों को चुभाने का काम करेंगे. राहुली की आंखें चौड़ी हो रही थीं लेकिन वह सही दिख रहा था.शरीर पर नुकीली बरछी चुभाने के प्रक्रिया शुरू होते ही भीड़ बढ़ने लगी. पीड़ा को दर्शाने वाली महिलाओं की आहें सुनाई पड़ने लगी थीं. अनिच्छा से ही सही, मैंने ख़ुद को वहां दूर किया.

जब मैंने पीछे मुड़कर देखा तो कई भक्त भगवान शिव के मंत्रों को दोहरा रहे थे, लेकिन उनके गाल, कान, ओठ, नाक, छाती, बांह और पीठ सब जगहों पर लोहे की कई छड़ें धंसी हुई थीं.पुजारी ने संतोष की एक बरछी ले ली और उसे केला पर घिसा ताकि वह थोड़ा चिकना हो जाए. इसके बाद मंत्र बुदबुदाते पुजारी ने उसे संतोष के गाल पर चुभोना शुरू किया, जल्दी ही वह नुकीली बरछी एक तरफ गाल में घुसकर दूसरी तरफ़ निकल आया.संतोष तकलीफ़ में दिखाई दिया, उसका पूरा शरीर कांप रहा था. पुजारी ने उसके गालों में दो और बरछी चुभो दीं और सबको गाल में ही छोड़ दिया.

अगली बार राहुल की थी. वे आगे आया तो उसकी आंखें पूरी तरह बंद थी. पुजारी ने उसके कान से शुरू किया. इसके बाद निचले ओठ में बरछी को चुभाया गया. निचले ओठ ही नहीं बल्कि ऊपरी ओठ में भी कई छड़ों को चुभो दिया गया. अंत में पुजारी ने राहुल की छाती पर एक इंच की दूरी पर दो जख़्म किए और वहां छड़ को धंसा दिया. मैंने राहुल की आंखों से आंसू की छोटी से बूंद गिरते देखीं, जिससे उसकी तकलीफ़ का पता चल रहा था.राहुल ने भगवान शिव के मंत्र पढ़ने की कोशिश तो ज़रूर की लेकिन उसकी आवाज़ बेहद धीमी रही. लोहे की पतली छड़ों के चलते उसके चेहरे का हाव भाव सहज नहीं था. अन्य भक्तों ने राहुल को अपने कंधों पर उठा लिया और उसको लेकर घेरा बनाकर परेड करने लगे, ताकि पूरे समुदाय को यह नज़र आए.मेरे लिए अचरज की बात यह थी कि इस पूरी प्रक्रिया में मुझे ख़ून का एक बूंद भी नहीं दिख रहा था. लेकिन अभी यह उत्सव पूरा नहीं हुआ था. भक्त अब चरक पूजा की तैयारी करने लगे थे जो इस उत्सव का अंतिम और बेहद डरावना हिस्सा है.उत्सव के समापन वाले अनुष्ठान में ख़ुद को तकलीफ़ पहुंचाने की प्रक्रिया और दुरुह हो जाती है. इसमें वही भक्त हिस्सा लेते हैं जिनको अभ्यास होता है, जो अनुभवी होते हैं. इसमें एक झूले जैसी रस्सी से लगे दो हुकों पर भक्त लटक जाते हैं, ये हुक उनके पीठ की मांस को आर पार करके निकले आते हैं और भक्त उससे लटके हुए मालूम पड़ते हैं.

इसमें हिस्सा लेने के लिए क़तार में सबसे आगे थे सुमन. 34 साल के सुमन 12 साल की उम्र से ही प्रत्येक साल इस उत्सव में हिस्सा लेते आए हैं. पहली नज़र में पुजारी उन्हें मौक़ा देने से इनकार कर दिया, क्योंकि उनका मानना था कि सुमन के पीठ पर ऐसी कोई जगह बची नहीं है जहां पर इन छड़ों को चुभाया नहीं गया हो.
लेकिन जब सुमन ने ग़ुस्से में आते हुए अनुष्ठान में शामिल होने पर ज़ोर दिया तो पुजारी उनकी पीठ पर चपत लगाई और पीठ के मांस को जितना खींच सकते थे, उतना खींचा और उसमें हुक फंसा दिया. सुमन ने अपनी मुठ्ठी को कसकर भींच लिया. उनकी आंखें बंद हो गईं, माथे पर नसें ऐसे नज़र आ रही थीं मानो अभी बाहर निकल आएंगी. सुमन बेहोश हो गए.लोग सुमन के चेहरे पर पानी का छींटा मारने लगे, आंखें खोलने के लिए थप्पड़ लगाने लगे. इसके बाद सुमन उठ गए. दूसरे भक्त उन्हें सहारा देते हुए उस मंच तक ले गए जहां झूला लगा था, लोगों ने उनकी पीठ में घुसी लोहे की हुकों से रस्सी को बांध दिया. झूले की दूसरी तरफ़ काउंटर बैलेंस करने के लिए दूसरे भक्त को ऐसे रस्सी के सहारा बांधा गया. इसके बाद दोनों को घुमाया गया और वहां मौजूद भक्तों की भीड़ उनका उत्साह बढ़ाती रही. इस दौरान दोनों में किसी के चहरे पर दर्द का भाव नज़र नहीं आया. सुमन मुस्कुराते हुए नीचे खड़ी भीड़ से बात करते दिखे.

कुछ राउंड चक्कर लगाने के बाद झूला धीमा हो गया और सुमन ने एक बच्चे को लपक लिया. कई माता-पिता अपने बच्चे को लेकर खड़े थे, वे बच्चे को भगवान शिव का आशीर्वाद दिलाने लाए थे. सुमन और उनके साथी ने रोते हुए बच्चे के साथ झूले का एक चक्कर लगाया, फिर बच्चे को उसके माता-पिता को थमाने के बाद दूसरे बच्चे को थाम लिया.एक मां ने मुझे बताया, "जब तक भक्त वहां झूले पर हैं तब तक उनमें भगवान शिव का वास होता है. जब मेरे भगवान के पास ही मेरा बच्चा है तो मुझे किसी बात की चिंता नहीं है."10 मिनट के बाद झूला रूक गया, सुमन को उतारा गया और वहां दूसरे भक्त को टिकाया गया. पीठ में लोहे की हुक के साथ सुमन ने मुझे बताया, "जब तक मैं वहां रहा, उस पूरे समय में मैंने ख़ुद को ईश्वर से कनेक्टेड पाया. मुझे लग रहा था कि मैं समुदाय के बाक़ी लोगों और भगवान शिव के बीच पुल बना हुआ हूं."मैंने सुमन से पूछा कि गजान के आयोजन बंद हो जाने पर वह क्या सोचते हैं. इसके जवाब में सुमन ने बेहिचक कहा, "तब दुनिया ख़त्म हो जाएगी. भगवान शिव का क्रोध हम सबको नष्ट कर देगा."

लेकिन इस साल अप्रैल में जब सामुदायिक स्तर पर गजान के आयोजन की तैयारी हो रही थी तब भारत सरकार ने कोविड-19 संक्रमण फैलने पर अंकुश लगाने के लिए देश भर में लॉकडाउन घोषित कर दिया.इस साल गजान का आयोजन नहीं होगा- संभवत हज़ारों साल के इतिहास में पहली बार ऐसा होगा.(सभी तस्वीरें सहर जैंड की है, आप उनकी रेडियो डॉक्यूमेंट्री वर्किंग ऑन हॉट क्वाइल बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के हार्ट एंड सोल कार्यक्रम मे सुन सकते हैं)














