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कोरोना वायरस: लॉकडाउन पर जान और जहान दोनों चुनेंगे पीएम मोदी?
- Author, तारेंद्र किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए पिछले 21 दिनों से जारी लॉकडाउन की समय सीमा पूरी होने वाली है.
इसके साथ ही लॉकडाउन को बढ़ाने और इसे ख़त्म करने को लेकर चर्चाएं भी तेज़ हो गई हैं. ओडिशा, पंजाब, महाराष्ट्र, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे देश के कई राज्यों ने अपने यहाँ लॉकडाउन बढ़ाने की घोषणा पहले ही कर दी है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए इस मुद्दे पर बैठक की है और अब वो इसे लेकर 14 अप्रैल की सुबह 10 बजे देश को संबोधित भी करने जा रहे हैं.
संभावना व्यक्त की जा रही है कि वो लॉकडाउन की समय सीमा बढ़ाने की घोषणा करेंगे. इस बात की भी चर्चा है कि इस बार लॉकडाउन की घोषणा के साथ कुछ क्षेत्रों में रियायतों की भी बात की जाएगी.
लेकिन यह तो निश्चित है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी यह आसान फ़ैसला नहीं होने वाला है. 21 दिनों की लॉकडाउन ने जहां एक तरफ़ अर्थव्यवस्था को भारी नुक़सान पहुँचाया है तो दूसरी ओर भारत में कोरोना का संक्रमण विस्फोटक स्तर पर ना पहुँचे, इसकी भी बड़ी चुनौती है.
ऐसी रिपोर्टें भी आ रही हैं कि सरकार के ऊपर कई सेक्टरों की ओर से उद्योग-धंधों का शुरू करने का दबाव बढ़ रहा है. उद्योग जगत की ओर से उन्हें जान के साथ जहान की चिंता करने की भी सलाह दी जा रही है.
सार्वजनिक स्वास्थ्य बनाम अर्थव्यवस्था का द्वंद्व
मशहूर अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार का मानना है कि अर्थव्यवस्था को अभी पूरी तरह से नहीं खोलना चाहिए.
वो कहते हैं, "अगर लॉकडाउन को खोल दिया जैसा कि कहा जा रहा है कि 15 उद्योगों को खोल देंगे. उसके साथ ही ट्रांसपोर्ट भी खोल देंगे. फिर इसके साथ ट्रेड भी खोलना पड़ेगा. तो यह ठीक नहीं होगा. अभी इस वक़्त ज्यादा लॉकडाउन को नहीं खोलना चाहिए. अगर हमारे पास पर्याप्त डेटा होता और रैपिड टेस्टिंग की व्यवस्था होती तो फिर कुछ ज़रूरी उद्योगों को खोलने के बारे में सोचा जा सकता था. लेकिन इसके अलावा ऐसा नहीं होना चाहिए कि हम पेपर, टेक्सटाइल और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री भी खोलने के बारे में सोचें."
लेकिन लॉकडाउन नहीं खोलने की स्थिति में अर्थव्यवस्था पर होने वाले असर पर वो कहते हैं कि एक माकूल स्थिति होनी चाहिए जिसमें अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य दोनों को साथ लेकर जा सकें लेकिन स्वास्थ्य की ज़रूरत अभी ज़्यादा है, इसलिए पहले इस पर ही ध्यान दिया जाए.
वो कहते हैं, "अगर सार्वजनिक स्वास्थ्य की स्थिति को नहीं संभाला तो अर्थव्यवस्था तो ऐसे भी बिगड़ जाएगी. कोरोना संक्रमण का दूसरा दौर आता है तब उस वक़्त अर्थव्यवस्था को संभालना और भी मुश्किल हो जाएगा. इसलिए ये हेल्थ इमर्जेंसी पहले है फिर इकॉनमी की इमर्जेंसी."
जिन राज्यों में कोरोना के सबसे ज़्यादा मरीज़ मिले हैं उनमें राजस्थान भी है. राजस्थान के सवाई मान सिंह अस्पताल के डॉक्टर राजेंद्र बागड़ी कहते हैं, "इस लॉकडाउन को आगे जारी रखने की ज़रूरत है नहीं तो 21 दिनों के लॉकडाउन पर पानी फिर जाएगा. अब हॉट स्पॉट सारे पहचाने जा चुके हैं. एक बार लॉकडाउन खुला और मूवमेंट शूरू हुआ तो फिर तीन हफ़्तों के लॉकडाउन का कोई फ़ायदा नहीं रह जाएगा."
लॉकडाउन और कितने दिन जारी रहना चाहिए?
इस पर वो कहते हैं, "कम से कम इंक्यूबेशन पीरियड तक यह जारी रहना चाहिए जो कि दो हफ्ते का होता है. इसी पीरियड में ये वायरस संक्रमण के लक्षण दिखाता है."
वो आगे कहते हैं, "लॉकडाउन भारत में सही समय पर किया गया, जिससे कम्युनिटी स्प्रेड नहीं हुआ और देश संक्रमण के दूसरे चरण में ही रुका हुआ है. नहीं तो यहां के हालात स्पेन और इटली जैसे विकराल हो जाते."
स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़ अगर भारत में लॉकडाउन में नहीं किया गया होता तो यहां इटली से भी बदतर हालत होती. देश में 15 अप्रैल तक आठ लाख 20 हज़ार लोग कोरोना से संक्रमित हो सकते थे.
अर्थव्यवस्था का संकट
लॉकडाउन नहीं खुलने की स्थिति में अगर लोगों के पास रोजगार और आमदनी नहीं होगी तो फिर उस संकट से कैसे निपटेंगे.
इस पर वो सुझाव देते हैं कि गांवों से सामान उठाकर शहरों में बाँटना चाहिए. सरकार के पास जो 50 मिलियन टन जो फूड स्टॉक है, उसे बाँटना चाहिए. ताकि लोगों को कहीं और न जाना पड़े और घरों से निकलना पड़े.
वो कहते हैं, "हमें अभी सबसे मूल बात पर ध्यान देना चाहिए कि किसी भी तरह से लोगों की जान बचे. पहले लोगों की जान बचाई जाए और उन्हें बुनियादी जरूरत की चीजें उपलब्ध कराई जाए. अर्थव्यवस्था तो बाद में भी संभल सकती है. ऐसे भी अर्थव्यवस्था इतनी जल्दी नहीं संभलने वाली."
वो आगे कहते हैं, अभी उत्पादन 25 फीसदी भी नहीं है. अभी ग्रोथ रेट -75 का है. और अगर ये दो महीने ऐसे ही चला और उसके छह महीने बाद अर्थव्यवस्था संभलती भी है तो इस साल का सालाना वृद्धि दर -30 या -40 फीसदी होगा. इसलिए यह गहरे डेप्रेसिएशन का दौर है ना कि मंदी की तरह -1 या -2 फीसदी वाला. इसलिए इससे उबरने में सालों लगने वाले हैं. 3-4 साल से पहले अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर नहीं आने वाली.
वो कहते हैं, "विश्व बैंक 2 फीसदी ग्रोथ रेट की बात कर रहा है लेकिन जब अभी दो महीने -75 फीसदी ग्रोथ रेट चलता है तो फिर दो फीसदी के ग्रोथ रेट को पाने के लिए आखिरी के चार महीनों में कम से कम 18-20 फीसदी के दर को हासिल करना होगा. जबकि अर्थव्यवस्था तो इस संकट से पहले ही बुरी हालत में थी और चार से पांच फीसदी के दर से बढ़ रही थी तो फिर इतने बड़े संकट के बाद ये 18-20 फीसदी कैसे पहुँच जाएगी."
वो बताते हैं कि उद्योग-धंधों को खोलने की स्थिति में मजदूरों का संकट भी होगा. मजदूर अपने-अपने घरों को लौटना चाहते हैं. अभी गुजरात में ओडिशा के मजदूरों ने घर जाने की मांग को लेकर हंगामा खड़ा कर दिया. इसलिए इसके सामाजिक असर भी हैं. खाने-पीने की चीजें नहीं मिलने की स्थिति में अराजकता फैल सकती है.
उद्योग-धंधों को फिर से पटरी पर लाने के लिए बेल-आउट पैकेज के सवाल पर वो आगे कहते हैं, "अभी की स्थिति में बेल आउट पैकेज भी काम नहीं करने वाला. क्योंकि बाज़ार में जब डिमांड ही नहीं होगी तो फिर औद्योगिक उत्पादों को खरीदेगा कौन."
वो आगे कहते हैं, "ऐसा भी नहीं है कि आप संगठित क्षेत्रों को खोल दे और असंगठित क्षेत्रों को ना खोले. उपभोक्ताओं में अभी भारी हताशा है. फैक्ट्रियों को खोलने की स्थिति में मजदूरों के संक्रमित होने का भी खतरा रहेगा."
लॉकडाउन कितना कारगर हो रहा है?
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 14 दिनों में देश के 15 राज्यों के 25 जिलों में संक्रमण का कोई भी नया मामला सामने नहीं आया है. स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव लव अग्रवाल ने बताया है कि अब तक दो लाख कोरोना के टेस्ट हो चुके हैं और अगले छह हफ्ते तक और टेस्ट करने को लेकर पर्याप्त तैयारी है.
इससे पहले आईसीएमआर की स्टडी में यह बात कही गई थी कि लॉकडाउन जैसे कदम उठाकर भारत अपने यहाँ मरीजों की संख्या 62 फीसदी से लेकर 89 फीसदी तक कम कर सकता है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस बात पर जोर दिया है कि अगर लॉकडाउन के साथ-साथ टेस्टिंग और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की जाए तो यह संक्रमण रोकने का कारगर तरीका होगा.
इस बाबत विश्व स्वास्थ्य संगठन के दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थानीय आपातकालीन सेवाओं के निदेशक डॉक्टर रॉड्रिको ऑफ़रिन ने बीबीसी को लिखित में जवाब दिया था, "कोविड-19 के संक्रमण को रोकने की दिशा में भारत सरकार ने जो कदम उठाए हैं वो सराहनीय हैं. भारत सरकार जो लॉकडाउन किया है साथ ही ट्रेन और बस सेवाओं को रोकने का फैसला लिया. इससे संक्रमण के फैलने की दर में कमी आएगी. लेकिन इसके साथ ही लगातार टेस्टिंग और कॉन्टैक्ट टेसिंग को भी बढ़ाना होगा."
इन सारी परिस्थितियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने जान और जहान में संतुलन स्थापित करने की चुनौती तो निश्चित रूप से होगी.
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