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कोरोना: लॉकडाउन में नहीं मिल रहे सैनिटरी पैड्स, लड़कियां परेशान
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस के कारण लागू लॉकडाउन में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए किराना स्टोर और मेडिकल स्टोर खुले हुए हैं. लेकिन दूर-दराज़ के गांवों में लड़कियों तक ये सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं.
उनके सामने सैनिटरी पैड्स की समस्या पैदा हो गई है.
राजस्थान की लड़कियों ने इस संबंध में मुख्यमंत्री को पत्र तक लिखा है. वहीं, झारखंड में लड़कियां स्वयंसेवी संस्थाओं को फ़ोन करके मदद मांग रही हैं.
इन लड़कियों को स्कूल से हर महीने सैनिटरी पैड मिलते थे लेकिन लॉकडाउन के बाद से स्कूल बंद हो गए हैं. वहीं, बाज़ार दूर होने और परिवहन बंद होने की वजह से ये लड़कियां मेडिकल स्टोर तक भी नहीं पहुंच पा रही हैं.
राजस्थान, बिहार और झारखंड की कई लड़कियां ये समस्या झेल रही हैं. इतना ही नहीं उनके लिए इस मसले पर खुलकर बात कर पाना भी संभव नहीं है.
लॉकडाउन में कहां से लाएं सैनेट्री पैड्स
राजस्थान में स्कूल, आंगनबाड़ी से बच्चियों को पीरियड्स के दौरान पैड मिला करते थे लेकिन अब स्कूल, आंगनबाड़ी, दुकाने सब बंद होने से लड़कियां परेशान हैं.
राजस्थान से पत्रकार मोहर सिंह ने बताया कि उदयपुर के सुदूर इलाक़ों में रहने वालीं लड़कियां आजकल सैनिटरी पैड की कमी से जूझ रही हैं.
इन लड़कियों को स्कूल से सैनिटरी पैड मिला करते थे लेकिन अब स्कूल भी बंद पड़े हैं. इन इलाक़ों से कोई दुकान भी करीब 10 से 15 किलोमीटर दूरी पर हैं. लड़कियां इस बारे में खुलकर बोल भी नहीं पा रही हैं.
माहवारी और सैनिटरी पैड पर महिलाएं तक आपस में खुलकर बात नहीं करतीं. ऐसे में इन लड़कियों के लिए घर के बड़ों से सैनिटरी पैड लाने के लिए कहना किसी चुनौती से कम नहीं है.
इन लड़कियों ने इस परेशानी का ज़िक्र करते हुए मुख्यमंत्री के नाम एक चिट्ठी भी लिखी थी. लेकिन, अब दिक्क़त ये थी कि इस पत्र को कैसे पोस्ट करें. लॉकडाउन होने से वो चिट्ठी को पोस्ट नहीं कर पा रही हैं.
गुर्जरों का गुड़ा गांव की कविता ने लिखा था कि उन्हें स्कूल से सैनिटरी पैड्स दिए जाते थे. इसलिए पिछले दो से ढाई सालों से सैनिटरी पैड का इस्तेमाल कर रही हैं. अभी लॉकडाउन होने से हर जगह बंदी है. घर के आसपास दुकान नहीं है और जहां दुकान है वो सात किमी दूर हैं. लॉकडाउन के कारण वहां भी नहीं जा सकतीं.
कविता ने चिट्ठी में बताया था कि घर में मम्मी और बहन के अलावा सभी मर्द हैं जिनसे ये बात नहीं कह सकतीं. मम्मी को बोलती हूं तो वो कपड़ा दे देती हैं जिससे उनके पैरों में जलन होती है. इसलिए गांव की सभी लड़कियों की तरफ से राजस्थान सरकार से निवेदन है कि उनके लिए सैनिटरी पैड की व्यवस्था कराएं.
ऐसी ही एक चिट्ठी गोगुन्दा की सुनीता पालीवाल और पिंकी खटीक ने लिखी थी. सभी लड़कियों के सामने फ़िलहाल यही समस्या है कि वो ख़ुद सैनिटरी पैड ला नहीं सकतीं और ना ही किसी से मंगवा सकती हैं.
हालांकि, उदयपुर की कलेक्टर आनंदी की नज़र में जब ये मामला आया तो उन्होंने संबंधित अधिकारियों को घर-घर में सैनिटरी पैड्स उपलब्ध कराने का आदेश दिया है. कई लड़कियों तक सैनिटरी पैड्स पहुंच भी चुके हैं.
इस संबंध में उदयपुर में महिला एवं बाल विकास विभाग के उप निदेशक महावीर खराड़ी ने बताया, “स्कूल बंद होने से बालिकाओं को पैड्स नहीं मिल पा रहे थे. इसलिए हमने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से घर-घर जाकर पैड्स उपलब्ध कराए हैं.”
बिहार का हाल
बिहार में बीबीसी संवाददाता सीटू तिवारी बताती हैं कि छात्राओं के लिए स्कूलों और स्वयंसेवी संस्थाओं के ज़रिए सैनिटरी पैड मुहैया कराए जाते हैं लेकिन फ़िलहाल ये सब रुका हुआ है.
बिहार की रहने वालीं शुभम ने इस साल ही 12वीं की परीक्षा पास की है. वह पटना ज़िले के नौबतपुर प्रखंड के सरिस्ताबाद गांव में रहती हैं और खगोल स्थित बालिका हाई स्कूल की छात्रा रही हैं.
शुभम बताती हैं कि नौवीं कक्षा में पहली बार सैनिटरी पैड का इस्तेमाल किया था. पैड काफ़ी आरामदायक लगा लेकिन लॉकडाउन के चलते उन्हें और उनकी बहन लक्ष्मी को बीते 4 सालों में पहली बार कपड़े का इस्तेमाल करना पड़ा है.
शुभम बताती हैं कि गांव में किराने की दो दुकाने हैं लेकिन इनमें से किसी में भी सैनिटरी पैड नहीं मिलता है. वहीं, दवाई की दुकान तकरीबन 3 किलोमीटर की दूरी पर है.
शुभम के पिता देवेन्द्र रविदास मज़दूर हैं और उनकी आमदनी काफ़ी कम है. लेकिन दोनों बहनों के सैनिटरी पैड का ख़र्च बड़ी बहन लक्ष्मी की सिलाई की छोटी-सी दुकान से निकलता है.
शुभम बताती हैं कि गांव की दूसरी लड़कियां भी इसी तरह की दिक्कत से दो चार हो रही हैं. वो कहती हैं, “सरकार जैसे राशन दे रही है, वैसे ही सैनिटरी पैड भी उपलब्ध कराए.”
बिहार के कुछ स्कूलों में छात्राओं की सुविधा के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं ने सैनिटरी पैड वेन्डिंग मशीन लगाई है लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है.
पटना स्थित बांकीपुर गर्ल्स हाई स्कूल में वेन्डिंग मशीन लगी है. यहां की प्राचार्य मीना कुमारी ने बीबीसी से फोन पर बातचीत में बताया, “ वेन्डिंग मशीन में दो और पांच रूपए के सैनिटरी पैड निकलते हैं. अभी तो स्कूल बंद है तो छात्राएं अपना इंतजाम खुद कर रही होंगी.”
बिहार सरकार छठी कक्षा से बाहरवीं कक्षा तक की छात्राओं को सैनिटरी पैड पर ख़र्च के लिए 300 रूपए देती है यानी प्रति माह 25 रूपए.
झारखंड: मदद के लिए फोन कर रहीं लड़कियां
झारखंड से बीबीसी संवाददाता रवि प्रकाश बताते हैं कि यहां लड़कियों को स्कूलों के स्तर पर और आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से सैनिटरी पैड्स दिए जाते हैं. लेकिन, फ़िलहाल दोनों जगह से ये मिलना बंद हो गए हैं.
लॉकडाउन के कारण राज्य के सभी आंगनबाड़ी केंद्रों में ताले लटके हुए हैं. यहां काम करने वालीं सेविकाएं और सहायिकाओं को सूखा राशन घर-घर बांटने के काम में लगा दिया गया है. इस कारण किशोरियों के बीच सैनिटरी नैपकिन बाटंने का काम फ़िलहाल बंद पड़ा हुआ है.
दरअसल, राज्य सरकार की पहल पर विभिन्न सखी मंडलों की महिलाओं (दीदी) को प्रशिक्षण देकर उनसे सैनिटरी पैड्स बनवाए जा रहे थे. इन्हीं पैड्स का वितरण स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से कराया जाता था. अब स्कूलों में भी छुट्टियां हैं और आंगनबाड़ी केंद्र भी बंद हैं.
सखी मंडलों को संचालित कराने वाली संस्था झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रोमोशन सोसायटी (जेएसएलपीएस) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सखी मंडलों की दीदियां विभिन्न पंचायतों में मुख्यमंत्री दीदी किचन का संचालन कर रही हैं, ताकि कोई भूखा नहीं रहे. इस कारण सैनिटरी पैड्स फ़िलहाल न तो बनाए जा रहे हैं और न उनका वितरण हो पा रहा है.
वहीं, शिक्षकों द्वारा मिड डे मिल के बदले सूखा अनाज बच्चों के घर तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई है लेकिन इनमें सैनिटरी पैड्स शामिल नहीं हैं.
गोड्डा ज़िले में विवेकानंद अनाथ आश्रम से जुड़ीं बंदना दुबे बताती हैं कि उनके पास सैनिटरी पैड्स के लिए रोज लड़कियों के फोन आ रहे हैं.
बंदना बताती हैं, “गोड्डा ज़िले में आठ कस्तूरबा स्कूल हैं और एक स्कूल में क़रीब 400 लड़कियां पढ़ती हैं. फिलहाल स्कूल बंद होने से लड़कियों को सैनिटरी पैड भी मिलने बंद हो गए हैं.”
“जो लड़कियां थोड़े सम्पन्न परिवारों से हैं हो सकता है कि वो सैनिटरी पैड ख़रीद रही हों वरना बाक़ी लड़कियां तो काफ़ी परेशान हैं. हम जितनी लड़कियों की मदद कर सकते हैं कर रहे हैं लेकिन सब तक पहुंच पाना तो हमारे लिए भी संभव नहीं है.”
बंदना दुबे से मदद मांगने वालीं शांति बस्की कस्तूरबा स्कूल में पढ़ती थीं लेकिन स्कूल बंद होने से उन्हें सैनिटरी पैड नहीं मिल पा रहे हैं.
शांति बस्की ने बताया, “हर महीने सैनिटरी नैपकिन मिल जाता था लेकिन, अब नहीं मिल पा रहा है. सर्फ, साबुन जैसे सफाई के दूसरे सामान भी नहीं मिल पा रहे हैं. इसलिए हमने बंदना दुबे जी को फोन भी किया था कि हमें सैनिटरी पैड लाकर दे दें. हम तो यहां से कहीं जा नहीं पाते.”
फिलहाल कुछ संस्थाएं लड़कियों की मदद करने की कोशिश कर रही हैं लेकिन बढ़ते लॉकडाउन के साथ इस ओर ध्यान दिया जाना भी ज़रूरी है.
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