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कोरोना वायरस: खनन इलाक़ों के आदिवासी साबुन और मास्क से भी महरूम
- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
देश के माइनिंग वाले इलाक़ों में खनिजों की तो अधिकता है, लेकिन यहां ग़रीबी भी उतनी ही विकराल है.
इन इलाक़ों के लिए डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (डीएमएफ़) तैयार किया गया. लेकिन, कोविड-19 के इस दौर में क्या इन इलाक़ों के लोगों को मास्क, सैनिटाइजर्स मिल पा रहे हैं?
क्या यहां के लोग इससे सुरक्षित हैं? क्या डीएमएफ़ का सही इस्तेमाल हुआ है? ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब मिलने बाक़ी हैं.
'क्या वे हमें साबुन और पानी दे सकते हैं?'
बचेली कस्बे में अपने घर पर गोविंद कुंजम को लगता है कि सरकार कोविड-19 से लोगों को बचाने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं कर रही है.
बचेली छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले में पड़ता है. इस इलाक़े की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक़, यह जगह सबसे बढ़िया लौह अयस्क के लिए देश भर में मशहूर है.
सरकारी कंपनी नेशनल मिनरल डिवेलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएमडीसी) यहां पर 1977 से खानें चला रही है. साथ ही ये कंपनी की सबसे बड़ी ख़दानों में से हैं.
43 साल के कुंजाम एक प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर के तौर पर काम करते हैं. वो कहते हैं, "कोरोना को लेकर जानकारी सीमित है. हमें कैंपेन चलाकर लोगों को जागरूक करना चाहिए. साबुन, सैनिटाइज़र्स, जैसी चीज़ें लोगों को देनी चाहिए और उन्हें हाथ धोने, ज्यादा मेलजोल से बचने की अहमियत जैसी बातें बताई जानी चाहिए. फ़िलहाल हम जैसे लोग जो कि पढ़ रहे हैं और जागरूक हैं, वही इन लोगों को जानकारी दे रहे हैं."
हालांकि, उनकी सबसे बड़ी चिंता बीमारी की बजाय आजीविका को लेकर है.
वो कहते हैं, "हम सरकारी स्कीमों के तहत घर बनाते हैं. लेकिन अब हमें कच्चा माल नहीं मिल पा रहा है, ऐसे में हमें दिक्क़त हो रही है. अगर ये हालात बने रहते हैं तो हम ज़्यादा वक़्त तक टिक नहीं पाएंगे."
35 साल के गणेशराम बाग पंचायत समिति के सदस्य और एक कारोबारी हैं. वह ओडिशा के राजपुर के झारसुगुडा ज़िले में रहते हैं. इस ज़िले में मिनरल्स की बहुतायत है.
गणेशराम जहां रहते हैं वह जगह आसपास मौजूद कोयले की खदानों की वजह से मशहूर है.
लोगों को कोविड-19 से बचाने की तैयारियां कैसी हैं?
क्या लोगों को मास्क, सैनिटाइजर्स मिल रहे हैं, क्या लोगों को जागरूक बनाने मुहिम चल रही है?
गणेशराम बाग कहते हैं, "हमारे पास अब तक ये चीज़ें नहीं हैं. वायरस की वजह से डर है और गाँव वाले घर से बाहर नहीं निकल रहे हैं. उन्हें कहा गया है कि अगर कोई बाहर से गाँव में आता है तो उसकी सूचना ब्लॉक डिवलपमेंट ऑफ़िसर (बीडीओ) को दी जाए. इस तरह के लोगों के लिए आइसोलेशन रूम बनाए गए हैं."
हालांकि, वह कुंजाम से सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे हैं, लेकिन दोनों की भावनाएं एक जैसी हैं.
वो कहते हैं, "यहां लोग रोज़ कमाते हैं और रोज़ खाते हैं. सरकार की ओर से एक हज़ार रुपए और थोड़ा सा चावल मिला है. लेकिन, अगर काम नहीं होगा तो हमारे लिए बड़ी मुश्किल हो जाएगी."
कुंजाम और बाग के बीच एक और समानता है. इनके जैसे हज़ारों लोग देश के माइनिंग इलाक़ों में रहते हैं. खनिज संसाधनों वाले ये इलाक़े माइनिंग गतिविधियों के चलते प्रभावित रहे हैं.
इन जगहों पर लोगों के हालात कितने ख़राब हैं इसका अंदाज़ा खान मंत्राल के 2015 में जारी आदेश से लगाया जा सकता है.
इस आदेश में कहा गया है, "खनन संबंधी कामकाज़ से देश के कम विकसित और सुदूर इलाक़ों पर बुरा असर पड़ता है. साथ ही इनसे आबादी के कमज़ोर तबक़े, ख़ास तौर पर आदिवासियों पर भी असर पड़ता है. ऐसे में यह ज़रूरी है कि एक संगठित और स्ट्रक्चर्ड तरीक़े से इन्हें ख़ास तवज्जो दी जाए और इनका ख्याल रखा जाए ताकि इन इलाक़ों और प्रभावित लोगों को फ़ायदा हो सके."
डीएमएफ़ की एंट्री
2015 में केंद्र ने माइन्स एंड मिनरल (डेवलप्मेंट एंड रेगुलेशन एक्ट) (एमएमडीआर) 1957 में संशोधन कर दिया. इसके बाद एमएमडीआर एमेंडमेंट एक्ट, 2015 और इसके भीतर एक सेक्शन 9बी आया.
इससे क्या बदला?
इसमें माइनिंग आधारित कामकाज़ से प्रभावित ज़िलों में डिस्ट्रिक्ट मिनरल फ़ाउंडेशन (डीएमएफ़) गठित करने का प्रावधान किया गया. डीएमएफ़ का मक़सद माइनिंग की वजह से प्रभावित हो रहे लोगों और इलाक़ों के लिए काम करना है.
खनन कंपनियां ख़दान वाले जिले में माइनिंग लीज़ के बदले 10 से 30 फ़ीसदी तक रॉयल्टी देती हैं. यह रक़म सीधे हर जिले के डीएमएफ़ में जाती है. इकट्ठा हुआ पैसा खनन प्रभावित लोगों पर खर्च किया जाता है. साथ ही इसे प्रभावित इलाक़ों पर भी खर्च किया जाता है.
क़रीब 60 फ़ीसदी पैसा पीने का पानी मुहैया कराने, प्रदूषण कंट्रोल और पर्यावरण संरक्षण, हेल्थकेयर, शिक्षा, सैनिटेशन जैसे कामों पर खर्च किया जाता है. बकाया 40 फ़ीसदी पैसा इंफ्रास्ट्रक्चर, सिंचाई, एनर्जी जैसी चीजों पर लगाने का प्रावधान है.
डीएमएफ़ में एक स्थायित्व भरी आजीविका मुहैया कराने पर भी पैसे खर्च करने की बात की गई है.
खनन मंत्रालय के मुताबिक़, जनवरी 2020 तक डीएमएफ़ के तहत इकट्ठी की गई रक़म 35925.39 करोड़ रुपए थी. यह रक़म 21 राज्यों के 574 ज़िलों से इकट्ठा की गई थी.
यहां है कहानी में ट्विस्ट
26 मार्च को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऐलान किया कि राज्य सरकारों से कहा जाएगा कि वे डीएमएफ़ के तहत इकट्ठी हुई रक़म का इस्तेमाल मेडिकल टेस्टिंग, स्क्रीनिंग और दूसरी चीज़ों के लिए करें ताकि कोविड-19 को फैलने से रोका जा सके. इसके अलावा, यह पैसा मरीज़ों के इलाज पर भी खर्च किया जाना चाहिए.
यह 1.7 लाख करोड़ रुपए के प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण योजना के राहत पैकेज के अधीन ही था.
हालांकि, वित्त मंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि यह आंकड़ा क़रीब 25,000 करोड़ रुपए का है, लेकिन बाद में केंद्र ने स्पष्ट किया कि डीएमएफ़ फंड का इस्तेमाल इसका एक-तिहाई यानी क़रीब 7,000 करोड़ रुपए ही रहेगा.
खनन मंत्री प्रह्लाद जोशी ने ट्वीट किया, "मेडिकल इक्विपमेंट्स ख़रीदने, मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने, फ़ेस मास्क, साबुन, सैनिटाइज़र्स जैसी चीज़ें ख़रीदने और ग़रीबों को बेहतर खाना मुहैया कराने के लिए डीएमएफ़ फंड ज़िलाधिकारियों को उपलब्ध कराया गया है."
क्या ऐसा वाक़ई हो रहा है?
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के एक और कस्बे किरंदुल के एक पत्रकार मंगल कुंजाम कहते हैं, "जब डीएमएफ़ तैयार किया गया तो यह एक अच्छा क़दम था. लेकिन, क्या इससे हमें कोई फ़ायदा हुआ है? अभी तक हमें ऐसा कुछ नहीं दिख रहा कि इससे हमें कोई सुरक्षा मिल रही हो. जिस ज़िले में पैसा इकट्ठा हुआ है वहीं पर इसे खर्च किया जाना चाहिए. अगर राज्य सरकार को आज़ादी मिली तो वह हमारी बजाय अपनी प्राथमिकताओं पर पैसा खर्च कर सकती."
वो कहते हैं, "शहरी इलाक़ों के उलट आदिवासी बाहर से आने वाली सप्लाई पर कम टिके होते हैं. पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम (पीडीएस) के ज़रिए थोड़ा राशन आता है. केवल चना और नमक से ही हमारा काम चल सकता है. लेकिन, हमें हमारी सुरक्षा के लिए उपायों की ज़रूरत है."
एक ग्रामीण ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया, "ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. लोगों से जो बन पड़ रहा है, वे कर रहे हैं. बाहरी लोगों को आने से रोका जा रहा है. हमारे यहां के कई लोग जो बाहर थे वे वहीं फंस गए हैं. ऐसे में गांव वालों में बेचैनी है."
उन्होंने कहा, "स्थानीय लोगों को चावल, दाल, नमक चाहिए. प्रशासन इन चीज़ों को हमें मुहैया करा सकता है. हमें साबुनों की ज़रूरत है, लेकिन दुकानें बंद हैं. प्रशासन को हमें साबुन दिलवाने चाहिए."
दंतेवाड़ा डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट टोपेश्वर वर्मा ने कहा, "फंड्स की कोई कमी नहीं है. हमने अपने स्टाफ और आंगनवाड़ी वर्कर्स को साबुन, मास्क और सैनिटाइज़र्स का वितरण शुरू कर दिया है और धीरे-धीरे ये चीज़ें आम लोगों तक भी पहुंचाई जाएंगी."
उन्होंने कहा कि डीएमएफ़ का अब तक कोई इस्तेमाल नहीं हो पाया. वे अभी सरकार के आदेश का इंतजार कर रहे हैं.
प्रशासन ने अब तक करीब 2,500 लोगों को ट्रेस किया है जो कि बाहर से ज़िले में आए हैं. साथ ही 50 बेड का अस्पताल, आइसोलेशन वॉर्ड और क्वारंटीन सेंटर तैयार किए गए हैं.
38 साल के सुरेश बिशी एक टीचर हैं. उनका गांव खैती, औडिशा के झारसुगुडा ज़िले में पड़ता है. यहां जल्द ही कोल माइनिंग कामकाज शुरू होने वाला है. कोविड-19 के अलावा उन्हें विस्थापन का भी डर है.
उन्होंने कहा, "महामारी के चलते लोग घरों के अंदर हैं. लॉकडाउन ने हमारी कमाई बंद कर दी है. सरकार को हमारी आजीविका के बारे में सोचना चाहिए."
उन्होंने कहा, "हमें पहले भी मुश्किलें आई हैं. माइनिंग की वजह से हमारी पानी की सप्लाई पर बुरा असर पड़ चुका है. अगर हाथ धोना और सैनिटेशन वक्त की जरूरत है तो हमें पानी की सप्लाई को ठीक करना होगा."
झरसुगुडा के ज़िलाधिकारी सरोज कमल ने बीबीसी को बताया, "हमने सभी माइनिंग अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे प्रभावित गांवों को सैनिटाइज़ करें. गांव के लोगों को सैनिटाइज़र्स, मास्क उपलब्ध कराएं. डिज़ास्टर मैनेजमेंट एक्ट, 2005 लागू है, ऐसे में उन्हें यह काम कुछ दिनों में ही पूरा करना होगा."
डीएमएफ़ के बारे में उन्होंने कहा, "हम 100 बेड का कोविड हॉस्पिटल अलग-अलग जगहों पर बना रहे हैं. हमें मेडिकल कर्मचारियों की किल्लत से जूझना पड़ रहा है."
डीएमएफ़ की अब तक की कहानी
सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरन्मेंट (सीएसई) की इन्वायरन्मेंट यूनिट में बतौर डिप्टी प्रोग्राम मैनेजर काम करने वाली चिन्मई शाल्या कहती हैं, "डीएमएफ़ को लोगों के अधिकार के तौर पर देखा जाना चाहिए. देश में माइनिंग वाले इलाक़ों की अजीब विडंबना है. ये इलाक़े खनिजों, जंगलों और आदिवासियों से समृद्ध हैं, लेकिन यहां ग़रीबी भी उतनी ही भयंकर है.
सीएसई ने 2018 में डीएमएफ़ का विस्तृत आकलन किया था. इसके नतीजे चौंकाने वाले रहे. न केवल प्रशासन और जवाबदेही कमज़ोर पाई गई बल्कि प्रभावित लोगों का गवर्निंग बॉडी में प्रतिनिधित्व भी कम था.
जिन्हें इसका फ़ायदा मिलना था उनकी पहचान नहीं की गई. प्लानिंग नहीं थी. स्टडी से पता चला, "कई दफ़ा ऐसे भी वाक़ये पेश आए जहां डीएमएफ़ के पैसे से कन्वेंशन हॉल, मल्टी-लेवल पार्किंग लॉट्स जैसी चीजें बनाई गईं."
उसी साल संसद की कोल और स्टील पर स्थायी समिति ने पाया कि डीएमएफ़ को और ज़्यादा जवाबदेह बनाना ज़रूरी है.
ऐसे में केंद्र का कोविड-19 के लिए इस फंड का इस्तेमाल करने का ऐलान क्या सही फैसला है?
शाल्या ने कहा, "यह एक असाधारण स्वास्थ्य इमर्जेंसी है और हेल्थकेयर पहले से ही एक हाई प्रायॉरिटी एरिया है. ऐसे में इस फंड का इसमें ही इस्तेमाल होना है. ज़्यादातर माइनिंग ज़िलों में हेल्थकेयर की हालत ख़राब है."
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