कोरोना वायरसः भूख से बेहाल वंचितों के लिए आंबेडकर अब भी प्रासंगिक- नज़रिया

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- Author, प्रोफ़ेसर बद्रीनारायण
- पदनाम, समाजशास्त्री, बीबीसी हिंदी के लिए
ऐसे दौर में जबकि पूरी दुनिया कोरोना वायरस से एक जंग लड़ रही है, बाबा साहब अंबेडकर, उनके विचार और उनका जीवन और भी प्रासंगिक हो जाता है.
इसकी पहली अहम वजह यह है कि जिस दलित, ग़रीब, मज़दूर और भूमिहीन किसान के लिए उन्होंने लड़ते हुए पूरा जीवन बिता दिया, वह आज इस कोरोना संकट के दौर में दोहरी मुश्किल का सामना कर रहा है.
ग़रीबों के सामने ख़ुद को और अपने परिवार को भूख की मार से बचाने की मुश्किल है. उसे अपने रहने के इंतज़ाम, जीवन की दूसरी परिस्थितियों से जूझने के अलावा सरकार की तरफ़ से जारी होने वाली स्वास्थ्य संबंधी हिदायतों का पालन करने जैसी मुश्किलें आ रही हैं.
संक्रमण का सबसे बड़ा ख़तरा ग़रीबों पर
अपनी कमज़ोर स्थिति के चलते ग़रीब और समाज के हाशिए पर मौजूद तबक़ा कोरोना से संक्रमित होने के सबसे बड़े जोख़िम से जूझ रहा है. इसके बावजूद उसके लिए इससे बचने की जंग सबसे कठिन है.
बाबा साहब अपने आलेखों में बार-बार इस तबक़े की रिहायश वाली जगहों, वहां की साफ़-सफ़ाई और हाइजीन के बुरे हालातों, ग़रीबी के चलते कई तरह की स्वास्थ्य और जीवन संबधी जोखिमों की बारे में विचारते और सावधान करते रहते थे.
बाबा साहब हमारी राज्य व्यवस्था को हर क्षण यह ताकीद करते रहे हैं कि समाज के ऐसे मजबूर तबक़ों को हर तरह से सुरक्षा और सहयोग देना राज्य और समाज की ज़िम्मेदारी है.

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संविधान में मिला हक़
भारत के संविधान का आर्टिकल-21 हर एक नागरिक को स्वस्थ और सम्मानपूर्ण जीवन देने का वादा करता है.
बिना स्वास्थ्य एवं सम्मानपूर्ण जीवन के हम 'अधूरी नागरिकता' की स्थिति में जीते हैं. दलित एवं ग़रीब, श्रमिक एवं भूमिहीन तबक़ों की नागरिकता 'स्वास्थ्य सुरक्षा' के बिना अधूरी है.
ये ग़रीब न केवल भारत बल्कि अमरीका, यूके, जर्मनी और इटली जैसे विकसित मुल्कों में भी सड़क के किनारे कैंपों में, छोटे सी ख़ोली जैसी जगहों में एक साथ रहने को मजबूर हैं.
इन लोगों के पास न संक्रमण से बचने की सलाह पहुंच रही है और न ही मास्क, सैनेटाइज़र, साबुन, जैसे साधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं.
हालत यह हो गई है कि पश्चिमी मुल्कों में कई जगहों पर भीख मांगकर जीवनयापन करने वाले कई लोग पैसे की जगह 'सैनेटाइज़र' मांगने लगे हैं.
बेघर ख़ुद को कैसे करें सुरक्षित
ज़्यातादर लोगों के पास घर नहीं हैं. भारत में यह स्थिति और भी ज़्यादा ख़राब है. 2011 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में 17.7 करोड़ लोगों के पास घर नहीं है. यानी हमारी जनसंख्या का 0.15 फ़ीसदी हिस्सा बेघर है.
हमारे शहरी जीवन की स्लम में रहने वाली क़रीब 17 फ़ीसदी आबादी भी कोरोना संक्रमण के लिए सॉफ्ट टारगेट होने के कारण उससे बचने के लिए जद्दोजहद कर रही है.

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प्रवासी मज़दूरों, असंगठित सेक्टर के कर्मचारियों और दिहाड़ी मज़दूरों की एक बड़ी संख्या इस कोरोना वायरस के संक्रमण के लिए बेहद असहाय है और जोख़िम भरे हालात में जीने को मजबूर है.
दूसरी महत्वपूर्ण प्रासंगिकता बाबा साहेब आंबेडकर की आज यह है कि उन्होंने दलितों और ग़रीबों को एक सम्मानित जीवन देने की लड़ाई लड़ी थी. उनके इस संघर्ष के परिणामस्वरूप इन वर्गों का एक भाग तो लाभान्वित हुआ है, लेकिन इस लॉकडाउन की स्थिति में उनकी 'मानवीय देह' मात्र एक 'बायोलॉजिकल देह' में बदल गई है.
उनकी देह का मानवीय सम्मान इस संकट की स्थिति में हमने ख़त्म होते देखा है. वे पैदल, भूखे 400-500 किलोमीटर की यात्रा करने को मजबूर हुए. उन्हें कई जगह प्रशासन द्वारा अत्यंत छोटी जगह में एक साथ लोहे के गेट में बंद कर दिया गया.
शहरों में अमानवीय जीवन जीने को मजबूर ग़रीब
बाबा साहब आंबेडकर ने दलितों और ग़रीबों को गांवों से निकल शहरों में माइग्रेट करने का सुझाव दिया था. उन्होंने कहा था कि दलितों और मज़दूरों का शहरों में प्रवास उनके लिए सामंती शोषण, जाति व्यवस्था की क्रूरता और जीवन में नया परिवर्तन लाने वाला साबित होगा.
ऐसा हुआ भी. भारतीय गांवों से दलितों और मज़दूरों की एक बड़ी आबादी रोज़ी-रोटी और मानवीय सम्मान की चाह में शहरों की ओर भागने लगी.

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1901 भारत में जिन शहरी प्रवासियों की संख्या 11.5 फ़ीसदी थी, वह 2011 में बढ़कर 31.6 फ़ीसदी हो गई. शहरों में आकर उन्हें कैश आधारित श्रम करने के अवसर तो मिले, लेकिन उनकी रिहायश अमानवीय स्थितियों में ही रही.
वे शहरों की झुग्गी-झोपड़ियों, स्लम और कई बार गंदे-बजबजाते नालों के आसपास बनी बस्तियों में रहने को मजबूर हैं. एक छोटे कमरे में शेयरिंग के आधार पर कई शिफ्टों में काम करने के लिए 10-12 मज़दूरों का साथ रहना आम बात है.
कइयों के पास तो अपना किराये का भी कोई ठिकाना नहीं है. ये लोग फ्लाईओवर के नीचे, पार्क में, सड़कों के किनारे, रात गुज़ारते हैं.
लॉकडाउन ने पलायन को किया मजबूर
कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए जब सरकार ने लॉकडाउन का एलान किया तो बड़ी तादाद में ऐसा बेहद ग़रीब, शहरी मज़दूर तबक़ा बेरोज़गार हो गया.
इनकी भूख उन्हें लीलने का बेताब हो उठी और कोरोना संक्रमण इन्हें अपने जबड़े में हड़पने की कोशिश करने लगा.
इससे एक ऐसी स्थिति पैदा हुई जो इन प्रवासी मज़दूरों, दिहाड़ी मज़दूरों एवं शहरी ग़रीबों के लिए एडम स्मिथ के 'श्रम के मूल्य' के सिद्धान्त, मार्क्स के श्रम की शक्ति के सि़द्धान्त और आंबेडकर के मानवीय देह के सम्मान के सिद्धांत को अप्रासंगिक बना दिया.
अगर कुछ अर्थों में कहें तो मानवीय देह वस्तुओं में तब्दील हो गई या यूं कहें मानवीय देह मात्र बायोलॉजिकल देह में सिमट कर रह गई.
आज कोरोना लॉकडाउन के कारण उन्हें पुनः विस्थापन का दर्द झेलना पड़ रहा है. ये लोग अपने मूल गांवों की तरफ़ लौटने को मजबूर हैं. हालांकि, इनके गांव भी आज काफ़ी कुछ बदल चुके हैं.
इस स्थिति से जो दूसरा निहितार्थ निकलता है वो यह है कि जो गांव आंबेडकर के समय में अर्थात् 1950 के पहले आंबेडकर के शब्दों में 'दलितों के लिए दमन की भूमि, अज्ञानता और अंधी स्थानीयता' का क्षेत्र थे, आज वही इन प्रवासी मज़दूरों, जिनमें अधिकांशतः दलित और ग़रीब हैं, की शरणस्थली बन कर उभरे हैं.
कुछ संदर्भों को छोड़ दें तो इन गांवों में सरकार के निर्देशों के मुताबिक़ क्वारंटीन में रहने के बाद वे अपने घरों में लौट रहे हैं.

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आज के गांव पहले से बेहतर
1950 के बाद से भारतीय गांवों में काफ़ी बदलाव हुआ है. स्थानीय स्वशासन और उस पर केंद्रित राजनीति, दलित चेतना के उभार, आज़ादी के बाद रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया और बहुजन समाज पार्टी के कारण हुई दलित गोलबंदी, संविधान से मिले आरक्षण, अत्याचार के ख़िलाफ़ बने क़ानूनों ने भारतीय गांवों के पूरे ढांचे में आमूलचूल पविर्तन ला दिया है.
इस वजह से दलितों एवं ग़रीबों के लिए अपना गांव आज उतना बेगाना नहीं रहा. कमी है तो बस गांवों में रोज़गार के साधनों के मौजूद न होने की, जिसके कारण इन ग़रीबों को पुनः उन्हीं शहरों में जाना होगा, जिन्हें उन्होंने अभी-अभी छोड़ा था.
यह एक तरह से इतिहास को दोहराने जैसा है. लेकिन, उम्मीद है कि इतिहास का दोहराना पिछली बार से अलग होगा.
इस कोरोना जनित नई स्थिति में आंबेडकर के प्रवसन संबंधी विचारों पर मूल्यांकन कर हमें हमारे समय द्वारा निर्मित नई-नई स्थितियों के साथ अपने को समाहित करना होगा.
शायद कोरोना लॉकडाउन में आंबेडकर के जन्मदिन पर बड़े आयोजन न हो पाएं, लेकिन उनके विचार हमारे जीवन और मनोमस्तिष्क में गूंजते रहेंगे.



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(लेखक इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के जीबी पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट में निदेशक हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)
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