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कोरोना लॉकडाउन: जो संक्रमित नहीं हैं उनके मरने की आशंका अधिक?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली पूरी तरह से कोरोना वायरस पीड़ित रोगियों के इलाज पर ध्यान केंद्रित किए हुए है.
लेकिन लॉकडाउन में डायबिटीज़ और दूसरी बीमारियों के मरीज़ों को देश के अधिकतर लैब और क्लिनिक बंद होने के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.
डॉक्टरों को डर है कि आने वाले दिनों में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की तुलना में उनकी मौत ज़्यादा हो सकती है जिन्हें संक्रमण ना हो.
भारत में हर रोज़ एक करोड़ से अधिक नियमित रोगी अपने इलाज के लिए डॉक्टरों और उनके क्लिनिक जाते हैं. वो या तो डायबिटीज़ के मरीज़ होते हैं, या दिल के या फिर ब्लड प्रेशर इत्यादि के रोगी होते हैं. उन्हें ज़रूरत होती है ब्लड टेस्ट, एक्सरे, सोनोग्राफ़ी और एमआरआई की. लेकिन इस समय उन्हें प्राथमिकता नहीं दी जा रही है.
सरकारी अस्पतालों में लैब हैं लेकिन स्टाफ़ कम है और अस्पतालों में प्राथमिकता कोरोना वायरस के मामलों को दी जा रही है.
लॉकडाउन के कारण 75 प्रतिशत से अधिक लैब और क्लीनिक बंद हैं. ट्रान्जेशिया नामी भारत की लैब को सप्लाई करने वाली उपकरणों की सबसे बड़ी कंपनी के प्रमुख सुरेश वज़ीरानी कहते हैं, "देश में एक लाख लेबोरेटरी हैं जिनमें से 75,000 से अधिक स्वास्थ्य आपातकाल के कारण बंद हैं. और जो बड़े निजी लैब खुले हैं उनमें कुछ ही तकनीशियन और डॉक्टर काम करने के लिए आते हैं."
मुंबई स्थित पैथोलॉजिस्ट डॉक्टर अपर्णा जयराम के अनुसार मुंबई में उनके पांच लैब में से तीन काम कर रहे हैं लेकिन "52 में से 10 से कम कर्मचारी काम पर आ रहे हैं."
उन्होंने ये भी कहा, "आम मरीज़ कोरोना-पीड़ित मरीज़ों की तुलना में अधिक संख्या में मर सकते हैं. मुझे लगता है कि सरकार को इस तरफ़ ध्यान देना चाहिए."
नतीजतन, आम मरीज़ कठिनाइयों के शिकार हैं.
मुंबई की एक कंपनी की उपाध्यक्ष केल गोयल की बच्चेदानी की परत मोटी हो जाती है जिसके लिए उन्हें हर महीने-दो महीने पर नियमित रूप से क्लिनिक का दौरा करने की आवश्यकता होती है.
उन्हें लॉकडाउन से ठीक पहले क्लिनिक जाना था. अब वो घर पर हैं. "मेरी इस बीमारी के कारण मुझे हर महीने अपनी गायनेकॉलॉजिस्ट के पास जाना पड़ता है और सोनोग्राफ़ी करवानी पड़ती है. पूरा लॉकडाउन है तो अब मैं क्लिनिक नहीं जा सकती."
क्या उनकी हालत बिगड़ सकती है? यह पूछे जाने पर केल गोयल बताती हैं, "यह मेरे दिमाग़ में चलता रहता है. अगर हालत बिगड़ती है तो या तो मुझे क्लिनिक जाना पड़ेगा या डॉक्टर को घर आना पड़ेगा."
टेस्ट कराने में मुश्किल
दिल्ली के ओखला इलाक़े में 75 वर्षीय एक उम्र दराज़ महिला, नफ़ीसा कौसर, 20 साल से शुगर की मरीज़ हैं. उन्हें हाइपरटेंशन भी है. समय-समय पर उन्हें अपना लिक्विड प्रोफाइल और दूसरे कई तरह के ब्लड टेस्ट कराने होते हैं.
वो कहती हैं, "मेरा ब्लड टेस्ट और चेकअप मार्च के अंत तक होने वाला था. लेकिन लॉकडाउन की वजह से देरी हो रही है. पहले ब्लड सैंपल लेने घर पर लैब का एक आदमी आता था. लेकिन लैब का कहना है कि उनके पास ब्लड भेजने के लिए लोग नहीं हैं. कूरियर सर्विस भी बंद है."
उनके क्लिनिक लाइफ़स्पैन का, जिसकी शाखाएं पूरे भारत में हैं, कहना है कि उन्होंने मरीज़ों को देखना और टेलीमेडिसिन के ऑर्डर लेना बंद कर दिया है क्योंकि कूरियर सेवाएं काम नहीं कर रही हैं.
यहां तक कि ग़ैर-ज़रूरी सर्जरी को भी फ़िलहाल टाला जा रहा है. महाराष्ट्र के नंदुरबार ज़िले के रहने वाले 40 वर्षीय विजय जाधव को तत्काल कॉर्निया ट्रांसप्लांट की ज़रूरत है और वह अपनी आंखों की रोशनी गंवा रहे हैं.
उनकी बहन अंकिता जाधव ने बीबीसी मराठी की दीपाली जगताप से कहा, "पहले हम इलाज के लिए पुणे गए थे. उन्होंने हमें तुरंत सर्जरी कराने की सलाह दी. लेकिन, हमें बताया गया कि कॉर्निया प्रत्यारोपण सर्जरी यहाँ नहीं की जा सकती है, इसलिए उन्होंने हमें अस्पताल जाने का सुझाव दिया, हैदराबाद या इंदौर में."
इस बीच लॉकडाउन लागू हो गया. बाद में उन्हें पता चला कि हैदराबाद और इंदौर के अस्पतालों में प्रत्यारोपण के लिए कॉर्निया उपलब्ध नहीं है. अंकिता ने बताया है, "हम अब जलना ज़िले के एक अस्पताल में आए हैं. हम यहां डॉक्टरों से सलाह ले रहे हैं."
हालांकि, लॉकडाउन नियमों के अनुसार, प्राइमरी हेल्थकेयर के लोगों को ज़रूरी सेवाओं के अंतर्गत रखा गया और इनके आने-जाने पर पाबंदी नहीं है लेकिन मरीज़ों की शिकायत है कि निजी अस्पताल सेवाएं नहीं दे रहे हैं और सड़कों पर नाकाबंदी है जहाँ ट्रैफ़िक पुलिस उन्हें रोकती है.
बीबीसी मराठी ने इस संबंध में इंदौर स्थित सेंटर फॉर साइट हॉस्पिटल के चिकित्सा निदेशक डॉ. प्रदीप व्यास से संपर्क किया. उन्होंने कहा, "हम केवल सबसे महत्वपूर्ण सर्जरी कर रहे हैं. कॉर्निया प्रत्यारोपण के लिए डोनर की आवश्यकता होती है. इंदौर में एक सरकारी मान्यता प्राप्त नेत्र बैंक है लेकिन लॉकडाउन के कारण नेत्र बैंक बंद है."
केल गोयल लॉकडाउन का पूरी तरह से समर्थन करती हैं लेकिन उन्हें चिंता है कि अगर इसे तूल दिया गया तो उन्हें समस्या हो सकती है.
नफ़ीसा कौसर कहती हैं, "हम अपनी उम्र और शुगर के कारण अधिक असुरक्षित श्रेणी में हैं. मैंने पिछले 10 दिनों से घर से बाहर क़दम भी नहीं रखा है. ब्लड टेस्ट किया जाना है लेकिन मुझे मालूम नहीं ये अब कब होगा. मैं शुगर लेवल कंट्रोल में रखने की कोशिश कर रही हूँ. बाक़ी समय में दुआ करती रहती हूँ."
तकनीशियनों की कमी
केंद्र सरकार ने बार-बार ये स्पष्ट किया है कि डॉक्टर और क्लिनिक तकनीशियन आवश्यक सेवाओं का हिस्सा हैं लेकिन ज़मीनी स्थिति अलग है.
डॉ. अपर्णा जयराम का कहना है कि कई डॉक्टर और क्लिनिक तकनीशियन घर पर रह रहे हैं क्यूंकि उनके घर वाले कोरोना के कारण उन्हें घर से बाहर निकलने नहीं देते और जब कुछ लोग बाहर जाते हैं तो पुलिस उन्हें रोक देती है.
डॉ. अपर्णा चिंतित हैं. वो कहती हैं, "मेरी पांच लैब में से तीन खुली हैं लेकिन स्टाफ़ बहुत कम है. मैं दिन में 18 घंटे काम कर रही हूं. मैं व्यक्तिगत रूप से केवल उन गंभीर और पुराने रोगियों के घरों को जा रही हूँ जिनका ब्लड सैंपल लेना ज़रूरी है."
वो आगे कहती हैं, "हम जीपी एसोसिएशन के पैथोलॉजी समूहों के व्हाट्सएप ग्रुपों में ये मेसेज दे रहे हैं कि डॉक्टर और पैथोलोजिस्ट अपॉइंटमेंट के आधार पर मरीज़ों को देखें और क्लिनिक खोलें. लेकिन इसका असर अधिक नहीं हुआ है और वो ट्रैफ़िक पुलिस से भी परेशान हैं."
डॉ. अपर्णा ने कुछ दिनों पहले ख़ुद एक ऐसी ही समस्या का सामना किया था, "मैं ब्लड सैंपल लेने के लिए एक मरीज़ के घर जा रही थी. मुझे एक वरिष्ठ ट्रैफ़िक पुलिस अधिकारी ने रोका, जिसने मुझसे कहा कि मैं घर पर क्यों नहीं रहती, मुझे बाहर जाने की क्या जल्दी है. मैंने उनसे कहा कि अगर आपको दिल का दौरा पड़ता तो आपको मेरी आवश्यकता होगी."
सुरेश वज़ीरानी का मानना है कि ग़ैर-कोरोना रोगियों की आने वाले दिनों में स्थिति और ख़राब होने वाली है. उन्होंने कहा, "हमारी प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली केवल 25 प्रतिशत की क्षमता पर काम कर रही है. अगर यह जारी रहता है तो हमें डर है कि ये एक गंभीर स्वास्थ संकट बन जाएगा. ग़ैर-कोरोना मरीज़ कोरोना-पीड़ित रोगियों से अधिक संख्या में मरेंगे."
सुरेश यह भी कहते हैं, "कोविड -19 का अधिकतर शिकार वो लोग हो रहे हैं जिन्हें पहले से बीमारियां हैं. इसलिए ये महत्वपूर्ण है कि ग़ैर-कोरोना रोगी नियमित रूप से अपना इलाज कराएं और सरकार उन्हें सुविधाएं दे. हमें कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए एक स्वस्थ राष्ट्र की ज़रुरत है."
वहीं, डॉ. अपर्णा का सुझाव है कि सरकार को अधिक समग्र दृष्टिकोण अपनाना चाहिए. वो कहती हैं, "उन्हें एक 360 डिग्री का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए जिससे सभी ग़ैर-कोरोना और कोरोना रोगियों को समान रूप से अपना इलाज मिल सके. कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में गैर-कोरोना रोगियों को स्वस्थ रखने की हर तरह की कोशिश करनी चाहिए."
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