कोरोना वायरसः मध्य पूर्व के लिए एक टाइम बम

    • Author, जोनाथन मार्कस
    • पदनाम, कूटनीतिक संवाददाता, बीबीसी

जंग और महामारी मिलकर कैसी तबाही मचाते रहे हैं, इतिहास इसका गवाह रहा है.

और अब जब कोरोना वायरस ने आहिस्ता-आहिस्ता मध्य पूर्व में पैर पसारना शुरू कर दिया है, तो जंगों में जकड़े इस इलाक़े में इसके मानवीय और राजनीतिक नतीजे बहुत गंभीर हो सकते हैं.

वायरस मध्य पूर्व में पहुँच चुका है. इसराइल जैसा देश जिसके यहाँ स्वास्थ्य की सुविधाएँ पश्चिम के जैसी आधुनिक हैं और जिसके पास संसाधन जुटाने की भरपूर शक्ति है, उसे भी महामारी के संभावित ख़तरों से लड़ने के लिए जूझना पड़ रहा है.

उसे वैस ही मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है जिनसे पश्चिमी यूरोप और अमरीका जूझ रहे हैं.

ऐसी ही हालत ईरान की है, जहाँ इसका क़हर और ज़्यादा बरपा है. वहाँ मरने वालों की संख्या बड़ी तेज़ी से बढ़ी है, और सरकार जो भी आँकड़े पेश कर रही है, उन पर बहुत कम ही जानकारों को भरोसा है.

वायरस का संक्रमण

मगर, मध्य पूर्व की कुछ ख़ास समस्याएँ हैं जिनसे संकट और गहरा सकता है. जैसे यहाँ के अधिकतर देशों में लोगों का रहन-सहन कैसा होगा, ये धार्मिक संस्थाएँ तय करती हैं.

और मज़हबी ताने-बाने में जकड़े समुदायों का नज़रिया तंग रहता है और वे बदलावों को आसानी और तेज़ी से स्वीकार नहीं करते.

ऐसे में ये महज़ संयोग नहीं कि इसराइल में अति-रूढ़िवादी हारदी समुदाय के लोगों ने सोशल डिस्टैंसिंग के निर्देशों को मानने में सुस्ती बरती और वहाँ सबसे ज़्यादा तकलीफ़ उन्हें ही उठानी पड़ी है.

उधर इराक़ में सीरिया से लौटकर आए शिया तीर्थयात्रियों में भी इस वायरस का संक्रमण हुआ, जिससे ये संकेत मिलता है कि इस तरह की आवाजाही से बीमारी फैलने का ख़तरा बढ़ जाता है.

नाकाम देश

वैसे निर्विवाद रूप से ये जितना बड़ा स्वास्थ्य संकट है, उतना ही बड़ा एक आर्थिक संकट भी. सऊदी अरब और रूस के बीच तेल की कीमतों को लेकर जो व्यापारिक युद्ध हुआ और जिसकी वजह से तेल का बाज़ार धराशायी हो गया, उससे मध्य पूर्व के अधिकतर देशों की आर्थिक सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा.

मध्य पूर्व के सरकारों की हालत ऐसी नहीं है कि वो मुश्किलों में पड़ी कंपनियों और व्यवसायों को बचाने के लिए सरकारी मदद दे सकें.

मगर इन सबसे अधिक कोरोना से लड़ते मध्य पूर्व के लिए जो समस्या सबसे बड़ी है, वो है वहाँ लगातार होती लड़ाइयाँ और उसकी वजह से वहाँ उपजी शरणार्थी समस्या.

सीरिया, लीबिया और यमन जैसे देशों को मोटे तौर पर नाकाम देश कहा जाता है जहाँ सरकारों के हाथ में बहुत कम ही शक्ति है और जहाँ साधन सीमित हैं और चिकित्सा तंत्र नाकाफ़ी. सीरिया में विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाक़ों में स्थित अस्पतालों और अन्य चिकित्सा संस्थाओं पर वहाँ की सरकार और उनके रूसी सहयोगी लगातार निशाना बनाते रहे हैं.

ऐसे में हैरानी की बात नहीं कि राहत संस्थाएँ इन देशों में तत्काल मदद की अपील कर रही हैं और वहाँ मिल-जुलकर अंतरराष्ट्रीय प्रयास किए जाने की माँग कर रही हैं.

वायरस के लिए माक़ूल जगह

सीरिया सरकार ने कोरोना संक्रमण के पहले मामले की पुष्टि 23 मार्च को की. अभी तक वहाँ लड़ाई में घिरे इदलिब प्रांत से किसी मामले की ख़बर नहीं आई है, मगर इसकी वजह वहाँ टेस्ट करने वाले साधनों की कमी हो सकती है.

अंतरराष्ट्रीय राहत संस्था मेडसाँ सान्स फ़्रन्टियर्स या एमएसएफ़ ने चेतावनी दी है कि "पूरे इलाक़े में बीमारी बहुत तेज़ी से फैल सकती है, ख़ास तौर पर उन शरणार्थी शिविरों में जहाँ लोग तंग जगहों पर रहते हैं और जहाँ सफ़ाई की उचित सुविधाएँ नहीं हैं. "

इन इलाक़ों में जो चिकित्सा केंद्र या सुविधाएँ हैं भी वो भी युद्ध के कारण दम तोड़ने की हालत में हैं. एमएसएफ़ ने केवल सीरिया को लेकर ही चिंता नहीं जताई है बल्कि वो तुर्की की ओर भी ध्यान दिलाता है जहाँ सीरिया से भागकर गए लोग शरणार्थी कैंपों में रह रहे हैं.

अंतरराष्ट्रीय मुहिम

रिफ़्यूजीज़ इंटरनेशनल नाम की संस्था ने दुनिया भर में विस्थापित लोगों के बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है. उसने भी फ़ौरन अंतरराष्ट्रीय प्रयास किए जाने की माँग की है.

संस्था के कार्यक्रम और नीति विभाग के उपाध्यक्ष हार्डिंग लैंग ने ध्यान दिलाया कि "वैश्विक महामारी के इस दौर में हमें दुनिया के उन लोगों को नहीं भुलाना चाहिए जिनपर सबसे ज़्यादा ख़तरा है."

वो कहते हैं, "सरकारों का ध्यान अभी अपने लोगों की रक्षा पर है जो कि बिल्कुल सही बात है, मगर कोविड-19 के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय मुहिम कामयाब हो इसके लिए ज़रूरी है कि इसमें सबका ध्यान रखा जाए. "

इस बारे में वो आगे कहते हैं, "हम दुनिया के उन 7 करोड़ लोगों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं जिन्हें जबरन विस्थापित होना पड़ा. ऐसे लोगों की रक्षा के लिए बुनियादी क़दम उठाना एक सही क़दम भी होगा और समझदारी भरा क़दम भी."

चरमराता तंत्र

मगर ऐसे समय में जब विकसित देश आर्थिक गतिविधियों और आवाजाही के ठप्प होने से उपजी परिस्थितियों से जूझ रहे हैं, सभी लोगों के बारे में सोचना मुश्किल काम होगा. और मध्य पूर्व की समस्या बड़ी विकराल है.

रिफ़्यूजी इंटरनेशनल का कहना है कि अभी इराक़, सीरिया, लेबनान और तुर्की में कम-से-कम एक करोड़ 20 लाख शरणार्थी और विस्थापित रह रहे हैं. और पूरे मध्य पूर्व में सीमाएँ ऐसी हैं जहाँ से शरणार्थी या प्रवासी आसानी से आर-पार जा सकते हैं.

इसके साथ एक दूसरी चुनौती मध्य पूर्व के इन देशों का ख़स्ताहाल हो चुका चिकित्सा तंत्र एक दूसरी समस्या है.

रिफ़्यूजी इंटरनेशनल साथ ही सीरिया का ध्यान दिलाते हुए उसे चिंता की एक बड़ी वजह बताता है जहाँ 56 लाख लोग देश छोड़ चुके हैं और 65 लाख लोग देश में ही विस्थापित हैं. उनमें से अधिकतर लोगों के पास स्वास्थ्य के लिए कोई सुविधा नहीं है.

हाल ये है कि वहाँ इन लोगों को सोशल डिस्टैंसिंग और सफ़ाई के साधारण निर्देशों का पालन करवा पाना भी मुश्किल है जबकि वहाँ शरणार्थी और विस्थापित लोग काफ़ी तंग और गंदे कैंपों में रहने को मजबूर हैं.

जहाँ ख़तरा हो सकता है...

मध्य पूर्व में लड़ाई में जकड़े इलाक़ों के अलावा और भी कई जगह हैं जाँ कोरोना संक्रमण का ख़तरा हो सकता है. इनमें इसराइली कब्ज़े वाला वेस्ट बैंक और गज़ा पट्टी शामिल हैं.

पश्चिमी तट के लगभग 40 फ़ीसदी हिस्सों पर शासन करने वाले फ़लस्तीनी प्रशासन साधनों के सीमित होने की वजह से शुरूआती दौर में ही संघर्ष करता दिख रहा है और चिंता इस बात की बन गई है कि वहाँ कामगारों के इसराइल और पश्चिमी तट के बीच आने-जाने से वायरस फैलने का ख़तरा और ना बढ़ गया हो.

मगर सघन आबादी वाले गज़ा पट्टी में स्थिति और चिंताजनक है. वहाँ के लोग सुरक्षा के नाम पर लगी इसराइल और मिस्र की आर्थिक नाकेबंदी की वजह से बाक़ी इलाक़ों से कटे हुए हैं.

वहाँ की ज़िम्मेदारी किसकी है इसे लेकर इसराइल और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच लंबे समय से बहस चल रही है. इसराइली सैनिक वहाँ से निकल चुके हैं और इसराइल का कहना है कि गज़ा में जो भी हो रहा है उससे उसका कोई वास्ता नहीं और ये फ़लस्तीनी गुट हमास की ज़िम्मेदारी है.

लेकिन यदि गज़ा में महामारी फैली तो उसकी इस दलील को मानते रहना मुश्किल होगा क्योंकि इसराइल गज़ा के भीतर बेशक ना हो, मगर बाहर से उसके ऊपर उसी का नियंत्रण है.

ऐसे में हैरानी की बात नहीं कि फ़लस्तीनी जानकारों और मानवीय संस्थाओं की ओर इस कथित इसराइली घेराबंदी को हटाने और फ़लस्तीनियों और इसराइलियों के मिलकर इस महामारी का सामना करने की माँग की जा रही है.

कोई झुकने को तैयार नहीं

ये सोचना बड़ा अच्छा लगता है कि संकट के इस दौर में लोग अपनी दुश्मनी को ताक पर रख देंगे. पर्दे के पीछे से इसराइल पश्चिमी तट में कुछ साज़ो-सामान भी भेज रहा है और चिकित्सा से जुड़े लोगों के लिए ट्रेनिंग कोर्स भी करवा रहा है.

मगर सारी दुश्मनी को ताक पर रख देने की संभावना बहुत कम लगती है. यमन में संघर्ष में शामिल विभिन्न धड़ों के बीच एक समग्र युद्धविराम होने की बात आई मगर लगता नहीं कि इसपर अमल हो सका है. कुछ ही दिन पहले वहाँ से सऊदी ठिकानों पर मिसाइल हमले हुए हैं.

वहीं ईरान के ख़िलाफ़ जारी अमरीकी प्रतिबंधों में कमी की भी कोई संभावना नहीं दिख रही. जबकि कई अमरीकी विशेषज्ञों का मानना है कि इन प्रतिबंधों से ईरान को वायरस से लड़ने के लिए विदेशों से मेडिकल और दूसरे सामानों को ख़रीदने में बाधा आ रही है जिसकी उसे बेहद ज़रूरत है.

मगर अमरीका में दक्षिणपंथी विचारधारा के विश्लेषकों की बातें सुनकर समझना मुश्किल नहीं लगता कि अमरीका इस संकट को एक ऐसा मौक़ा मानकर चल रहा है जिससे ईरान सरकार की हालत और ख़राब होगी.

ट्रंप सरकार ने ख़ुले तौर पर तो इसे स्वीकार नहीं किया है मगर उसने स्पष्ट रूप से संकट के इस दौर में ईरान के साथ सार्थक बातचीत की कोई कोशिश भी नहीं की है.

प्रलयंकारी आशंका

इन परिस्थितियों में एक सवाल उठता है – अगर ये महामारी मध्य पूर्व में फैली तो उसके व्यापक परिणाम क्या होंगे?

मध्य पूर्व में शायद ही कोई सरकार हो जो जायज़ रूप से वहाँ सत्तारूढ़ हैं. वहाँ नई पीढ़ी के अरमानों को दबा कर रखा गया है. “अरब स्प्रिंग” से शायद छोटा-मोटा कुछ बदलाव हुआ हो, मगर जिन तनावों की वजह से ये क्रांति हुई, वो बरक़रार हैं.

लोकतांत्रिक इसराइल में भी, महामारी ने एक संवैधानिक संकट का रंग ले लिया है जिसके राजनीतिक परिणाम निकलेंगे.

कोरोना वायरस से लड़ने की ज़रूरत महसूस करते हुए वहाँ विपक्षी नेता बेनी गैंट्ज़ बिन्यमिन नेतन्याहू के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय सरकार में शामिल होने पर मजबूर होते दिखाई दे रहे हैं. ये ऐसा क़दम है जिसके बारे में वो कह चुके हैं कि वे कभी ऐसा नहीं कर सकते और इसे लेकर उनकी पार्टी दो फाड़ हो गई है.

और अदालतों के बंद होने से प्रधानमंत्री नेतन्याहू के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले की सुनवाई भी टल रही है और वो सत्ता पर पकड़ मज़बूत कर रहे हैं.

जंगों और महामारियों से इतिहास पटा पड़ा रहा है. अभी, दुर्भाग्य से, संकट का ये शुरूआती दौर है.

ऐसे में मध्य पूर्व की मुसीबतें और बढ़ सकती हैं, और जो देखने को मिले, वो शायद इससे बेहतर ना हो जितना कि हम आज देख रहे हैं.

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