कोरोना वायरसः क्या यूपी की तरह केरल में भी इंसानों पर केमिकल का छिड़काव किया गया?

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए 24 मार्च से भारत में लॉकडाउन का ऐलान हो चुका है और इस लॉकडाउन के सबसे बड़े शिकार रहे गांवों से शहरों में आने वाले प्रवासी मज़दूर.
25 मार्च से ही अपने-अपने दुखों को बस्तों में समेटे दिल्ली, मुंबई, गुजरात सहित देश के बड़े शहरों से हज़ारों-लाखों की संख्या में इन मज़दूरों ने अपने-अपने गांवों की ओर पलायन शुरू कर दिया.
ऐसे ही मज़दूरों का एक वीडियो उत्तर प्रदेश के बरेली से सामने आया.
जहां दिल्ली से जब ये मज़दूर बरेली पहुंचे तो उन्हें बैठा कर उनपर डिसइंफेक्टेंट का छिड़काव किया गया. इसमें सोडियम हाइपोक्लोराइट जैसा रसायन था.
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वीडियो के सामने आने के थोड़ी देर बाद ही बरेली के जिलाधिकारी ने ट्वीट किया, "इस वीडियो की पड़ताल की गई, प्रभावित लोगों का सीएमओ के निर्देशन में उपचार किया जा रहा है. बरेली नगर निगम एवं फायर ब्रिगेड की टीम को बसों को सैनेटाइज़ करने के निर्देश थे, पर अति सक्रियता के चलते उन्होंने ऐसा कर दिया. सम्बंधित के विरुद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं."
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लेकिन इसके तुरंत बाद ही बीजेपी आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने एक वीडियो ट्वीट करते हुए कहा कि ऐसे ही रसायन केरल में भी इंसानों पर छिड़के गए लेकिन उस पर किसी ने आपत्ति नहीं जताई.
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बीजेपी आईटी सेल का ट्वीट
मालवीय ने वीडियो के साथ लिखा, "ये केरल है, जहां एजेंसियां सीमा पार करने वालों पर ऐसे स्प्रे कर रही है. लेकिन सारा विरोध उत्तर प्रदेश के खिलाफ़ किया जा रहा है, क्योंकि वहां बीजेपी के एक भगवाधारी संत मुख्यमंत्री हैं जो काफ़ी अच्छा काम कर रहे हैं."
इसके बाद केरल का ये वीडियो इस दावे के साथ वायरल होने लगा कि उत्तर प्रदेश की तरह ही केरल राज्य में पिनाराई विजयन की सरकार लोगों पर रयासन का छिड़काव करा रही है.
इस ट्वीट के बाद बरेली के जिलाधिकारी का एक और ट्वीट सामने आया जिसमें उन्होंने कहा, "हालांकि मास सैनिटाइजेशन का यह तरीका दुनिया के कई देशों में अपनाया जा रहा है. इसे करते वक़्त और सावधानी बरती जानी चाहिए थी और सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए था जिससे लोगों को परेशानी महसूस नहीं होती."
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क्या है सच्चाई
बीबीसी ने सबसे पहले इस दावे की पड़ताल शुरू की कि क्या केरल में ऐसा कोई रसायन इंसानों पर स्प्रे किया गया है? और साथ ही दुनिया में किन देशों में इन रसायनों का इस्तेमाल इंसानों पर किया जा रहा है. सबसे पहले हमने केरल के वीडियो की जानकारी जुटाई. हमें पता चला कि ये वीडियो केरल के वायनाड ज़िले का है.
बीबीसी ने केरल प्रशासन से संपर्क किया तो फ़ायर फ़ोर्स के वरिष्ठ अधिकारी ने पहचान ज़ाहिर ना करने की शर्त पर बताया, "ये वीडियो लगभग एक सप्ताह पुराना है और इसमें नज़र आ रहा स्प्रे पानी और साबुन का डायल्यूट सॉल्यूशन है जिसे हमने वायनाड में इस्तेमाल किया था. इसमें सोडियम हाइपोक्लोराइट जैसा रसायन नहीं था क्योंकि ऐसे रसायन हम इंसानों पर इस्तेमाल नहीं करते. साबुन का ये मिश्रण किसी भी तरह के संक्रमण को दूर करने के लिए किया गया था."
अब बात करते हैं दूसरे दावे की कि क्या दुनियाभर के कई देशों में ऐसे रसायन इंसानों पर इस्तेमाल करके उन्हें सैनेटाइज़ किया जा रहा है?
इस साल फरवरी के आखिर में चीन के चॉन्गकिंग प्रांत में एक कंपनी ने 360 डिग्री वाला डिसइंफ़ैक्टेंट टनल बनाया. इस टनल में ऐसे सेंसर लगाए गए कि किसी भी इंसान के इसमें दाखिल होते ही डिसइंफ़ैक्शन कैमिकल का स्प्रे शुरू हो जाता है. चीन इस स्प्रे के लिए क्लोरीन ब्लीच और पानी का सॉल्यूशन इस्तेमाल कर रहा है. चीन के अन्य शहरों में भी इस तरह के टनल के इस्तेमाल किए जा रहा हैं.

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क्या ये केमिकल इंसानों पर इस्तेमाल के लिए उचित हैं?
सबसे पहले बात सोडियम हाइपोक्लोराइट की. जिसका इस्तेमाल बरेली में मज़दूरों पर किया गया.
अमरीका के मुताबिक, सोडियम हाइपोक्लोराइट का इस्तेमाल पीने के पानी में और स्वीमिंग पुल के पानी को साफ़ करने के लिए किया जाता है. इसके साथ ही ये एक डिसइंफेक्टेंट एजेंट है जिसका इस्तेमाल किसी सतह, धातु के सामानों को साफ़ करने के लिए किया जाता है.
लेकिन अगर ये इंसानी शरीर के संपर्क में आ जाए तो आंखों में तेज़ जलन, त्वचा पर जलन हो सकती है. अगर इंसानों पर ये ज्यादा मात्रा में स्प्रे हो जाए तो सांस में परेशानी और टिश्यू बर्न जैसी दिक़्कत हो सकती है. इसलिए इसे इंसानों पर कतई इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
अब बात करते हैं क्लोरीन ब्लीच या कैल्सियम हाइपोक्लोराइट की. चीन के डिसइंफैक्शन टनल में पानी के साथ ये कैमिकल इस्तेमाल किया जा रहा है. ये भी एक ऑक्सिडाइजिंग एजेंट है. सोडियम हाइपोक्लोराइट के अपेक्षा इसका इस्तेमाल पानी को साफ़ करने के लिए ज्यादा किया जाता है.

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ब्लीचिंग एजेंट
साथ ही ये एक बेहतर डिसइंफेक्शन रसायन है. लेकिन इसे भी इंसानों पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इससे भी शरीर में तेज़ जलन होती है. खासकर आंख, मुंह और नाक में इसके जाने से ज़्यादा परेशानी हो सकती है.
हमने इसे समझने के लिए दिल्ली के मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल, साकेत के इंफ़ैक्शियस डिज़ीज़ के सीनियर डॉक्टर जतिन आहूजा से बात की.
डॉक्टर आहूजा कहते हैं, "ये दोनों ही ब्लीचिंग एजेंट हैं और हम अपनी रोज़मर्रा के कामों में इसका इस्तेमाल करते हैं. ख़ास कर मरीज़ के मास्क, कई नलियां जो रोज़ नहीं बदली जातीं वो इससे साफ़ की जाती हैं. लेकिन इंसानों पर इसका उपयोग बिलकुल मना है."
"इंसानों को सैनिटाइज़ करने के लिए उन्हें बेहतर साबुन से नहलाना चाहिए और उनके कपड़ों को अगर गर्म पानी और डिटर्जेंट से साफ़ किया जाना चाहिए. हां अगर उनके बक्से या बैग जैसे सामानों पर इस ब्लीच का छिड़काव होता तो उससे कोई परेशानी नहीं होती लेकिन इंसानों पर कही भी इसे इस्तेमाल नहीं करना चाहिए."
साबुन-पानी के मिश्रण का छिड़काव
डॉक्टर जतिन आहूजा आगे कहते हैं, "यहां तक कि एल्कोहॉल वाले सैनेटाइज़र भी हाथ या मोटी त्वचा वाले हिस्से में ही इस्तेमाल किए जा सकते हैं. आंख, चेहरा, नाक, मुंह जैसी संवेदशील जगहों पर बाज़ार में बिकने वाले सैनेटाइज़र भी इस्तेमाल करने की मनाही है."
क्या ऐसे डिसइंफैक्शन के स्पे से इंसान वायरस से बचेंगे?
बिजनेस इंसाइडर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस बात के कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं कि डिसइंफ़ेक्शन स्प्रे से कोरोना वायरस के संक्रमण से इंसान बच जाएगा. अगर वायरस किसी इंसान के शरीर में पहुंच चुका है तो ये ब्लीचिंग एजेंट इसे उसके बॉडी फ्यूइड यानी ख़ून तक पहुंच के उसे ख़त्म नहीं कर सकते.
बीबीसी ने अपनी पड़ताल में पाया है कि केरल में इंसानों पर स्प्रे तो किया गया लेकिन वहां साबुन-पानी के मिश्रण का छिड़काव हुआ जो इंसानी शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता, वहीं यूपी के बरेली में सोडियम हाइपोक्लोराइट के मिश्रण का इस्तेमाल हुआ जिसे मानव शरीर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.
चीन में भी कुछ जगहों पर इंसानों पर क्लोरीन बेस्ड ब्लीच का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसे मेडिकल संस्थाएं इस्तेमाल ना करने की सलाह देती हैं.

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