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नागरिकता संशोधन क़ानून: शाहीन बाग़ अभी खत्म नहीं हुआ है...
- Author, चिंकी सिन्हा
- पदनाम, चिंकी सिन्हा, बीबीसी संवाददाता
मंगलवार को शाहीन बाग को खाली करा लिया गया, 101 दिनों से चला आ रहा प्रदर्शन अब नहीं चल रहा है.
बीते 15 दिसंबर से जिस सड़क को महिलाओं ने बंद किया हुआ था, वह भी खुल चुकी है. मेहरुनिस्सा बीते कई सप्ताह से यहां धरने पर बैठी थीं. इसके लिए उन्होंने कैंटीन स्टाफ की अपनी नौकरी छोड़ दी थी. सोनिया विहार के अपने घर पर ताला लगाकर वह यहां धरने पर बैठी थीं.
लेकिन प्रदर्शन स्थल खाली कराए जाने के बाद वह धीमे धीमे चलते वह शाहीन बाग के एक गली के अंदर चली जाती है. मंगलवार की सुबह, रात से धरने पर बैठी चार महिलाओं के लिए पड़ोस की महिलाएं नाश्ता लेकर आई थीं.
इससे पहले सोमवार की रात, पुलिस ने यहां आकर धरना खत्म करने की चेतावनी दी थी, जिसे महिलाओं ने नहीं माना. कुछ ही घंटों के बाद, पुलिस ने मुस्लिम महिलाओं के प्रदर्शन की हर निशानी को हटा दिया गया, तोड़ दिया और संबंधित सामाग्री को उठाकर ले गई.
स्क्रैप मैटेरियल से बने भारत के विशाल नक्शे को तोड़ दिया गया, इंडिया गेट के प्रतिमूर्ति को हटाया गया. यहां पर बने टेंटों को उखाड़ दिया गया और 70 चौकियों पर प्रदर्शन में शामिल महिलाओं की उपस्थिति की निशानी के तौर पर रखी चप्पलों को पांच ट्रकों में भरकर ले जाया गया.
कई जिलों में धारा 144
दिल्ली पुलिस की साउथ ईस्ट की डीसीपी ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया कि शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों से लॉक डाउन के चलते जगह खाली करने को कहा गया था. उन लोगों के मना किए जाने के बाद इस प्रदर्शन पर कार्रवाई की गई.
प्रदर्शन स्थल को खाली करा लिया गया है, इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया गया. इसके बाद इलाके की सुरक्षा व्यवस्था को चाक चौबंद कर दिया गया है. पुलिस के मुताबिक इस दौरान छह महिलाओं और तीन पुरुषों को हिरासत में लिया गया है जबकि प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पुलिस 11 लोगों को ले गई है.
हालांकि इन सबको शाम में रिहा कर दिया जाएगा. इनमें से एक 36 साल की मरियम खान भी थीं जो प्रदर्शन की शुरुआत से ही इसमें शामिल थीं.
उन्होंने रविवार को बीबीसी को बताया था कि प्रदर्शन कानूनी फ्रेमवर्क के तहत जारी है और प्रदर्शन की जगह पर सोमवार से केवल पांच महिलाएं मौजूद होंगी जो एक दूसरे से काफी दूरी पर बैठेंगी और कोरोना वायरस कोविड-19 के संक्रमण पर अंकुश के लिए मास्क लगाकर प्रदर्शन करेंगी.
कोरोना वायरस संक्रमण पर अंकुश के लिए सरकार ने लॉक डाउन और कर्फ्यू को लागू किया है. रविवार को इसके चलते देश के कई जिलों में धारा 144 लागू की गई थी.
कोरोना संक्रमण फैलने का खतरा
रविवार को जनता कर्फ्यू के दिन इस प्रदर्शन पर अज्ञात लोगों की ओर से पेट्रोल बम फेंक कर हमला किया था, इसके अलावा भी इस जगह पर कई बार हिंसक स्थिति देखने को मिली, इसके बावजूद प्रदर्शन 100 दिनों तक चला.
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक मंगलवार को सुबर सात बजे पुलिस पहुंच गई थी और समाचार चैनलों में दिए बयानों में पुलिस ने यह माना है कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों को बलपूर्वक हटा दिया है. हालांकि इन महिलाओं के प्रदर्शन को चुनौती देने वाली वकील अमित सहनी की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल है.
इसमें याचिका में कहा गया है कि इन महिलाओं के प्रदर्शन पर होने से कोरोना संक्रमण फैलने का खतरा है और इन्हें हटाया जाना चाहिए. इससे पहले अदालत ने प्रदर्शनकारियों से बात करने के लिए पर्यवेक्षकों को भेजा था ताकि प्रदर्शनकारी हाईवे का रास्ता खाली करके कहीं और प्रदर्शन करने के लिए तैयार हो जाएं.
दिल्ली में सोमवार की सुबह छह बजे से लॉक डाउन लागू है और इस दौरान केवल आवश्यक सेवाओं को राजधानी में कहीं आने जाने की इजाजत है और पूरे शहर में धारा 144 ( यानी चार लोगों से ज्यादा लोगों के एकत्रित होने पर पाबंदी) लागू है. इसका उल्लंघन करने वाले हर शख्स पर कार्रवाई करने के आदेश है.
नागरिकता संशोधन कानून
दिल्ली पुलिस के कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा है, "हमलोगों ने जामिया और शाहीन बाग और अन्य जगहों को खाली कराया है. इस दौरान कुछ लोगों को हिरासत मे लिया गया और हमें मुश्किलें भी हुई. लेकिन मुझे प्रसन्नता है कि लोगों ने कोई प्रतिरोध नहीं जताया."
शाहीन बाग में पुलिस की टीम को फूल देते हुए स्थानीय लोगों की तस्वीरें भी सामने आई हैं. लेकिन मरियम खान जैसी प्रदर्शनकारियों का मानना है कि नागरिकता संशोधन कानून, कोविड-19 से ज्यादा खतरनाक है. मरियम ने कहा कि वह जानती हैं कि यह महामारी खतरनाक है लेकिन इतना ही खतरनाक नागरिकता का मुद्दा भी है.
एक अन्य प्रदर्शनकारी ने भी मंगलवार सुबह बताया कि प्रदर्शन अपने स्प्रिट में जारी रहेगा. इस धरने में शुरुआत से ही शामिल शाहीन कौसर बताती हैं कि जिस तरह से इसे हटाया गया वह दुखद है. शाहीन कौसर सोमवार की शाम को शाहीन बाग में थीं, वहां इस बात की बैठक भी हुई थी कि क्या धरने को समाप्त करना चाहिए या नहीं?
इसके बाद वह अपने घर लौट गई थीं. प्रदर्शनकारी इस मुद्दे पर बात कर रहे थे कि क्या कुछ समय के लिए प्रदर्शन को बंद कर दना चाहिए. पिछले सप्ताह जब दिल्ली सरकार ने 50 लोगों से ज्यादा लोगों के एक साथ बैठने की जगह पर पाबंदी लगा दी थी तबसे प्रदर्शन में 45 महिलाएं शामिल हो रही थीं.
लॉकडाउन के बाद
शनिवार को इन लोगों ने फैसला लिया कि जनता कर्फ्यू में भी विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा और इस दौरान केवल पांच महिलाएं प्रदर्शन पर बैठेंगी और बाक़ी महिलाओं के प्रतिनिधित्व के तौर पर उनकी चप्पलें रखी जाएंगी.
शाहीन कौसर बताती हैं, "हमें इसे पहले ही समाप्त घोषित करना चाहिए, क्योंकि लॉकडाउन के बाद हम लोग फिर से लौट सकते थे. लेकिन इससे कुछ प्रदर्शनकारी तैयार नहीं हईं. उनका कहना था कि हमें इस उद्देश्य के लिए जान देने के लिए भी तैयार होना चाहिए."
कौसर के मुताबिक शाहीन बाग के प्रदर्शन की खूबसूरत संस्कृति यही देखने को मिली कि बिना किसी लीडर के इस प्रदर्शन में हर मुद्दे पर डिबेट और बहस होने की गुंजाइश थीं. लेकिन पिछले कुछ दिनों से प्रदर्शन को जारी रखने पर लोगों की राय बंटने लगी थी.
क्योंकि देश भर के अलग अलग हिस्सों में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे प्रदर्शन स्थलों को खाली कराया जा रहा था. दिल्ली के जाफराबाद, हौज रानी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और तुर्कमान गेट के प्रदर्शन को भी खाली करा लिया गया था.
सोमवार की शाम
पुरानी दिल्ली के ईदगाह में सीमित संख्या में लोग प्रदर्शन में शामिल थे लेकिन सोमवार की शाम को उसी भी खाली करा लिया गया था. मुंबई, देवबंद और लखनऊ में जारी प्रदर्शन को भी उसके स्थान से हटा दिया गया था.
ओखला में रहने वाली 43 साल की शगुफ्ता, शाहीन बाग के प्रदर्शन में शुरू से शामिल रही हैं और इस दौरान कई कार्यक्रमों की संयोजक भी थीं. उन्होंने बताया कि यह खूबसूरत तरीके से समाप्त हो सकता था, ऐसा नहीं होना दुखद है.
शगुफ्ता ने फोन पर बताया, "तमाम मुश्किलों के बाद भी कई महीनों से हमारा प्रदर्शन जारी था. पुलिस बड़ी संख्या में आई और सबकुछ हटा दिया. वह सबकुछ जो हमलोगों ने प्रेम से मेहनत करने बनाया था. हम सरकार के नियमों को मान रहे थे, कोरोना वायरस पर चर्चा कर रहे थे. हमलोगों में किसी ने कहा है कि यह लंबी लड़ाई है और लॉकडाउन खत्म होने के बाद हम लौटेंगे. लेकिन यह एक बहादुरी भरे प्रदर्शन का दुखद अंत है."
सत्ता की ताकत
शाहीन बाग की तर्ज पर देश भर में कई जगहों पर प्रदर्शन देखने को मिला था. यह लोग लगातार अपने रणनीति भी बदल रहे थे.
कई महिला संगठनों, समूहों मसलन एनएफआईडब्ल्यू, एआईडीडब्ल्यूए, दिल्ली की प्रगतिशील महिला संगठन ने कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते राज्य और केंद्र सरकार, संस्थाएं और अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों से तुरंत इस मुद्दे पर ध्यान देने को कहा था.
क्योंकि इस संक्रमण के फैलने की आशंका के बाद भी देश भर में हजारों महिलाएं प्रदर्शन पर बैठी थीं. सहेली संस्था की वाणी सुब्रमण्यम बताती हैं कि प्रदर्शन स्थल को जिस तरह से बलपूर्वक खाली कराया गया वह नागरिकता में अंतर के मुद्दे और सत्ता की ताकत को प्रदर्शित करने वाला है.
वाणी बताती हैं, " पुलिस की कार्रवाई सत्ता की ताकत का प्रदर्शन था, ऐतिहासिक चीज को मिटाने का प्रदर्शन था. जनता कर्फ्यू के दौरान लोग थाली बजाते हुए सड़कों पर निकले और प्रदर्शन किया. उसे मंजूर किय गया और शाहीन बाग के प्रदर्शन को इजाजत नहीं मिली. यह नागरिकता में अंतर को जाहिर कनरे वाला है. ठीक है महामारी की स्थिति है लेकिन इससे दूसरे मुद्दे समाप्त नहीं हो जाते. हम यहां की महिलाओं के साथ खड़े हैं."
क्रूर परिस्थितियों का सामना
वाणी बताती हैं, 'प्रदर्शन करने वाली हजारों महिलाओं से ना तो राज्य सरकार ने बात की और ना ही केंद्र सरकार ने, यह किस तरह का लोकतंत्र है.'
70 एक्टिविस्ट और आंदोलनों के हस्ताक्षर के साथ इन महिलाओं ने बयान जारी किया था, जिसमें कहा गया था, "देश कोरोना वायरस की महामारी से लड़ने की तैयारी कर रहा है, उसी वक्त देश की महिलाओं के लिए भी संकट बढ़ रहा है. बीते कुछ महीनों से देश भर में हजारों महिलाएं प्रदर्शन पर बैठी है. ये महिलाएं एनपीआर, एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून को वापस लेने की मांग कर रही है."
"उनकी चिंता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे कह रही हैं कि हम कोरोना वायरस से बच भी गए तो डिटेंशन सेंटर में क्रूर परिस्थितियों का सामना करते हुए अमानवीय मौत का सामना करना पड़ेगा. बावजूद इसके केंद्र और राज्य सरकारें और उनकी संस्थाएं लगातार, शांति से प्रदर्शन करने वाली महिलाओं से बात करने से इनकार करती रही है, इसके बदले इन महिलाओं के प्रदर्शन पर हमले हुए, उन्हें बदनाम किया गया. उनका मजाक उड़ाया गया."
अदालत पर भरोसा
इन लोगों ने एनपीआर डेटा कलेक्शन की प्रक्रिया को टालने और दीर्घकाल में पूरी तरह हटाने की मांग केंद्र और राज्य सरकारों से की थी.
शाहीन बाग के प्रदर्शन में शामिल एक्टिविस्ट साजिद माजिद बताते हैं, "मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि किस वजह से प्रदर्शन स्थल को खाली कराया गया, वह भी तब जब मामला अदालत में है. प्रदर्शन में शामिल महिलाएं खुद से सावधानी और बचाव के तरीके अपना रही थीं. इसका मतलब तो यही है कि इस सरकार का अदालत पर कोई भरोसा नहीं है."
वैसे शाहीन बाग की प्रदर्शन वाली सड़क रहेगी, 101 दिनों तक इस पर चला प्रदर्शन भी याद किया जाएगा. इसे कोई नहीं मिटा सकता. और यह पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ. शाहीन यानी बाज की आवाज़ फिर से गूंजेगी. जैसा कि इस प्रदर्शन में शामिल एक महिला ने नाम ना देने की शर्त पर कहा, "मुद्दा पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है."
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