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कोरोना वायरस: लॉकडाउन और कर्फ़्यू में क्या अंतर है
- Author, कमलेश मठेनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस के ख़तरे को देखते हुए भारत के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लॉकडाउन कर दिया गया है.
इन राज्यों के 548 ज़िलों में लॉकडाउन का आदेश दिया गया है. वहीं, पंजाब और महाराष्ट्र में लॉकडाउन के बाद कर्फ़्यू भी लगा दिया गया है.
इससे पहले दिल्ली में लॉकडाउन के तहत लोगों को सख़्त नियमों का पालन करने के आदेश दिए गए थे.
सरकार का कहना है कि लॉकडाउन और कर्फ़्यू की मदद से सोशल डिस्टेंसिंग में मदद मिलेगी. लोग अपने घरों में रहेंगे और वायरस के संक्रमण को फैलने से रोका जा सकेगा.
लेकिन, लॉकडाउन के दौरान भी देखा गया कि कई लोग बाहर निकले और सड़कों पर घूमते हुए दिखे. इसके बाद कर्फ़्यू लगाने का क़दम उठाया गया.
इस दौरान लॉकडाउन और कर्फ़्यू को लेकर लोगों में उलझन देखी जा रही है.
लॉकडाउन क्योंकि एक नई प्रक्रिया है तो उसके नियम समझने में परेशान आ रही है. ऐसे में जानते हैं कि दोनों में क्या अंतर है.
क्या होता है लॉकडाउन
लॉकडाउन को महामारी अधिनियम 1897 के तहत लागू किया जाता है. ये अधिनियम पूरे भारत पर लागू होता है.
इस अधिनियम का इस्तेमाल किसी विकराल समस्या के दौरान होता है. जब केंद्र या राज्य सरकार को ये विश्वास हो जाए कि कोई संकट या बीमारी देश या राज्य में आ चुकी है और सभी नागरिकों तक पहुंच रही है तो देश व राज्य दोनों इस अधिनियम को लागू कर सकते हैं.
इस अधिनियम की धारा 2 राज्य सरकार को कुछ शक्तियां प्रदान करती है. इसके तहत केंद्र और राज्य सरकारें बीमारी की रोकथाम के लिए अस्थायी नियम बना सकती हैं.
सरकारें ऐसे सभी नियम बना सकती हैं जो बीमारी की रोकथाम में कारगर साबित हो सकती हैं.
इसी नियम के तहत सभी राज्यों में लॉकडाउन का आदेश दिया गया है.
उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने लॉकडाउन के बारे में ये बातें हमें बताईं-
- लॉकडाउन एक प्रशासनिक आदेश होता है. इसे किसी आपदा के समय सरकारी तौर पर लागू किया जाता है. इसमें लोगों से घर में रहने का आह्वान और अनुरोध किया जाता है. इसमें ज़रूरी सेवाओं के अलावा सारी सेवाएं बंद कर दी जाती हैं. दफ़्तर, दुकानें, फ़ैक्टरियाँ और परिवहन सुविधा सब बंद कर दी जाती है. जहां संभव हो वहां कर्मचारियों से घर से काम करने के लिए कहा जाता है.
- लॉकडाउन में सज़ा का प्रावधान होना ज़रूरी नहीं है. एक तरह से लॉकडाउन को, बिना सज़ा के प्रावधान वाला कर्फ़्यू कहा जा सकता है. अगर लोग इसमें बाहर निकलते हैं तो पुलिस सिर्फ़ उन्हें समझाकर वापस भेज सकती है. उन्हें जेल या जुर्मान नहीं हो सकता. हालांकि, सरकार लॉकडाउन में भी सख़्ती कर सकती है. उत्तर प्रदेश प्रशासन ने ये कहा है कि लॉकडाउन के अंतर्गत कोई बाहर आता है तो छह महीने की सज़ा या जुर्मान लगाया जा सकता है.
- क़ानूनी पहलुओं पर जाएं तो कर्फ़्यू एक स्थापित प्रक्रिया रही है और प्रशासन के पास इसे लागू करने का अनुभव भी रहा है. लेकिन, लॉकडाउन एक नया प्रयोग है इसलिए व्यावहारिकता में कुछ नई बातें सामने आ रही हैं.
- वर्तमान समय में लॉकडाउन में ज़रूरी सेवाओं जैसे पुलिस, अग्निशमन, मेडिकल, पैरामेडिकल, मीडिया, डिलिवरी, पेट्रोल पंप, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बस टर्मिनल, बस स्टैंड, सुरक्षा सेवाएं, पोस्टल सेवाएं, टेलिकॉम एवं इंटरनेट सेवाएं, बैंक, एटीएम, पानी, बिजली, नगर निगम, ग्रॉसरी और दूध आदि सेवाओं को लॉकडाउन से छूट दी गई है. इनसे जुड़े लोग और वाहन बाहर जा सकते हैं.
- हालांकि, भारतीय रेलवे ने 25 मार्च तक के लिए अपनी सेवओं पर रोक लगा दी है.
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क्या होता है कर्फ़्यू
- दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 144 के तहत कर्फ़्यू लगाया जाता है. इस धारा को लागू करने के लिए ज़िला मजिस्ट्रेट एक नोटिफ़िकेशन जारी करता है. जिस जगह भी यह धारा लगाई जाती है, वहां चार या उससे ज़्यादा लोग इकट्ठे नहीं हो सकते हैं. अगर पूरे राज्य में ये व्यवस्था लागू है तो पूरे राज्य में चार या उससे ज़्यादा लोग एकत्र नहीं हो सकते.
- अक्सर इस क़ानून का उपयोग विरोध प्रदर्शन और दंगों के दौरान क़ानून व्यवस्था बिगड़ने से रोकने के लिए किया जाता है. हाल में सीएए के विरोध में हुए प्रदर्शनों और दंगों के दौरान हालात क़ाबू करने के लिए भी कई जगहों पर धारा 144 लगाई गई थी.
- कर्फ्यू में ज़रूरी सेवाओं जैसे पुलिस, अग्निशमन, मेडिकल, पैरामेडिकल, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बस टर्मिनल्स, बस स्टैंड, पानी, बिजली, ग्रॉसरी और दूध आदि सेवाएं को लेकर छूट दी गई है. इनसे जुड़े लोग काम के उद्देश्य से बाहर निकल सकते हैं.
- लेकिन, कर्फ़्यू के दौरान ज़रूरी सेवाओं के लिए पास जारी किया जाता है. कर्फ़्यू के पास डेजिगनेट अधिकारी जारी करते हैं. अगर पास नहीं है तो बाहर जाने पर सज़ा हो सकती है.
- अगर कोई धारा 144 तोड़ता है तो धारा 188 के तहत उसमें चार महीने की क़ैद या जुर्माना या दोनों की सज़ा हो सकती है.
- इनके अलावा गैर-ज़रूरी काम के लिए आप गाड़ियाँ बाहर नहीं निकाल सकते.
कर्फ़्यू की ज़रूरत क्यों पड़ी
शुरुआती दौर में कई राज्यों और ज़िलों में सिर्फ़ लॉकडाउन किया गया था. लेकिन, इसके बाद महाराष्ट्र और पंजाब में कर्फ़्यू भी लगा दिया गया.
कर्फ़्यू की ज़रूरत को लेकर पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह कहते हैं, "लॉकडाउन के दौरान हुआ ये कि लोगों ने सरकार की घर में रहने की अपील को गंभीरता से नहीं लिया. लोग बाहर आते-जाते रहे, एक-दूसरे से मिलते रहे. ज़रूरी सामान की दुकानों पर भीड़ भी लगाई. दुकानें और दफ्तर नहीं खुले थे लेकिन लोग टहलने के लिए ही बाहर निकल गए. कुछ लोग अपने राज्य वापस लौटने की कोशिश कर रहे थे. ऐसे में प्रशासन को कर्फ़्यू लगाना ही पड़ा क्योंकि सख्ती के बिना लोग मान नहीं रहे थे. मुझे लगता है कि आपातस्थिति में कर्फ़्यू लगाना ही एक विकल्प था."
विक्रम सिंह ये भी कहते हैं कि कर्फ़्यू में ये देखना भी ज़रूरी है कि कुछ आकस्मिक चीज़ों का ध्यान रखा जाए. अचानक से कर्फ़्यू लगा है तो जो लोग कहीं से आ रहे हैं और रास्ते में हैं वो अपने घर तक पहुंच जाएं. चिकित्सा सुविधा के लिए नियमों में ढील दी जाए. एंबुलेंस के लिए कर्फ़्यू पास पर बहुत ज़्यादा ज़ोर ना हो. हालांकि, हमेशा से कर्फ़्यू के दौरान इन बातों का ध्यान रखा जाता रहा है. संक्रमण जैसी स्थितियों में लोगों को घरों में रखने के लिए व्यावहारिक रूप से कर्फ़्यू ज़्यादा प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है.
हालांकि, कर्फ़्यू के दौरान भी पुलिस बल के सामने कई चुनौतियां आती हैं.
पूर्व डीजीपी के मुताबिक कर्फ़्यू पूरे राज्य में लागू तो किया जा सकता है लेकिन इसके साथ व्यावहारिक समस्या ये आती है कि छोटे-छोटे गली-मोहल्लों में नज़र रखना पुलिसकर्मियों के लिए थोड़ा मुश्किल होता है. यहां लोगों को समझाया जाता है और पेट्रोलिंग की जाती है लेकिन ये एक चुनौतीपूर्ण काम होता है. फिर भी पुलिस बल क़ानून का उल्लंघन ना होने देने की पूरी कोशिश करता है.
कर्फ्यू कर्फ़्यूसीआरपीसी की धारा 144 के तहत लगाया जाता है. इसमें पांच या पांच से ज़्यादा लोगों के इकट्ठा होने की मनाही होती है. ये प्रशासनिक आदेश होता है. जहां पुलिस कमिश्नर है वहां उनके द्वारा, जहां ज़िलाधिकारी है, वहां उनके द्वारा अन्यथा शासन के स्तर पर भी ये किया जा सकता है.
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