कोरोना वायरस: क्या 'कम्युनिटी ट्रांसमिशन' से बढ़ सकती हैं भारत की मुसीबतें

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
भारत में कोरोना वायरस की टेस्टिंग को लेकर कई सोशल मीडिया यूज़र चर्चा कर रहे हैं.
लोग सवाल कर रहे हैं कि, "कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या कई बड़े देशों में भी तेज़ी से बढ़ी है, लेकिन भारत में यह संख्या जिस रफ़्तार से बढ़ती हुई बताई जा रही है, कहीं उसकी वजह टेस्टिंग से संबंधित कुछ गड़बड़ियाँ तो नहीं हैं?"
दुनियाभर में अब तक दो लाख से ज़्यादा लोग कोरोना वायरस से संक्रमित पाये गए हैं और 8,600 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.
वहीं भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 150 पार जा चुकी है और बुधवार शाम तक तीन लोगों की मौत COVID-19 की वजह से हो चुकी है. अब तक भारत में कुल 17 प्रदेशों में कोरोना संक्रमण के मरीज़ मिले हैं.
इटली, ईरान, स्पेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ़्रांस, दक्षिण कोरिया और अमरीका समेत कई अन्य समृद्ध देशों से तुलना करें तो भारत की स्थिति फ़िलहाल काफ़ी नियंत्रित दिखाई पड़ती है.
भारत सरकार ने पिछले दो सप्ताह में कई यात्रा संबंधी प्रतिबंध लागू किये हैं. वहीं राज्य सरकारों ने भी 31 मार्च तक लोगों के एक जगह पर इकट्ठा होने को रोकने के लिए कई तरह के प्रतिबंध लागू कर दिये हैं.
केंद्र सरकार के नेतृत्व में काम करने वाली संस्था, इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च ने मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह दावा किया है कि "भारत फ़िलहाल दूसरे चरण में है और अब तक 'कम्युनिटी ट्रांसमिशन' का कोई मामला सामने नहीं आया है."
लेकिन आईसीएमआर के इस दावे का आधार क्या है? और क्या 'कम्युनिटी ट्रांसमिशन' होने पर स्थिति बिगड़ेगी? महामारी के फैलने को कितने चरणों में बाँटकर देखा जा रहा है और कितने लोगों के अब तक टेस्ट किये जा चुके हैं?
इन सभी सवालों के जवाब इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में दिया है जिसे संस्थान के डीजी डॉक्टर बलराम भार्गव ने जारी किया है.

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महामारी के चार चरण
पिछले दो सप्ताह में जितनी बार भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रेस वार्ता की है, उसमें इस बात पर विशेष ज़ोर दिया गया है कि भारत में अभी तीसरा चरण नहीं आया है.
आईसीएमआर के अनुसार कोरोना वायरस महामारी के फैलने के चार चरण हैं.
- पहले चरण में वे लोग कोरोना वायरस से संक्रमित पाये गए जो दूसरे देश से भारत में आये और उनमें पहले से ही कोरोना के विषाणु थे. यह स्टेज भारत पार कर चुका है क्योंकि ऐसे लोगों से भारत में स्थानीय स्तर पर संक्रमण अब फैल चुका है.
- दूसरे चरण में स्थानीय स्तर पर संक्रमण फैलता है, लेकिन ये वे लोग होते हैं जो किसी ना किसी ऐसे संक्रमित शख़्स के संपर्क में आये जो विदेश यात्रा करके लौटा हो.
- तीसरा स्तर और थोड़ा ख़तरनाक माना जाता है. ये है 'कम्युनिटी ट्रांसमिशन' जिसे लेकर भारत सरकार चिंतित है. 'कम्युनिटी ट्रांसमिशन' तब होता है जब कोई व्यक्ति सीधे तौर पर संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए बिना या संक्रमित देश की यात्रा किए बिना ही इसका शिकार हो जाता है.
- और चौथा चरण तब होता है, जब संक्रमण स्थानीय स्तर पर महामारी का रूप ले लेता है.

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वायरस फैलने की बड़ी वजह
भारत में कोरोना वायरस के प्रकोप को न्यूनतम रखने के लिए सरकार को चाहिए कि इसे दूसरे चरण में ही रोक लिया जाये.
इस बात को ध्यान में रखते हुए ही सरकार ने सभी देशों के साथ जुड़ी अपनी सीमाएं सील कर दी हैं, ट्रेनों, अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और बसों को निलंबित किया है. संक्रमित देशों से लोगों की भारत में एंट्री पर रोक लगा दी गई है.
सैकड़ों भारतीय जो चीन, ईरान और इटली जैसे देशों में फंसे थे उन्हें भारत सरकार अपनी निगरानी में भारत लेकर आई है और उन्हें कोरोना वायरस से लड़ने के लिए बनाये गए क्वारंटीन सेंटरों में रखा गया है. लेकिन ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो अलग-अलग हवाई रूट लेकर पिछले तीन हफ़्तों में भारत में दाख़िल हुए हैं.
हवाई अड्डों पर हुई स्क्रीनिंग में इस तरह के अधिकांश लोगों में किसी तरह के लक्षण नहीं दिखे. ऐसे में ऐहतियात के तौर पर दो से तीन हफ़्ते के लिए उन्हें अपने घरों में ही रहने का सुझाव दिया गया था.
लेकिन ऐसे कुछ मामले पिछले दिनों सामने आ चुके हैं जिनमें या तो सावधानी नहीं बरती गई या फिर तथ्यों को प्रशासन से छिपाया गया, जैसे पिछले कुछ समय में किस देश की यात्रा करके लौटे हैं?


आईसीएमआर की रिपोर्ट में इस रवैये को ही कोरोना वायरस के फैलने की सबसे बड़ी वजह माना गया है.
भारत सरकार ने दावा किया है कि अब तक 11,500 से ज़्यादा लोगों की कोविड-19 के लिए जाँच की जा चुकी है.
सरकार ने 9 मार्च और फिर 17 मार्च को कोरोना वायरस की जाँच से जुड़ी एडवाइज़री जारी की थी. इसमें कहा गया कि भारत सरकार कोविड-19 के लिए अंधाधुंध टेस्टिंग नहीं कर सकती. यह भी कहा गया है कि संसाधनों के सही इस्तेमाल के लिए टेस्टिंग की एक रणनीति बनाई गई है जिसे 'टेस्टिंग प्रोटोकॉल' कहा जा रहा है.

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'टेस्टिंग प्रोटोकॉल' बताएगा किसकी नहीं होगी टेस्टिंग?
इस टेस्टिंग प्रोटोकॉल के अनुसार बीते 14 दिनों में विदेश की यात्रा करके लौटे सभी लोगों को 14 दिन के लिए क्वारंटीन में यानी अलग-थलग रहने के लिए कहा जा रहा है. इस दौरान अगर उनमें कोई लक्षण दिखाई देते हैं, जैसे- ज़ुकाम, खाँसी या साँस लेने में तक़लीफ़, तो कोरोना संक्रमण का पता लगाने के लिए उनके ख़ून की जाँच की जाएगी.
ख़ून की जाँच में अगर वे कोरोना वायरस से संक्रमित पाये जाते हैं, तो उन्हें आइसोलेट किया जाएगा यानी और डॉक्टरों की निगरानी में रखा जाएगा.
अगर टेस्टिंग के दौरान संपर्क में आये लैब के किसी कर्मी में बीमारी के कुछ लक्षण दिखाई देते हैं, तो उनका भी टेस्ट किया जाएगा.
कम्युनिटी ट्रांसमिशन है या नहीं, इसकी जाँच के लिए यह प्रोटोकॉल बनाया गया है.
इसके अनुसार SARI यानी साँस से संबंधित किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज़ों के समूह में से बीस लोगों के सैंपल हर सप्ताह लिये जा रहे हैं. ये वो मरीज़ हैं जो 51 सरकारी केंद्रों में भर्ती हैं जहाँ कोरोना संक्रमित लोगों का इलाज चल रहा है.
फ़रवरी में ये रेंडम सैंपलिंग शुरू की गई थी. फ़रवरी में लिए गए सभी 500 सैंपल नेगेटिव पाए गए थे. मार्च में भी ये सैंपल लिये जा रहे हैं जिनके नतीजे अगले कुछ दिन में सामने आ जाएंगे.
इसी के आधार पर कहा जा रहा है कि भारत में फिलहाल कम्युनिटी ट्रांसमिशन के केस अभी नहीं हैं.
क्या हर सप्ताह 20 सैंपल काफ़ी हैं?
आईसीएमआर के डीजी डॉक्टर बलराम भार्गव ने कहा है कि "सैंपल हर हफ़्ते लिये जा रहे हैं, हर सेंटर से लिए जा रहे हैं, जो वहाँ की स्थानीय स्थिति का प्रतीकात्मक रूप बताते हैं."
"अब तक ये सैंपल नेगेटिव पाए गए हैं, वो भी उन लोगों के जो पहले से साँस से जुड़ी किसी समस्या से जूझ रहे हैं."
उन्होंने कहा कि "ऐसे में क्या सभी लोगों के टेस्ट करना संसाधनों की बर्बादी नहीं कहलाएगा. हम अस्पताल पहुँच रहे हर मरीज़ का सैंपल नहीं जाँच सकते."
उन्होंने बताया, "अभी जिन 51 सेंटरों में कोविड-19 के मरीज़ों को भर्ती किया जा रहा है, वहाँ इतने मरीज़ भर्ती नहीं हुए हैं जो हम सैंकड़ों लोगों के सैंपल हर सेंटर से ले सकें. अगर कुछ सेंपल पॉज़ीटिव आते हैं, तो हम आगे की रणनीति के बारे में विचार करेंगे. फ़िलहाल हमारी रणनीति सर्विलेंस करने की है जो बताती हैं कि भारत अभी फ़ेज़-2 में ही है. एक तय समय के बाद हम दोबारा उन मरीज़ों के सैंपल लेंगे, इसीलिए हम इसे सर्वे नहीं कह रहे हैं, सर्विलेंस कह रहे हैं."
आईसीएमआर के अधिकारियों की एक टीम ने हाल ही में एक प्रेस वार्ता में कहा कि "ऐसा नहीं है कि हम इन सैंपलों को देखते हुए निश्चिंत होकर बैठ गए हैं. पर दुनिया भर में वायरस किस तरह फैल रहा है, इसे जाँचने के लिए यही रेंडम सेंपलिंग का तरीक़ा अपनाया जाता है."

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क्या हम आगे के लिए तैयार हैं?
भारत सरकार के अनुसार देश में 71 टेस्टिंग यूनिट हैं जो आईसीएमआर के अंतर्गत काम कर रही हैं. इस हफ़्ते के आख़िर तक क़रीब 49 और सरकारी लैब कोविड-19 की जाँच के लिए तैयार हो जाएंगी. कोविड-19 की जाँच के लिए भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन से क़रीब दस लाख किट भी माँगी हैं.
आईसीएमआर ने यह भी दावा किया है कि 23 मार्च तक भारत में दो ऐसी लैब तैयार हो जाएंगी जहाँ रोज़ाना 1400 टेस्ट हो सकेंगे. इससे तीन घंटे के भीतर कोविड-19 की जाँच की जा सकेगी.
इस तरह की कुछ अन्य मशीनें भी भारत सरकार ने विदेश से मंगवाई हैं. अमरीका और जापान के पास इस तरह की मशीने हैं जिनसे एक घंटे में कोविड-19 की जाँच की जा सकती है.

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