योगी सरकार के तीन साल: कितने पूरे हुए प्रमुख वादे

योगी आदित्यनाथ

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, लखनऊ से

सीएए विरोधी हिंसा, उसके बाद के क़ानूनी दांव-पेच और फिर कोरोना संकट की आपा-धापी के बीच योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी सरकार ने भी तीन साल पूरे कर लिए.

रिकॉर्ड बनाने के लिए मशहूर योगी सरकार ने एक रिकॉर्ड यह भी बनाया कि योगी आदित्यनाथ बीजेपी के ऐसे पहले मुख्यमंत्री बन गए, जिन्होंने तीन साल का कार्यकाल पूरा किया. बुधवार को तीन साल की उपलब्धियां बताने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मीडिया से बात की.

योगी आदित्यनाथ ने इन तीन सालों में अपनी सरकार की तारीफ़ करते हुए कहा कि उन्होंने न सिर्फ़ हर क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़े बल्कि तमाम चुनौतियों को भी अवसर में बदला.

हालांकि विपक्षी दल और कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक ऐसी तमाम उपलब्धियों पर सवाल भी खड़े कर रहे हैं. योगी आदित्यनाथ भले ही उपलब्धियों के लंबे चौड़े दावे कर रहे हों लेकिन ऐसी कई चुनौतियां बनी हुई हैं, जिन पर भारतीय जनता पार्टी पिछली सरकारों को घेरा करती थी और ख़ुद सरकार में आने पर उसने इन्हें दूर करने का वादा किया था.

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क़ानून व्यवस्था और महिला सुरक्षा

क़ानून व्यवस्था और महिला सुरक्षा को लेकर भारतीय जनता पार्टी न सिर्फ़ पिछली समाजवादी सरकार पर आक्रामक रहती थी बल्कि सरकार में आने पर उसे पूरी तरह से सुधार देने का भी वादा किया था.

सरकार आते ही, या यों कहें कि अभी सरकार ने ठीक से काम-काज सँभाला भी न था कि जगह-जगह एंटी रोमियो दस्ते बना दिए गए और देखते ही देखते वो चर्चा में आ गए. लेकिन उसके कुछ दिन बाद ही ये दस्ते कहां चले गए, किसी को पता नहीं.

वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा कहती हैं, "एंटी रोमियो अभियान तो इसलिए निष्क्रिय हो गया क्योंकि शुरुआत में ही इसे इतना विवादित बना दिया गया, लड़कियों और लड़कों को इतना परेशान किया जाने लगा कि जितनी यह उपलब्धियां बटोर पाया उससे ज़्यादा इसके ख़ाते में बदनामियां और ज़्यादतियां आ गईं. दूसरे, इसका कोई क़ायदे का अब तक सिस्टम नहीं बन पाया है. यहां तक कि कई बार इस दस्ते में शामिल महिला पुलिसकर्मियों तक से छेड़छाड़ की शिकायतें मिलने लगीं."

क़ानून-व्यवस्था के मामले में सरकार चाहे जितने दावे करे लेकिन वो विपक्ष के निशाने पर हमेशा रहती है. हालांकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2016 की तुलना में अपराध के हर क्षेत्र में कमी के दावे किए गए हैं लेकिन सरकार के इन दावों पर भी सवाल उठते हैं.

राज्य सरकार के प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री श्रीकांत शर्मा कहते हैं, "पिछली सरकारों की तुलना में साल 2017 के बाद अपराधों में काफ़ी कमी आई है. पहले की सरकारों में मुक़दमे दर्ज नहीं होते थे लेकिन हमारी सरकार में सख़्त निर्देश दिए हैं कि मुक़दमे तुरंत दर्ज किए जाएं. इसके बावजूद अपराध की संख्या में काफ़ी गिरावट आई है. आज अपराधी क़ानून के भय से या तो जेल के अंदर है या फिर उत्तर प्रदेश के बाहर है."

समाजवादी पार्टी के नेता उदयवीर सिंह कहते हैं कि अपराधी कितना डरे हुए हैं और अपराध कितने कम हैं ये आए दिन की ख़बरों से ही पता चल जाता है. उनके मुताबिक, "रेप, हत्या, डकैती, लूट की घटनाएं आम हो गई हैं. आज पूरा प्रदेश दहशत में है और सरकार कह रही है कि अपराध पर कंट्रोल कर लिया गया है. ख़ुद इन्हीं की पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय गृहमंत्री कह चुके हैं कि दिल्ली में दंगे भड़काने के लिए तीन सौ अपराधी आए थे. तो जब अपराधी थे नहीं तो दिल्ली कैसे चले गए."

वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा भी सरकार के इस दावे को सच नहीं मानतीं. उनका कहना है, "रेप की घटनाएं बढ़ी हैं और उससे ज़्यादा हैरानी वाली बात ये है कि रेप के बाद जलाकर मारने जैसी भयावह घटनाएं लगातार सामने आई हैं. उनके मुताबिक़, ये स्थितियां तभी आती हैं जब लोगों को क़ानून का डर नहीं होता."

किसान

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किसान कर्ज़माफ़ी

भारतीय जनता पार्टी ने इसे अपनी चुनावी घोषणा में कहा था कि कैबिनेट की पहली बैठक में ही किसानों का कर्ज़ माफ़ कर दिया जाएगा. सरकार में आने के बाद इस वादे को निभाने की कोशिश की गई और कैबिनेट की बैठक तब तक नहीं हुई जब तक कि कर्ज़माफ़ी की योजना नहीं बन गई और उसकी घोषणा के लिए सरकार तैयार नहीं हो गई. सरकार ने क़रीब 86 लाख लघु और सीमांत किसानों के 36 हज़ार करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ़ करने की घोषणा की.

सरकार की इस घोषणा के बाद तमाम किसानों के कर्ज़ माफ़ ज़रूर हुए लेकिन लाखों रुपये के बकाए किसानों के जब दो रुपये और चार रुपये के कर्ज़ माफ़ी के प्रमाण पत्र मिलने लगे तो बैंकों के इस गणितीय ज्ञान ने किसानों को हैरान कर दिया. ऐसे किसानों ने बैंकों से लेकर सरकार तक न जाने कितने चक्कर लगाए लेकिन बैंकों की गणित को वो झुठला नहीं पाए.

यही नहीं, कर्ज़माफ़ी की घोषणा के बावजूद बड़ी संख्या में किसान आज भी अपने कर्ज़े माफ़ होने की राह देख रहे हैं. किसान नेता और कांग्रेस पार्टी के किसान प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक शिवनारायण सिंह परिहार कहते हैं, "सरकार चाहे जो दावे करे लेकिन ज़मीनी हालात तो ये हैं कि अभी भी तमाम किसानों का कर्ज़ बाकी है. हां, कुछ किसानों के कर्ज़ माफ़ भी हुए हैं. लेकिन जिनके नहीं हुए हैं, उन्हें सरकारी बैंकों ने नोटिस जारी किए जिसकी वजह से कई किसान सदमे में मर गए. कई किसानों ने आत्महत्या कर ली. पूरे प्रदेश में किसानों ने आत्महत्या की है."

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बूचड़खानों पर प्रतिबंध और गोशाला

योगी सरकार ने शुरुआत में ही राज्य भर में चल रहे अवैध बूचड़खानों पर कार्रवाई शुरू की जिसे लेकर मीट कारोबारी हड़ताल पर भी गए. राज्य सरकार का दावा है कि सभी अवैध बूचड़खाने बंद हो गए हैं. बूचड़खानों पर कार्रवाई के अलावा सरकार का गायों की सुरक्षा और संरक्षा पर ख़ासा ज़ोर रहा है. ख़ुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गाय और गोशाला को लेकर काफ़ी संवेदनशील रहे हैं.

सरकार ने बड़ी संख्या में कान्हा गोशालाएं बनवाईं और अधिकारियों को सख़्त निर्देश दिए कि सड़क पर किसी तरह के गोवंश न दिखें. लेकिन सरकार की यह योजना पूरे प्रदेश में औंधे मुंह गिरी दिख रही है. एक ओर जहां गोशालाओं में हर दिन बड़ी संख्या में गायों के मरने की ख़बरें आती रहती हैं तो दूसरी ओर, पूरे प्रदेश में किसान आवारा गायों से अपनी फ़सलों की रक्षा के लिए संघर्ष करते दिख रहे हैं.

सड़क

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24 घंटे बिजली और गड्ढामुक्त सड़कें

बीजेपी के चुनावी वादों में 24 घंटे बिजली और गड्ढामुक्त सड़कों की ख़ूब चर्चा हुई. सरकार ने शुरुआत में काफ़ी तेज़ी से इन पर काम भी हुआ और काम अभी भी हो रहा है लेकिन दोनों ही वादे पूरे होने की सीमा से अभी भी काफ़ी दूर हैं. बीबीसी से बातचीत में ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा दावा हैं कि शहरों में 24 घंटे और गांवों में 18 घंटे बिजली मिल रही है, लेकिन कुछ महानगरों को छोड़ दिया जाए तो यह दावा खरा उतरता नहीं दिखता. यहां तक कि राजधानी लखनऊ में भी चौबीस घंटे बिजली मिलने की बात करना बेमानी ही होगा.

सरकार ने सौ दिन के भीतर सभी सड़कों को गड्ढामुक्त करने का लक्ष्य तय किया था. कुछ सड़कों के गड्ढ़े भरे भी गए लेकिन एक साल के भीतर ही भरे गए गड्ढ़े फिर से दिखाई देने लगे. जहां तक गड्ढ़ामुक्त सड़कों की बात है तो राज्य सरकार के एक बड़े अधिकारी नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, "ये एक ऐसा वादा है जिसे किया ही जा सकता है, निभाया नहीं जा सकता."

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शिक्षा व्यवस्था

योगी सरकार का दावा है कि उनकी सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता के लिए कई अहम क़दम उठाए गए हैं. सरकार का कहना है कि बेसिक शिक्षा में स्कूल चलो अभियान के तहत पिछले तीन साल में 4 करोड़ 71 लाख से अधिक बच्चों का नामांकन किया गया और पहली बार सरकारी स्कूलों में स्वेटर, जूते और मोजे का वितरण किया गया. सरकार हर बार नक़लविहीन बोर्ड परीक्षाओं का भी दावा कर रही है लेकिन हर बार उसके दावे खोखले साबित हुए हैं.

सरकारी स्कूलों में मिड डे मील में होने वाली लापरवाही आए दिन अख़बारों की सुर्खियों में रहती है तो दूसरी ओर अंग्रेज़ी माध्यम के प्राइमरी स्कूल बन ज़रूर गए हैं लेकिन ये स्कूल अंग्रेज़ी माध्यम के अध्यापकों का अभी इंतज़ार ही कर रहे हैं. यही नहीं, शिक्षकों की हाज़िरी के लिए प्रेरणा ऐप समेत तमाम प्रयोगों के चलते अध्यापकों की नाराज़गी भी मोल लेनी पड़ी है. जहां तक प्रेरणा ऐप का सवाल है तो वो अब तक पूरी तरह से अमल में नहीं आ सका है.

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