कोरोना से भारत के शेयर मार्केट में कोहराम

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- एक महीने में दुनियाभर के बाज़ार 20 से 40 फ़ीसदी तक टूटे
- कोरोना के कहर से दुनियाभर के बाज़ारों में हाहाकार
- एक महीने में दुनियाभर के बाज़ार 19 से 40% तक टूटे
- अमरीका का डाओ जोंस 28% टूटा
- ब्रिटेन का FTSE 30% टूटा
- जर्मनी का सूचकांक DAX 34% गिरा
- फ्रांस का CAC 34% लुढ़का
- सेंसेक्स में 20% से अधिक की गिरावट
- ब्रेंट क्रूड में 39% से अधिक की फिसलन

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कोरोना वायरस ने सबसे पहले चीन में तबाही मचाना शुरू किया था, लेकिन अब ये चीन की सीमाओं से बाहर निकलकर दुनिया के तमाम देशों में क़हर बरपा रहा है और महामारी का रूप ले चुका है.
हालात ये हो चुके हैं कि कोरोना के कुल सक्रिय मामलों में से सिर्फ़ 30 फ़ीसदी ही चीन में हैं और बाकी 70 फ़ीसदी मामले दुनिया के अलग-अलग देशों से सामने आए हैं.
चीन में जहाँ हालात सुधरने की ख़बरें सामने आ रही हैं, वहीं कोविड-19 से इटली, दक्षिण कोरिया और ईरान में लॉकडाउन की स्थिति बन गई है.
इटली में बनी स्थितियों के बाद जर्मनी समेत कई यूरोपीय देशों को कोरोना का डर सता रहा है. ज़ाहिर का इसका असर वहाँ की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है. अर्थव्यवस्था की पतली होती जा रही इसी हालत से शेयर बाज़ारों की भी कंपकंपी छूट रही है और निवेशकों में हड़कंप है.
रूस और ओपेक देशों में क़ीमतों को लेकर चल रही खींचतान ने कच्चे तेल को वहाँ पहुँचा दिया, जहाँ दो महीने पहले तक शायद ही कोई इसकी कल्पना कर रहा हो. मई 2011 में जहाँ कच्चे तेल की क़ीमत 113 डॉलर प्रति बैरल थी, वहीं मार्च 2020 में ये 34 डॉलर पर पहुँच गई.
शुक्रवार को भारतीय शेयर बाज़ारों में बिकवाली इस क़दर हावी हो गई थी कि 10 फ़ीसदी का लोअर सर्किट लगने के बाद कारोबार को 45 मिनट के लिए रोक देना पड़ा था. कोरोना से सहमे निवेशकों ने कुछ हौसला दिखाया और निचले स्तरों से हुई ख़रीदारी से बाज़ार में कुछ हरियाली दिखी.
शेयर बाज़ारों में अपना पैसा बचाने के लिए निवेशकों में मची इस हड़कंप से दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों के भी पसीने छूट रहे हैं. बैंकिंग सिस्टम में नक़दी की कमी न हो इसके लिए तो इंतज़ाम किए ही जा रहे हैं, साथ ही ब्याज दरों में कमी भी की जा रही है ताकि लोगों के हाथों में खर्च के लिए अधिक पैसा रहे.

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कोरोना वायरस के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए दुनियाभर के केंद्रीय बैंक आगे आ रहे हैं. अमरीकी फ़ेडरल रिज़र्व बैंक ने ब्याज़ दरों में कटौती की है. इसके तहत अब बैंक 0 से 0.25 प्रतिशत की ब्याज दर पर क़र्ज़ देगा.
न्यूज़ीलैंड के केंद्रीय बैंक ने भी आपातकालीन बैठक के बाद ब्याज़ दरों में 75 बेसिस प्वाइंट्स की कटौती की है. संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का केंद्रीय बैंक 27 अरब डॉलर के राहत पैकेज की घोषणा कर चुका है. सऊदी अरब ने 13 अरब डॉलर के राहत पैकेज की घोषणा की है.
भारतीय रिज़र्व बैंक ने भी शुक्रवार को कहा कि वैश्विक स्थितियों के साथ-साथ घरेलू हालात पर उसकी क़रीबी नज़र है और नक़दी की कमी न हो और बाज़ारों में स्थिरता रहे, इसके लिए वो पर्याप्त क़दम उठाएगा.
लेकिन इन क़दमों और रिज़र्व बैंक के आश्वासन का कोई असर दिख नहीं रहा है. अमरीकी और यूरोपीय बाज़ारों के वायदा कारोबारों में भारी बिकवाली से एशिया के निवेशकों का हौसला भी जाता रहा और सोमवार को बाज़ार खुलते ही धड़ाधड़ बिकवाली होने लगी. सेंसेक्स 2713 अंक गिरकर 31,390 अंकों पर बंद हुआ जबकि निफ्टी 756 अंकों की गिरावट के साथ 9,199 पर बंद हुआ.

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ऐसा नहीं कि निवेशकों का ज़ोर कुछ ख़ास शेयरों को बेचने पर रहा. बैंकिंग, फ़ाइनेंशियल, रियल्टी और मेटल समेत सभी सेक्टर इंडेक्स आठ से नौ फ़ीसदी की गिरावट के साथ बंद हुए.
एस्कॉर्ट्स सिक्योरिटीज़ के रिसर्च हेड आसिफ़ इकबाल भी मानते हैं कि शेयर बाज़ारों के हालात सिर्फ़ भारत ही नहीं दुनिया भर में ख़राब और चिंताजनक हैं. उनका कहना है, "अलग-अलग देशों के सेंट्रल बैंकों का ब्याज दरें घटाना और राहत पैकेजों की घोषणा करना अपने आप में संकेत है कि कोरोना वायरस का असर उससे अधिक है जितना सोचा गया था. आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती, व्यापार और ट्रैवल पर पाबंदियों से दुनियाभर की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है."
सबसे बड़ी दिक्कत विदेशी संस्थागत निवेशकों के भरोसे की है. घरेलू बाजारों से पैसा निकालने के कारण भी बाज़ार के ऊपर दबाव है. इस महीने अब तक निवेशक 35,000 करोड़ रुपए से अधिक निकाल चुके हैं और लगता नहीं कि अगले कुछ दिनों तक इस सिलसिले पर लगाम लग सकेगी.

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