मध्य प्रदेश के बाद क्या राजस्थान और महाराष्ट्र में भी कांग्रेस को है ख़तरा?

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- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने से पार्टी जैसे संकट में फंसी है, उसके बाद अब कांग्रेस शासित अन्य राज्यों में भी उसके अस्तित्व पर सवाल उठने लगे हैं.
आगामी ख़तरे की बात करें तो राजस्थान और महाराष्ट्र का नाम सबसे ऊपर आता है.
राजस्थान में जहां कांग्रेस की सरकार है, वहीं महाराष्ट्र में वो सरकार बनाने में भागीदार है.राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन की खटपट कई बार खुलकर सामने आ जाती है.
महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस को कितनी मशक्कत करनी पड़ी थी, ये भी किसी से छिपा नहीं है.
मुश्किल भरी राह तय करके महाराष्ट्र और राजस्थान में अपनी जगह बनाने वाले कांग्रेस क्या अब इन्हें भी गंवाने की राह पर है? ये समझने के लिए दोनों राज्यों की स्थिति पर बारी-बारी से नज़र डालते हैं.

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राजस्थान
राजस्थान में कांग्रेस की स्थिति फ़िलहाल मध्य प्रदेश जैसी नहीं है. राजस्थान में कांग्रेस और बीजेपी की सीटों की संख्या में अंतर काफ़ी ज़्यादा है.
200 सीटों वाली राजस्थान विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के 72 विधायक हैं और बहुमत साबित करने के लिए कम से कम 101 विधायकों की ज़रूरत होगी.
यानी बीजेपी अगर यहां सरकार बनाना चाहे तो उसे 29 और विधायकों की ज़रूरत होगी.
राजस्थान की राजनीति से वाकिफ़ वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ कहते हैं कि राज्य में अगर नंबर को ध्यान में रखें तो बीजेपी के लिए यहां महाराष्ट्र वाला फ़ॉर्मूला लगाना आसान नहीं होगा.
बारेठ ये भी मानते हैं कि असहमतियां और नाराज़गी होने के बावजूद सचिन पायलट राजस्थान में वो कदम नहीं उठाएंगे जो सिंधिया ने एमपी में उठाया.
उन्होंने कहा, "पहली बात तो ये कि सचिन पायलट अकेले इतने विधायकों का समर्थन जुटा नहीं पाएंगे. वो 10-12 से ज़्यादा विधायकों को साथ नहीं ला पाएंगे. हां, मौके का फ़ायदा उठाकर वो अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश ज़रूर करेंगे. हो सकता है कि लगे हाथ वो हाईकमान पर दबाव डालकर अपने हित में कोई फ़ैसला करा लें. इसके अलावा सचिन पायलट ज़्यादा कुछ नहीं करेंगे क्योंकि वो बहुत गुणा-गणित लगाकर कदम उठाने वालों में से हैं."
पायलट के पास संख्याबल नहीं है, ये तभी ज़ाहिर हो गया था जब मुख्यमंत्री पद के लिए अड़े होने के बावजूद उन्हें कुर्सी नहीं मिली थी.
बारेठ कहते हैं कि सिंधिया के लिए बीजेपी में काफ़ी कुछ है. उन्हें राज्यसभा सीट मिल सकती है, वो केंद्र में मंत्री बन सकते हैं.
सचिन पायलट पहले से ही उप मुख्यमंत्री हैं, प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष भी हैं. ऐसे में वो सिंधिया की तरह सीमा नहीं लाघेंगे क्योंकि बीजेपी के पास उन्हें देने के लिए बहुत कुछ नहीं है.
राजस्थान की राजनीति पर नज़र रखने वाले स्थानीय पत्रकारअवधेश अकोदिया कहते हैं कि राजस्थान में बीजेपी की राह इसलिए भी आसान नहीं है क्योंकि वहां उनके पास शिवराज सिंह चौहान जैसा कोई कद्दावर नेता नहीं है.
अकोदिया कहते हैं, "वसुंधरा राजे को मोदी-शाह की जोड़ी बहुत ज़्यादा पसंद नहीं करती इसलिए वो उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाएगी, ये मुश्किल है. इसलिए सचिन पायलट को देने के लिए भी बीजेपी के पास बहुत कुछ नहीं है. मुख्यमंत्री वो उन्हें बनाएगी नहीं और केंद्र में भेजने के लिए पार्टी के पास पहले से ही बहुत से नेता मौजूद हैं."
अवधेश अकोदिया का मानना है कि सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया की तुलना नहीं की जा सकती.
वो कहते हैं, "पायलट के उलट सिंधिया ने कम उम्र में ही सत्ता का स्वाद चख लिया था. कम उम्र में वो सांसद बन गए, चार बार सांसद बने और दो सरकारों में मंत्री भी रहे. ये पहली बार है जब उनके पास कोई बड़ा पद नहीं था. सचिन पायलट के साथ ऐसा नहीं है. पांच साल पहले तक उनके पास कुछ नहीं था लेकिन आज वो उप मुख्यमंत्री भी हैं और प्रदेश कांग्रेस समिति के प्रमुख भी."
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही राजस्थान में अभी ख़तरा गंभीर नज़र न आ रहा हो लेकिन मध्य प्रदेश और कर्नाटक से सबक लेते हुए कांग्रेस को सावधान हो जाना चाहिए.
ख़ासकर तब जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने बेटे वैभव गहलोत की हार के लिए सार्वजनिक तौर पर उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट को ज़िम्मेदार ठहरा चुके हों.
नारायण बारेठ कहते हैं, "कांग्रेस को ज़मीनी सच्चाई और पार्टी की अदंरूनी कलह ध्यान में रखना चाहिए क्योंकि दरार बढ़ते ही बीजेपी उससे सत्ता हथियाने की कोशिश करेगी."

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महाराष्ट्र
मध्य प्रदेश के घटनाक्रम के बाद शिवसेना नेता संजय राऊत ने कहा कि महाराष्ट्र की सरकार सुरक्षित है और वहां 'एमपी वायरस' नहीं घुस पाएगा.
288 सीटों वाली महाराषट्र विधानसभा में 2019 में हुए चुनाव में बीजेपी को 105, शिव सेना को 56, एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटें मिली थीं.
बीजेपी ने वहां सरकार बनाने की पूरी कोशिश की. पार्टी ने देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री और एनसीपी के अजित पवार को उप मुख्यमंत्री पद की शपथ भी दिला थी लेकिन फिर पूर्व सहयोगी रहा शिवसेना उसके ख़िलाफ़ चली गई.
शिवसेना चाहती थी कि ढाई साल के लिए उसका मुख्यमंत्री बने और ढाई साल के लिए बीजेपी का. कोई समझौता न होने पाने की स्थिति में आख़िरकार शिवसेना,एनसीपी और कांग्रेस ने मिलकर गठबंधन सरकार बनाया.
ज़ाहिर है बीजेपी अगर महाराष्ट्र की सत्ता वापस पाना चाहती है तो इसके लिए उसे कांग्रेस की शिवसेना और एनसीपी की कमज़ोरियां पर ज़्यादा ध्यान देना होगा. मध्य प्रदेश की तरह यहां दारोमदार कांग्रेस के ऊपर नहीं है.
महाराष्ट्र की राजनीति को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकारविजय चोरमारे का मानना है कि बीजेपी के लिए वहां मध्य प्रदेश जैसी स्थिति पैदा कर पाना आसान नहीं होगा.
वो कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि महाराष्ट्र की सरकार पर कोई गंभीर ख़तरा है क्योंकि जिन्हें सत्ता के लिए पार्टी छोड़कर बीजेपी में जाना था वो लोकसभा चुनाव के पहले ही चले गए थे. फिर चाहे वो शिवसेना के हों, कांग्रेस के हों या एनसीपी के. अभी जो लोग मूल पार्टियों में बने हुए हैं वो अपनी राजनीतिक विचारधारा से कुछ न कुछ वास्ता तो ज़रूर रखते हैं.''
चोरमारे के मुताबिक़ अगर कुछ लोग जाना भी चाहें तो उन्हें अपनी विधायकी बरक़रार रखने के लिए दल बदल क़ानून के तहत कम से कम दो तिहाई की संख्या में पार्टी छोड़नी होगा और इतनी बड़ी संख्या में विधायकों का ख़तरा मोलकर बग़ावत करना मुश्किल लगता है.
चोरमारे कहते हैं कि मध्य प्रदेश में जो कुछ हुआ उससे महाराष्ट्र में कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी सतर्क ज़रूर हो गए होंगे.
उन्होंने कहा, "यहां के नेता परिपक्व और पार्टी की विचारधारा को अहमियत देने वाले हैं. चाहे वो अशोक चह्वाण हों या पृथ्वीराज चह्वाण, वो वैचारिक रूप से मज़बूत हैं. उन्हें कोई नाराज़गी होगी भी तो वो पार्टी को साथ लेकर चलने की कोशिश करेंगे, पार्टी के भविष्य के बारे में सोचेंगे."
क्या मिलिंद देवड़ा जैसे नेता भी ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा कदम उठा सकते हैं? इसके जवाब में चोरमारे कहते हैं कि इसके आसार कम हैं.
वो कहते हैं, "सिंधिया के पास अपना जनाधार है. पिछले चुनाव को छोड़ दें तो जनता उन्हें चुनती रही है और साथ ही संघ परिवार से उनका पुराना रिश्ता है. राजघराने वैसे भी दक्षिणपंथी विचारधारा के करीब रहते हैं. इसके उलट सचिन पायलट राजस्थान में बाहरी हैं. मिलिंद देवड़ा न तो चुनकर आए हैं और न ही मुंबई कांग्रेस में उनकी वैसी पैठ नहीं है.''
चोरमारे कहते हैं कि पायलट और देवड़ा जाने से कांग्रेस को नुक़सान ज़रूर होगा लेकिन वो ख़ुद उतनी मज़बूत स्थति में नहीं हैं कि बीजेपी में अपनी जगह बना सकें.
बीजेपी को उनके आने से फ़ायदा भी होगा लेकिन बदले में उन्हें कुछ देने के लिए बीजेपी के साथ बहुत संभावनाएं नहीं हैं इसलिए ऐसा होना फ़िलहाल मुश्किल है.

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हाथ आई सत्ता क्यों गँवा रही है कांग्रेस?
कर्नाटक और मध्य प्रदेश ऐसे ताज़ा उदाहरण है जब कांग्रेस सरकार संकट में घिरी. जहां कर्नाटक में कांग्रेस ने कुर्सी गंवा दी, वहीं मध्य प्रदेश में बीजेपी उसके सामने बहुमत साबित करने की चुनौती पेश कर सकती है.
कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार विश्वास मत हासिल नहीं कर सकी और बीएस येदियुरप्पा ने सरकार बना लिया.
सिंधिया के अपने विधायकों समेत पार्टी छोड़ने के बाद मध्य प्रदेश में अगले कुछ दिनों में फ़्लोर टेस्ट होगा और वहां की तस्वीर भी साफ़ हो जाएगी. अगर कमलनाथ विश्वास मत साबित नहीं कर पाए तो उन्हें कुर्सी छोड़नी होगी.
राजस्थान और महाराष्ट्र ख़तरे से पूरी तरह अछूते हैं, ऐसी भविष्यवाणी भी नहीं की जा सकती.
इन सबके बीच सवाल ये है कि आख़िर कांग्रेस इतनी कमज़ोर क्यों पड़ जा रही है? पार्टी अपने भीतर पल रही फूट शांत क्यों नहीं कर पा रही है?
राजनीतिक विश्लेषक अपर्णा द्विवेदी का मानना है कि कांग्रेस की सबसे बड़ी कमज़ोरी नेतृत्व का अभाव है.
वो कहती हैं, "लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल गांधी इस्तीफ़ा देकर किनारे हो गए. प्रियंका गांधी अपनी मर्ज़ी से 'सीज़नल कैंपेनिंग' करती हैं. सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष भले हैं लेकिन कई वजहों से वो पार्टी पर पहले की तरह ध्यान नहीं दे पा रही हैं. कांग्रेस में नेतृत्व का संकट कितना बड़ा है, उसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उसके पास अपना अध्यक्ष तक नहीं है."
अपर्णा कहती हैं कि कांग्रेस अब उस स्थिति में भी नहीं है कि वो विचार-विमर्श करके और कुछ रणनीतियों के ज़रिए चीजें संभाल ले.
अपर्णा के मुताबिक़ अब कांग्रेस को अपना नेतृत्व बदलने और पूरी कायापलट करने की ज़रूरत है, तभी वो ख़ुद को बचा पाएगी.
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